Wednesday, September 18, 2013

सौरभ राय की कवितायें

सौरभ राय 

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भौतिकी
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याद हैं वो दिन संदीपन

जब हम

रात भर जाग कर

हल करते थे

रेसनिक हेलिडे

एच सी वर्मा

इरोडोव ?


 
हम ढूंढते थे वो एक सूत्र

जिसमे उपलब्ध जानकारी डाल

हम सुलझा देना चाहते थे

अपनी भूख

पिता का पसीना

माँ की मेहनत

रोटी का संघर्ष

देश की गरीबी !


 
हम कभी

घर्षणहीन फर्श पर फिसलते

दो न्यूटन का बल आगे से लगता

कभी स्प्रिंग डाल कर

घंटों ऑक्सिलेट करते रहते
 
और पुली में लिपट कर

उछाल दिए जाते

प्रोजेक्टाइल बनाकर !


 
श्रोडिंगर के समीकरण

और हेसेनबर्ग की अनिश्चित्ता का

सही अर्थ

समझा था हमने |

सारे कणों को जोड़ने के बाद

अहसास हुआ था -

“अरे ! एक रोशनी तो छूट गयी !”

हमें ज्ञात हुआ था

इतना संघर्ष

हो सकता है बेकार

हमारे मेहनत का फल फूटेगा

महज़ तीन घंटे की

एक परीक्षा में |


 
पर हम योगी थे

हमने फिज़िक्स में मिलाया था

रियलपॉलिटिक !

हमने टकराते देखा था

पृथ्वी से बृहस्पति को |

हमने सिद्ध किया था

कि सूरज को फ़र्क नहीं पड़ता

चाँद रहे न रहे |


 
राह चलती गाड़ी को देख

उसकी सुडोलता से अधिक

हम चर्चा करते

रोलिंग फ़्रीक्शन की |

eiπ को हमने देखा था

उसके श्रृंगार के परे
 
हमने बहती नदी में

बर्नोली का सिद्धांत मिलाया था

हमने किसानों के हल में

टॉर्क लगाकर जोते थे खेत |


 
हम दो समय यात्री थे

बिना काँटों वाली घड़ी पहन

प्रकाश वर्षों की यात्रा

तय की थी हमने

‘उत्तर = तीन सेकंड’

लिखते हुए |


 
आज

वर्षों बाद

मेरी घड़ी में कांटें हैं

जो बहुत तेज़ दौड़ते हैं

जेब में फ़ोन

फ़ोन में पैसा

तुम्हारा नंबर है

पर तुमसे संपर्क नहीं है |

पेट में भूख नहीं

बदहज़मी है |

देश में गरीबी है |


 
सच कहूँ संदीपन

सूत्र तो मिला

समाधान नहीं ||


सिनेमा
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सूरज की आँखें
टकराती हैं
कुरोसावा की आँखों से
सिगार के धुंए से
धीरे धीरे
भर जाते हैं
गोडार्ड के
चौबीस फ्रेम ।
 
हड्डी से स्पेसशिप में
बदल जाती है
क्यूब्रिक की दुनिया
बस एक जम्प कट की बदौलत
और चाँद की आँखों में
धंसी मलती है
मेलिएस की रॉकेट ।
 
इटली के ऑरचिर्ड में
कॉपोला के पिस्टल से
चलती है गोली
वाइल्ड वेस्ट के काउबॉय
लियॉन का घोड़ा
फांद जाता है
चलती हुई ट्रेन ।
 
बनारस की गलियों में
दौड़ता हुआ
नन्हा सत्यजीत राय
पहुँचता है
गंगा तट तक
माँ बुलाती है
चेहरा धोता हुआ
पाता है
चेहरा खाली
चेहरा जुड़ा हुआ
इन्ग्मार बर्गमन के
कटे फ्रेम से ।
 
फेलीनी उड़ता हुआ
अचानक
बंधा पता है
आसमान से
गिरता है जूता
चुपचाप हँसता है
चैपलिन
फीते निकाल
नूडल्स बनता
जूते संग खाता है ।
 
बूढ़ा वेलेस
तलाशता है
स्कॉर्सीज़ की टैक्सी में
रोज़बड का रहस्य ।
 
आइनस्टाइन का बच्चा
तेज़ी से
सीढ़ियों पर
लुढ़कता है ।
सीढ़ियाँ अचानक
घूमने लगती हैं
अपनी धुरी पर
नीचे मिलती है
हिचकॉक की
लाश !
 
एक समुराई
धुंधले से सूरज की तरफ
चलता जाता है ।
हलकी सी धूल उड़ती है ।
स्क्रीन पर
लिखा हुआ सा
उभरने लगता है -
‘ला फ़िन’
‘दास इंड’
‘दी एन्ड’
 
रील
घूमती रहती है ।


संतुलन
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मेरे नगर में
मर रहे हैं पूर्वज
ख़त्म हो रही हैं स्मृतियाँ
अदृश्य सम्वाद !
किसी की नहीं याद -
हम ग़ुलाम अच्छे थे
या आज़ाद ?
 
बहुत ऊँचाई से गिरो
और लगातार गिरते रहो
तो उड़ने जैसा लगता है
एक अजीब सा
समन्वय है
डायनमिक इक्वीलिब्रियम !
 
अपने उत्त्थान की चमक में
ऊब रहे
या अपने अपने अंधकार को
इकट्ठी रोशनी बतलाकर
डूब रहे हैं हम ?
 
हमने खो दिये
वो शब्द
जिनमें अर्थ थे
ध्वनि, रस, गंध, रूप थे
शायद व्यर्थ थे ।
शब्द जिन्हें
कलम लिख न पाए
शब्द जो
सपने बुनते थे
हमने खोए चंद शब्द
और भरे अगिनत ग्रंथ
वो ग्रंथ
शायद सपनों से
डरते थे ।
 
थोड़े हम ऊंचे हुए
थोड़े पहाड़ उतर आए
पर पता नहीं
इस आरोहण में
हम चल रहे
या फिसल ?
हम दौड़ते रहे
और कहीं नहीं गए
बाँध टूटने
और घर डूबने के बीच
जैसे रुक सा गया हो
जीवन ।
 
यहाँ इस क्षण
न चीख़
न शांति
जैसे ठोकर के बाद का
संतुलन ।


भारतवर्ष
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वो किस राह का भटका पथिक है ?
मेगस्थिनिस बन बैठा है
चन्द्रगुप्त के दरबार में
लिखता चुटकुले
दैनिक अखबार में |
सिन्कदर नहीं रहा
नहीं रहा विश्वविजयी बनने का ख़्वाब
चाणक्य का पैर
घांस में फंसता है
हंसता है महमूद गज़नी
घांस उखाड़कर घर उजाड़कर
घोड़ों को पछाड़कर
समुद्रगुप्त अश्वमेध में हिनहिनाता है
विक्रमादित्य फ़ा हाइन संग
बेताल पकड़ने जाता है |
वैदिक मंत्रो से गूँज उठा है आकाश
नींद नहीं आती है शूद्र को
नहीं जानता वो अग्नि को इंद्र को
उसे बारिश चाहिए
पेट की आग बुझाने को |
सच है-
कुछ भी तो नहीं बदला
पांच हज़ार वर्षों में !
वर्षा नहीं हुई इस साल
बिम्बिसार अस्सी हज़ार ग्रामिकों संग
सभा में बैठा है
पास बैठा है अजातशत्रु
पटना के गोलघर पर
कोसल की ओर नज़र गड़ाए |
कासी में मारे गए
कलिंग में मारे गए
एक लाख लोग
उतने ही तक्षशिला में
केवल अशोक लौटा है युद्ध से
केवल अशोक लड़ रहा था
सौ चूहे मार कर
बिल्ली लौटी है हज से
मेरा कुसूर क्या है ?-
चोर पूछता है जज से |
नालंदा में रोशनी है
ग़ौरी देख रहा है
मुह्हमद बिन बख्तियार खिलजी को
लूटते हुए नालंदा
क्लास बंक करके
ह्वेन सांग रो रहा है
सो रहा है महायान
जाग रहा है कुबलाई ख़ान |
पल्लव और चालुक्य लड़ रहें हैं
जीत रहा है चोल
मदुरै की संगम सभा में कवि
आंसू बहाता है
राजराज चोल लंका तट पर
वानर सेना संग नहाता है |
इब्न बतूता दौड़ा चला आ रहा है
पश्चिम से
मार्को पोलो दक्षिण से
उत्तर से नहीं आता कोई उत्तर
आता है जहाँगीर कश्मीर से
गुरु अर्जुन देव को
मौत के घात उतारकर |
नहीं रही
नहीं रही सभ्यता
सिन्धु – सताद्रू घाटी में
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से
चीखता है भिंडरावाले
गूँज रहा है इन्द्रप्रस्थ
सौराष्ट्र
इल्तुतमिश भाला लेकर आता है
मल्ल देश के आखिरी पड़ाव तक
चंगेज़ ख़ान की प्रतीक्षा में |
कोई नहीं रोकने आता
तैमूर लंग को |
बहुत लम्बी रात है
सोमनाथ के बरामदे में
कटा हुआ हाथ है |
लड़ रहें हैं राजपूत वीर
आपस में
रानियाँ सती होने को
चूल्हा जलाती हैं |
चमक रहा है ताजमहल
धुल रहा है मजदूरों का ख़ून
धुल रहा है
कन्नौज
मथुरा
कांगरा |
कृषि कर हटाकर
तुगलक रोता है-
“पानी की किल्लत है
झूठ है
झूठ है सब
केवल राम नाम सत् है”
वास्को डि गामा ढूंढ रहा है
कहाँ है ?
कहाँ है भारतवर्ष ?

इंजीनियर्स मैनिफेस्टो
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हमने तो
खड़े किये हैं
लाखों मीनार,
बनाए हैं महल
शीशों के,
रोका है
नदियों का
विराट प्रवाह !
क्या नहीं रोक सकते
छोटुआ के छत का टपकना ?
ताकि वो
अपने घर के अँधेरे में
चैन से
सो सके ?
 
हमने तो बनायीं हैं
लम्बी कारें
पानी के भव्य जहाज़
दुनिया को सिखाया है
उड़ना !
क्या छोटुआ के बापू की
छह हज़ार साल पुरानी
बैल गाड़ी में हम मिलकर
लकड़ी का
एक ऐसा टुकड़ा नहीं जोड़ सकते
जिससे रात को उनका
पीठ दरद
कम हो जाए ?
 
हमने तो बनाएं हैं
असंख्य सॉफ्टवेअर
एक बटन दबा कर
बदल सकते हैं दुनिया,
हमने पिरो दिए हैं
दूर देशों को
एक तार में !
क्या नहीं जोड़ सकते हम मिलकर
डब्बे में बंद पड़ा
छोटुआ की इस्कुल का
सरकारी कंप्यूटर ?
 
हमने तो ईजाद किये हैं
नयी दवाइयां,
नए नुस्खे
ज़िन्दगी जीने के,
हमने बकरियों के
क्लोन खड़े कर दिए हैं !
क्या नहीं ला सकते
पिछली की हमशक्ल
छोटुआ के लिए
एक और माँ
जिसे वो
बुखार से मरने से
बचा सके ?
 
पूरी दुनिया को
चाँद पर चलाने वाले हम मिलकर
क्या छोटुआ को नहीं सिखा सकते
उसकी अपनी ही ज़मीन पर
खड़ा रहना ?


कित- कित--------------
मैट्रिक के इम्तेहान
ख़त्म होते ही
दोपहर में
बच्चों के साथ
आँगन में
कित-कित खेलती
लड़की से कहा जाता है -
अंदर जाओ ।

बाहर तार पर सूखते
लड़की के हाथों से
कढ़ाई किये गए
फूलों वाले चादर पर
एकाएक धँसे मिलते हैं
चोरकट्टे ।
लड़की की जटाएँ
मोहल्ले भर में
आग की लपट होती 
कित कित खेलती 
लड़की की
गर्दन पर अटकी
पसीने की बूंद हफ्ते भर बरसती
मुहल्ले भर में ।
घर की वृद्धाएँ
अचानक भुला देती घंटों लम्बी तेल मालिश
ऊंची सुनती दादी से
चिल्ला चिल्लाकर की गई
प्यार भरी बातें ।
कित-कित के खेल में
सबसे लम्बी छलांग भरती लड़की
नहीं लाँघ पाती
अपनी ही परछाई ।
  

आज्ञाकारी बेटी
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ब्लाऊज़ सिलते वक्त 
औरत कोशिश करती है
अपनी पीठ के
दरारों को भरने की ।
गर्भनिरोधक गोलियाँ
तकिये के नीचे छिपाते वक्त 
औरत डरती है
कोई देख न ले ।

पति से मार खाकर
औरत झट से घुस जाती है
रसोई में
आज लकड़ी गीली है
धुआं तनी ज्यादा हो रहा है न -
बड़बड़ाती है
रोटी सेंकते हुए ।

औरत की आँखों में 
अब सपने नहीं चुभते
औरत मुस्कुराती सी लेटी है
औरत अपने पति की
आज्ञाकारी बेटी है ।


सिक्यूरिटी गार्ड
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सड़क पर इन दिनों
हर मोड़ चौराहे पर
खड़े हैं
सिक्यूरिटी गार्ड्स
घनी रौबदार मूंछें 
हाथ में डंडा
पैनी नज़र
तैनात 
हर गुज़रते 
आदमी को देख 
वाकी टॉकी पर बड़बड़ाते -
"सूट वाला 
अच्च्छा आदमी लगता है
चीथड़े वाले की 
तलाशी लो !
उसके पास झोला है
चेक करो बम तो नहीं ?"

सड़क पर
इन दिनों 
लोगों से ज़्यादा
सिक्यूरिटी गार्ड्स हैं ।

परिचय -

नाम - सौरभ राय
वर्ष 1989 में एक शिक्षित बंगाली परिवार में जन्म, झारखण्ड में निवास 
शिक्षा - इंजीनियरिंग में स्नातक , वर्तमान में विधि में स्नातकोत्तर की पढ़ाई 
सम्प्रति - वर्तमान में बैंगलोर में ब्रोकेड नामक कंपनी में इंजीनियर 
तीन काव्य संग्रह प्रकाशित - 'अनभ्र रात्रि की अनुपमा', 'उत्थिष्ठ भारत' एवं 'यायावर'
हिंदी की कई पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित - हंस, वागर्थ, कृति ऒर इत्यादि 
हिंदी काव्य के अलावा अंग्रेजी में भी गद्य लेखन, जिन्हें souravroy.com में पढ़ा जा सकता है

पता - 

Sourav Roy, 
T3, Signet Apartment,
1st main, IIM Post,
Behind HSBC,
Sarvabhowma Nagar,
Bannerghatta Road,
Bangalore - 560076,
Karnataka
फ़ोन - 09742876892

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