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Thursday, April 25, 2019

डर- सपना सिंह





डर
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"हम खूब दावे कर लें कि स्त्रियों के प्रति सदियों से स्थापित सोच में बदलाव आया है .. फिर क्यों आज भी जन्म से ही एक अंजाना डर उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है... और उस डर को वे पीढ़ी दर पीढ़ी प्रत्यारोपित करती जा रहीं हैं.
कहानीकार सपना सिंह की कहानी 'डर' सामजिक परिवेश में स्त्रियों के प्रति उस विचारधारा को उजागर करती है जो हर क्षण उनमें डर की पौध को खाद-पानी देकर सींच रही है!"





  लड़की के साथ गैग रेप। भीगा तैलिया आंगन में फैलाते हुये उसके कानों में टी.वी. पर आती आवाज टकराई लॉबी में रखा टी.वी. लगातार अमंत्रित करता है ब्रकेंग न्‍यूज किचन की ओर जाते उसकी निगाह टी.वी. पर पड़ती है न्‍यूज रीडर लगातार पूरे एक्‍साइटमेनट के साथ बोल रहा है एम.बी.ए. की छात्रा पढ़कर लौटते वक्‍त कार में लिफट ले लेना आफत न्‍यौतना ही तो है।

“सुमि, कहां खोई हो... मेरे मोजे कहां हैं...? कितनी बार कहा, जूतों के साथ ही रक्‍खा करो...’’ पतिदेव का कर्कश स्‍वर कानों से टकराया... वह आंटा माड़ना छोड़ मोजे ढूढ़ने लपकी। हर बार इसी सब के लिये झाड़ पाती है, मोजे, जूते, रूमाल, मोबाइल। यही तीन कमरों का घर... वही दो एक मेज... वही अलमारियां...फिर भी वहीं सब चीजों के लिये कच-कच उसका बड़बड़ाना एक बार शुरू होता है तो जल्‍दी खत्‍म होने पर नहीं आता.... मेरी चट्टी बनियाइन... सही जगह पर क्‍यों नहीं रखती? अब वह तो अपने हिसाब से सही जगह पर ही रखती है, पर उसकी सही जगह अक्‍सर पतिदेव के लिये गलत ही होती है अब तो, इसी बात पर मूड़ ऑफ। ये मर्द और इनका मूड़... इनकी बड़-बड़ से क्‍या हमारा मूड़ नहीं बिगड़ता? पर जतायें किसे...? चुप रहो तो कहेंगे घर पर रहना बेकार बोलों तो सुनेंगे ही नहीं.... जैसे उनसे नहीं दीवार से कह रहे हो.... थोड़ा तेज बोलों तो, कहेंगे.... चिल्‍लाती क्‍यों रहती हो हर वक्‍त... ब्‍लप्रेशर बढ़ जायेगा... गिर पडो़सी किसी दिन भट्ट से...।

“मम्‍मी .... चोटी करो...।” बेटी कंघा लेकर खड़ी है।

’’करती हूँ... पहले दूध खत्‍म करो।‘’

‘पहले चोटी करो... वही तुनकता उददण्‍ड’’ स्‍वर... जो उसे भीतर तक खदबदा डालता है, उसने उस स्‍वर को नजर अंदाज किया और दूध में बोर्न्‍विटा मिलाने लगी।

‘’मम्‍मी... जल्‍दी करो... ऑटो आ जायेगा ....।‘’

बेटी बेसब्र हो रही है मुंह से निकलते ही बात पूरी हो जानी चाहिये... वह भुनभुनाते हुये बेटी के बाल बनाने लगी।

’कस के करो-....’

’तुम ठीक से... सीधे खड़ी रहो...।‘’ उसने बेटी को डपटा....

’ढीला कर रही हो...’ बेटी तुनकी और अपने बाल छुड़ाकर शीशे के सामने खड़ी हो खुद से चोटी बनाने लगी।

जब मेरा किया पसंद नही आता तो... खुद ही किया करो... अब से मत आना मेरे पास कहते हुये कुछ याद आ गया बहुत पहले का कोई दृश्‍य... इतनी बड़ी लड़की अपनी मां से भी लम्‍बी... मां से अपनी दो चूटिया गुथवाती... इसी तरह मां को टोकती झुझंलाती...। क्‍या दुनियां में किसी लड़की को अपनी मां की गुथी चोटी पंसद नहीं आती...?

पतिदेव का स्‍पेशल कमेंट है... तुम मां- बेटी की पटती नहीं....।

’मम्‍मी। पिन लगा दो...’ वो स्‍कूल का दुप्‍पट्टा लिये खडी़ है... अब इसमें भी झिक-पिक । इस वर्ष आठवी से ही सलवार कुर्ता चल गया है... तर्क है लड़के सीढि़यों के नीचे खड़े हो, झाकते हैं स्‍कर्ट खतरनाक है... निचली क्‍लास की स्‍कर्ट भी डिवाइडर टाइप की हो गई है। कुछ भी देख पाने पर पूरा अंकुश। उसकी आंखे बेटे के मासूम चेहरे पर अटक जाती है, ये चेहरे... कैसे शैतान चेहरों में तब्‍दील हो जाते हैं।

उसे याद आता है... वेा चचेरा भाई, उससे 6-7 साल छोटा, वह पूरी तरह बड़ी और बो बड़े होने की प्रक्रिया से गुजरता हुआ। इस दोपहर नॉवल पढ़ते-पढ़ते वह नींद में जा पहुंची थी... गले में सरसराहट... उनींदी आंखो में कौंध सा गया चेहरा... जैसा किसी रहस्‍य लोक में घुसने की चोरी करते पकड़ा गया हो उसने किसी को बताया नहीं... पर दिनों तक अपने उस भाई से नजरे चुराती रही थी।

टी.वी. पर विज्ञापन चल रहा है किसी सैनेटरी पैड का ... हवा की तरह हल्‍की फुल्‍की लड़की... कुछ ज्‍यादा फुदक रही हैं पीरियड्स में उतना घूमना फिरना? पर उसे तो दुनिया की सेाच बदलती है न... जैसे, सिर्फ स्‍त्राव ही परेशानी का सबब हो जिससे बेतरीन पैड बैड लगाकर छुटकारा पाया जा सके.... उन दिनों की खिन्‍नता, दर्द असुविधा.... ये सब... इनका क्‍या करे....? अब बाजार में ये, ये चीज भी मौजूद है.... जिसका इस्‍तेमाल तुम्‍हें पूरी स्‍वच्‍छता देगा।

‘मम्‍मी ये क्‍यो है’ बेटे की सहज जिज्ञासा।‘

’ये-ये लड़कियों का ड्रायपर है...’ पांच साढ़े साल पांच साल के बच्‍चे को और क्‍या बताये ? जैसे तुम छोटे थे तो पहनते थे न वैसे ये बड़ी लड़कियों का...।

’दीदी का भी’

’हां...।‘’



‘दीदी... क्‍या शू शू करती हैं...’ इतने में दीदी ने एक चपत उसके सिर में लगाई, मम्मी की ओर रोष से देखते हुये। भूनभूनाई.... मम्‍मी... कुछ भी बताती रहती हो’ बड़ी होती बेटी उससे सं‍बंधित हर बात में सकुचाई रहती है, पैड छुपाकर लाया करो ऐसे क्‍यों लाती हो... पापा से क्‍यों मगाती हो।

वो भी तो थी इस उम्र में ऐसी ही.... कपड़ा फाडने हुये लगता अदृश्‍य हो जाये, कपड़े की चिडर्र किसी कानों तक न पहुंचे और फिर गंदे कपड़े को अखबार में लपेटकर बाउंडरी के उस पार उछालना...ऐसे कि वह इधर न गिरकर उस पार पानी भरे प्‍लॅाट में गिरे... और ये सब होते बीतते कोई देख न ले... आंगन में चारपाई पर लेटे धूप सेंकते पापा या फिर वहीं चटाई पर बैठ स्‍वेटर बुनती मां... या फिर छोटे भाई बहन या बगिया की घांस निकालता चपरासी, वो छोटे छोटे पल कितने भारी होकर गुजरते थे, अब ये पैड बैड होने से कितनी सहूलियत हो गई है तब कहां मिलते थे छोटे कस्‍बों शहरों में...।

नयी पत्रिका आई है, फुरसत में वह इन हल्‍की फल्‍की पत्रिकाओं को पढ़ना पंसद करती है सबकुछ तो होता हो इनमें ड्रांइंग रूम से लेकर बेडरूम तक में एक औरत को कैसे होना रहना चाहिये खुद से लेकर घर और आस पड़ोस सब सुन्‍दर साफ और व्‍यवस्थित,सबसे पहले सवाल-जवाब के कॉलम पढ़ती है वो विशेषज्ञों द्वारा दिये... गये जवाब... कितने बदल गये हैं... आजकल के सवाल पहले जहां इन कॉलमों में पति द्वारा उत्‍पीड़न बचपन में हुये यौन उत्‍पीड़न से उपजे अपराध बोध विवाह पूर्व प्रेम प्रसंग को लेकर उपजा अर्न्‍तद्द ... आदि से संबंधित सवाल होते थे... वहीं अब सवाल चौकाते हैं ज्‍यादातर सवाल रिलेशनशिप से जुडे़ होते हैं, एम.बी.ए. की छात्रा का सवाल है-

अपने ब्‍वायफ्रेण्‍ड के सांथ उसके सेक्‍सुअती रिलेशन है... क्‍या ये गलत है? दूसरी सवाल है- क्‍या शादी से पहले अपने पार्टनर के सांथ सेक्‍स एंजॉय करना गलत है? पर जब मेरी उम्र की लड़कियां शादी करके सेक्‍स एंजॉय कर रही है तो मैं क्‍यों नहीं...।

ऐसे सवाल और उनके वैसे ही जवाब इंगित करते हैं वक्‍त बहुत तेजी से बदला है... अब सेक्‍स टैबू नहीं रहा... शायद छोटे शहरों कस्‍बों में अब भी हो... पर बड़े शहरों में सेक्‍स पिज्‍जा बर्गर की तरह तेजी से नयी पीढ़ी द्वारा स्‍वीकार्य हो रहा है शायद प्रेम या रिलेशनशिप की अनिवार्यता भी पीछे छूट जाये... एक भूख जिसे पूरा किया जाना... जरूरी हो! कहीं पढ़ा था, अमेरिका, यूरोप में सेक्‍स अनुभव लेने की औसत उम्र सोल‍ह वर्ष है ऐसे आंकड़े सर्वे आजकल प्रतिष्ठित पत्रिकायें खूब करती हैं... उनके रिजल्‍ट भी चौकानें वाले होते हैं। यह सब पढ़-सुन देख डरती है वो...।

डर तो और भी बहुत सारे है... बचपन से आज तक ये डर साथ-साथ रहा है हर वक्‍त हर कहीं... बहुत बचपन की घटनायें... वर्षों डराती रहीं... जाने कौन था वो... जो रात के अंधेरे में 6-7 साल की बच्‍ची की पीठ पर अपने शरीर की रगड़ देता अब तक डरावनी यादों की तरह सिहरा देती है।

पापा के ऑफिस के सभी लोग मेला देखने जा रहे हैं वो भाई बहन भी कालोनी के अन्‍य बच्‍चो की तरह जीप में ठूंस लिये जाते हैं भाई आगे पापा की गोद में वी पीछे छोटे कर्मचारी चपरासियों के साथ कुछ और बच्‍चे भी वह किसी की गोद में थी, सारी राह कुछ चुभता सा.. नीचे की ओर... दर्द चुभन से बेहाल...वह उठना चाहती पर बुरी तरह ठंसी जीप लौटते में वह जिदिया गई थी... आगे... बैठेगी... पापा के पास.... भाई को पीछे जाना पडा़ था...। क्‍या उसे भी वैसे ही कुछ चुभा होगा?

और ये आज कल की लड़कियां... जानबूझकर जोखिम मोल लेती किसी से भी लिफ्ट ले लेना... ब्‍वायफ्रेड से अकेले में मिलना... शार्टकट के चक्‍कर में सुनसान रास्‍ते जाना... ये सब आफत को न्‍यौता देना ही तो है, अखबार चैनल सनसनी बरदात सारे दिन ब्रेकिंग न्‍यूज... आरूषिद्व रूचिका शिवानी... डर ...डर... डर।

ढेरों घटनायें... देर तक सोचती है वो, कैसे, क्‍या करने पे बचा जा सकता था.. किसने किया होगा... आरूषि का कत्‍ल? क्‍यों किया होगा रूचिका ने आत्‍महत्‍या...? और वह हाई प्रोफाइल पत्रकार शिवानी भटनागर! कितने अनुतंरित सवाल।

एक लड़की का जन्‍म लिया है तो उम्र भर सिर्फ ‘बचने’ की सोचो अपने आपको सुरक्षित रखने की जुगत इतनी बड़ी बन जाती है... कि बाकी हर संभावना इसके आगे बौनी।

““मम्‍मी ! मैं जा रही हूँ ... देर हो रही है... ” बेटी का स्‍वर झुझलाया हुआ.... मतलब इरा अभी नहीं आई थोड़ी दूर पर रहने वाले मौसेरे भाई की बेटी की क्‍लास में है दोनों सांथ ट्यूशन जाती हैं सुविधा भी सुरक्षा भी एक से भले दो...। पर उसे दो मिनट भी देर हुई नहीं कि, इनका झुझलाना शुरू।

“मम्‍मी... फोन करो मामी को इरा चली का नहीं...”

“आती होगी....।”

“कल से ... मैं .... नहीं रूकूगी ... उसकी वजह से हमेशा लेट होते है...। “पीछे बैठना पड़ता है... जगह नहीं मिलती....।” बेटी की आवाज तल्‍ख है।मम्‍मी की ये सब बाते उसकी समझ में नही आतीं। इसके साथ आओ.... अकेले मत जाओ... सुनसान रास्‍ते से मत जाओ...। लेकिन, क्‍या वो चाहती है ये सब करना कहना.... कितनी मन्‍नतो से मांगी थी बेटी, पर बेटी की मां बनते ही कैसे तो एक डर भी भीतर पैदा हो गया। ना ये सामान्‍य मात़त्‍व का डर नही था जो अपने बच्‍चे की सुरक्षा को लेकर हरदम सचेत रहता है वह गि‍र न जाये... कोई चोट न... लगा बैठे.... कुछ नुकसान न कर ले अपना.... इन सब डरो के साथ-साथ एक और अदृश्‍य सा डर जो प्रत्‍यक्षत: कहीं नहीं दिखता था... पर था... और दिन व दिन बेटी के बढ़ने के साथ ही वह भी बढ़ रहा था डगमग चलते पाव कब का स्थिर , मजबूत चाल चलने लगे, गिरने पड़ने चोट खाने का कोई भय नहीं, फिर भी, आंखो के दायरे से बाहर नहीं जाने देना चाहती वो उसे। कब मुक्‍त होगी वह इन डरो से। क्‍या कभी ये दुनियां वैसी होगी जहां कोई लड़की अपनी पूरी उम्र बगैर डरे जी पाये, ईश्‍वर ने सृ‍ष्टि रचते हुये ये जो इतने सारे तरह तरह के जीव जन्‍तु बनाये... उन सब में उसके जैसा बिल्‍कुल उसका दूसरा कम उसका पूरक उसी की नस्‍ल का...। क्‍या एक के बिना दूसरे का अस्तित्‍व संभव है...? फिर, क्‍यों और कैसे एक की सत्‍ता दिन व दिन और और मजबूत होती गयी और दूसरा सिर्फ दास नुमा भूमिका भूमिका में उतरता गया, कैसी बिडंबना है- डर भी उसी से है और डर भगाने के लिये सहारा भी उसी का है। औरताना जिंदगी के उम्र का कोई पड़ाव इस... डर से अछूता बचा है क्‍या ? छोटी बच्चियों से लेकर दादी, नानी की उम्र तक की औरत तभी एक सलामत जब तक सामने पड़ने वाले पुरूष के भीतर का पिशाच जाग न जाये ... और पिशाच को जगने न देने के लिये तमाम एहतियात... न ऐसे न रहो...ये न पहनो...यों न बैठो... न चलो... यूं न देखो .... बंदिशे, सलोहं सहूलियतें समझाइशें...।

वह उतान पड़ी है कमरे में, स्‍कूल बैग, ड्रेस, बोतल जूता मोजा सब बिखरे पड़े हैं कितनी बार कमरे को व्‍यस्थित रखने को कह चुकी है... पर वह सुनती नहीं... ज्‍यादा बोलने पर झुंझला जाती है। पतिदेव का कहना है तुम कुछ सिखाती नहीं। अब वो न सुने उसके कहे को तो? यूं भी स्‍कूल से थके यादें आये बच्‍चों पर कड़कडाना उसे अच्‍छा नहीं लगता। दो बजे तक उसकी अपनी बैटरी भी डिस्‍चार्ज हो चुकी होती है जैसे-तैसे बच्‍चों का खाना परोस उसे खुद भी बिस्‍तर ही दीखता है।

देखो, कैसी तो बेहोश सी सो रही है। सोचते हुये... वह इधर उधर बिखरी चीजों को समेटने लगी हैं उसकी आहट ने बेफिक्र सोई बेटी को शायद नींद में ही झिझोड दिया है... फैले पैर को सिकोड़ करवट ले उनीदी आंखे खोलती हैं बेटी का यों पैर सिकोड़ना... पता नहीं क्‍यों उसे भीतर तक मथ देता है आहटें, बेटियों को ही पैर सिकोड़ना पर क्‍यों मजबूर कर देती हैं...?

“कोई नहीं... मैं हॅू...।” वह आश्‍वस्‍त सी करती कहती हैं... और फिर चीजों समेटने में जुट जाती हैं... उफ ये टयूशन वाला बैग... कल से चेन खुली है इसकी... सोचते हुये बैग उठाती है... खुली चेन को बंद करते भीतर कुछ चमकता है... ये क्‍या है...? अरे, ये यहां.... इसके बैग में.. कितने दिनों से वह इसे किचन में ढूढ़ रही थी... पर, इसे इसने बैग में क्‍यों रक्‍खा है...? हाथ में पकड़ने फल काटने के चाकू पर उसकी नजरें जम सी गई हैं.... उसे चक्‍कर सा महसूस होता है... जाने कब, कैसे उसके भीतर का डर उसकी बेटी के भीतर प्रत्‍यारोपित हो गया... कब कैसे...?

---सपना सिंह

परिचय


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नाम - सपना सिंह

जन्‍म तिथि - 21जून 1969] गोरखपुर] उत्‍तर प्रदेश

शिक्षा - एम.ए. (इतिहास, हिन्‍दी) बी.एड.

प्रकाशित कृतियॉ - धर्मयुद्ध] साप्‍त’हिक हिन्‍दुस्‍तान के किशोर कालमों सें लेखन की शुरूआत, पहली कहानी 1993 के सिम्‍बर हंस में प्रकाशित... लम्‍बे गैप के बाद पुन: लेखन की शुरूआत, अबतक-‘’हंस-कथादेश’’, परिकथा,कथाक्रम, सखी(जागरण), समर लोक संबोधन (प्रेमकथा विशेषांक), हमारा भारत, निकट, अर्यसदेंश, युगवंशिका, माटी, इन्‍द्रपस्‍थ भारती, गम्‍भीर समाचार, कथा यूके ‘पुरवाई’ , इत्‍यादि में दो दर्जन से अधिक कहानियॉं प्रकाशित।
आकशवाणी से कहानियों का निरतंर प्रसारण।
प्रतिलिपि, सत्‍याग्रह, शब्‍दाकंन, हस्‍ताक्षर, पहलीबार, नॉटनाल वेब पत्रिकाओं में कहानियां।
उपन्‍यास - तपते जेठ में गुलमोहर जैसा।
कहानी संग्रह़ - उम्र जितना लम्‍बा प्‍यार , चाकर राखो जी

सपना सिंह
द्वारा प्रो. संजय सिंह परिहार
म.नं. 10/1456, आलाप के बगल में,
अरूण नगर रीवा (म.प्र.)

मो.न्ं. 09425833407


Tuesday, May 26, 2015

घुरिया - मीना धर

घुरिया 
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जन्मदिन की ढेर सारी बधाई और शुभकामनायें दीदी !

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 "घुरिया"  कहानी हमारे समाज के  विकृत मानसिकता   से ग्रस्त   ऐसे तबके से परिचय करवाती है जिनकी संवेदनहीनता को पशुतुल्य कहने में तनिक भी संकोच नही होता ! कहानी पढ़ने के बाद कई प्रश्न मन में उठतें हैं ! एक लड़की जिसका ठीक से मानसिक विकास नही हो पाया है, जिसे पूरा गाँव पगली समझता है, पागल  वह लड़की है या वह समाज जिसने उससे पशुओं जैसा व्यवहार किया ?
गाँव की पृष्ठभूमि पर आधारित तीन सखियों की बेहद मार्मिक और संवेदनशील  कहानी लिखने के लिए मीना धर दीदी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें !  लमही  में प्रकाशित कहानी आप सब भी पढ़ें !



















    बड़ी खुशनुमा दोपहरी है, खुशबू लिए हुए हवा के झोंके बसंती और फुलवा को सहला रही हैं, ऊपर आसमान में भूरे बादल उड़ रहे हैं, उनकी छाया जमीन पर दौड़ रही है, दुआर से थोड़ी दूर मैदान में घास के ऊपर बादलों की उड़ती हुई छाया रोमांच पैदा कर रही है | दूर कहीं बौछारें गिरी हैं जिसके कारण हवा से मिट्टी की सौंधी खुशबू आ रही है |
घर के सामने खुली जगह पर बसंती मिट्टी के घड़े के टूटे हुए एक टुकड़े से कुछ लकीरें खींच रही है और उसकी सखी फुलवा बड़े -बड़े फूलों वाली फ्राक पहने ओसारे की सीढियों पर बैठी लंगड़ी खेलने के इंतजार में उससे कुछ बाते करती जा रही है | बसंती की सफ़ेद फ्राक पर छोटे-छोटे फूल और तितलियाँ बनी हुई हैं और उसके बालों को दो हिस्से में बाँट कर दोनो कानों के ऊपर लाल रंग के रिबन से बांध कर सुन्दर से दो फूल बनाये गये हैं | बसंती ने एक आयताकार आकृति बना कर उसके अन्दर कई लकीरें खींच दी है अब दोनों में ये तय नही हो पा रहा है कि पहले कौन खेलेगा | दोनों पहले हम,पहले हम कर ही रहीं थीं कि इतने में पीछे से एक मोटी सी आवाज आई -- “ई का ?”
दोनो ने आवाज की तरफ घूम कर देखा, घुरिया अपनी लहराती चाल से उन्ही की तरफ चली आ रही थी |
“देखु ना घुरिया हम एतना मेहनत से बनवली हँ, त पहिले हमही खेलब |” बसंती मचल कर बोली |
“हर बेर तूहीं पहिले खेलबू ?” खिसियाते हुए फुलवा बोली |
“काहें ? जब ओल्हापाती खेले के बेरिया हमहीं के हर बेर चोर बना देलू, तब हम त नाही रिसियानी |” दोनों हाथ कमर पर रख आँखे मटका कर बोली बसंती |
“हँ..त तूहीं हर बेर चोर छंटा जालू त हम का करीं |” बसंती भी अकड़ कर बोली |
घुरिया जो अभी तक इन दोनों की लड़ाई देख रही थी बसंती के हाथ से चप्पू (घड़े का गोल सा टुकड़ा) ले लेती है |
“ले आव द, हम पहिले खेलब” कह कर उस चप्पू को पहले खाने में ऐसे फैकती है कि वो खाने में ही गिरे ना तो दूसरे खाने में जाये ना ही पहले और दूसरे खाने की बीच की लकीर को स्पर्श करे चप्पू सही स्थान पर गिरता है और घुरिया अपना एक पैर उठा कर एक पैर से उस खाने में कूदते हुए जाती है और उस चप्पू को उसी पैर से मार कर बाहर ले आती है; अब तीनों मिल कर लंगड़ी के खेल का आनंद लेने लगतीं हैं |
*
यू.पी. और बिहार को जोड़ता हुआ स्टेशन सिवान उससे कुछ दूर पर स्थित है पिपरौंसी गाँव जिसमे ज्यादातर भुमिहार ब्राह्मणों का परिवार है कुल तीन घर ब्राह्मणों का है, बाकी और कई जातियों के परिवार भी हैं; पर सबसे ज्यादा संपन्न और ठसकदार गाँव के भूमिहार हैं, वो कुछ भी करें, उनके खिलाफ़ बोलने की हिम्मत गाँव में किसी की भी नही है | गाँव में ब्राह्मणों का बहुत सम्मान होता है, सभी उनका आदर करते हैं, उन्ही में से एक परिवार किसन बाबा का है | किसन बाबा बाल-ब्रम्हचारी हैं उनका मन पूजा पाठ में ज्यादा लगता है, गाँव के कई लोगों ने उनसे गुरुदीक्षा ले रखी है; इसी लिए सभी उनको बाबा कह कर बुलाते हैं | अपने घर से भी उनको बहुत मान मिलता है और वो भी अपने घर वालों का बहुत ख्याल रखते हैं | बसंती किसन बाबा की १० साल की भतीजी है | उनके मझले भाई साहब कलकत्ते में नौकरी करते है; तो उनका परिवार ज्यादातर अपने गाँव पिपरौंसी में ही रहता है, बसंती उनकी एक ही बेटी है |
फुलवा गाँव के एक संपन्न किसान नारायण राय की बेटी है और घुरिया दूसरे टोला की है, तीनो लगभग एक ही उम्र की हैं और उनमे खूब पटती भी है और लड़ाई भी खूब होती है | ओल्हापाती खेलना हो, लंगड़ी, पचीसी या गोटी, बिना लड़ाई के क्या मजाल की खेल पूरा हो जाय | कभी-कभी तो झोंटा-झुटउवल की नौबत आ जाती है,बाल बिखर जाते हैं रिबन का फूल बिगड़ जाता है, लड़ाई के बाद कट्टी हो जाती, ऐसा लगता कि अब ये तीनों एक दूसरे से कभी बात नही करेंगीं; पर अगले ही दिन फिर से खेलने की तैयारी हो जाती | बसंती की माँ हर बार उसे उन दोनों के साथ खेलने से रोकती पर वो माने तब ना ..
घुरिया दो भाइयों के बीच एक बहन है पर उसकी बदकिस्मती ये कि उम्र के हिसाब से उसकी बुद्धि बहुत कम थी | सांवला रंग, बड़ी-बड़ी आँखें, कमर तक लंबे बाल और लहराती हुई चाल कुल मिला कर सुंदर थी, बस दिमाग ही भगवान ने थोड़ा और दे दिया होता तो क्या बात थी ! उसकी माँ उसका बहुत ख्याल रखती, उसके लंबे बाल हमेशा संवरे रहते, कपड़े साफ़-सुथरे और पाँवो में हमेशा चप्पल रहती, बस एक कमी थी उसमे, उसकी आवाज बहुत भारी थी; पर इससे उन तीनो की दोस्ती में कोई फर्क नही पड़ता था |
बसंती अब बड़ी हो रही थी और उसकी माँ चाहती थी कि आगे की पढ़ाई उसकी कलकत्ते में हो इस लिए अपने पति को बार-बार चिट्ठी लिख रही थी आखिर कुछ दिनों बाद चिट्ठी आई कि “मै आ रहा हूँ तुम्हें लेने” और बसंती की माँ ने जैसे अपनी मन की मुराद पा ली हो, वो जाने की तैयारी में लग गई |
*
गाँव से थोड़ी दूर बगीचे में एक तरफ़ गन्ने की पेराई हो रही थी वहीं थोड़ी दूर ईंट का गोलाकार बड़ा सा चूल्हा बना था, उसी पर एक बड़ा सा छिछला कड़ाहा चढ़ा था, जिसमे गन्ने के रस को एक सूती धोती से छान कर डाला जा रहा था, कड़ाहे के नीचे तेज आग जल रही थी और एक आदमी उसे चला रहा था, कुछ देर बाद ही गर्म गर्म गुड़ तैयार होने वाला था |
वहीं थोड़ी दूर पर पकड़ी के पेड़ के नीचे तीनों सखियां उदास बैठीं थीं, आज से दसवें दिन बसंती को चले जाना था, इसी बात से वो तीनों बहुत उदास थीं | उन्हें गाँव में लगभग सभी जानते थे और बसंती तो सब की दुलारी थी तो उसे बहुत लाड मिलता था सबसे | उधर से निकलते हुए रामबचन ने उन तीनों को देख लिया |
“अरे !! ई तिकड़ी काहें मन गिरा के बैठी है भाई” रामबचन उन तीनों को उदास देख कर बोले |
वो कुछ बोलतीं इससे पहले फिर बोल पड़े रामबचन “चला…तोहा लोगिन के हम रस पिआयीं |”
“नाहीं चाचा, आज मन नईखे |” बसंती दबे स्वर में बोली
“काहें बबुनिया ? आज ई चाँद जईसन मुखड़ा पर गरहन काहें लागल बा ?” रामबचन उनके पास बैठते हुए बोले | रामबचन का घर बसंती के घर के पास ही था |
“बिहान बसंती शहर चली जाई, एहीसे हमनीके नीक नइखे लागत |” बोलते हुए फुलवा की आँखे भर गई |
“अच्छा !!! ई त बहुते खुशी के बात बा, चला हम सबके मुंह मीठ कराई |”
रामबचन तीनो को ले गये जहाँ गन्ना पेरा जा रहा था पर रस किसी ने भी नही पिया तो महुआ के पत्ते पर गरम-गरम गुड़ ला कर रामवचन ने तीनो को दिया |
वो खा ही रहीं थीं कि ओल्हापाती की पूरी टीम आ कर बसंती को घेर खड़ी हो गई | उन सब को पता चल गया था कि वो गाँव छोड़ कर जाने वाली है, सभी के लटके हुए चेहरे देख कर रामबचन बोले..
“बसंती के जाए में अबहिन कई दिन बा ना, त आज से काहें इतना उदासी ? जा..जा के खेला लोगिन बसंती के साथ |”
सभी बच्चे शोर करते हुए जामुन के पेड़ की तरफ़ बढ़ जाते हैं और शुरू हो जाता है ओल्हापाती का खेल |
*
बसंती कलकत्ते माँ के साथ अपने पापा के पास चली गई, फुलवा गोरखपुर पढ़ने के लिए भेज दी गई; पर घुरिया गाँव में ही रह गई, बाकी सब भी अपनी-अपनी पढ़ाई में लग गये |
दिन बीतने लगे सब का साथ छूट गया, बसंती अब शहर के वातावरण में घुल मिल गई थी | उसका पहनावा, बातचीत का तरीका, उठने बैठने का ढंग सब बदल गया था लेकिन वो फुलवा और घुरिया को भूल नही पायी थी, जब भी अकेली होती वही बगीचा, गर्म गुड़, महुआ, बादलों की परछाई को पकड़ने के लिए भागना उसे सब याद आता तब वो अपनी, फुलवा और घुरिया की फोटो निकाल कर देख लेती |
*
उधर बसंती और फुलवा के चले जाने के बाद घुरिया अकेली हो गई | उसका घर से निकलना बंद कर दिया गया वो घर के अन्दर गुड्डे गुड़ियों से खेलती, अब वो पहले जैसे लंगड़ी, पचीसी और ओल्हापाती नही खेल पाती, बाहर न निकलने देने का एक कारण और भी था, अब वो शरीर से बड़ी हो रही थी; पर उसका मन अब भी बच्चों जैसा था | फुलवा और बसंती की बात और थी पर किसी दूसरे के साथ खेलने जाने की इजाजत नही थी उसे | उसकी माँ पल-पल उसका ख्याल रखती |
*
समय का पहिया घूमता गया, कई बसंत खिले और चले गये, कई बार बादलों ने छुआ-छुऔवल खेला, कई बार बगीचे के पेडों ने अपने पुराने पत्ते गिरा कर नये पत्ते पहन लिए और कई बार बरखा की बूंदों ने धरा को सिंचित किया पर इस बार जो बसंत खिला तो बसंती और फुलवा की तरह घुरिया भी खिल उठी | साँवला रंग, बड़ी आँखे, लंबे बाल, इकहरा बदन और वही नागिन जैसी लहराती चाल | जब माँ तैयार कर देती तो घुरिया आकर्षक युवती दिखाई देती पर जैसे ही अपना मुंह खोलती, पता चल जाता कि वो एक सुन्दर सलोनी नवयुवती नही, अब भी पाँच – छ: साल की बच्ची ही है |
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अपनी छत पर खड़ी बसंती मौसम का लुत्फ़ उठा रही थी | मौसम बहुत सुहाना हो रहा था | ठंडी-ठंडी हवा जब शरीर को छू के गुजरती तो एक सुखद एहसास दे जाती आसमान पर भूरे बादल आने लगे और वही घूप-छाँव का खेल शुरू हो गया | कभी धूप आगे तो छाँव पीछे और कभी छाँव आगे तो धूप पीछे, सामने हरे भरे पार्क से जब छाँव गुजरती तब वहाँ की घाँस का रंग गहरे काही रंग का दिखाई देता पर वहीं से जब धूप गुजरती तब वही कही रंग धानी रंग में परिवर्तित हो जाता | प्रकृति का ये सुन्दर नजारा देख कर उसे अपना गाँव याद आ रहा था | जब वो, फुलवा और घुरिया ऐसे मौसम में खेलने निकल जाया करतीं थीं, कभी जामुन तोड़ती तो कभी टिकोरे तोड़ कर उसकी भुजुरी बना कर खाया करती थीं | भुजुरी बनने के लिए प्याज, नमक और छोटी सी चाकू घर से छुपा कर ले जाया करती थीं दोनों | सोचते हुए बसंती के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है | अचानक ही बरखा की कुछ बूँदें उसके चेहरे से टकराती हैं और उसके कानों से एक आवाज ..
”वसूऊऊऊऊ |”
वो अपनी सोच से बहार आ गई | “आई माँ” कह कर वो सब कपड़े समेट कर सीढियों की तरफ बढ़ गई | अब वो बसंती से वसू हो गई थी, माँ उसे प्यार से वसू ही कहती थी | सौंधी मिट्टी की खुशबू अब भी उसके नथुनों मे समा रही थी |
“ना जाने फुलवा और घुरिया कैसी होंगी, क्या कर रहीं होंगी ?”कपड़े घरी करते हुए वो माँ से बोली |
“वो भी पढ़ लिख रहीं होंगी और क्या कर रहीं होंगी,,,अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो आखरी साल है, छुट्टियों में इस बार गाँव जाने के लिए तुम्हारे पापा कह रहे हैं |”
“अच्छा” !!! चहकते हुए बसंती बोली, उसके चेहरे पर चमक आ गई गाँव जाने के नाम से |
घरी किये हुए कपड़े उठा कर उसने आलमारी में रख दिया और तरकारी काटती हुई माँ के गले से लग गई |
“ज्यादा खुश ना हो, अगर न० अच्छे नही आये तो तुम्हें नही ले जाऊँगी गाँव |” माँ ने तरकारी काटते हुए ही जवाब दिया | बसंती उठ कर अपने कमरे की ओर बढ़ गई |
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घुरिया के लिए सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था अचानक उसकी माँ की तबियत बिगड़ी और बिगड़ती ही गई | उसके दूसरे भाई की शादी होने वाली थी घर में सभी भगवान से मना रहे थे कि कोई अनहोनी न हो | माँ की बीमारी के कारण उसकी बड़ी भाभी उसका पूरा ख्याल रखती | घुरिया की माँ उसे सीने से चिपकाये रहती |
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धीरे – धीरे घर में शादी की तैयारी होने लगी, सभी लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गये | इसी दौरान घुरिया धीरे-धीरे घर के बाहर खेलने जाने लगी | अब वो पहले जैसी साफ सुथरी नही रहती, बाल भी उलझने लगे | जहाँ घुरिया को रोज नहला कर साफ कपड़े पहनाए जाते थे, वहीं अब वो तीन-चार दिन में कपड़े बदलती | उसकी दोस्ती अब अपने टोला के बच्चों के साथ हो गई थी, उन्ही के साथ वो खेलती रहती जब कोई भाई उसे देखता, डांट कर अन्दर ले आता तब वो माँ से चिपट कर खूब रोती | माँ उसे बहुत ऊँच-नीच समझाती पर ये सब बातें उसे कहाँ समझ आती |

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भाई की शादी में घुरिया किसी अप्सरा से कम नही दिख रही थी, सरसों के फूल जैसे पीले रंग के फ्राक और चूड़ीदार सलवार में वो फूल जैसी खिली थी ऊपर से माथे पर छोटी सी बिंदी, होंठों पर हल्के लाल रंग की लिपस्टिक, लम्बी सी चोटी में पीले रंग की तितली वाली क्लिप, कलाइयों में मैचिंग की चुडीयाँ और पांवो में सुन्दर नग जड़े हुए चप्पल ..कुल मिला कर किसी परी जैसी दिख रही थी |
घुरिया के दुआर पर बैंड बाजा बज रहा था | एक नचनिया चमचम करती लाल साड़ी, लाली और नकली चोटी लगाए नाच रही थी | एक ट्रेक्टर-ट्राली पर बड़े-बड़े स्पीकर रख कर उसमे फ़िल्मी गीत बजाये जा रहे थे |
बारात में जाने के लिए घुरिया के भाइयों के मित्र भी आये थे उन्ही में एक मागेश जो कि गाँव के ही दबंग राघवेन्द्र राय का बेटा था; अचानक उसकी निगाह घुरिया पर पड़ी | मागेश उसे इस रूप में देख कर चौंक पड़ा, ऐसा नही था कि वो घुरिया को जानता नही था या पहले कभी देखा नही था; पर घुरिया ऐसी होगी उसने कभी सपने में भी नही सोचा था | घुरिया तो आसमान से उतरी हुई अप्सरा जैसी लग रही थी |
परछावन के बाद बरात विदा हो गई, टोला के सारे मर्द बारात चले गये औरते भी थोड़ी देर गीत गा कर अपने-अपने घर चली गयीं | दूसरे दिन घुरिया की दूसरी भाभी घर आ गई पर कुछ दिनों बाद ही उसकी माँ स्वर्ग सिधार गई |
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माँ के गुजरने के बाद दिन गुजरने लगे | घुरिया की दशा दिन पर दिन खराब होने लगी, जो कभी अबोध बच्ची जैसी दिखती थी वही अब विक्षिप्त सी लगने लगी थी | बड़ी भाभी सोचती कि छोटी करे और छोटी भाभी सोचती कि बड़ी करे इसी सोच विचार में घुरिया पिसने लगी..कई-कई दिन बीत जाता न उसके बाल बंधते न उसके कपड़े बदलते | उसके सुन्दर लंबे केश आपस में उलझ कर चिपकने लगे, सिर में जूँ पड़ गये, उसके शरीर और कपड़ों से दुर्गन्ध आने लगी |
जिसे देख कर कभी लोग कहते थे कि भगवान ने सब कुछ दिया घुरिया को बस थोड़ा सा दिमाग ही देना भूल गये, वही लोग अब उसे पगली कह कर मुंह बिजका देते; पर वो अब भी पगली नही थी, मन से वो वही मासूम घुरिया थी | एक माँ के न होने से उसकी ये दशा हो गई थी |
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कच्चे ओसारे में एक खटिया पड़ी थी | घुरिया बैठे-बैठे सिर खुजा रही थी, कभी-कभी उसके नाखून में कोई मोटा सा जूँ फँस जाता तो उसे वो निकाल कर जमीन पर रख कर अपने अंगूठे के नाखून से मार देती, इतने में टोला के कुछ बच्चे आ गये... “घुरिया दीदी”
“का रे |” जूँ मारते हुए घुरिया बोली
“चला गोली (कंचे) खेले |”
सुन् कर वो खुश हो गई
“चला, बाकिर पहिले हमही खेलब |” घुरिया बोली
“हाँ ठीक बा |” बच्चे राजी हो गये
सभी बच्चे घुरिया के साथ कंचे खेलने लगे, अचानक ही घुरिया के मुंह से चीख निकल गई, उसने घूम कर देखा तो उसकी भाभी थी, जो उसके बाल पकड़ कर उसे खींचते हुए घर की ओर ले जा रहीं थी और साथ-साथ बड़बड़ाती भी जा रही थी...
“आवे दा अपने भाई के, ई रोज-रोज के बवाल खतम कर देत हईं, तनिको लाज नईखे, जवान भयिली बाकिर टोला के लइकन के साथ गोली खेलल नाही छूटल |”
घुरिया कराहते हुए उसके साथ खींचती जा रही थी |
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फाइनल इयर के एक्जाम खत्म हो चुके थे बसंती माँ के साथ घर जाने की तैयारी करने लगी | गाँव जाने की खुशी सबसे ज्यादा इसी बात से थी कि वो घुरिया और फुलवा से मिल सकेगी |
उधर फुलवा भी होस्टल से घर आ गई, वो तो हर साल छुट्टियों में घर आती थी और बसंती का इंतजार करती थी कि शायद इस साल बसंती गाँव आ जाये; पर बसंती गाँव छोड़ने के बाद गुलरी का फूल हो गई थी नही दिखी तो नहीं दिखी | इस साल भी फुलवा को उम्मीद नही थी कि बसंती गाँव आएगी |
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ट्रेन को स्टेशन पर दो मिनट ही रुकना था, बसंती और उसकी माँ पहले से ही सारा सामान दरवाजे के पास रख कर खड़ी थी कि जैसे ही ट्रेन रुकेगी वो लोग तुरंत उतर जायेंगीं, उन्ही की तरह और भी लोग दरवाजे के पास भीड़ लगा कर खड़े थे | ट्रेन जैसे ही रुकी, किसी तरह धकिया- धुकिया के वो दोनों सामान सहित प्लेटफार्म पर उतर गईं | भीड़ छंटने के बाद उन दोनों ने इधर-उधर देखा तो किसन बाबा उन्हें ढूंडते हुए दिख गये, बसंती सामान उठा कर माँ के साथ उनकी तरफ चल दी तब तक उनकी नजर भी इन दोनों पर पड़ गई, उन्होंने लपक कर बड़ीकी भौजी के पाँव छूए और बसंती के हाथ से दोनों बैग ले लिया | अब किसन बाबा आगे और वो दोनों उनके पीछे-पीछे स्टेशन से बाहर आ कर अपनी जीप में बैठ गयीं |
जीप कच्चे रास्ते पर धूल उड़ाती दौड़ती जा रही थी | कच्ची सड़क के दोनों तरफ खेत थे, किसी खेत में पकी हुई गेंहूँ की बालियाँ झूम रहीं थीं, किसी खेत में गेंहूँ के गट्ठर बना कर रखे थे तो किसी खेत में कम्बाइन से कटाई हो रही थी | ये सब देख कर बसंती सोच रही थी कि तब में और अब में कितना अंतर आ गया है गाँव में ! तब जोताई, बोआई, कटाई और ओसाई सब काम खेतिहर मजदूर किया करते थे और मजदूरी के रूप में अनाज लिया करते थे, जिससे उनकी घर गृहस्थी का काम चलता था; पर अब तो हर काम मशीन से हो रहा था जो सिर्फ पैसे वालों के पास था, मतलब भूमिहारों के पास, तो उन मजदूरों का घर कैसे चलता होगा ? बसंती अभी सोच ही रही थी कि उसकी नजर एक खेत से उठते हुए धुएं पर पड़ी उसने उत्सुकता वश चाचा से पूछा तो पता चला कि गेंहूँ की बालियों की कटाई के बाद जो बाकी का हिस्सा होता है वो वहीं खेत में ही जला दिया जाता है ये उसी का धुँआ था |
बसंती आश्चर्य से बोली–“तो फिर भूसा कहाँ से आता है ? गाय-गोरू क्या खाते हैं ?”
“अब सबके घर गाय-गोरू नाहीं हैं और जिसके घर हैं वो अपने मतलब भर का भूसा बना कर बाकी का सब ऐसे ही जला देते हैं |” किसन बाबा ने जवाब दिया |
जीप अब गाँव के करीब पहुँच रही थी, बसंती को वो बगीचा दिखने लगा जिसमे कभी वो अपनी दोनों सखियों के साथ खेला करती थी |
पीपल के नीचे बरम बाबा का थान, नीम के नीचे कालीमाई का थान और पोखरा के किनारे-किनारे छठ माई का थान, सभी को प्रनाम करते हुए बसंती बगीचे में प्रवेश कर गई पर अब वो बगीचा भी पहले जैसा घना नही रह गया था, बहुत से पेड़ काट दिए गये थे | जिस बगीचे में सूर्य देव की किरणें पत्तों से छन-छन कर जमीन तक पहुंचती थीं, वो अब बेधड़क अपना साम्राज्य स्थापित किये हुए थीं | कुछ औरते उपले पाथते हुए दिखाई दीं, उनके पास से जैसे ही जीप निकली वो अपना काम रोक कर बसंती और उसकी माँ को पहचानने की कोशिश करने लगीं | दुआर पर पहुँच कर किसन बाबा ने जीप रोक दी |
“भौजी आप बसंती के साथ भीतर जाईं हम सामान ले के अब्बे आवत हयीं |” बसंती की माँ से बोले किसन बाबा | दोनों भीतर चली गयीं और सबसे मिलने जुलने लगीं |
*
धीरे-धीरे दिन चढ़ रहा था, वो बार-बार दुआर पर झाँक कर अन्दर आ जाती थी | अब वो पहले की तरह दुआर पर घंटों नही बैठ सकती थी | गाँव में अब भी बहू बेटियाँ दुआर पर नही बैठती थीं, उसे फुलवा और घुरिया से मिलने की व्याकुलता थी | आखिर उससे नही रहा गया तो उसने अपनी बड़की अम्मा से पूछा जो बैठ कर चावल पछोर रही थीं |
“अम्मा...ऊ फुलवा और घुरिया कहाँ हैं अब ?”
“अरे फुलवा त आईल बा एहू साल, ऊ हर साल आवेले, तोहके पूछेले, आ घुरिया त घूमत होई, रुका...अबे केहू से फुलवा के घरे खबर भेजवात हयीं |” कह कर बड़की अम्मा चावल थाली मे ले कर चुनने लगीं | धीरे-धीरे शाम होने को थी बसंती बेचैन थी, वो फिर से दुआर पर आई तो देखा कि किसन बाबा चले आ रहे थे |
उसे देख कर बोले..“पंचानन मिलल रहलें त हम बतवली कि जा के फुलवा से बता दिहा कि बसंती आईल बा |”
ये सुन कर बसंती का चेहरा गुलाब की तरह खिल गया | अभी वो अन्दर जाने को मुड़ी ही थी कि एक आवाज सुन के वो चौंक गई |
“बसंतीईईईई”.............
मुड़कर देखा तो उसने एक सुंदर सी लड़की गुलाबी सूट में मुस्कुराती हुई उसकी तरफ चली आ रही थी | बसंती उसे देखते हुए मुस्कुरा दी |
“फुलवा !!” उसे देख आश्चर्यचकित हो बोली बसंती और लिपट गई दोनों ....
जैसे दो लताएँ आपस में उलझ कर लिपट जाती हैं उसी तरह फुलवा बसंती एक दूसरे की बाहों में उलझ गई | प्रेम की अधिकता ने उनकी आँखे भिगो दी | आज बरसों बाद दो धारा एक साथ  मिली थी तीसरी धारा कहीं अदृश्य थी |
बसंती फुलवा को माँ के कमरे में ले गई | माँ और बड़की अम्मा भी उन दोनों को खुश देख कर बहुत खुश थीं | शिकवा, शिकायत, उन दोनों ने इन सालो में क्या-क्या किया, वो सब बतियाते-बतियाते कब अंधेरा हो गया उन्हें पता ही नही चला, बड़की अम्मा लालटेन जला कर ले आयीं | गाँव में अब भी बिजली व्यवस्था ठीक नही थी; कभी दिन तो कभी रात में आ जाती थी बिजली | बड़ी अम्मा के जाते ही फुलवा बोली-
“अच्छा बसंती अब चलती हूँ…कल फिर से मिलते हैं |“ उसे जाते हुए देख कर बड़की अम्मा बोली
“नाहीं बाबू अकेले मति जयिहा, बड़ा ज़माना खराब भईल बा |“
वो फुलवा और बसंती के साथ बाहर आयीं तो देखा कि किसन बाबा कुछ लोगों से बतिया रहे थे, उन्होंने किसन बाबा को बुला कर फुलवा को घर तक छोड़ने को कहा | वो चली गई पर बसंती को अब घुरिया से मिलने की जल्दी थी |
*
दिवस संध्या से मिल कर कब का जा चुके थे | सभी पंक्षी अपने-अपने बसेरो में वापस आ गये थे, कीट पतंगे भी पत्तों की ओट में छुप गये, संध्या भी निशा की बाहों में समा गई थी | कभी-कभी कोई बगीचे से गुजरता तो सूखे पत्ते खड़क जाते फिर बगीचे में सन्नाटा पसर जाता, झींगुरो की आवाज आ रही थी, ऐसे में एक परछाई दूसरे का हाथ थामे बगीचे के भीतर समाती चली जा रही थी उस ओर जिस ओर बगीचा ज्यादा घना था | दोनों परछाइयाँ धीरे-धीरे घने अँधेरे में जा कर एक पेड़ के नीचे बैठ गयीं | गिरे हुए सूखे पत्ते खड़के फिर सन्नाटा हो गया |
“ई कहाँ ले आये हमके, कुच्छु दिखा नही रहा |” अँधेरे में उसका हाथ थामे हुए बोली वो | ये लड़की की आवाज थी |
“अरे !! देखु न तोरे लिए का लाये हम |“ ये एक मर्दानी आवाज थी |
“अच्छा !! त ले आवा दा |” बोली वो
“ले खो |”
उसे लगा कि उसके होठों के पास कुछ है, उसने मुंह खोल कर खा लिया |
“अरे !! ई त बहुते निम्मन बा !” खुश होती हुई बोली वो |
“हाँ, त धीरे बोलु ना, केहू सुन ली त ऊहो मांगे लागी त देबे के पड़ी, ले ई चाकलेट अब अपनी हाथे से खो |” आदेशात्मक आवाज थी
अंघेरे में ही एक हाथ ने दूसरे हाथ में चाकलेट थमा दिया और वो बड़ी खुशी से खाने में लग गई, हाथ को मुंह तक जाने के लिए किसी रौशनी की जरुरत नहीं होती |
अचानक ही कोई जानवर भागता हुआ उन दोनों के पास से निकल गया, जल्दी से एक मोटा हाथ लड़की के मुंह पर ढक्कन की तरह लग गया नही तो उसकी चीख बगीचे में गूंज जाती; शायद कोई कुत्ता या सियार था | वो फिर खाने में लग गई और वही हाथ उसके मुंह से हट कर उसके गर्दन, कंधे से होता हुआ उसकी पीठ पर कसता चला गया...वो कसमसाई ..
“छोड़ा खाए द हमके |” बोली वो
पर उसकी बात का कोई जवाब नही मिला | उस परछाई की सांसों की आवाज उसकी कानों तक आ रही थी, दो हाथ उसके पूरे जिस्म पर रेंग रहे थे, वो कसमसा तो रही थी; पर अपना चाकलेट छोड़ने को तैयार नही थी, वो खाती रही | इतने में उन दोनों हाथों ने उसे कंधे से पकड़ कड़ कर सूखे पत्तों पर गिरा दिया, वो कुछ बोलने को हुई तो धीरे से घुड़क कर बोला वो ..
“चुप रहु नाही त काल्हि से कुच्छु नाही देब ला के |“
उसका हाथ फिर से उसकी मुंह पर ढक्कन की तरह लग गया..सूखे पत्ते खड़क उठे कुछ टूट कर दो भागो में बंट गये तो कुछ पिस कर मिट्टी में मिल गये, पीड़ा, सिसकियाँ, कराह, कुछ घुटी हुई आवाजें, सब अंघेरे ने निगल लिया | आँखों के कोरों से निकला हुआ आँसू मिट्टी ने सोख लिया, चाकलेट हाथ से छूट कर गिर गया | गुलशन के एक कुम्हलाये हुए फूल को भी आवारा भँवरे ने नही छोड़ा, उसके डंक से घायल फूल की हर पंखुड़ी बिखर गई थी |
पेड़ के नीचे हो रही हलचल से ऊपर बैठे पंक्षी जाग चुके थे और सहमे हुए उस बहेलिये को दरिंदगी से अपना शिकार करते देख रहे थे | थोड़ी देर बाद वो खड़ा हो गया; पर लड़की वहीं बेसुध पड़ी रही, जब वो खुद से नही उठी तब उसने झुक कर उसे सहारा दे कर उठाया और उसे ठीक किया फिर उसका हाथ थाम कर बगीचे के बाहर ला कर धमकी भरे लहजे में बोला..
”तनिको केहू के आगे मुंह से निकल गईल ई सब त गटइया दबा देब जान लीहे |”
लड़की ने सहम कर ‘ना’ में सिर हिलाया और थके कदमों से लहराती हुई धीरे-धीरे गाँव में प्रवेश कर गई, दूसरी परछाई उसे वहीं छोड़ दूसरी ओर निकल गई ...
*
सूरज  सिर पर चमक रहा था, ऐसा लग रहा था कि अपने अन्दर के सारे अंगारे को आज ही धरती पर गिरा देगा | बगीचा अब भी कराह रहा था, पेड़ पौधे सिसक रहे थे, दिन की गर्मी से बेकल कई पंक्षी जोड़े पेड़ पर सहमे हुए बैठे थे, वो साक्षी थे उस चिड़िया की बर्बादी, उसकी दबी सिसकियों, उसकी बेबसी और बहेलिया के बर्बरता की |
*
आज भी पूरा दिन निकलने को था, घुरिया का कहीं पता नही था बसंती उससे मिलने को बेचैन थी |

“जा चलि जा आज कहीं घूमि आवा |” बड़की अम्मा भूजा फटकते हुए बोलीं |
गोंसारी से कई तरह का भूजा भुजा कर आया था, बड़की अम्मा उसी को फटक कर उसमे रह गये बालू के कण अलग कर रहीं थीं ताकि खाने में दाँतों के नीचे एक भी बालू के कण ना आ जायें |
“कहाँ जाऊं, ? मन नही है |” बसंती उदास हो कर बोली
“का बात  ह बबुनिया, काहे मन गिरल बा आजु ?” बड़की अम्मा उसे उदास देख कर बोलीं |
बसंती जा कर बड़की अम्मा के पास खड़ी खटिया बिछा कर बैठ गई और बोली - “एक बात बताइये बड़की अम्मा ? घुरिया क्यों नही दिख रही है ? कैसी है वो, क्या उसकी शादी हो गई या अब वो इधर आती-जाती नही ?”
घुरिया का नाम सुनते ही बड़की अम्मा का हाथ रुक गया, हवा में उछला हुआ भूजा कुछ सूप में तो कुछ आस-पास गिर कर फ़ैल गया बड़की अम्मा के चेहरे पर भी उदासी फ़ैल गई वो बोलीं ..
”बियाह कहाँ उनकी भाग में लिखल बा, के करी उनके साथे बियाह  ? न कहीं ठौर न ठिकाना ! गाँव भर घूमेली..जहाँ जऊन पा जाली, ऊहे खा के पेट भर ले ली |”
बसंती को वो सारी बात बताती चली गयीं | दिल में दर्द और आँखों में आँसू लिए बसंती भौचक्की सी सब सुनती गई |
*
छुट्टियाँ खत्म होने को थीं फुलवा का ब्याह तय हो गया था, बसंती को वापस कलकत्ते जाना था, पर वो अभी तक घुरिया से नही मिल पायी थी, कई बार किसन बाबा से कहा उसने पर हर बार किसन बाबा ने उसके घर जाने से सख्ती से मना कर दिया |
बोले “किसी दिन खुद ही वो घूमती-घामती आ जायेगी तभी मिल लेना |”
बसंती बहुत उदास थी उसका मन घुरिया को ले कर बहुत परेशान था | कल उसे वापस जाना था, सारी तैयारी हो गयी थी, वो कुछ भी नही कर पा रही थी उसके लिए | इससे अच्छा तो हम बचपन में ही थे, कोई भेद भाव नही था, वो तब भी बुद्धि की वैसी ही थी जैसी आज है; तो आज उसको उसके साथ उठने बैठने से क्यों रोका जा रहा है ? उसका दिल बैठा जा रहा था जैसे कि कुछ छूटा जा रहा है उससे | काश जाने से पहले एक बार देख पाती घुरिया को !
*
शाम को ठण्डी-ठण्डी हवा चल रही थी बसंती उदास ओसारे में बैठी थी इतने में फुलवा भी आ गई उसे पता था कि कल बसंती को जाना है | दोनों बैठी घुरिया के बारे में ही बतिया रहीं थी कि अचानक ही किसन बाबा उन दोनों के पास आ कर धीरे से बोले--

“हऊ देखा लोगिन |”
दोनों ने चौंक कर उधर देखा, एक लम्बी सी लड़की मैले कपड़े पहने लहराते हुए अपनी ही धुन में चली आ रही थी | फुलवा तो अक्सर ही उसे देख लेती थी क्यों कि वो गाँव आती रहती थी; पर उसे देख कर बसंती का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा जैसे-जैसे वो नजदीक आती जा रही थी, तस्वीर साफ होती जा रही थी, दुआर पर आते-आते उसे पहचान चुकी थी बसंती | फुलवा की तरफ़ देखते हुए बसंती के मुंह से निकला ---
“घुरियाआआआ !!!!”
फुलवा ने हाँ में सिर हिला दिया, बसंती का मुंह खुला का खुला रह गया |
“ए घुरिया” किसन बाबा ने आवाज दिया...
सुन कर वो ठिठकी, उसने देखा किसन बाबा की तरफ़, उन्होंने इशारे से उसे आने को कहा | वो आ कर ओसारे की सीढियों पर बैठ गई, उसकी हालत देख कर बसंती की आँखे भीग गयीं | उसे वही बचपन वाली घुरिया याद आ रही थी, साफ़ सुथरी, लम्बी चोटी  मोड़ कर दोनों कानों के ऊपर रिबन से फूल बने होते थे, सांवली सलोनी घुरिया अब कितनी मैली कुचैली दिख रही थी, बसंती आ कर घुरिया के पास ओसारे की सीढियों पर बैठ गई |
“चीन्हलू के ह ?” किसन बाबा बसंती की तरफ़ इशारा कर के घुरिया से बोले |
घुरिया ध्यान से बसंती को देख रही थी | चाहते हुए भी बसंती अपने आँसू नही रोक पायी | अचानक ही घुरिया अपनी मोटी आवाज में चीख पड़ी--
“बसन्तीईईईईईईईईईई !!!!!!”
अपनी बचपन की सखी को देख कर घुरिया का बाल मन स्नेह के लिए तड़प उठा, वो कुछ भी सोचे बिना बगल में बैठी बसंती का दोनों हाथ पकड़ कर अपने माथे तक ले गई और बिलख-बिलख कर रो पड़ी ..अब बसंती से भी नही रहा गया, अपना हाथ छुड़ा कर उसने उसे अपनी बाहों में भर लिया और दोनों सखियां गले मिल कर रो पड़ीं फुलवा की आँखों में भी आँसू आ गये, अन्दर से बड़की अम्मा, बसंती की माँ सभी बाहर आ गयीं, ये दृश्य देख कर सभी की आँखों में आँसू थे | फुलवा ने ही दोनों को अलग किया फिर दोनों ने सहारा देकर घुरिया को ओसारे में ला कर कुर्सी पर बैठा दिया |
*
तीनों बड़ी देर तक बतियाती रहीं, सभी लोग अपने-अपने काम में लग गये | घुरिया कभी तो अच्छे से बात करती पर कभी-कभी उसकी बात उन दोनों को समझ नही आती, बसंती उसकी दशा देख कर आहत थी, वो कभी बचपन की बात याद कर चहक उठती तो कभी न जाने क्या सोच कर उदास हो जाती |
“बहुत दुखाता...मुड़ी में ढील हो गईल बा...ऊ भउजी नू...हमार झोंटा नोचेली...खाहू के नाही देली निम्मन....|” और भी न जाने क्या-क्या घुरिया खुद से ही बोले जा रही थी हाथ उसका सिर में ही था, जूँ की वजह से खुजला रही थी लगातार | इतना तो तय था कि उसकी दिमागी हालत धीरे-धीरे खराब होती जा रही थी |
खाने का समय हो गया था | आज बसंती के कहने पर तीनों को केले के पत्ते पर एक साथ खाना परोसा गया क्यों कि वो दोनों थाली में और घुरिया अकेले केले के पत्ते पर खाना खाती ये बसंती को मंजूर नही था, हलाकि माँ और बड़की अम्मा दोनों ने मना किया पर बसंती नही मानी | घुरिया को पूछ-पूछ कर ठीक से खिलाया बसंती ने | ऐसा लग रहा था जैसे उसने जन्मों अच्छा खाना नही खाया था, खाने के बाद फुलवा को उसके घर छोड़वा दिया बड़की अम्मा ने | घुरिया फिर से जा कर ओसारे की सीढ़ी पर बैठ गई बसंती उसके पास ही बैठी थी, वो जो भी पूछती घुरिया उसका ठीक से जवाब नही दे पाती; वो अपने ही धुन में कुछ का कुछ कहती जा रही थी | बड़की अम्मा और माँ बार-बार उसे घुरिया से दूर बैठने को कह रहीं थीं पर बसंती का दिल उससे दूर रहने को नहीं कर रहा था, उसे लग रहा था कि घुरिया को वो कलकत्ता ले जाये और उसका दवा इलाज करा कर अपने साथ रखे; पर वो विवश थी जानती थी कि माँ कभी नही मानेगी | बहुत रात हो गई, किसन बाबा ने सब को भीतर जाने को कहाँ, सब चले गये पर बसंती वहीं बैठी रही तब किसन बाबा ने बसंती को डांट कर कहा ..
“चला तूहूँ भीतर जा...इनके रोज के काम ह, कहीं ढ़िमिला जयिहें, इनकी खातिर रतिया भर बाहरे बईठबू का ?”
बसंती घुरिया को वहीं छोड़ कर भीतर चली गई | सुबह उठ कर बसंती जल्दी से बाहर आई, देखा तो सीढियां खाली थीं, कोई भी नही था घुरिया कहीं डगर गई थी, मायूस हो कर बसंती कलकत्ते जाने की तैयारी में लग गई |
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धीरे-धीरे समय गुजरने लगा बसंती को गाँव से आये हुए चार महीने हो गये इस बार वो फुलवा से उसका पता ले कर आई थी | उसकी चिठ्ठी गये हुए बहुत दिन बीत गये थे पर उधर से कोई जवाब नही आया | बसंती की शादी की बात-चीत माँ पापा में अब घर में होने लगी थी, कोई लड़का था जो इंजिनियर था और माँ बाप का इकलौता भी, वो घर में सभी को पसन्द था | गाँव में भी चिट्ठी भेज कर बड़की अम्मा और किसन बाबा से पूछ लिया गया था, सभी की रजामंदी हो गई थी |
फुलवा का जवाब आ गया, उसकी शादी हो गई थी, वहीं गोरखपुर में ही | घुरिया के बारे में उसने लिखा था कि “अब वो बिमार सी रहने लगी है जैसे उसके पेट में कोई बिमारी लग गई हो, उसका पेट धीरे-धीरे फूलता जा रहा है; पर उसके भाई भौजाइयों को कोई फर्क नही है | वो सब उसे पीछा छुडाने के लिए किसी दूर की बस में बैठा कर छोड़ दिए थे कि कहीं मर-बिला जायेगी पर कोई भला मानुस उसे घर छोड़ गया था | अब फिर से पूरे गाँव में भटकती है रातोदिन | ना जाने कैसे पत्थर के इंसान हैं वो सब ! शरीर कमजोर होने से लाठी के सहारे चलती है अब |” चिठ्ठी पढ़ कर बसंती की आँखों में आँसू आ गये |
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दो महीने बाद ही वहीं कलकत्ते से ही बसंती की शादी हो गई, गाँव से सभी लोग आ गये थे | बसंती विदा हो कर अपने ससुराल चली गई और सब भूल कर घर गृहस्ती में लग गई |
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राघवेन्द्र राय गाँव के रईस थे, वैसे तो उनकी उम्र पचास से साठ के बीच थी पर जब वो अपनी बड़ी-बड़ी मूछों पर ताव दे कर सफारी सूट, आँखों पर काला चश्मा, गले में मोटी सी सोने की चैन, हाथ की उंगुलियों में अंगूठियां और कलाई पर सुनहरी घड़ी पहन कर निकलते तो देखने वाले उन्हें देखते ही रह जाते | उनके घर के भीतर के लिए नौकरानियाँ थीं और बाहर के लिए नौकर, जो गाय गोरु से ले कर बाहर की साफ़-सफाई का काम करते थे | राघवेद्र राय के दरवाजे पर एक बड़ा सा नीम का पेड़ था, उसी के नीचे कई लोग कुर्सी डाल कर बैठे थे | वैसे तो हमेशा ही उनके दरवाजे पर बैठकी होती थी; पर आज कल वो प्रधानी के लिए खड़े थे इसलिए और भी हुजूम रहता था उनके आस-पास |
एक तरफ़ बड़ी सी घारी (जानवरों के रहने का स्थान ) थी | उसी के पास घुरिया बैठी अपने जूएँ निकाल-निकाल कर मार रही थी | रात में वो वहीं घारी में सो जाती और दिन भर बाहर बैठी रहती शायद शरीर की कमजोरी की वजह से वो अब ज्यादा इधर उधर घूम नही पाती थी | घर के नौकर ही उसे भी कुछ खाने को दे दिया करते थे और वो वहीं पड़ी रहती |
कई रोज से राधवेन्द्र राय उसे घारी के पास बैठ कर जूँ मारते देख रहे थे, उस दिन उन्होंने एक नौकर को बुला कर हजाम को बुलवाया और घुरिया के सिर पर उस्तरा चलवा दिया फिर घर से दो नौकरानियों को बुला कर कहा कि वो घुरिया को नहला कर कोई साफ सुथरा कपड़ा पहना दें | मुंह बिचकाती हुई दोनों ने उसे सहारा दे कर खड़ा किया और भीतर हाते में ले जा कर हैण्डपम्प के नीचे बैठा दिया |
थोड़ी देर बाद ही वही दोनों उसे फिर से ला कर वहीं बैठा गयीं | उन लोगों ने उसे किसी का पुराना सूट पहना दिया था | ये सब देख कर वहाँ बैठे सभी लोग राघवेन्द्र राय की सहृदयता की प्रशंसा किये बिना नही रह सके | कितना पुण्य का काम किया था उन्होंने ! थोड़ी सी छाया थी जहाँ, वहीं जा कर सो गई घुरिया, उसे भी बहुत सुकून मिला था अपने जूँओं से छुटकारा पा कर | राघवेन्द्र राय उसे बड़े गौर से निहार रहे थे |
आज फिर अमावस की रात थी सभी लोग जा चुके थे | घर के लोग भी अब घरों में बंद होने लगे, दुआर पर जो लालटेन टंगा था वो भी ठण्डा (बुझा) कर दिया गया, थोड़ी देर में घुरिया की तरफ़ एक साया चला आ रहा था, उसने झुक कर उसके कान में कुछ कहा और चला गया घुरिया लाठी के सहारे उठी और घारी के भीतर चली गई | आज कल बारिश नही हो रही थी तो घर के सभी गाय-गोरू रात में बाहर नाँद पर ही बधें रहते थे |
कुछ देर बाद ही घारी का दरवाजा अन्दर से बंद हो गया | फिर से रात सिसक उठी, धरती ने फिर से आँसू पी लिए, अंधेरो ने सब कुछ देख कर भी अपनी आँखे बंद कर ली, कुछ दबी घुटी कराह घारी की ईंट की दराजो में समा गई, थोड़ी देर बाद ही घारी का दरवाजा खुला और वो साया बाहर निकल कर एक तफर चला गया, घुरिया वहीं बेसुध पड़ी रही |
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कुछ दिनों के बाद ही जाड़े का आगमन होने वाला था | घुरिया का शरीर धीरे-धीरे सूखता जा रहा था; पर पेट ऊपर की ओर आ रहा था | कोई पथरी तो कोई हवा बयार बता रहा था, जितने मुंह उतनी बातें |
कुछ दिनों बाद राघवेन्द्र राय ने गाँव के बाहर उसके लिए एक फूस की मड़इया छवा दी उसी में एक गगरी में पानी और एक चट्टाई बिछा दी गई, अब यही घुरिया का नया बसेरा था | उसे दोनों समय का खाना-पानी गाँव से कोई ना कोई दे जाता था | अब अक्सर रात में सियार के रोने की आवाज पूरे गाँव को सुनाई पड़ जाती थी |
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समय बीतने के साथ घुरिया जर्जर हो कर हड्डियों का ढांचा बन गयी थी; पर उसका पेट बाहर को आ गया था जो अब पूरे गाँव में चर्चा का विषय बन गया था | हर घर में उसी की चर्चा थी, सभी की हमदर्दी थी उसके साथ; पर ये सब किसने किया, कोई नही जानता था |
जब भी कोई उसे खाना देने जाता वो उदास बैठी रहती थी, उसका हँसना बोलना सब बंद हो गया था | अब तो उसके आस-पास से ‘बास’ भी आने लगी थी, उसके पास जाने से हर कोई कतराने लगा था, उसके घर वाले और समाज के ठेकेदारों ने उसे उसके भाग्य पर छोड़ दिया था |
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दोपहर का समय था, बसंती सारा काम खत्म कर के अपने कमरे में आराम करने जा रही थी तब तक दरवाजे पर खट-खट की आवाज हुई | बसंती ने जा कर दरवाजा खोला तो डाकिये ने उसके हाथ में एक चिट्ठी पकड़ाई और चला गया | चिट्ठी पिपरौंसी से आई थी | बसंती का चेहरा खिल उठा, काफी दिनों से गाँव का कोई समाचार नही मिला था उसे | बड़ी खुशी–खुशी उसने अंतर्देशीय पत्र खोला और पढ़ने लगी | पढ़ते पढ़ते उसकी आँखों में आसूं आ गये, उसने जल्दी से जा कर अपनी सास को पूरी बात बताई | बड़की अम्मा की तबियत बहुत खराब थी, उसे देखने के लिए तुरंत बुलाया गया था |
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पति को छुट्टी न मिल पाने के कारण बसंती अपने मम्मी-पापा के साथ गाँव आ गई थी; पर उनके आने से पहले ही बड़की अम्मा स्वर्ग सिधार गई थीं | उनका अंतिम दर्शन भी नही कर सकी वो | बड़की अम्मा की तेरवीं तक घर रिश्तेदारों से भरा रहा उसे घुरिया की याद तो आई पर उसके बारे में किसी से पूछने का मौका नही मिला | तेरवीं में उसके पति भी आ गये थे, उन्ही के साथ उसे दो दिन बाद ही वापस लौटना था | धीरे-धीरे सभी रिश्तेदार जा चुके थे, बसंती ने भी अपना सामान समेटना शुरू कर दिया था |
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उस दिन जैसे ही वो ओसारे में आई तो देखा कि क्या स्त्री क्या पुरुष हर कोई बगीचे की तरफ भागा जा रहा है !!
“इतनी सर्दी में ये लोग बगीचे की तरफ क्यों जा रहे हैं ?” भीतर आ कर उसने माँ से कहा |
ये सुन कर माँ भी बाहर आ कर देखने लगीं, उसके पति भी उसके पास खड़े हो कर माजरा समझने की कोशिश कर रहे थे | बसंती से रहा न गया, उसने जाती हुई एक महिला को रोक कर पूछा--
“का हुआ है ? काहें सब बगीचे की तरफ़ भागे जा रहे हैं ?”
“ऊ घुरिया के कुच्छु हो गईल बा बुझाता !! ईहे सुन के हमहूँ देखे जात हयीं |” महिला रुके बिना ही ये कहते हुए भागती चली गई |
धुरिया का नाम सुन कर बसंती चौंक पड़ी | वो सोचने लगी “क्या हुआ घुरिया को ?” उसका दिल धक-धक करने लगा उसने पति की तरफ़ देखा और बोली--
“चलिए हम भी देखते हैं कि क्या हुआ उसे |” वो दोनों भी धड़कते दिल के साथ बगीचे की तरफ़ बढ़ गये, उसने अपने पति को घुरिया के बारे में सब कुछ बताया था |
घुरिया की मड़इया के आस-पास बहुत भीड़ लगी थी | किसी तरह से बसंती भीड़ में घुस कर रास्ता बनाती हुई मड़इया तक पहुँच गई; फिर उसने जो दृश्य देखा !! उसकी चीख निकल गई, वो अपना मुंह दबा कर फूट-फूट कर रो पड़ी |
घुरिया अर्धनग्नावस्था में पड़ी थी, उसके दोनों पैरों के बीच में गर्भनाल में लिपटी हुई एक बच्ची खून और गंदगी से सनी हुई अपना हाथ पैर चला रही थी, शायद वो उस बन्धन और गंदगी से बाहर आना चाहती थी |
गाँव भर के लोग तमाशबीन खड़े थे | वो बच्ची कब से गंदगी में अपने हाथ पैर मार रही थी | बसंती के पति भी उस तक पहुँच गये थे, ये दृश्य देख कर वो भी सिहर गये; पर तुरंत ही संभल कर उन्होंने कुछ लोगों से बात की कि जो भी पास में कोई डा० मिले उसे तुरंत ही बुलाया जाय | अब कुछ लोग हरकत में आये और जल्दी से दूसरे गाँव डा० साहब को बुलाने के लिए एक आदमी को भेजा गया क्यों की पिपरौंसी में सरकारी प्राथमिक चिकित्सालय तो था; पर उसमे बारहों महीने कमर तक घास उगी रहती थी, डा० साहब भी नदारद रहते थे | सभी देख रहे थे पर आगे बढ़ने की हिम्मत कोई भी नही जुटा पा रहा था | गाँव की दाई भी आ गई थी, डा० साहब ने आ कर सबसे पहले बच्ची को गर्भनाल काट कर अलग किया, अब तक गाँव की कुछ औरतों को अपना फर्ज याद आ गया था, दौड़-दौड़ कर सबने सब सामान एकत्र कर लिया था | दाई ने बच्ची को गरम पानी से नहला दिया, अब बच्ची वो किसे दे ? उसने इधर-उधर देखा बसंती खड़ी-खड़ी सिसक रही थी, उसका अंतर्मन क्रोध से धधक रहा था, इतना ओछा काम किसने किया होगा ? उसने अपनी हवस पूरी करने के लिए घुरिया को भी नही बक्शा, जो कि दिमागी रूप से कमजोर थी, शरीर से मैली-कुचैली, बास आती देह से भी अपनी हवस बुझा लिया, इन हवस के भेड़ियों को मात्र एक मादा शरीर चाहिए नोचने के लिए भले ही वो एक लाश ही क्यूँ ना हो, घुरिया एक चलती-फिरती लाश ही तो थी !
उसे अब भी भरोसा नही हो रहा था, जो कुछ भी वो देख रही थी उस पर | उसने दाई की मंशा भाप ली जल्दी से आगे बढ़ कर उसने बच्ची को अपने आँचल में ले लिया और अपनी शाल में ढक लिया | डा० ने घुरिया को मृत घोषित कर दिया | बगीचा में उसी जगह जहाँ घुरिया कई बार मर चुकी थी, उसकी चिता जला दी गई, उसकी मड़इया गिरा कर आग लगा दी गई, उसके अन्दर की सारी गंदगी जल कर स्वाहा हो गई, घुरिया का नामोनिशान मिट गया !


*पच्चिस साल बाद ..........

बसंती ने अपने पति के सहयोग से अपनी सखी घुरिया की याद में ‘घूरी देवी’ के नाम से एक संस्था खोली थी जिसके माध्यम से दूर दराज के गाँवों की निरक्षर महिलाओं को साक्षर किया जाता था,उन्हें डलिया, खाँची, हाथ पंखा,चट्टायी आदि बनाना सिखा कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाता था और ऐसी बच्चियाँ जो दिमागी या शारीरिक रूप से विकलांग थी, जिनका कोई देखभाल करने वाला नही था, उन्हें ढूंड कर संस्था गोद लेती थी और उनका पालन-पोषण और उनकी शिक्षा का पूरा ख्याल रखा जाता था ताकि फिर से कोई परछाई रात के अंधेरे में उन्हें रौंद ना सके न ही फिर कोई घुरिया एड़ियाँ रगड़ कर इस दुनिया से विदा हो और न ही किसी करिश्मा का जन्म हो |
बसंती ने संस्था के लिए दिन रात एक कर दिया | शुरुआत छोटे स्तर पर हुयी थी पर संस्था के कार्यों की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी जिससे संस्था को सहयोग भी मिलने लगा था | आज जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ‘घूरी देवी संस्था’ को सम्मानित किया जाना था | बड़ा सा पंडाल लगा था, बड़े-बड़े गणमान्य बैठे थे | मंच से जब संस्था की अध्यक्षा का नाम पुकारा गया; तब बसंती के बगल में बैठी एक सुन्दर सी युवती, जिसकी उम्र कुछ चौबीस या पच्चीस की होगी, लाल रंग की बाडर वाली सफ़ेद साड़ी और बंद गले का लाल ब्लाउज, गले में सोने की पतली सी चैन, एक हाथ में घड़ी और दूसरे हाथ से अपना पल्लू संभालते स्टेज की तरफ़ बढ़ गई | पूरा पंडाल तालियों से गड़गड़ा उठा |

शाम हो चुकी थी घर के बाहर गाड़ी रुकते ही करिश्मा की सहेलियों ने उसे घेर लिया और बधाइयों का सिलसिला शुरू हो गया | करिश्मा को छोड़ कर बसंती और उसके पति अन्दर आ गये | कमरे में वही बचपन की फोटो (जिसमे बसंती, घुरिया और फुलवा थी), टंगी हुयी थी | बसंती घुरिया को देख कर भावुक हो जाती है और अपने पति का हाथ पकड़ कर कहती है --
“दस वर्ष पहले जो संस्था खोली थी, उम्मीद नही थी कि इस मुकाम पर पहुँचेगी, आप का सहयोग ना होता तो मैं कुछ भी ना कर पाती |” उसकी आँखों में आँसू थे |
“नहीं .. ये तुम्हारी मेहनत,लगन और अपनी सखी के प्रति तुम्हारे प्रेम का नतीजा है जो संस्था यहाँ तक पहुँची है, घुरिया का नाम कभी मिटने नही दिया तुमने, अब तुमने इसकी जिम्मेदारी करिश्मा को सौंप कर बहुत अच्छा किया |” पति ने बहुत ही प्रेम से उसके आँसू पोंछते हुए कहा और भीतर चले गये |
बसंती सिसक पड़ी “घुरिया को मैं कैसे मरने देती, संस्था से उसका नाम और करिश्मा के रूप में वो खुद जीवित है, हर पल मेरे करीब है, मैंने कभी भी उसको खुद से दूर नही महसूस किया, वो तो मेरी साँसों में बसती है, बसंती मर जायेगी पर घुरिया कभी नही मर सकती..कभी नही”.......बुदबुदाते हुए बसंती फूट फूट कर रो पड़ी |
तब तक करिश्मा भी आ गई | बसंती को उन्ही तीन लड़कियों की फोटो के सामने यूँ बिलख कर रोते देख चौंक पड़ी |
“माँ...माँ....क्या हुआ ?” करिश्मा ने उसे पकड़ कर सोफे पर बैठा दिया और उसको चुप कराने लगी, तब तक उसके पापा भी आ गये, वो बसंती को समझाने लगे, करिश्मा दौड़ कर एक गिलास पानी ले आई और बसंती को पिलाया, जब वो थोड़ा सामान्य हुई तो करिश्मा बोली –
“माँ..आपने कभी नही बताया कि ये कौन-कौन हैं ? मैंने जब भी पूछा आपने टाल दिया, आज आप को बताना ही होगा कि इनसे आप का क्या रिश्ता है ? आखिर कौन हैं ये ? जिनके लिए मैंने अक्सर आपको आँसू बहाते हुए देखा है और आज तो हद ही हो गई ! आप को अपनी सेहत का जरा भी ध्यान नही ?”
“बस् इतना जान ले कि इसमें से एक तेरी माँ है बेटी, जिसकी वजह से संस्था का वजूद है; अगर वो ना होती तो तू या तेरी संस्था भी ना होती |” अपनी हिचकियों पर काबू पाते हुए बसंती बोली |
करिश्मा उसके गले से लग गई और बोली “ये तो मुझे भी पता है कि इनमे से एक मेरी प्यारी सी माँ है |” बसंती ने उसका माथा चूम लिया, करिश्मा उससे बेल की तरह लिपटी हुई थी ||

साभार लमही


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परिचय
नाम- मीना पाठक


कार्य - गृहिणी , लेखिका
शिक्षा- कानपुर यूनिवर्सिटी से स्नातक

'अंतर्मन ' ब्लॉग का सफल संचालन ,
प्रकाशित कृति – (साझा संग्रह)-‘अपना-अपना आसमा’, ‘सारांश समय का’, ‘जीवन्त हस्ताक्षर"
सम्मान - शोभना वेलफेयर सोसायटी द्वारा-शोभना ब्लॉग रत्न सम्मान 2012 व माण्डवी प्रकाशन द्वारा ‘साहित्यगरिमा’ सम्मान 2014 प्राप्त हुआ !!

फोन न०- 09838944718
ई - मेल आईडी-- meenadhardwivedi1967@gmail.com

























































Sunday, May 10, 2015

माँ की दुनिया की कहानियाँ- संतोष दीक्षित



माँ की दुनिया की कहानियाँ

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एक: पहला चाँटा
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चार वर्ष का होने तक मैं माँ का दूध पीता रहा था। जैसी कि उन दिनों घर की हालत थी, माँ भी ठीक वैसी ही थी। यानी कि दुबली पतली और पीली सी। पेट भर अनाज भी नसीब नहीं होता था उसे हर दिन। दूध, मलाई की जगह दूध वाली चाय पी लेती थी सुबह शाम, सबके साथ। फिर भी माँ हमेशा हँसती रहती। ‘‘अरे मेरे लाल ऽ... मेरा बच्चा ऽऽ ...’’ कहकर सदैव पुचकारती रहती। मेरे ज्यादा रोने या जिद करने पर पाँच मिनट सुस्ताने के नाम पर बाहर बारामदे में बैठ जाती और मुझे छाती से चिपका लेती। तीन चार मिनट बीतते न बीतते माँ की छातियों से दूध रिसना बन्द हो जाता। लेकिन मैं भी इतना सीधा सादा और संतोषी था कि दुबारा दूध रिसने के इन्तजार में माँ के स्तन से ही खेलने लगता। तभी तो माँ ने बहुत सोच विचारकर ‘धीरज’ नाम रखा था मेरा।
मैं माँ के स्तन पर मुँह से बुदबुदाती ध्वनि निकालते हुए ऊंगलियों से बना स्कूटर दौड़ता तो कभी मोटरकार। हवाई जहाज तक उड़ाने और उतारने का मजा ले लेता मैं यूंही खेलते हुए। माँ को फुर्सत में बैठी देख अबतक दो एक पड़ोसिनें बारामदे में जम ही जातीं। तब तो मेरी चाँदी हो जाती। इधर मैं अपने खेल की विधिवता में निमग्न हो जाता उधर माँ बतकही और निन्दा रस मंे आकंठ डूब जाती। कुछ धूल उड़ती रहती, कुछ कारवां बढ़ता रहता।
लेकिन बीच-बीच में मुझे ऐसा लगता जैसे माँ थोड़ी असहज हो जाती हो। उसकी आरामदायक स्थिति में थोड़ा विध्न पड़ता और तब वह मुझे झकझोरकर मेरी यथास्थिति से बाहर ढ़केल देती। फिर सबकुछ सामान्य हो जाता।
इसी क्रम में एक दिन जाने क्या हुआ कि माँ ने मुझे अकस्मात एक चांटा जड़ दिया। नहीं ... चांटा जड़ने से पहले उई माँऽ ... की हल्की चीख भी निकली थी माँ के कंठ से। चांटा जड़ने के बाद एकदम से बड़बड़ाते हुए मुझे अपनी गोद से परे जमीन पर लुढ़का दिया और मेरे लिए कुछ कठोर शब्दों की वर्षा करने लगी। यह सब कुछ अकस्मात ही घटित हुआ। मैं अचानक हुए इस आघात से हतप्रभ तो था ही माँ द्वारा यूं कठोरता बरतने पर और भी विचलित हो उठा और लगा पैर पटक-पटक कर रोने और चीखने चिल्लाने।
मेरे इस कृत्य से माँ का गुस्सा और भी भड़का दिया और उसने ‘‘यह ले ... और ले ... शैतान... हरामी कहीं काऽ...’’ की क्रुद्ध वाणी के साथ दो चार हाथ मेरी पीठ और कमर पर भी जड़ दिये।
लेकिन उन दिनों मैं धीरज कुमार के साथ-साथ जिद्दी कुमार भी था। ‘‘दुध्धु उ ...
दुध्धु उ उ ...’’  की रट तब भी लगातार लगाए जा रहा था। हाथ पैर पटकना भी बदस्तूर जारी था। थक हारकर उस दिन माँ ने पुनः मुझे अपनी छाती से सटा लिया।
इसके अगली बार से माँ ने पता नहीं क्या किया कि मैं मुँह लगाता नहीं कि फौरन हटा लेता। इतना कडु़वा और कसैला। अमृत की जगह विष। नहीं, विष नहीं, मुसब्बर! माँ अपनी एक पड़ोसन की सलाह पर मुसब्बर का इस्तेमाल करने लगी। इसके बाद तो मैं भी पीतल की छोटी गिलसिया से दूध पीना सीखकर माँ का राजा बेटा बन गया।
आप सोचते होंगे, इतना सब मुझे याद कैसे है ? ... इतनी कम उम्र की बातें !
दरअसल यह सारी राम कहानी स्वयं माँ ने ही सुनायी थी मुझे और सुनकर मेरा सारा गुस्सा और तनाव एक क्षण में काफूर हो गया था। दरअसल उस दिन खेलकर लौटने में थोड़ी देर हो जाने के कारण बाबूजी ने गाल पर तमाचा जड़ दिया था क्योंकि मेरी सालाना परीक्षा सर पर थी। इसके चलते मैं बहुत क्रोध और तनाव में था कारण कि मेरा रिजल्ट अब तक कभी खराब नहीं हुआ था।
आज यह सब याद करते हुए तब से ये यही सोच रहा हूँ कि आखिर कितनी समृद्ध थी माँ कि उसके पास हर बुरे और खुरदरे वक्त के लिए गहरी आत्मीयता से भरा एक कोमल सा किस्सा होता था।



दो: पहला प्यार
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पता नहीं माँ का स्वभाव ऐसा क्यों था ? वह बाबूजी से अपने लिए कभी कुछ नही मांगती। बाबूजी को कभी-कभी क्रोध भी आ जाता इस बात पर-’’साड़ी में चार जगह पैबन्द लगाकर पहन लेगी, मगर होंठ से दो बोल नहीं निकालेगी हरमजादी ...।’’
लेकिन हम बच्चों की किसी वाजिब जरूरत पर माँ क्रुद्ध शेरनी की तरह भिड़ जाती थी बाबूजी से और अपनी बात मनवा कर ही दम लेती। ऐसे ड्रामें का अंत यही होता कि बाबूजी जेब से रूपये निकाल फर्श पर फेंक देते और फर्श पर गिरे इन्हीं रूपयों के बीच माँ की क्षत-विक्षत देह भी भू लुंठित पड़ी मिलती।
ऐसी ही एक शाम जब मैं खेल के मैदान से घर पहुँचा, माँ फर्श पर लुढ़की पुढ़की पड़ी मिली। उसकी कलाइयों से खून रिस रहा था और फर्श पर रूपयों के साथ-साथ माँ की चूडि़यों को टुकड़े भी छितराए पड़े थे।
मैंने बड़ी मुश्किल से माँ को उठाकर चैकी पर बिठाया। फिर उसकी कलाई पर रूई के फाहे से डेटाॅल लगाया। माँ की चोट अंदरूनी थी। मारे दर्द के वह बोल तक नहीं पा रही थी।
मैंनेझट स्टोव जलाकर चाय का पानी चढ़ाया। फिर दौड़कर बगल की मौलवी की दुकान से दो डंडा बिस्कुट और वेदना निग्रह रस की एक पुडि़या ले आया।
स्कूल जाने के रास्ते में जगह-जगह दिवारों पर लिखा पढ़ता जाता था-वेदना निग्रह रस, दर्द से फौरन निजात पाने के लिए।
चाय के साथ वेदना निग्रह रस की पुडि़या, डंडा बिस्कुट और एक गिलास ठंडा पानी भी।
माँ के लिए आज अभी मैंने वही सब कुछ बिल्कुल उसी तरह किया था, जैसे औरों के लिए रोज रोज कई कई दफे करती थी मां। सिर्फ वेदना निग्रह रस की पुडि़या एक अतिरिक्त प्रयास था मेरी ओर से।
चाय के साथ डंडा बिस्कुट और दवा लेने के कोई पन्द्रह मिनट बाद माँ के बोल फूट सके-‘‘तुझे कैसे मालूम इस दवा के बारे में ?’’-माँ के चेहरे पर एक सुखद आश्चर्य का भाव था।
‘‘पढ़ के जानाऽ ... और कैसे जानता ?... जगह-जगह दिवालों पर लिखा रहता है इसके बारे में।’’ मैंने पूरी सावधानी से यह वाक्य पूरा किया नहीं कि माँ ने एकदम फौरन से पेश्तर ‘‘हाय रे मेरा पढ़ा लिखा लाल...’’ कहकर मुझे अपनी छाती से भींच लिया।
सच कहता हूँ, जो स्थिति थी माँ की, घर की, मैं प्यार पाकर उतना खुश नहीं था, जितना कि प्यार लुटाकर माँ खुश और संतुष्ट नजर आ रही थी।


तीन : पहला पाठ 
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उस मोहल्ले में माँ बहुत लोकप्रिय थी, जहाँ वह किरायेकी एक कोठरी लेकर बाबूजी के संग रहती थी। पास-पड़ोस की तमाम नववधुएँ एवं उनकी ननदें, सब दोपहर के बाद माँ के इर्द-गिर्द ही जमी रहतीं। पाक कला, सिलाई, कढ़ाई से लेकर बोलने का सउर तक, सबकुछ सिखलाती उन्हें माँ हँसते बोलते और बतकही के रस में डूबते उतराते।
लेकिन एकदम अकेले में अजीब तरह की ठंडी सांसे छोड़ते हुए, कलपते देखा है कइ्र्र कई बार माँ को। खीरी लखीमपुर, लखनऊ और कानपुर जैसे शहरों के लिए ... जहाँ बचपन से लेकर युवा होने तक का समय गुजारा था माँ ने। हरदोई से लेकर बनारस के बीच के सारे शहर उसे मुंहजबानी याद थे। हर शहर में कोई न कोई रिश्तेदार और उनके यहाँ अवसर विशेष पर माँ के जाने और चन्द दिन गुजारने के वो तमाम खुशगवार पल। इन तमाम स्मृतियों को अपने आँचल की खूंट में बांधकर लायी थी माँ अपने मायके से। यही उसका स्त्री धन था ... उसके अतीत का चलचित्र ...।
माँ के पास इन तमाम शहरों से जुड़े इतने दिलचस्प यात्रा स्ंस्मरण थे कि इन्हें बीसियों दफा सुनते सुनते ये तमाम शहर मेरी स्मृतियों में किसी धरोहर की तरह बस चुके थे। इनमें से अधिकांश शहरांे में मैं कभी नहीं गया, लेकिन जानता हूँ स्टेशन से बाहर का नजारा कैसा होगा, क्या सब मिलेगा देखने को और एक खास मोहल्ले में जाने का रास्ता क्या होगा ... इसके बीच क्या क्या पड़ेगा ... वगैरह ... वगैरह।
माँ जिस दिन भी अपनी इन सघन स्मृतियों की छांह में विचरती रहती हम सभी भाई बहन कहते रहते-‘‘माँ आज यूपिआई हुई हैं।’’
लेकिन याद है एक घटना कानपुर की। माँ अपने मायके आयी हुई और अपने भाइयो, बहनों और सहेलियों के साथ सारे दिन मगन रहती थी। तरह-तरह के किस्से, हंसी मजाक, खाना-पीना ... बस यही दिनचर्या थी माँ की। इन सबों के बीच मैं अपनी बोली बानी के साथ ‘बिहारी राजा’ का खिताब पता और अगल-बगल के जिस घर में भी जाता, ‘आ गवा बिहारी’ कहकर मेरा जोरदार स्वागत होता। माँ को यह अच्छा नहीं लगता फिर भी मुस्कुराती। लेकिन सच तो यह है कि विशेष तवज्जो दिये जाने के कारण मैं भीतर से फ£ महूसस करता।
ऐसे ही सौहाद्रपूर्ण पारिवारिक माहौल के बीच एक दोपहर यूपी और बिहार को लेकर थोड़ी छींटाकशी हो गई। थोड़ी कहासुनी बढ़ी और देखते ही देखते यह एक तीखी बहस में बदल गई।
और उस दिन मैंने आश्चर्य और श्रद्धा के साथ माँ का एक नया रूप देखा। अपने तमाम ठोस तर्कों के साथ विपक्षियों को तुर्की ब तुर्की जवाब देती बिहार की यह बहू खड़ी थी बिहार के पक्ष में। बिहार राज्य के बारें में इनती ढेर सारी सूचनाएँ और पटना शहर के बारें में इतनी ठोस जानकारियाँ ... मैं सचमुच दंग था माँ की ऐसी प्रतिभा देखकर।
उस दिन तमाम उपस्थित लोगों नेे अंत में एक ही वाक्य कहा-‘‘बिटिया अब परायी हो चुकी हैं।’’
मैंने आश्चर्य से गर्दन घुमाकर माँ की ओर देखा। वह ऐसा ताना सुनने के बाद भी खुश थीं।

चार: माँ के साथ खेल
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जब मैं छोटा था तभी से माँ मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत औरत लगती थी। जब किशोर वय का हुआ, तब भी मेरे खयालात कुछ कुछ ऐसे ही थे। बल्कि कहूँ कि थोड़े विशिष्ट संस्कार ले चुके थे। जैसे कि मेरी माँ की नाक मुझे बहुत लुभाती। लेकिन सबसे ज्यादा आकर्षित माँ के पैरों की पूरी बनावट करती। खासकर पर्व त्योहार के दिन जब माँ अपने इन गोरे सुडौल पैरों का बिछिया आलता और पायल के साथ श्रृंगार करती। तब मैं अक्सर माँ को उलाहना देता-‘‘एक तेरा पैर है ... इतना सुडौल ... एक मेरा है।’’
तब माँ ध्यान से मेरे पैरों को देखती जिसकी कई कई ऊंगलियाँ ठेस लगते रहने से थोड़ी विकृत और खुरदरी थीं। बायें पैरे के अंगूठे का नाखून तो और भी भद्दा था।
‘‘तेरे पैर सच में मर्द के पैर है।’’
माँ तारीफ करती तो मैं उसे मुंह चिढ़ाकर भाग जाता-‘‘नहीं ... मर्द नहीं बनना है मुझे ... खबरदार जो मर्द कहा मुझे ...!’’
जब मैं काॅलेज आने जाने लगा, किसी खूबसूरत लड़की पर नजर पड़ती नहीं कि फिसलकर फौरन उसके पैरों पर चली जाती। पैर अगर माँ के पैरों की बनावट के कहीं आस पास भी टिकते, तभी दुबारा उसका चेहरा देखता अन्यथा सर झुकाकर आगे बढ़ जाता।
अपने ट्यूशन की पहली आमदनी से मैं माँ के लिए एक खूबसूरत सैंडिल खरीद लाया। माँ कैसी तो बेढं़गी किस्म की चप्पलें पहना करती थी जिससे मुझे काफी खीझ होती थी। सैंडिल देखकर माँ बहुत खुश हुई। बोली कि रख लेती हूँ इसे बहुरिया के लिए। आएगी तो दाद देगी तुम्हारे पसंद की।
‘‘यह तुम्हारे लिए है य’’-मैंने ... दृढ़ शब्दों में कहा।
‘‘अरे मैं कहाँ ... इसके लायक सूट भी तो चाहिए या कोई अच्छी साड़ी।’’
अगले महीने मैं सूट का कपड़ा ले आया। फिर मेरी नौकरी हो गयी। मैं माँ से दूर चला गया, दूसरे शहर। फिर मेरी शादी की बात चलने लगी लेकिन इसके पहले ही माँ अचानक चल बसी। चल बसी तो क्या ? कोई दूर थोड़े न चली गयी थी। और करीब आ गया था उसका गोल सा चेहरा और खड़ी नाक। और उसके वह पैर ... जिनपर अपना सर टिकाकर मैंने उसे अंतिम विदाई थी, उसकी वह
लम्बी पतली ऊँगलियाँ और उनकी बगल में थोड़ा मोटा और नाटा सा, किसी सेठ की कोठी के बाहर खड़े गोरखा पहरेदार सा वह अंगूठा ... यह सब मेरी जेहन में ज्यों के त्यों सुरक्षित पड़़े थे।
मेरी शादी के लिए रिश्ते लगातार आ रहे थे। तस्वीर देखकर मैं किसी लड़की को पसंद कर लेता। लकिन जब प्रत्यक्ष देखता तो ...! तीन सुन्दर लड़कियाँ मैंने केवल इसलिए छाँट दी, क्योंकि मुझे उनके पैर जरा भी नहीं जँचे। फिर मैंने एक लड़की पसंद कर ली। उसके पैर माँ के पैरों से भी ज्यादा गोरे, सुडौल और आकर्षक थे। उसके दाहिने पैर के अंगूठे के नीचे काजल के टीके की तरह एक काला दाग था। जैसे प्रकृति ने ही बुरी नज़र से बचने को उपाय रच दिया हो। मैं मुग्ध भाव से सर झुकाए इन पैरों को निहारता ही रहागयाथा ...। मैं इतराता और मटकता फिर रहा था अपनी इस पसंद पर।
बहू के घर आने पर महिलाओं के बीच चल रही बतकट्टी के कुछ अंश मेरे कानों तक भी पहुँचे। मेरी मौसी मेरी बुआ से कह रही थी-‘‘अभी कमला (मेरी माँ) रहती तो क्या ऐसी ही
बहुरिया इस घर में आती ? बेचारा टूअर ... जाने क्या देखा इसमें जो सीधेे हाथ पकड़ घर ले आया।
अचानक मेरी नजर कमरे की दिवाल पर अंटक गई। वहाँ माँ की तस्वीर थी ‘‘उसकी जवानी का मुस्कुराता खिलखिलाता चित्र। मुझे लगा उस चित्र में मौजूद मेरी माँ मुझे जीभ बिराकर चिढ़ा रही है। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में गर्मियों की लम्बी दोपहर मंे लूडो के खेल में मेरे हार जाने पर माँ मुझे जीभ बिराकर चिढ़ाती थी। और तब मैं दांत पर दांत चढ़ाकर किटकिटाते हुए चैलेंज करता कि अच्छा अबकी बार जीतकर दिखलाओ तो जानूं। ओर इस तरह यह खेल वर्षो चालू रहा। कभी माँ मुझे चिढ़ाती कभी मैं।
‘‘ठीक है कहने दो लोगों को कुछ भी लेकिन उसके पैर तुम्हारे पैरों से ज्यादा खूबसूरत हैं ... समझी।’’ उस एकांत कमरे में माँ को सम्बोधित करते हुए मैंने भी उसे जीभ बिराकर चिढ़ाया।
माँ के साथ खेल का अंत यहीं पर हो गया।

पाँच:  माँ के रूप हजार
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माँ का यह रूप मेरे लिए सर्वथा अकल्पनीय था।
पूरे सात वर्ष गुजर चुका था माँ के साथ।उसके तमाम दब्बूपन और आज्ञाकारिता का मैं सबसे बड़ा गवाह था। गवाह था उसके पिटकर रोने और फिर आँसू पोंछ झटपट रसोई घर में सक्रिय हो जाने का।
लेकिन आज उसी माँ के इस नए संस्करण को देख मैं भांैचक था।
‘‘नया नहीं है ये बुद्धू ... यही पुराना है। पुराना और स्वाभाविक रूप। दरअसल यही और ऐसी ही एक मुक्कमल लड़की थी मैं जो तुम्हारे पिता के घर एक पत्नी, बहू और जाने क्या क्या बन कर कई कई टुकड़ों में बँट गई हूँ।’’
यह माँ ने उस रात बताया था। अपने पिता के घर में। मैं नानी की गोद में बैठा था। नानी स्नेह और लाड़ मिश्रित स्वर में माँ को बुरा भला कहती हुई मेरी कमर में सरसों तेल की मालिश भी करती जा रही थी।
माँ दिन भर साइकिल के आगे के डंडे पर मुझे बिठाकर जाने किन-किन सहेलियों के घर घुमाती रही थीं। हर जगह भरपूर प्यार, दुलार और टाॅफी मिठाई। सारे दिन मस्ती करता रहा मैं। लेकिन रात में मामूली से कमर दर्द की शिकायत पर माँ का पुरा कुनबा जुट गया था मेरी तीमारदारी में।
और माँ ... वह बगल में बैठे भाई बहनों से गप्पें लड़ाने में मशगूल थीं। बीच बीच में नकली गुस्सा भी करतीं मुझपर-‘‘एक नम्बर का पाजी है यह और अव्वल बहाने बाज भी। इतनी सेवा हो तो किसकी कमर में दर्द न उठे भला .......... ? अब कल से बैठना तुम घर में ही, नानी माँ के पास ...मैं नहीं लेकर जानेवाली तुमको कहीं।’’
‘‘दस वर्ष की उम्र से ही निगोड़ी सायकिल चलाने लगी थी। डी.ए.वी. स्कूल में जब नाम लिखाया गया इसका तो यही शत्र्त थी इसकी कि एक सायकिल भी मिलनी चाहिए। तब से जो पाँव में पहिए लगेइसके ... अब भी छूटी नहीं है आदत।’’
नानी माँ यह सब बखान रही थी और मैं अपने शहर के बारे में सोच रहा था, जहाँ आज भी कोई छोटी या बड़ी लड़की सायकिल चलाते हुए नहीं दिखती। दिखती क्या दरअसल वह ऐसा सोच भी नहीं सकती। इस लिहाज से माँ का यह रूप मेरे भीतर माँ के प्रति एक अतिरिक्त सम्मान जगा रहा था।
जबकि माँ थी कि हंस हंसकर बताए जा रही थी कि कैसे वह कांग्रेस के जुलूस, सत्याग्रह, पिकेटिंग आदि में स्कूल से भागकर अपनी सायकिल से फौरन पहुँच जाती। उस दिनों कानपुर की डाॅ0 लक्षमी सहगल माँ की आदर्श थी। वह उनसे कई-कई बार मिली थी और उन जैसी ही बनना चाहती थी। माँ के पैरों पर अंग्रेजों की लाठी के दाग भी थे।

आज माँ नहीं है। उसकी पूरी जिंदगी मर्दों की इस दुनिया में एक औरत के टूटकर बिखर जाने की उसी पुरानी कहानी की तरह है। लेकिन माँ से जुड़ी यह छोटी छोटी कहानियाँ किसी अनमोल विरासत की तरह दफन थी मेरे जेहन में। आज यह तमाम कहानियाँ खुद ब खुद बाहर निकलकर पूरी सृष्टि में छा जाना चाहती हैं। कारण है मेरे शहर का बदलता परिवेश। आज मेरे शहर की हजारों-हजार स्कूली बच्चियां सायकिल की पैंडल मारते हुए जीवन पथ पर रफ्तार से उड़ी जा रही हैं। इन्हें देखते ही बरबस माँ की याद हो आती हैं। लगता है माँ हजारो-हजार रूपों में एक बार फिर से जिंदा होकर मुझे गहरे सुकून और आनन्द से भर रही हैं।
माँ की दुनिया की यह कहानी इन बच्चियों की दुनिया की कहानी बनने जा रही है।

तुम्हें शत-शत प्रणाम मेरी हजारो-हज़ार नन्ही मुन्नी माताओं !







संतोष दीक्षित
दुली घाट, दीवान मोहल्ला
पटना सिटी, पटना-800 008
मोबाइल -9334011214


Friday, February 13, 2015

अनोखा - इंदु सिंह





अनोखा


जैसा कि नाम कुछ अलग है अनोखा वैसी वो अलग बिलकुल भी नहीं थी बस न जाने क्यूँ उसका नाम अनोखा था . करीब पाँच फुट लम्बी, साँवला रंग ,छोटी निर्जीव आँखें ,भूरे सूखे बाल , ऊपर के चारो दांत कुछ आगे को निकले हुए, उसके पास से आती पसीने की असहनीय गंध और शरीर में लिपटे हुए पुराने कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े ये थी अनोखा की रूपरेखा !

एक बेहद गरीब नाई
 हरी प्रसाद की बेटी थी वो और इकलौती नहीं बल्कि चार छोटी बहने और पाँचवा एक भाई भी था जिसकी माँ की भूमिका अनोखा ही निभा रही थी!  अनोखा की माँ रामरती लोगों के घर चौका-बासन और लिपाई-पुताई करके किसी तरह अपने बच्चों के लिए रोटी जुटा पाती थी ! एक लड़के की चाह में पाँच बेटियाँ जनी थीं उसने !  दबाव किसी का नहीं था उसे खुद ही बेटा चाहिए था अपने बुढ़ापे को सँवारने के लिए !  खुद की उम्र अभी तीस पार न थी पर देखने में किसी पिछली सदी सी दिखती थी रामरती,  रंग इतना काला कि उसके दाँत चूने जैसे सफ़ेद चमकते थे , शरीर सिर्फ हड्डियों का ढांचा मात्र बचा था कई बार खेतों की फसल बचाने के लिए खड़े किये गए बिजुका भी उससे भले दिखते थे ! अनोखा के पिता हरी प्रसाद को मिर्गी के दौरे पड़ते थे  आए दिन यही सुनने में आता कि आज यहाँ तो कल वहाँ हरी प्रसाद गिरा पड़ा है और मुंह से झाग फेंक रहा है !  यही बीमारी उसकी सबसे बड़ी दुश्मन थी पूरे गाँव में कोई भी उससे अपने बाल या दाढ़ी ( हजामत ) नहीं बनवाता था कि कहीं उसकी साँसों से ये बीमारी उन्हें भी न लग जाए. पास के गाँव में सप्ताह में दो दिन सब्जी और मवेशी का बाज़ार लगता था अतः हरी प्रसाद वहीँ जाकर किसी पेड़ की  छाँव तले अपनी पिटारी खोल उस्तरे को चमकाता हुआ बैठ जाता और कोई दो-चार लोग जो उसे नहीं पहचानते थे अपने बाल कटवा लेते थे या हजामत बनवा लेते थे  बस यही उसकी कमाई थी !  .खेती बाड़ी न के बराबर थी एक बिसुआ उसरहा खेत उसे मिला था अपने भाइयों से बँटवारे के बाद जिसमे मुश्किल से धान की फसल हो पाती थी और थोड़े बहुत गेंहूं भी मिल जाते थे . बीमारी के चलते दूसरे लोग उसे अपनी खेती भी बटाई पर नहीं देते थे  उसके पास अपने बैल या हल भी नहीं था जुताई आदि के लिए. बामुश्किल वो अपने भाइयों से बैल और हल ले पाता था अपने खेत की जुताई के लिए इसके बदले वो उनके खेतों में फसल की कटाई - ढूआई करा देता था !  इतनी सब कठिनाइयों के बीच जो दो-चार रूपए कमाता भी तो रोज तो नहीं पर हाँ महीने में एकाध बार देसी दारु में डुबो देता था उसका कमज़ोर शरीर झेल भी न पाता और वो पड़ा रहता  कभी किसी मेड़ पर ,कभी किसी तालाब के किनारे बेसुध ! . गाँव का कोई न कोई बच्चा या बड़ा ये ख़बर उसके घर पंहुचाता कि हरी प्रसाद यहाँ या वहाँ पड़ा है दारु पीकर !  तब रामरती और अनोखा एक साथ आते और उसे घसीटते हुई दोनों घर तक ले जाती .रामरती के मुँह से गालियाँ बरसतीं , अपनी किस्मत को कोसती और सारा गुस्सा अपनी बेटियों पर निकालती ,उन्हें पीट डालती लेकिन इस सब का हरी प्रसाद पर कोई असर न होता और अनोखा बचपन से ही आदी थी इस सबकी,  इसलिए कभी कुछ नहीं कहती,  बस अपने पिता को घर तक ले जाने में चुपचाप रामरती की  मदद करती थी !

रामरती रोते हुए बेटे अनूप को कलेजे से लगा के चिल्ला – चिल्ला के कहती कि बस मेरा बेटा बड़ा हो जाए तो मुझे इस नरक की दुनिया से मुक्ति मिले न जाने इन पाँच-पाँच बोझ की गठरियों से कब पीछा छूटेगा
, मुझे मार कर ही मरेंगी ये सब ! और उस पर ये दारु बाज खसम न मरता है न मरने देता है !  घर में अनाज की कमी इतनी कि न जाने कितनी रातें रामरती ने सिर्फ पानी पर गुज़ारीं थीं !  दिन में तो फिर भी जिस घर में काम करती कोई न कोई उसे बासी रोटी -आचार या खराब हो रहा खाना खिला ही देता  हाजमा इतना मज़बूत हो चुका था उसका कि सब कुछ  हजम हो जाता !

अनोखा अब चौदह वर्ष की हो चुकी थी और उसका शरीर अब उन फटे कपड़ों से छुप नहीं रहा था ! रामरती के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यही हो रही थी की सब गाँव वालों की नज़रों से कैसे बचाए अपनी बेटी के विकसित हो रहे शरीर को !  रामरती ने अपनी समस्या जिन घरों में काम करती थी उनकी मालकिनो से बताई तो कुछ भली औरतों ने अपनी पुरानी फटी ब्रा रामरती को दे दी
कि इसे सिल कर वो अनोखा को पहनाये और अनोखिया से बोल कि दुपट्टे से ढँक कर रखा करे ठीक से अपना शरीर ज़्यादा बाहर आने – जाने की ज़रुरत नहीं है घर पर ही रहे और घर सम्हाले बाहर कमाने के लिए तो तुम हो ही !  पुरानी साडी को फाड़ कर रामरती ने अनोखा के लिए दुपट्टा भी बना दिया और फटी ब्रा की मरम्मत करके अनोखा को पहना दी इस हिदायत के साथ अब तू बड़ी हो रही कायदे से रहा कर पर भला कब तक और कहाँ तक ढँक पाती ये पुरानी अंगिया और पुरानी ओढ़नी अनोखा के नित नए विकसित हो रहे शरीर को !  आखिर उसे भी तो अच्छा लगता था अपने शारीर का बदलता हुआ यह रूप क्यों कि अब जब भी वो घर में रहती तो चचेरे भाई भी उसे बड़े ध्यान से निहारते और जब भी बाहर जाती गाँव के चाचा-ताऊ सब उसे अपने पास बुलाते, उसके हाल पूछते और बिना किसी काम के ही दो – चार रुपए भी पकड़ा देते कि रख लो कुछ अपनी पसंद का ले लेना !

आज तो जैसे ही बिसात खाने वाले की आवाज़ सुनकर अनोखा घर से बाहर भागी और उसके पास बैठ के सामान देख रही थी कि तभी गाँव के रज्जन काका वहाँ आ गए और उन्होंने बिसात खाने वाले से उसे पूरे ९ रूपये के कान के बुँदे और ३ रुपए की नाखूनी दिलवाई साथ ही बड़े प्यार से बोले अनोखा कल यह बुँदे पहन कर इसी वक़्त मेरे ट्यूबवेल पर आना जरा मैं भी तो देखूं कि कैसी दिखती है तू इन बूंदों में . अनोखा ने पहली बार कान में बुँदे पहने थे आठ बरस की थी जब उसने शौक में कान छिदवाए थे लेकिन आज तक सिवाए नीम की सूखी डंडी के कोई जेवर उसे न मिला था . हरा नग था उन बुन्दो का और उसमे तीन छोटे – छोटे घुंघरुओं की लटकन भी थी उन्हें पहन कर अपने छोटे- छोटे  घिसे हुए नाखूनों में नाखूनी लगा कर अनोखा इतरा रही थी और सोच रही थी कि माँ बस यूँ ही परेशान रहती है और सब को कोसती है जबकि सब लोग कितने अच्छे हैं गाँव में ख़ास कर रज्जन काका!


शाम को घर आते ही रामरती की नज़र जैसे ही अनोखा पर पड़ी वह दंग रह गई और जोर से उसके बाल खींचते हुए बोली कलमुही कहाँ से लाई ये सब और नाखूनी लगाकर क्यूँ बैठी है ? अनोखा घबरा कर – डर कर रोने लगी . माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी सोचकर उसने झूठ बोला कि रज्जन काका की बेटी बेबी जिज्जी ने दिए हैं हमें वो कह रही थीं कि हमारी शादी हो गई है और अब हम सोने के गहने पहनते हैं इनका कोई काम नहीं है इन्हें अब तू रख ले और ये नाखूनी भी उन्होंने ही दी ये सुनकर रामरती कुछ शांत हुई और बोली  ठीक है लेकिन आइंदा कभी कोई तुझे कुछ सामान दे तो मुझे बताना और ये नखूनी-अखूनी शादी के बाद लगाना अभी कायदे से रह ! चल अब रात के लिए रोटी सेंक भूख लगी है आज रामसरन कक्कू के यहाँ से माठा मिला है उसी से सब खा लेंगे और हाँ देख ये थोडा गुड़ है इसे अनूप के मट्ठे में डाल देना कहकर रामरती चली जाती है घर के बाहर बैठकर पंचायत कर रही अपनी जिठानियों और देवरानियों के पास और शामिल हो जाती है गाँव के सभी ठाकुरों की ठकुरई के बारे में बात करने और दबीं जुबान से उन्हें गरियाने के लिए तभी मौका देखते ही उसकी जिठानी हमेशा की तरह उसे छेड़ती है ,"  अरे रामरती अनोखा सयानी हो गई है कोई लड़का देख भी रही है या नहीं ? मेरी मान जल्द उसकी शादी कर दे कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गई तो क्या करेगी !  तू कहे तो अपने बड़े भाई से बात चलाऊँ कोई दान-दहेज़ भी नहीं देना पड़ेगा  बस मेरे भईया को एक लड़का दे दे और फिर क्या, राज करे पूरा जीवन !"  तीन बेटियां है बस चौथे बच्चे के समय भौजाई ख़तम हो गई तब से उनका घर सूना है खाने पीने की भी कोई कमी न है मेरे भईया के पास वैसे भी तू कहाँ से कर पायेगी अनोखिया की शादी !

रामरती वहाँ से बिना कुछ बोले हुए चली आती है और मन ही मन सोचती है कि सही तो कह रही है उसकी जिठानी आखिर कैसे होगी अनोखा की शादी . खाने के बाद खाट पर लेटी हुई रामरती इंतज़ार करती है नींद का
रात चढ़ आई लेकिन नींद उसकी आँखों से कोसों दूर है दिमाग में वही सवाल कि कैसे जीवन कटेगा लडकियाँ बड़ी हो रही हैं और यहाँ तो खाने तक के लाले हैं ऐसे में शादी ? तभी हरी प्रसाद आता है और एक झटके में उसके ऊपर टूट पड़ता है ये कहते हुए कि मट्ठा खट्टा था बहुत मेरी भूख अभी बाकी है. निष्प्राण,निर्जीव रामरती से अपनी वासना की भूख शांत कर हरीप्रसाद सो जाता है , और रामरती, उसकी भूख ? उसे भूख है ही नहीं . ज़िंदगी ने इतना भर दिया है उसे कि वो भूख को ही भूल चुकी है. कई बार  तो उसे खुद के जीवित होने पर भी शक हो उठता है रात बीत जाती है और सुबह होते ही रामरती चल पड़ती है उन घरों की ओर जहाँ वो चौका-बासन करती है ,सुबह की चाय उसे वहीँ नसीब हो जाती है हालांकि दूध नहीं होता उस चाय में बची हुई उबली हुई पत्तियों में ही पानी डाल कर उबाल कर दे दिया जाता है उसे पीने को पर शक्कर खूब होती है क्यूंकि मालकिन अक्सर ही कहती हैं कि इन काम वालों को मीठा बहुत पसंद होता है इनकी चाय में शक्कर खूब होनी चाहिए बस . सही तो कहती हैं मालकिन, हमारे जीवन की मिठास इसी चाय की ही तरह तो है न पत्ती, न दूध,बस दिखावे की चाय जिसका बस रंग गाढ़ा है हमारे गाढ़े जीवन की तरह!

उधर घर में अनोखा जल्दी-जल्दी सारे काम निपटाती है अपने छोटे भाई अनूप को नहला-धुला कर ,उसकी आँखों में मोटा सा कानो तक फैला हुआ काजल लगाकर उसे अपनी छोटी बहनों के हवाले कर खुद नहा कर तैयार हो जाती है !  अनोखा को ब्रा पहनना पसंद नहीं रोज ही रामरती की डाँट से पहन लेती है पर आज वो ब्रा पहनना नहीं भूलती . आज उसे अपने बदन पर ये कसाव अच्छा लग रहा था कानो में हरे बुँदे खूब जँच रहे थे . अब रज्जन काका से मिलने कैसे जाए बस यही सोचते हुए वो हाँथों में लोटा उठा कर चल देती है ताकि कोई सवाल न करे कि वो कहाँ जा रही है क्योंकि उसकी चाची और ताई सब अपनी मोटी नज़र उस पर रखते हैं कि कब वो कोई गलती करे और वो रामरती को नीचा दिखा सके . ट्यूबवेळ पर रज्जन पहले से ही मौजूद था अनोखा को देखते ही उसकी धमनियों का प्रवाह तेज़ हो गया लेकिन खुद को नियंत्रित करते हुए सामान्य स्वर में बोला अरे आओ अनोखा मै तेरी ही राह देख रहा था.  अनोखा ये कहते हुए कि काका आपने कहा था न कि बुँदे पहन कर दिखाना चुप – चाप जमीन की ओर निहारने लगती है . हाँ ! रज्जन बोला, थोड़ा पास तो आ ,मेरे पास आ कर बैठ कहते हुए रज्जन अनोखा को  अपने पास खींच लेता है. अनोखा डर जाती है लेकिन कहती कुछ नहीं, हिम्मत ही नहीं उसमे बस नीचे ज़मीन को ही निहारती रहती है. रज्जन चुप्पी तोड़ता है ,कितनी अच्छी लग रही है तू ,किसी फिलम कि हीरोइन माफक . अनोखा शरमा जाती है और दुपट्टे से मुंह ढँक लेती है .रज्जन की नज़र सीधे अनोखा के कसे हुए शरीर पर जाती है . देख अनोखा मै तेरे लिए और भी बुँदे, माले और नया सूट भी ला दूँगा या तू अपनी पसंद का ले लेना मै तुझे पैसे दे दूँगा अब शरमाना छोड़ और खुश रह बस ! अनोखा  कहती है काका आज तक मैंने कभी नया कपड़ा नहीं पहना ,घर में कुछ नई साड़ियाँ हैं माँ के बक्से में लेकिन उन्हें माँ भी नहीं पहनती, कहती है कि मेरे ब्याह में मुझे देगी पता नहीं सच कहती है या झूठ क्यूंकि प्यार तो वो सिर्फ अनूप को ही करती है आप कितने अच्छे हो रज्जन काका कहते हुए वो  थोड़ा सहज हो जाती है .  देख मै तेरे लिए क्या लाया हूँ कहते हुए रज्जन अपने कुरते की जेब से अख़बार कि एक पुड़िया निकालता है और उसकी ओर बढ़ा देता है जिसमे चिपकी होती हैं तीन-चार जलेबियाँ .अनोखा खुश होकर कहती है, "जलेबी !"  रज्जन कहता है, "हाँ तेरे लिए ही लाया हूँ !"  और अनोखा झट से अखबार लेकर  जलेबियाँ खाने लगती है . रज्जन ध्यान से अनोखा के होठों को निहारता है और एकदम से उसका मुँह पकड़ कर अपने मुँह में भर लेता है . काका आप क्या कर रहे हैं कहते हुए अनोखा खुद को छुड़ाती है . कुछ नहीं तूने जलेबियाँ खाई तो मैंने सोचा मै भी मुँह मीठा कर लूं रज्जन कहता है . तू डर क्यूँ रही है अनोखा देख तुझे कुछ भी नहीं हुआ , मुझे अच्छा लगा क्या तुझे अच्छा नहीं लगा कहकर रज्जन अनोखा की कमर में हाँथ डालकर उसके पेट को दबाता है . मुझे डर लग रहा है काका यदि माँ को पता चला तो मुझे मार ही डालेगी कहते हुए अनोखा अपनी ओढ़नी को फैला लेती है . रज्जन कहता है मै तुझे प्यार करने लगा हूँ अनोखा और मैं  तेरा पूरा ख्याल रखूँगा किसी को भी कुछ नहीं पता चलेगा तुझे किसी से भी डरने की कोई ज़रुरत नही है , मै हूँ ना . तू रामरती को भी मत बताना कहते हुए रज्जन खुद को अनोखा के शरीर से पूरी तरह सटा देता है . अनोखा उम्र के जिस मोड़ पर है उसे ये सब किसी सपने और सतरंगी दुनिया के सामान लगता है . रज्जन धीरे-धीरे अनोखा के शरीर को सहलाता है वो डरती है और साथ ही शरमाती भी है लेकिन मना नहीं करती आखिर अभी-अभी जलेबियाँ खाई थीं उसने और फिर नया सूट भी तो मिलगा तभी किसी की आवाज़ आती है रज्जन ओ रज्जन ! रज्जन चौकन्ना होता है अनोखा को एक झटके से अलग कर झट से खड़ा होता है, कल फिर आना कहते हुए उसे कोठरी के पीछे के दरवाजे से निकल जाने को कहता है और खुद को सँभालते हुए कोठरी के बाहर आता है वहाँ गाँव के प्रधान होते हैं . अरे प्रधान साहब आप यहाँ, बताइए कैसे आना हुआ . अनोखा चली जाती है और आज पहली बार वो अपने शरीर में कुछ पिघलन महसूस करती है. जल्दी से घर पहुँच कर बुँदे उतार देती है और घर के कामो में जुट जाती है लेकिन आज उसे अपना शरीर हवा की तरह उड़ता हुआ सा लगता है. माँ कभी भी जलेबी नहीं लाई !  हाँ  एक बार किसी ने दो जलेबियाँ दी थीं उसे वो भी माँ ने अनूप को खिला दी थीं, उसकी बची ज़रा सी चाशनी ही मुझे चाटने को मिली थी और आज पूरी चार जलेबियाँ खाईं मैंने !  कितना अच्छा लगा था अनोखा सोचती है . इसी तरह पूरा दिन बीत जाता है और रात आते ही अनोखा सुबह की प्रतीक्षा में बेचैन हो रही है कि कल भी उसके लिए कुछ तो ज़रूर ही लायेंगे रज्जन काका .आज रात खुद से ही शरमा रही है और खुद को ही सहला भी रही है . ये सब उसे अच्छा लग रहा है पर क्यूँ ,क्या ये तो उसे खुद भी नहीं पता लेकिन ये सच है कि इतना खुश इससे पहले वो कभी नही हुई . हरी नाई रोज ही निकल जाता कि शायद आज कोई उससे बाल बनवा ले और रामरती घरों के चौका-बासन करने चली जाती उनके जाते ही अनोखा भी फटाफट सारे काम निपटा कर निकल जाती किसी न किसी बहाने से अपने रज्जन काका से मिलने ! 

रज्जन काका की उम्र करीब ४८ की होगी और उनकी बेटी
, बेबी जो कि १९ की है इसी साल उसकी शादी हुई है . अनोखा अभी चौदह की पूरी हो पंद्रहवीं की दहलीज में कदम रख रही है. रज्जन रोज ही अनोखा के लिए मिठाई लाता,कभी कोई अँगूठी तो कभी नगद रूपए भी देता . आज तो उसने अनोखा को पचास रूपए दिए ये कहकर कि अपने लिए एक नई ब्रा खरीद ले जिसमे लाल रंग की लेस लगी हो अनोखा रोज एक ही उधड़ी सी कुछ मटमैले रंग की ब्रा पहने रहती है यह जानने के लिए रज्जन को कभी उसकी कमीज़ नहीं उतारनी पड़ी क्यूंकि अनोखा के घिसे पारदर्शी कुरते के ऊपर से दुपट्टा हटाते ही रज्जन की ललचाई नज़रें सीधा वहीँ ठहरती हैं . ये रज्जन का रोज का काम था वो अनोखा की ओढ़नी दूर रखवा देता कि मुझसे क्या शर्म मै तो तेरा ही हूँ और जी भर निहारता उसके अधखुले,अधढंके कसे शरीर को. अगले ही दिन पैसे को सलवार के नारे में खोंस कर अनोखा बाज़ार से खरीद लाती है अपने जीवन का पहला नया कपड़ा वो भी अंतरंग और मचल पड़ती है सोचकर ही कि कल वो नया कपड़ा पहनेगी . पर माँ ! सोचते ही डर जाती है कि माँ को पता चलेगा तो मार ही डालेगी . मारे डर के नई ब्रा को भी खोंस लेती है सलवार के नारे के ही बीच में ताकि किसी कि नज़र न ही पड़े . खुश थी क्यूंकि पूरे दस रूपए भी बच गए थे जिसकी उसने आइसक्रीम खा ली थी . सब कितना अच्छा लग रहा है वो सोचती है कि बड़े होने के कितने फायदे हैं. माँ तो घर में रोटी और नमक ही देती है या कभी-कभी मठ्ठा या चटनी बस ! रज्जन काका उसे रोज ही उसकी पसंद की चीज़े खिलाते हैं और माँ कहती है किसी से बात न करो ,खुद नहीं करती बात किसी से तभी कोई माँ को कुछ नहीं देता . मै खुश हूँ और मुझे माँ जैसा नहीं बनना . अगले दिन नई ब्रा पहन कर ऐसे इतराती है खुद पर जैसे कोई सोने का हार पहन लिया हो. घर के छोटे से मटमैले शीशे में खुद को निहारती है मटक-मटक कर और जा पँहुचती है अपनी खुशियों के भगवान् रज्जन काका के पास .अनोखा को देखते ही रज्जन ताड़ जाता है फिर भी सवाल करता है कुछ लिया या नहीं ? अनोखा नज़रें नीचे कर शरमा जाती है और रज्जन उसकी ओढ़नी हटा देता है धीरे से उसे बांहों में जकड़ लेता है उसके कानो में बोलता है, "ऐसे दिख नहीं रहा ज़रा ठीक से दिखा, देखूं तो सही,  कहते हुए अनोखा का कुर्ता उतारने लगता है !  अनोखा डर जाती है पर मना नहीं कर पाती आखिर रज्जन काका ने ही तो दिलवाई है !  रज्जन हटा देता है उसके शरीर से कुर्ता और धीरे-धीरे उसके करीब जाकर जकड़ लेता है उसे और कर देता है अनोखा का कौमार्य भंग ! अनोखा तेज़ दर्द से कराह उठती है ,उठ भी नहीं पाती . नीचे खून देख कर डर कर रोने लगती है ,रज्जन उसे समझाता है मै हूँ तेरे साथ और पहली बार में होता है ऐसा, तू थोड़ी देर आराम कर फिर उठना सब ठीक हो जायेगा. अनोखा धीरे-धीरे सुस्त कदमो से खुद को संभालती हुई घर आ जाती है . आज उसे कुछ अच्छा नहीं लगा,बहुत थक गई है वो घर आकर भी कोई काम नहीं करती बस लेटी रहती है पूरा दिन.शाम को रामरती से डांट भी खाती है पर उठती नहीं,पेट दर्द का बहाना बना कर लेटी रहती है अगले दिन सुबह उसे ठीक लगता है ,लेकिन कुछ मीठा खाने की चाह नही रही अब और न ही रज्जन काका से मिलने की . दो-तीन दिन वो घर से नहीं निकली तो रज्जन खुद दोपहर उसके घर आकर उसकी तबियत पूछता है और साथ ही कल आना कुछ ज़रूरी बात करनी है कहकर चला जाता है. रज्जन के इस तरह से आने और उसका का हाल पूछने से अनोखा को अच्छा लगता है और वो खुद को ठीक महसूस करती है !  अगले दिन फिर वो रज्जन से मिलने जाती है रज्जन उसे पकड़ कर सब जगह चूमने लग जाता है ये कहते हुए कि अनोखा अब मैं तेरे बिन नहीं रह पाऊंगा! तू क्यों नहीं आई तीन दिनों से क्या मै तुझे पसंद नहीं और जवाब की प्रतीक्षा किये बिना कुरते की जेब से पाजेब निकल कर खुद ही उसे पहनाने लगता है !  अनोखा कुछ बोल नहीं पाती बस एक बार फिर रज्जन के साथ खुद को रज्जन का कर देती है ,इस बार उसे भी अच्छा लगता है !  पर ज्यादा अच्छा क्या लगा रज्जन का साथ या अपने पैरों में चाँदी की पायल ये न समझ पाई वो खुद भी !
धीरे-धीरे ये मुलाकातें बढ़ती गईं और फिर एक रोज़ रामरती की नज़र पड़ी कि अनोखा का शरीर पहले से अधिक गठा और स्वस्थ नज़र आ रहा है इस फर्क को वो समझ पाती कि अनोखा की उबकाइयों ने सब बता दिया !  रामरती अनोखा को बुरी तरह पीटती है और उसके कुछ न बताने पर उसकी तलाशी लेती है तलाशी लेने पर उसे पायल मिलती है जो अनोखा ने छप्पर के अन्दर छुपा रखी थी जब रामरती जोर से उसका गला दबाती है तब जाकर वो रज्जन का नाम लेती है !  रामरती वही आँगन में लड़खड़ा जाती है ये कहते हुए कि कहाँ से लाए ज़हर की पुड़िया जो खिला सके अनोखा को और खुद को भी. हरीप्रसाद को कोसते हुए
,  अनोखा को गालियाँ बकते हुए वो सीधे रज्जन के घर जाती है . रज्जन घर में नहीं था और उसकी दुल्हिन से कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई आखिर उनके घर ही काम करती है रामरती और यदि काम से निकाल दिया तो ? कहाँ से पेट भरेगी सबका उधर अनोखा भाग कर खेत में रज्जन के पास जाकर सब बताती है कि माँ कह रही है तू पेट से है और मुझे बहुत मारा तो मैंने आपका नाम बता दिया ! रज्जन कोई बात नहीं अनोखा तू चिंता मत कर और अपनी माँ को बोल कल तुझे लेकर दूसरे गाँव के अस्पताल में मिले ,जो भी खर्चा होगा मै दूंगा बस एक बात का ध्यान रहे ये बात किसी और को पता नहीं चलनी चाहिए ! अगले दिन रामरती अनोखा को लेकर अस्पताल पहुँचती है रज्जन उसे पैसे और साथ ही धमकी देकर कि ये बात कहीं और नहीं निकलनी चाहिए वहाँ से चला जाता है !  पंद्रह वर्ष की अनोखा का उसकी जान के रिस्क पर कराया जाता है गर्भपात! इस उम्र में गर्भ में नया जन्म और फिर उसकी हत्या अनोखा को ज्यादा कुछ फर्क नहीं पड़ता सिवा इसके कि माँ बहुत गुस्सा है, जबकि रामरती नहीं समझ पाती कि वो जिन्दा है या मर गई !  गाँव में भला कब ऐसी बातें छुपती हैं आग की तरह ये बात भी फ़ैल गई और अब तो हर जवान-बूढ़ा पुरुष अनोखा से मिलना चाहता  सिवाय रज्जन काका के !  अनोखा को रामरती ने घर में बंद कर दिया था और वो कहीं आ जा न सके ये जिम्मेदारी उसकी छोटी चारों बहनों की थी ! पूरे गाँव में हर घर में हर एक की जुबान पर बस एक ही बात थी कि फूटी किस्मत है रामरती की पति मिर्गी वाला मिला और लड़की ने तो नाक ही कटा दी,हमारी होती तो ज़हर खिला कर मार डालते ऐसी कुल्टा लड़की को अरे रज्जन का क्या दोष आदमी है,  इसी से न संभाली गई होगी अपनी जवानी पूरे गाँव के मुँह पर कालिख पोत दी इसने !  इस गंदगी को जल्दी से जल्दी गाँव से फेंक देना चाहिए,हर कोई समझाता रामरती को !  रामरती की जुबान चिपक चुकी थी और आँखे रेगिस्तान से भी अधिक सूखी हो चली थीं !  कोई राह नज़र नहीं आ रही थी उसे ! कई ठाकुरों ने तो यहाँ तक समझाया कि अनोखा को मेरे पास भेज दिया कर तेरे दिन भी बहुर जायेंगे आखिर और भी तो चार बेटियाँ हैं तेरे !  रामरती बस यही सोचती कि पैदा होते ही गला क्यूँ न घोंट दिया मैंने इन लड़कियों का ! लड़कियां होती ही हैं भार !  कहते हुए बस अनूप को गले से चिपका लेती है ! शाम का वक्त है रामरती की जिठानी आती है और बेहद दया भाव से कहती है जो होना था हो गया तू कहे तो अब भी बात बन सकती है मै अपने भईया को कुछ नहीं बताउंगी अनोखा की शादी जल्दी से उनके साथ करवा सकती हूँ तेरे सर से मुसीबत भी हट जाएगी और मेरे भाई का घर भी बस जायेगा . लेकिन जिज्जी तुम्हारे भईया की उम्र तो चालीस पार है और अनोखा अभी पंद्रह की भी पूरी नहीं हुई रामरती कहती है. ये सुनते ही जिठानी गरम तवे सी छन्ना के बोली हाँ !और रज्जन तो बस अभी सोलह बरस का ही है न ! जब अड़तालीस साल के आदमी के साथ सोना आता है तुम्हारी बेटी को तो हमारे भईया तो अभी चालीस के ही हैं.सही कहते हैं भला करने चलो और अपना ही हाँथ जलाओ जिठानी जोर से कहती है . रामरती कुछ सोच नहीं पाती कि क्या करे ,किससे मदद ले,कैसे अनोखा की शादी कर जल्द से जल्द उसे गाँव से अपने जीवन से निकल फेंके  इसी उधेड़बुन में बैठी है कि तभी अनूप रोते हुए आता है , कहता है मम्मी मेरे पापा मर गए ! चलो देखो चल कर सब कह रहे हैं वो मर गए.
‘अच्छा हो की मर गया हो तेरा बाप कम से कम कहीं से तो मुक्ति मिले ’ कहते हुए रामरती भागती है गाँव के बड़े तालाब की ओर वहीँ किनारे हरिप्रसाद पड़ा है भीड़ लगी हुई है कोई कह रहा है कि इसे मिर्गी आई है, कोई कह रहा है कि दारु पी है इसने .सब दूर खड़े हैं कोई उसके पास नहीं जाता . रामरती उसे छूती है ,ठंडा है उसका पूरा शरीर और दारू की तेज़ दुर्गन्ध आ रही है , मुंह से लेकर कान के अन्दर तक झाग फैला है, मृत्यु एक साथ सारे ही ऐबों को ले जाती है. एक जोर की चीख गूँज जाती है पूरे गाँव में अनूप के पापा ” ! रामरती वहीँ हांथों को पटक कर चूड़ियाँ तोड़ देती है और कहती है अच्छा हुआ मर गए, मुक्ति तो मिली . चूड़ियों के टूटने से हांथों से खून बहने लगता है और उन्ही खून भरे हांथों से मिटा देती है अपना सिन्दूर . हरी प्रसाद का क्रिया कर्म जैसे-तैसे उसके भाई कर देते हैं .रामरती कई दिनों तक  घर से नहीं निकलती एक सन्नाटा पसरा है उसके चारों ओर . शाम का वक्त है अनोखा आती है और सन्नाटे को तोड़ती हुई कहती है माँ घर में कुछ भी खाने को नहीं है . सब तो खा गई , अब मै ही बची हूँ, आ मुझे भी खा ले कहते हुए रामरती अपनी चुप्पी तोड़ती है तभी अनूप रोते हुए आता है माँ, मुझे भूख लगी है. रामरती उसे चुप कराती है और घर में तलाशती है कि कुछ खाने को मिल जाये लेकिन घर में  सिवाय ख़ाली बर्तनों के कुछ भी नहीं मिलता . रामरती भाग कर ठाकुर के घर जाकर रोती है और वहाँ से अनूप के लिए खाना लाती है, ठकुराइन उसे खाना तो दे देती हैं लेकिन साथ ही कल से काम पर आने कि हिदायत भी  कि यदि काम नहीं करेगी तो उसके बच्चों के लिए खाना कौन देगा इस  तरह जितना शोक करना था कर लिया,वैसे भी क्या करता था तेरा पति, अब तू आगे की सोच और कल से काम पर आना शुरू कर. रामरती घर जाकर अपने कलेजे के टुकड़े को खाना खिलाती है और लड़कियों को खुद परोस के खाने के लिए कह देती है अगले दिन से ही रामरती  घरों में काम के लिए जाने लगती है अभी एक महीना भी नहीं बीता कि फिर से जमींदार उसे नए-नए बहानों से परेशान करने लगे कि वो अनोखा को उनके पास भेज दे. रामरती बेहद डर चुकी थी अतः सीधा अपनी जिठानी से अनोखा की शादी कि बात करती है कि क्या वो अब भी अपने भाई के साथ अनोखा की शादी कर सक सकती है .जिठानी अपनी ख़ुशी को दबाते हुए कहती है अब इतना अहसान तो करना ही पड़ेगा तुझ पर पहले ही मान जाती तो इतनी बेईज्ज़ती तो नहीं उठानी पड़ती अब देखती हूँ मै भैया से बात कर के. एक महीने के अन्दर साधारण ढंग से अनोखा कि शादी हो जाती है. बारात में दूल्हा और उसकी तीन बेटियाँ थी. दूल्हा अनोखा को देख किसी बांके छोरे की तरह लालायित था जबकि अनोखा इतनी शांत कि तालाब का शांत पानी भी उसके समक्ष कोलाहल करता नज़र आये .बेटियाँ उसे मम्मी-मम्मी पुकार रही थीं .बड़ी लड़की की उम्र तो १० या ११ की ही होगी . अनोखा की शादी संपन्न हो गई और विदाई में उसे मिली थीं तीन बेटियाँ . वैसे भी अपने घर में अपनी चार बहनों और भाई अनूप की माँ तो वही थी बस फर्क ये था कि उसी उम्र के उसके भाई-बहन उसे दीदी बुला रहे थे जबकि वो बेटियाँ उसे मम्मी बुला रही थीं . अनोखा की विदाई में सभी आँखें शून्य थीं सिवाय अनूप के वो सबसे छोटा था और अनोखा खुद से ज्यादा अनूप का ख्याल रखती थी इसलिए अनूप को दीदी का जाना बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था विदाई में रामरती अनोखा को गले लगाते हुए कहती है अब मेरी जिम्मेदारी ख़तम अब वही तेरा घर है जी या मर बस यहाँ मत आना . ससुराल में अनोखा का स्वागत करने के लिए भी कोई न था सिवाय अनोखा की विधवा सास के और वो थी भी तो दूसरी पत्नी, इसलिए सास को भी कोई उत्साह नहीं था कि वो अनोखा का स्वागत धूम धाम से करे . पूरा दिन गुज़र गया शाम होते ही तीनो लड़कियों को दादी के पास भेज कर अनोखा का पति कांतिलाल कमरे में आता है और बिना किसी वार्तालाप के वसूल लेता है अपने पति होने का अधिकार .शादी के दूसरे ही महीने अनोखा गर्भवती हो जाती है सास और पति दोनों को लड़का ही चाहिए इस लिए तीन महीने पूरे होते ही वो उसकी जांच करवाते हैं. गर्भ में लड़की है पता चलते ही अनोखा का गर्भपात करा दिया जाता है. पंद्रह की उम्र और दो-दो बार गर्भपात, अनोखा पीली पड़ जाती है ,उसका शरीर निष्प्राण सा दीखता है. अभी कच्ची उम्र है अनोखा की कहते हुए डॉक्टर कांतिलाल को कुछ वक्त अनोखा से संबंध न रखने की सलाह देता है लेकिन कांटी लाल को इंतज़ार नहीं है और कुछ ही महीनो में फिर से अनोखा की कोख हरी हो जाती है, कर दी जाती है.  तीन महीने पूरे होते ही एक बार फिर से जाँच,लेकिन इस बार लड़का है कि खबर से सास और पति उसे भर पेट खाना भी खिलाते हैं और उसका ख्याल भी रखते हैं. अनोखा का कमज़ोर शरीर टूट चुका है अब तक वो सिर्फ लेटी रहती है उससे ठीक से चला भी नहीं जाता. कम उम्र कमज़ोर शरीर का नतीजा आठवें महीने में ही उसे प्रसव का दर्द उठ जाता है और बच्चा जनने में ही निकल जाती है अनोखा की जान ! बड़ी मुश्किल से बच्चा बचता है क्यूंकि डॉक्टर से बच्चा बचाने के लिए ही कहा गया था माँ तो नई भी आ जाएगी लेकिन लड़का  इतनी मुश्किल से तो घर का चिराग मिला है इसलिए बच्चा हर हाल में बचना चाहिए . कांतिलाल और उसकी माँ खुश है कि लड़का हुआ है उनके वंश का वंशज मिल गया है, पालने के लिए माँ तो मिल ही जायेगी .  अनोखा बिलकुल शांत हो चुकी है क्योंकि उसे जीवन से मुक्ति मिली है हालाँकि क्या यही जीवन था क्या यही होना चाहिए था.... क्या यही मुक्ति है ....अनोखा में कुछ खास या अलग भले ही न रहा हो किन्तु उसका जीवन उसके नाम की तरह अनोखा ही गुज़रा ….!
 ( त्रैमासिक पत्रिका ‘ लमही ’ में प्रकाशित ! )

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