Showing posts with label अनीता मौर्या. Show all posts
Showing posts with label अनीता मौर्या. Show all posts

Thursday, October 18, 2012

अनीता मौर्या की कवितायें

गृहिणी होने के साथ-साथ
अपना इंटरनेट कैफे चलाती हैंपिछड़ी/मलीन बस्तियों के बच्चों की शिक्षा तथा
महिला सशाक्तिकरण हेतु कार्यरत संस्था की सदस्य भी हैं
कविता लेखन- आत्मसंतुष्टि
जन्म- फ़ैजाबाद( उत्तर प्रदेश)
शिक्षा -स्नातक, पूर्वांचल यूनिवर्सिटी, विषय- दर्शनशास्त्र
वर्तमान में निवास - कानपुर
विभिन्न ई- पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में कविताएँ प्रकाशित
(स्त्री मन की व्यथा, हालात से समझौत करती स्त्री की पीड़ा, स्त्री पक्ष से समाज से प्रश्न करती बेहद संवेदनशील अभिव्यक्ति है अनीता मौर्या की कविताएँ )

हिरोइन 

हिरोइन नहीं थी वो,
और न ही किसी मॉडल एजेंसी की मॉडल
फिर भी,
जाने कैसा आकर्षण था उसमे
जो भी देखता, बस, देखता रह जाता,
उसका सांवला सा चेहरा,
मनमोहक मुस्कान,
और आँखें..?
आँखें तो जैसे के बस,
अभी बोल पड़ेंगी,
उम्र 17 साल
गंभीरता का आवरण ओढ़े,
जिए जा रही थी...
इक अजीब सा दर्द झलकता था,
उसकी आँखों से,
खामोश रहती थी वो,
किसी को अपना राजदार
जो नहीं बनाया था उसने,
फिर मैं मिली उससे,
उसकी राजदार,
उसकी सहेली बनकर,
'उसकी कहानी '
जैसे,
जिंदगी को कफ़न पहना दिया गया हो,
अपने रिश्तेदार की शोषण की शिकार वो,
जिन्दा लोगों में उसकी गिनती ही कहाँ होती थी,
वो निर्बाध बोलती रही,
और मेरी आँखे निर्बाध बरसती...
'एक दिन'
लापता हो गयी वो,
कोई कहता, 'भाग गयी होगी',
कोई कहता, ' उठा ले गयी होगी ,
जितने मुंह , उतनी बातें,
आज अचानक उसे रैम्प पर चलता देख,
हतप्रभ रह गयी मैं,
जिंदगी ने कहाँ से कहाँ पंहुचा दिया उसे,
मैं फिर चल पड़ी,
बनने उसकी राजदार,
इतनी यंत्रणा, इतनी पीड़ा,
कैसे मुस्कुराती है वो,
सब मन में समेट कर,
उसके फैक्ट्री के मालिक ने,
दुराचार किया था उसके साथ,
विरोध करने पर चोरी का इलज़ाम लगा,
जेल भेज दिया,
पर रक्षक के भेष में छुपे,
वो भेड़िये भी टूट पड़े उस पर,
उसका रोना, गिडगिडाना ,
सब ठहाकों की शोर में दब कर रह गया,
तब ठान लिया उसने,
अब नहीं रोएगी वो,
अपनी रोंदी हुई मुस्कान,
मसला हुआ जिस्म लेकर,
यहीं इसी दुनिया में रहेगी वो,
जियेगी, भरपूर जियेगी,
और आज
वो सचमुच की हिरोइन है।



कोलाहाल'

कभी कभी 'मन'
बड़ा व्याकुल हो जाता है,
संशय के बादल, घने
और घने हो जाते हैं,
समझ में नहीं आता,
स्त्री होने का दंभ भरूँ,
'या' अफ़सोस करूँ...
कितना अच्छा हो,
अपने सारे एहसास,
अपने अंतस में समेट लूँ,
अनीता मौर्या गृहिणी होने के साथ साथ अपना इंटरनेट कैफे चलाती हैं, और पलकों की कोरों से,
एक आँसूं भी न बहने पाए....
यही तो है,'एक'
स्त्री की गरिमा,
'या शायद'
उसके, महान होने का
खामियाजा भी...
क्यूँ एक पुरुष में
स्त्रियोचित गुण आ जाये,
तो वो ऋषितुल्य हो जाता है,
'वहीँ'
एक स्त्री में पुरुषोचित
गुण आ जाये तो 'वो'
'कुलटा'
विचारों की तीव्रता से,
मस्तिस्क झनझना उठता है,
दिल बैठने लगता है,
डर लगता है
ये भीतर का 'कोलाहाल'
कहीं बाहर न आ जाये,
और मैं भी न कहलाऊं
'कुलटा'

तितली

इक चंचल नदी थी ,.
'सुन्दर' जैसे 'परी' थी,
खिलती हुई कली थी,
सुन्दरता की छवि थी वो...
फिर एक दिन, कुछ ऐसा हुआ,
कैसे बताउँ, कैसा हुआ..
इक शिकारी दूर से आया,
उस गुडिया पर.. नज़र गड़ाया
उडती थी जो बागों में जा कर,
वो तितली अब गुमसुम पड़ी थी,
किस से कहती, दुख वो अपने,
हिन्दी कवितासर पे मुसीबत भारी पड़ी थी,
ऐसे में एक राजा आया,
उस तितली से ब्याह रचाया,
बोला 'मैं सब सच जानता हूँ'
फिर भी तुम्हे स्वीकार करता हूँ..
जब थोडा वक़्त बीत गया तब,
राजा ने अपना रंग दिखाया,
मसला हुआ इक फूल हो तुम,
इन चरणों की धुल हो तुम..
जीती है घुट घुट कर 'तितली',
पीती है रोज़ जहर वो 'तितली'
'भगवन', के चरणों में 'ऐ दुनिया,
मसला हुआ क्यूँ फूल चढ़ाया...
कहना बहुत सरल है 'लेकिन'
'अच्छा' बनना बहुत कठिन है,
'महान' बनना, बहुत आसान है'
मुश्किल है उसको, कायम रखना...
याद रखना, इक बात हमेशा,
सूखे और मसले, फूलों को,
देव के चरणों से दूर ही रखना,
फिर न बने एक और 'तितली'
फिर न बने इक और कहानी..

लडकियां

'लडकियां'
जिनका एक माजी होता है ,
स्याह अतीत होता है,
जब बैठती हैं, 'ब्याह' की वेदी पर,
झोंक देना चाहती हैं,
अपने अतीत की सारी कालिख,
उस ब्याह की अग्नि में,
'पर'
कहाँ हो पाता है ऐसा,
वक़्त मन के घाव तो भर सकता है,
पर नासूर नहीं, वो तो रिसते रहते हैं,
'हमेशा'
"जैसे रेंगते रहते हों,
असंख्य कीड़े,
देह पर,

आत्मा की गन्दगी,
नहीं छूटती,
सैकड़ों बार नहा कर भी"
पीड़ा का अथाह सागर समेटे,
बन जाती हैं दुल्हन,
समाज की खातिर,
परिवार की खातिर,
कोई नहीं देखता,
उसकी लहुलुहान आत्मा,
जब भी अतीत भूलकर,
वर्तमान में जीने लगती है,
हंसती है, खिलखिलाती है,
वक़्त मारता है,
एक जोर का चांटा,
उसके मुंह पर,
"बेशरम कहीं की"
ऐसे हादसों के बाद भी,
कोई खुलकर हँसता है भला,
कोई याद दिलाता है अक्सर,
यूँ प्यार जताना,
शिकवे-शिकायत करना,
अपने मन के भाव जताना,
'तुम्हे' शोभा नहीं देता,
एहसान मानो मेरा,
स्वीकार किया है तुम्हे,
तुम्हारी आत्मा के हर घाव के साथ,
'वो'
समेट लेती है, मन के घाव मन में,
जीती है जिंदगी, घुट -घुट कर,
क्या सच में नहीं होता,
यूँ घुट - घुट कर ताउम्र जीने से अच्छा,
एक बार का मर जाना..

(ऊपर चित्र साभार गूगल से लिये गये हैं यदि कोई चित्र, कलाचित्र इत्यादि किसी सर्वाधिकार का उलंघन हो तो कृपया सूचित करें उसे हटा दिया जायेगा )


फेसबुक पर LIKE करें-