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Tuesday, June 24, 2014

गंगा दशहरा,गाँव की यादें - सोनरूपा विशाल

 गंगा दशहरा,गाँव की यादें - सोनरूपा विशाल  

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बुजुर्गों की दुआओं का जो हम पर शामियाना है
बहुत महफूज उसमें ज़िन्दगी का ताना - बाना है

ये बच्चे, ये मकाँ, ये मालो-दौलत सब हैं मुट्ठी में
मगर मिट्टी ही  आखिर में  तेरा - मेरा ठिकाना है

- सोनरूपा विशाल









 सोत नदी के नाम पर
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सोत नदी ठहरी है अब भी अपने उसी मुक़ाम पर लोगों ने गोदाम भर लिए सोत नदी के नाम पर
पुल बनवाने का वादा कर वोट ले गए जो इससे पटरी तक बनवा न सके वो कहे व्यथा अपनी किससे
कबसे ये ख़ामोश पड़ी है रखे भरोसा राम पर |
सपनीली आँखों सी इसकी पड़ी रहीं ख़ाली सीपें उनके मोती चुरा ले गयीं सारी सरकारी जीपें
इसके शंख मुफ़्त में लेकर बेचे महँगे दाम पर |
इसके पानी तक को सोखा  
थानों ने तहसीलों ने 
- डॉ उर्मिलेश




आज गंगा दशहरा है , हमारे शहर बदायूँ से २६ किलोमीटर दूर गंगा के किनारे बसे क़स्बे ‘कछला’ में आज के दिन छोटा सा मेला लगता है ,सुबह अख़बार में मेले में मिलने वाले सामान,विशेषकर लकड़ी के गढ़ोलने बेचते हुए दुकानदारों का फोटो चस्पा था,उसे देख कर मैंने बच्चों को दिखाया और बताया कि’तुम्हारी मम्मा ने इसको पकड़कर चलना सीखा था’ दोनों मुस्कुराये और बोले अच्छा!! फिर वन टू थ्री …..गॉन!

एक और ख़बर थी कि हमारे गाँव भतरी गोवर्धनपुर से होकर निकली सदानीरा नदी ’सोत नदी’ आज इतनी बदहाल और शुष्क हो चुकी है कि उस नदी को अब नाव से नहीं पैदल पार किया जा सकता है !ये ख़बरें कोई नई नहीं थीं लेकिन न जाने आज क्यों लगा जिस तरह सोत नदी का अस्तित्व मिट रहा है उसी तरह एक दिन इन से जुड़ी मेरी यादों का भी यही हश्र न हो !

थोड़ी फ़ुर्सत है आज ,इसीलिए शायद याद भी आ गया कि मेरे पास एक अद्रश्य अलमारी है जिसमें एक छोटा सा,प्यारा सा पर्स है और उसमें कई तरह की

रंगबिरंगी,खट्टी मीठी टॉफियाँ हैं ,जब मन करता है तब उसमें से कुछ टॉफियाँ का स्वाद लेती हूँ फिर दोबारा पर्स में रख देती हूँ , मेरी ये टॉफियाँ कभी ख़त्म नहीं होतीं ,ये टॉफियाँ जादुई हैं क्यों कि मेरे बचपन के कई सारे हिस्सों की उपमायें हैं जिनके रंग,ढंग,स्वाद सब अलग-अलग हैं !

बचपन का चैप्टर क्लोज हुए अर्सा हो गया है लेकिन ये सच्चाई है कि ज़िन्दगी का हर हिस्सा हमेशा खुशनुमा नहीं होता इसीलिए बैलेंस बनाये रखने के लिए ज़िन्दगी के हर हिस्से की अच्छी अच्छी बातों,यादों,अनुभवों को दिल के चार कोष्ठकों में कहीं न कहीं संजो कर रखना बहुत ज़रूरी होता है ! यही ज़रुरत आज मुझे बचपन के कुछ वाक़ये लिखने का इशारा कर रही है ,मेरी समझ से ऐसी ज़रूरतों की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए !क्या मालूम आज यादें मजबूत हैं कल शायद कमज़ोर हो जाएँ ....अब क्यों कि बचपन के भी कई चैप्टर्स होते हैं तो क्या लिखा जाये,कहाँ से लिखा जाये ये भी बड़ी समस्या है,चूँकि समस्या की वजह से ही समाधान शब्द अस्तित्व में है ,इसीलिए इस समस्या का समाधान ये है कि मैं बस लिखना शुरू कर रही हूँ फिर ये यादों की नदी जहाँ चाहे वहाँ बहे,मैं रोकने वाली नहीं हूँ और वैसे भी यादें बड़ी ज़िद्दी होती हैं वो सुनती ही किसकी हैं?


मेरे बच्चों की गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयी हैं ,रोज़ जान आफ़त में रहती है ‘मम्मा कहाँ चल रही हो छुट्टी में ? लेकिन इस बार की भीषण गर्मी देख कर बिलकुल मन नहीं कर रहा कि घर से बाहर जाया जाये |मेरे बच्चों की तरह मेरी भी ये समस्या थी कि मेरी नानी का घर भी एक ही शहर में था इसीलिए गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाने वाला ऑप्शन मेरे बच्चों के लिए और बचपन में मेरे लिए भी कुछ ख़ास क्रेज़ नहीं रखता था, पापा गाँव से थे लेकिन जबसे होश संभाला तब से हमने यही देखा की पापा कॉलेज और कवि सम्मेलनों की वजह से कभी-कभी ही गाँव जा पाते थे, दादी-बाबा ही अक्सर बदायूँ आ जाते थे, बाबा जी एक प्राइमरी स्कूल में हेड मास्टर थे ,गाँव में ज़मीन बटाई पर दे रखी थी इसीलिए खेती की कोई चिंता नहीं थी|गर्मियों में जब बाबा जी घर आते तो सबसे पहले एक जग भर कर बहुत तेज़ मीठा रूह अफज़ा पीते फिर थोड़ी देर सुस्ताने के बाद हम बच्चों को पास बिठा कर पूछते की बताओ विद्यालय में क्या नया सीखा ? मुझे परेशान करने के लिए पूछते की बताओ अमरुद को इंग्लिश में क्या कहते हैं मैं कहती ‘गुआवा’ तो कहते नहीं ‘बिलकुल ग़लत अमरुद को सपड़ी कहते हैं (यहाँ गाँव में अमरुद को सपड़ी कहा करते हैं) मैं चिढ़ जाती,मेरे ट्यूटर से कहते ‘मास्साब क्या पढ़ा रहे हो अमरुद को ये बच्ची ‘गुआवा’ कह रही है’ वो हँसने लगते थे ,मेरे टीचर की आदत थी जब मैं कोई ग़लती करती थी तो वो सीधे मेरे सिर पर मारते थे मुझे बहुत गुस्सा आता था , वो फिर न मारें इसके लिए जैसे ही वो मुझे मारने के लिए हाथ उठाते थे मैं इंकपैन का नोंक वाला हिस्सा ऊपर कर देती थी और वो नोंक उनके हाथ में चुभते ही वो तिलमिला के रह जाते कहते और मैं मन ही मन मंद-मंद मुस्कुराती थी अपनी विजय पर ,आज भी वो अक्सर टहलते हुए मिल जाते हैं मुझे ,वो शायद भूल गए हों लेकिन उन्हें देख कर मुझे मेरी ये शैतानी याद आ जाती है |

हमारे घर अक्सर गाँव से लोग आ जाया करते थे ,चूँकि पापा प्रोफ़ेसर होने के साथ-साथ देश के जाने माने कवि थे,सब उन्हें बहुत सम्मान देते थे गाँव के सबसे सयाने और लायक सपूत थे ,वो सिर्फ़ ‘पंडित भूप राम शर्मा’( मेरे बाबा जी )के पुत्र नहीं थे वो सबके लिए बेटे जैसे थे,ये अपनापन भी कितना अनमोल होता है न | गाँव के लोगों को जब भी कोई परेशानी होती तो सबसे पहले वो पापा को याद करते,हमारे घर में हर अतिथि सम्मानीय था |मेरी दादी को बड़ा सुकून मिलता था जब कोई उनके बेटे की बड़ाई करता गाँव वाले कहते थे कि’उर्मिलेश तो हमारी ढाल हैं हमें किसी बात की चिंता नहीं है हमें पता है हमारा उर्मिलेश हमें कोई परेशानी नहीं होने देगा”|वो ज़्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं थीं लेकिन रामायण की चौपाइयाँ बहुत मन से पढ़तीं |

आये दिन तो उनके व्रत हुआ करते थे ,दान पुण्य करने में सबसे आगे रहतीं थीं ,ज़रा-ज़रा सी बात पर प्रसाद बोल देती थीं ‘कि भगवान ये मनो कामना पूरी हो तो मैं प्रसाद चढ़ाऊँगी’ |हमारे घर में लोगों का, रिश्तेदारों का आना जाना अक्सर लगा रहता था लेकिन मैंने अपनी मम्मी के चेहरे पर कभी शिकन नहीं देखी,बिलकुल मेरी नानी जी की तरह,मेरी नानी को मैंने शायद ही कभी टेंशन में देखा हो वो हर वक़्त मुस्कुराती रहती हैं,कभी-कभी सोचती हूँ कि पुराने समय में दान पुण्य ,सम्मान,मदद,विनम्रता ,सदभाव जैसे संस्कार सिखाये नहीं जाते थे लेकिन आज बच्चों को सिखाना पड़ता है |शायद हम भी इसमें कहीं ना कहीं ज़िम्मेदार हैं | तब ये जीवन जीने के सलीक़े में शामिल थे ,ये ख़ुद ब ख़ुद हमारे व्यक्तित्व में और व्यवहार में शामिल हो जाते थे |

मैं सरस्वती शिशु मंदिर की छात्रा थी ,हमारे एक रिश्तेदार जिनके बच्चे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में पढ़ते थे ,एक बार उन्होंने मुझसे पुछा कि बेटा आप कौन से क्लास में पढ़ती हो ? मैंने कहा कि ‘मैं तृतीय कक्षा में पढ़ती हूँ’ मेरा जवाब सुनकर सब हँसने लगे | मुझे बहुत बुरा लगा घर जाकर मैंने पापा को बताया उन्होंने मुझे किस तरह समझाया ये तो मुझे याद नहीं लेकिन उस दिन के बाद से मुझे इतना याद है मुझे शुद्ध हिंदी बोलने में कभी शर्मिदगी नहीं हुई बल्कि गर्व हुआ|

हिंदी से एक बात याद आई जब कभी पापा हमें डांटते थे तब भी शुद्ध हिंदी के शब्द उपयोग करते थे जब कभी मैं तेज़ी से ज़ीने से उतरती थी तब पापा हमेशा टोकते थे कहते थे ‘तुममें सौन्दर्य बोध है या नहीं,इतनी तेज़ी से उतरती हो कि तुम्हारी चप्पलों की आवाज़ औरों को भी सुनाई देती है,क़ायदे से उतरा करो,या शाम को कभी हम अलसाये हुए से बिस्तर पर लेटे रहते तो कहते थे कि तुम बच्चों में बिलकुल ‘शारीरिक चैतन्यता’नहीं है दोनों बेला मिलने के वक़्त सोते रहते हो|

हमारा घर प्रोफेसर्स कॉलोनी में था ,चार-चार क्वाटर्स के चार ब्लॉक्स थे ,एक ही दीवार से चारों क्वाटर्स जुड़े हुए थे ,एक घर में अगर शोर होता तो उससे बाक़ी बचे तीनों क्वाटर्स गुंजायमान रहते थे ,मम्मी खाना बनाते हुए भी रेडियो साथ रखती थीं ,वो फ़िल्मी गानों की और क्रिकेट की बहुत शौक़ीन थीं और आज भी हैं , अगर कभी रेडियो के सिग्नल नहीं आते तो दूसरे घर से आती रेडियो की आवाज़ ध्यान से सुनतीं थीं ,दूसरे क्वाटर में एक बंगाली परिवार था वो अंकल भी क्रिकेट के शौक़ीन थे कमेंट्री के बीच में यकायक शोर सुनकर आवाज़ लगा कर पूछते ...मंजूल (मंजुल) विकीट गीर गया क्या ? मम्मी फटाफट जवाब देतीं ‘जी भाई साहब’|एक क्वाटर में शर्मा परिवार था ,वो अंकल संस्कृत के प्रोफ़ेसर थे और बहुत सख्त थे लेकिन उनका बेटा गोल्डी बहुत शैतान था , मेरा पक्का दुश्मन था वो |मुझे और मेरी मम्मी को बागबानी का बहुत शौक था |गुल्हड़,गुलाब,मोरपंखी,बेला,नीबू,क्रोटन के पेड़ ,पौधे हमने अपने छोटे से लॉन में लगा रक्खे थे ,हमारे घर से लगा हुआ घर गोल्डी का था ,वो मेरे लॉन से अक्सर फूल तोड़ा करता था और पूछने पर झूठ बोल देता था कि मैंने नहीं तोड़े| वो मुझे एक आँख नहीं भाता था ,पूरी दोपहरी मैं खिड़की पर पहरा देती रहती कि देखती हूँ बच्चू आज तुम कैसे फूल तोड़ते हो | पकड़े जाने पर उस पर जैसे मुक़दमा सा दायर कर देती,गवाहों को एकत्र करती, जैसे न जाने उसने कितना बड़ा गुनाह कर दिया हो |


कॉलोनी में मेरे हमउम्र कई बच्चे थे,शाम होते ही मैं अपने छोटे भाई को लेकर घर से निकल जाती थी,सब एक जगह एकत्र हो जाते थे और फिर खेल शुरू होता था, उन दिनों चार्ल्स शोभराज का नाम अख़बारों की सुर्ख़ियों में था ,बड़े लोगों के मुँह से हम बच्चे उसके कारनामे सुना करते थे ,उस को दिमाग में रख कर हम बच्चे भी ‘डॉन पुलिस’ के खेल में एक बच्चे को डॉन बना कर उसका नाम चार्ल्स शोभराज रख देते थे बाक़ी उसे पकड़ने वाले होते थे,किसी एक बच्चे के घर के बाहरी हिस्से को हम पुलिस हेड क्वाटर बनाते वहाँ दो लोग तैनात रहते ,एक प्लास्टिक का फ़ोन लेते ,कुछ कागज़ और पेन और बन जाता हमारा परफेक्ट पुलिस हेड क्वाटर! कभी इक्कल दुक्कल ,कभी घोड़ा है जमाल शाही,कभी वरफ पानी,कभी आई स्पाई | बहुत सारे खेल थे हमारे पास , एक बार जब गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गयीं तो मेरे सभी दोस्त कहीं न कहीं घूमने जाने लगे,ज़्यादातर सब नानी या दादी के घर छुट्टियाँ में जाते थे तब कहीं हिल स्टेशन वगैरह जाने का चलन नहीं था|

लेकिन क्यों कि हम नानी के यहाँ अक्सर जाते थे तो वहां जाना हमारे लिए कोई नई बात नहीं थी और दादी के यहाँ गाँव जाना भी मुझे भाता नहीं था लेकिन सब दोस्त वापस आकार पूछेंगे कि मीतू तुम कहाँ गईं? तो मैं क्या बताऊँगी, ये सोच कर मैंने मम्मी पापा से गाँव जाने के लिए पूछा,मम्मी पापा को पता था की मैं गाँव में रुक नहीं पाऊँगी ,उन्होंने मना कर दिया |लेकिन ज़िद करके मैं और मेरी छोटी बहन बाबा दादी जी के साथ गाँव चले आए ,शहर से १७ किलोमीटर दूर एक क़स्बा था ‘वजीरगंज’,वहाँ तक हम बस से आये फिर वहां से पाँच किलोमीटर दूर गाँव हम बैलगाड़ी से पहुँचे,बैलगाड़ी पर पहली बार बैठे थे वो इतनी उचक-उचक के चल रही थी कि न जाने कितनी बार तो मैं डर से चीखी लेकिन फिर मज़ा आने लगा |


गाँव में एक ख़ासियत होती है कि वहाँ किसी के भी घर मेहमान आयें वो पूरे गाँव का मेहमान होता है ,और हम भी गाँव में सबको मेहमान से कम नहीं लग रहे थे हमारा घर सबसे ऊँचाई पर था हमें देख कर औरतें आपस में फुसफुसा रही थीं ‘मास्टर साहब के यहाँ गौतारिया आये हैं’ ‘अरे उर्मिलेश की लड़किनी’आई हैं, ख़ुद को इतनी तवज्जो मिलती देख मुझमें ‘वी आई पी’ की आत्मा आने लग गयी थी ,क्या ऐटीट्यूड था मेरा! आज सोचती हूँ तो ख़ुद पर बहुत हँसी आती है कि कितनी पगली थी मैं |

पूरे दिन में गाँव के सब बच्चे हमें घेरे रहते हम शहरी भाषा बोलते तो वो हँसते और वो गाँव की भाषा बोलते तो हम हँसते |गाँव जाने से एक दो दिन पहले ही मैंने आमिर खान की पिक्चर’ पापा कहते हैं’ देखी थी उस का दीवाना पन उन दिनों मेरे सर चढ़ कर बोल रहा था ,पूरी दुपहरी मैं आमिर की तरह गिटार की जगह हाथ का पंखा लेकर खूब जोर जोर से उस पिक्चर के गाने गाती रहती बाक़ी सब बच्चे भी अपने-अपने राग अलापते | वहां बच्चे गेंहूँ के एवज़ में जब कुल्फ़ी ख़रीदते थे तो मुझे बड़ा आनंद आता था,दादी कहती थी कि तुम पैसे देकर ले लो लेकिन मैं गेंहूँ के एवज़ में ही कुल्फ़ी खरीदती ,मुझे ऐसा लगता कि जैसे मैं फ्री में कुल्फ़ी ले आई | रोज़ाना भरी दुपहरी फिरकी के पंखे बेचने वाला आता था मैं दादी से कहती ‘दादी पैसे दो,मुझे वो पंखा चाहिए जिसे लेकर भागो तो वो चलने लगता है ‘ ये सुन कर सब हँसते,हम दिन भर खूब खाते और मस्ती करते थे ,दादी के हाथ से बने और चूल्हे पर पके खाने का स्वाद आज भी नहीं भूलता|

जब सूरज जी की ड्यूटी ओवर हो जाती तो हम खेत की तरफ निकल जाते,कोई कहता ...आओ लली तुम्हे पालेज दिखावें, हम पूछते..पालेज ,ये क्या होती है ? तो कहते अरे तरबूजन के खेत को पालेज कहत हैं|और भी कई चीज़ों से अनजान हम दोनों बहनों से गाँव वाले कहते ‘उर्मिलेस की लड़किनी तो कतई सहरी हैं,जानती ही नाय हैं कछु,तुम्हारे पापा नै तुम्हें कछु न बताओ, ऐते बड़े सहर में तो नाय हो तुम ,जो बम्बई होत्तीं तो कतई न आतीं हियन ,लली जे देखौ तुम्हारे पापा जाई लड्हौरी में डुक जात्त ऐ जब तुम्हारे बाबा उनकौ पठेत्ते ! हम दोनों को खूब मज़ा आता ये सब बातें सुन कर |

तब सोत नदी आज की तरह सूखी नहीं थी,नदी में एक नाव हर वक़्त चलती रहती थी ..वो एक ओर से गाँव से आने जाने का एक मात्र ज़रिया थी ...उस समय कोई पुल नहीं था ,एक आद चक्कर हम भी लगा लेते नाव से ,वहीँ पास में आम के बाग थे गाँव के लड़के चटपट पेड़ पर चढ़ जाते हमें ताज़ी आम खिलाने के लिए ..इतना बढ़िया आव भगत शायद ही हमारी कहीं हुई होगी लेकिन जैसे जैसे शाम घिरने लगती मुझे मम्मी पापा की याद सताने लगती दिन तो अच्छा कट जाता था,लेकिन रात को जब गाँव में सात बजे से ही सुनसान होने लगता तो लगता की हम ये कहाँ आ गए ,मुझे अपनी कॉलोनी का शोर शराबा याद आने लगता ,पूरे गाँव में घुप्प अँधेरा हो जाता ,घर बस ढिबरी से ही रोशन रहते लेकिन जब ज़िद करके आ ही गए थे तो अब कैसे कहते की हमें वापस पहुँचा दो ,बाबा शाम को हमारी चारपाई बरामदे में डाल देते थे और नीचे पानी का छिडकाव कर देते थे जिससे कि वहां ठंडक बनी रहे,दादी हमारा मन लगाने को खूब सारी कहानी सुनातीं ,हमें गर्मी ना लगे इसीलिए बाबा दादी बारी-बारी से पूरी रात हाथ के पंखे से हमारी हवा करते रहते थे , लेकिन दो-तीन दिन में ही हमारे दावों की पोल राजनेताओं के दावों की तरह खुलने लगी थी बड़ी शान से मम्मी से कह कर आये थे कि देख लेना मम्मी हम कम से कम पंद्रह दिन गाँव में रह कर आयेंगे लेकिन यहाँ तो बस तीन चार दिन में ही मन भर गया था |मेरी छोटी बहन इतना परेशान नहीं करती थी जितना कि मैं |उसको कुछ ख़ास याद भी नहीं आ रही थी घर की ,वो तो जहाँ जाती वहीँ रम जाती,मैं ही थी मम्मी पापा की चिपकू बच्ची |मेरी बहन वापस जाने के लिए एक बार भी नहीं कहती और मुझे समझाती कि ‘अगर तुम रोओगी तो बाबा दादी को कितना बुरा लगेगा वो कितना ध्यान रख रहे हैं हमारा’ |लेकिन उल्टा मैंने ही उसे सिखाती कि ‘मेरे साथ तुम भी कहो कि बाबा जी हमें वापस घर जाना है तो बाबा जी हमें छोड़ आयेंगे’, दादी बाबा मेरा उतरा मुँह देख कर समझ ही गए थे कि इनका मन नहीं लग रहा अब |हमारे कहने पर बाबा हमें वापस घर छोड़ आये , फिर तो तभी गए जब मम्मी-पापा गाँव गए,तो ये थी हमारी एक मात्र गाँव की छोटी सी ग्रीष्मकालीन छुट्टी !

आज इस सब को दोहरा कर मेरा मन भी मीठी-मीठी टॉफी के स्वाद की तरह मीठा-मीठा हो गया है |

-आज का दिन बहुत अच्छा है जिसने मुझे कुछ देर लिए ही सही लेकिन मेरी ज़िन्दगी के सबसे प्यारे वक़्त यानि मेरे बचपन से मुझे बावस्ता करवाया है ,ऐ दिन ...शुक्रिया तुम्हारा !





सोनरूपा
गंगा दशहरा
८ जून २०१४  








-सोनरूपा विशाल, गंगा दशहरा ८ जून २०१४

जन्म – ३० अक्टूबर बदायूँ (उ.प्र.) में

पिता –राष्ट्रीय गीतकार डॉ.उर्मिलेश शिक्षा - एम.ए (हिंदी), पी .एच . डी एम .जे पी रूहेलखंड विश्वविद्यालय.बरेली
एम.ए पूर्वार्द्ध (संगीत) -दयालबाग विश्वविद्यालय,आगरा प्'संगीत प्रभाकर ' प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन एवं गायन आई सी सी आर एवं इंडियन वर्ल्ड कत्चरल फोरम (नयी दिल्ली ) द्वारा ग़ज़ल गायन हेतु अधिकृत दिल्ली,बरेली दूरदर्शन से समय समय पर कवितायेँ प्रसारित आकाशवाणी द्वारा ग़जल गायन हेतु विगत १० वर्षों से अधिकृत लखनऊ एवं बरेली आकाशवाणी से गायन का प्रसारण अखिल भारतीय कविसम्मेलनों में काव्य पाठ हिंदी की ख्यातिलब्ध पत्र -पत्रिकाओं एवं ब्लॉगस में लेख व रचनाएँ प्रकाशित, कृति - 'आपका साथ' (डॉ.उर्मिलेश की ग़ज़लों का आडियो एल्बम सस्वरबद्द) ‘लिखना ज़रूरी है’प्रथम प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह सम्मान -मॉरिशस में आधारशिला फाउंडेशन द्वारा आयोजित विश्व हिंदी सम्मलेन में 'कला श्री सम्मान' कला एवं संस्कृति मंत्रालय मॉरिशस मंत्रालय द्वारा विशिष्ट सम्मान आई सी सी आर एवं उदभव संस्था द्वारा 'उदभव विशिष्ट सम्मान’ 'बदायूँ गौरव सम्मान' तत्कालीन मुख्यमंत्री (उ.प्र.) द्वारा
'उत्तर प्रदेश लेखिका संघ' द्वारा सम्मानित
उपाध्यक्षा बदायूँ क्लब बदायूँ ,(महिला प्रकोष्ठ) डॉ.उर्मिलेश जन चेतना समिति की आजीवन सदस्य संपर्क - डॉ.सोनरूपा 'नमन 'अपो. राजमहल गार्डन प्रोफेसर्स कॉलोनी , 'बदायू'(उ .प्र) २४३६०१ ई मेल –sonroopa.vishal@gmail.com वेबसाइट-www.sonroopa.com likhnazaroorihai.blogspot.com

Saturday, June 08, 2013

जिंदगी का सफरनामा - अनुपमा तिवाड़ी

 

  •                                             जिंदगी का सफरनामा - अनुपमा तिवाड़ी


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नाम - अनुपमा तिवाड़ी
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शिक्षा - हिंदी व समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर व पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातक.


कार्यरत - पिछले 25 वर्षों से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली संस्थाओं में कार्य करती रही हैं, वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, राजस्थान में कार्यरत.


रचनाकर्म - अनुपमा की कविताएं और लेख कादम्बिनी, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, मधुरिमा, अनुराग, लोकमत, अमन पथ, अनौपचारिका, विमर्श आदि में प्रकाशित होते रहे हैं
कुछ ई - मेगजींस में लेख और कवितायेँ प्रकाशित हुई हैं.
वर्ष 2011 में बोधि प्रकाशन जयपुर से " आइना भीगता है " प्रथम कविता संग्रह प्रकाशित.
कवि सम्मेलन और आकाशवाणी पर कविता पाठ में भाग लेती रही हैं.
अभी लिखना जारी है ......

अनुपमा तिवाड़ी
07742191212




  •       सबकी जिंदगी एक किताब सी होती है जिस पर कुदरत, समाज और हम स्वयं हर दिन कुछ - कुछ लिख रहे होते हैं। मेरे जीवन का पहला पन्ना 30 जुलाई 1966 को लिखा गया। मेरा जन्म राजस्थान में दौसा जिले के बाँदीकुई कस्बे में हुआ। मेरे पिता रेलवे में मेलगार्ड थे। दादाजी भी देश
  आज़ाद होने से पहले वहीं मेलगार्ड रहे थे। मेरे नानाजी, मामाजी, चाचाजी, ताऊजी सभी रेलवे में अच्छे पदों पर रहे। मम्मी, दादी सभी पढ़ी  - लिखी  थीं। राजस्थान में ब्राह्मण परिवार अपने को श्रेष्ठ मानते हैं इसमें गौड़ सनाढ्य कुल के तो अपने को और भी ऊँचे ब्राह्मण कहते हैं। एक तो ब्राह्मण परिवार दूसरा शिक्षित । मेरे पूरे परिवार में सभी के नाम बड़े सुंदर - सुंदरऔर भाई - बहनों के मिलते - जुलते नाम रखने की परम्परा रही है। जिस पर भी हमारा परिवार थोड़ा गौरान्वित होता रहा है। इस प्रकार मेरे परिवार में खासतौर से मेरी मम्मी मे यह बहुत अंदर तक बैठा हुआ है कि हम सर्वश्र्रेष्ठ हैं। बचपन से मैं भी इसी माहौल में पली बढ़ी। हम पाँच बहन - भाईयों में मैं तीसरे नंबर पर हूँ। मुझसे दो बड़ी बहन और दो भाई छोटे हैं। जब मैं अपनी मम्मी के तीसरी बेटी पैदा हुई थी। तब मेरा नाम ’नौना’ रखा गया। राजस्थान में ’नौन’ नमक या खारे स्वाद को कहते हैं। मेरी मम्मी से जब मैंने कुछ वर्ष पहले इस नाम के रखने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि ’लोना’ बंगाली में मीठे को कहते हैं इसलिए मेरा नाम ’नौना’ रखा। मध्यमर्गीय परिवारों में एक प्रकार का अस्वीकार्य भेदभाव होता है। मेरे भाई के जन्मदिन पर सुबह हवन होता फिर शाम  को मेरी मम्मी की बहुत सारी सहेलियाँ गीत बधावा गाने आती थीं। हम एक - दो दिन पहले उन्हें बुलावा देने जाते थे। मेरे भाई को वो सब 2 - 2 रुपये भी देतीं। लड़कों के जन्मदिन पर ऐसा होता है और लड़कियों का जन्मदिन नहीं मनाया जाना ऐसा मुझे बिना के समझाए ही समझ में आ गया था। मेरी प्राथमिक शिक्षा आदर्श विद्या मंदिर बाँदीकुई में हुई। मुझे और मेरे सभी भाई - बहनों को शिक्षित होने के साथ.- साथ संस्कारित होने के लिए भी  उस स्कूल में भेजा गया था। वहां हम शिक्षक को गुरुजी और आपस में सहपाठियों को भैया - बहन बोलते थे। छठी से आठवीं कक्षा तक मैं वहां आर्य समाज मंदिर स्कूल में पढ़ी। लड़कियों के लिए सीधे घर से स्कूल जाना और सीधे स्कूल से घर आना ही ठीक समझा जाता था। कम बोलना, घर के सारे काम करना, लड़कों से बात नहीं करना, सहेलियां भी नहीं बनाना क्योंकि सहेलियां गलत बात सिखाती हैं, ऐसा समझा जाता था। 13 - 14 की उम्र के बाद लड़कों के साथ खेल खेलना भी गलत माना जाता था।



       कुछ - कुछ घर सा, कुछ - कुछ थाने सा, मेरा घर 
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   जिस रेलवे के बंगले में हम रहते थे, वह बहुत ही बड़ा था मेरी मममी आगे होतीं तो मैं और मेरा भाई पीछे खेलते और मम्मी पीछे होतीं तो हम आगे खेलते। घर में हर खेल खेलने की मनाही थी परन्तु हम हर खेल खेलते थे। जब भी मेरी मममी हमें खेल खेलते देख लेतीं तो हमारी डंडे से जोरदार पिटाई करतीं।  पिटाई के समय कभी - कभी पेशाब भी निकल जाता, बदन पर नील पड़ जाती और कभी - कभी तो खून भी आ जाते।। उनकी अपेक्षा थी कि हम पढ़ाई में ध्यान लगाएं पर हमारा ध्यान पढाई में कम ही लगता था। घर में खाने - पहनने की कोई कमी नहीं थी परन्तु पैसे बिलकुल नहीं मिलते थे। हम भाई - बहन सोचते रास्ते में पापा मिल जाएँ तो हम उनसे पैसे माँग लें। हम पापा से 10 पैसे माँगते तो वे 25 पैसे दे देते। वो मेरे लिए 5 पैसे प्रतिदिन चीज खरीद कर खाने के लिए पर्याप्त होते थे।

    एक बार हमारी एक शिक्षिका उमा बहिन जी स्कूल छोड़ कर जा रही थी। कक्षा की हम सभी ल़ड़कियों ने सोचा कि हम अपनी टीचर को कोई गिफ्ट देंगे। वो कितनी अच्छी हैं और अब हमसे कभी नहीं मिलेंगी। इसके लिए मैंने मेरे पापा की जेब से 25 पैसे चुरा लिए और स्कूल में जमा करवा दिए। मुझे विश्वास था कि इसके लिए मेरी मम्मी मुझे पैसे नहीं देंगी। जिस दिन उन उमा बहिनजी का विद्यालय में अंतिम दिन था हमने उन्हें अच्छा डबल रिफिल का पैन, गले मे पहनने के लिए चेन और एक डायरी दी। हमारी एक - दो सहपाठियों ने इसके लिए पैसे नहीं दिए जिनमें एक रेनू लड़की भी थी। रेनू की माँ और मेरी माँ आपस में सहेली थीं। एक दिन मेरी माँ मुझे उनके घर ले कर गईं। रेनू की मम्मी ने कहा कि ’’स्कूल में तो बार - बार पैसे मंगाते हैं, अभी 25 -  25 पैसे सभी से मंगवाए मैंने तो नहीं दिए।’’ यहां बात खुल गई कि मैंने तो पैसे स्कूल में दिए थे। इस बात पर घर जाने के बाद मेरी मम्मी ने चोरी करने पर मेरी खूब पिटाई की और कहा कि मैंने यह बात घर में उनको क्यों नहीं बताई। मेरी दो बड़ी बहनें मम्मी के साथ घर के और काम करतीं और मैं पेड़ों में पानी डालना, पानी की हौद भरना, घर में सुबह - शाम झाडू लगाने का काम करती थी। अपने तय काम को मैं बहुत ही ख़ुशी ख़ुशी और नियमपूर्वक करती थी। मेरा एक भाई मुझसे ढाई वर्ष छोटा है, वह और मैं खूब साथ - साथ खेलते थे। तीन तरह से कंचे खेलते बिलास्तर, अंटे, गुच्चिक। अंटे तो हम एक ही रजाई में बैठ कर जब रात को पढ़ते थे तब भी खेलते थे। मेरी बहन जब पढती तो वह पढ़ते - पढ़ते सो जाती तब मेरा भाई कभी - कभी उसके सामने से किताब उठा लेता परन्तु भाई बहन का पढ़ते हुए सो जाना मम्मी को पता नहीं चलता था। घर में अनुशासन के नाम पर कभी - कभी मुझे मेरा घर पुलिस थाना लगता था। जहां धीरे बोलना है, हंसना नहीं है, खेलना नहीं हैं, दोस्त सहेलियां नहीं बनाने हैं सीधे घर से स्कूल जाना और स्कूल से सीधे घर आना है, सिर्फ कोर्स की किताबें पढना है। पढ़ाई में मैं कभी होषियार नहीं रही। गणित मुझे शुरू से ही बहुत कठिन लगता था। पांचवीं से आठवीं तक तो मैं किसी - किसी होशियार लड़की की कापी में से देख - देख कर कर गणित के सवाल कर लेती थी। टैस्ट मे नंबर कम आने पर स्कूल में पिटाई होती और घर पर भी। मेरी माँ की जब इच्छा होती तब वो हमारी काॅपियां चैक करतीं उसमें नोट पड़ पन्ने को मैं मां के डर से जब कभी - कभी फाड़ देती तो पन्ना दूसरी तरफ से भी निकलने  लगता जो मेंरी माँ तुरन्त समझ जातीं कि एक तरफ से पन्ना फाड़ा गया है। कभी - कभी वो स्कूल में भी आ जातीं हमारी प्रगति को जानने परन्तु वहां हमारी कक्षा अध्यापिका हमारी पढ़ाई में कमजोरी की उनसे मेरी शिकायत करती तो शाम को घर जाने में भी डर लगता। घर पर मेरी मां पूछती टैस्ट के नंबर सुना दिए ? मैं कहती ’’अभी तो नहीं सुनाए।’’  एक, दो बार तिमाही टैस्ट में नंबर कम आए तब मैंने प्रोग्रेस रिपोर्ट में पापा जैसे साइन ; हस्ताक्षर द्ध बनाते थे वैसे साइन बना लिए हालांकि वो बिलकुल वैसे तो नहीं बने थे। इस बात का जब मम्मी को पता चला तो उन्होंने  पिटाई की। 


नवीं कक्षा में मुझे विज्ञान विषय दिलवाया गया। क्योंकि मेरी नानी की मृत्यु कैंसर से हुई थी और बराबर वालों में अपने बच्चे को डाक्टर बनाना मां - बाप के लिए भी गर्व से सिर उठा कर जीने जैसा समझा जाता था। इसलिए मेरी मम्मी मुझे डाक्टर बनाना चाहती थी। गणित विषय का मुझे  ट्यूशन भी लगवाया गया। उस समय ट्यूशन फीस चालीस रुपये प्रतिमाह थी। मैं जिन शिक्षक से ट्यूशन पढ़ती थी वे हमें स्कूल में भी गणित पढ़ाते थे। अंतिम महीने में मैं 15 दिन उनसे पढ़ी क्योंकि फिर परीक्षाएं आ गईं थीं। अंतिम महीने में मेरी मम्मी ने 15 दिन के 20 रुपये ट्यूशन फीस दी। मुझे यह पैसे उन  शिक्षक को देने थे जो मुझे ट्यूशन पढ़ाते थे। मैं साइकिल पर बाजार सामान लेने गई फीस के 20 रुपये मैंने कपड़े के थैले में डाले और थेैले को हैंडिल के चारों तरफ लपेट लिया। बाजार में सामान  खरीदते समय वे रुपये कहीं गिर गए। अब मुझे बहुत डर लगा। मैं बाजार अक्सर सामान लेने जाती थी। जब सब्जी लेने जाती तो तीन रुपये की सब्जी खरीदती और घर पर मम्मी को 3 रुपये 25 पैसे की बताती। इस तरह 25 पैसे, 50 पैसे बचा - बचा कर लगभग मैंने साढे अट्ठारह या उन्नीस रुपये इक्कठे कर लिए। ये रुपये मैंने रुमाल में लपेट कर बिस्तर के बक्स में रखती जा रही थी। बिस्तर का बक्स मेरे हिसाब से पैसे रखने के लिए सुरक्षित जगह था। मेरी मम्मी ने एक दिन बिस्तर का बक्स खोला जिसमें वह रुमाल उन्हें मिला। तो उन्होंने घर में सबसे पूछा कि यह किसने रखा ? मेरे पैसे उन्हें मिल जाने पर मैं रोने लगी। जो शिक्षक मुझे ट्यूशन पढ़ाते थे, रास्ते में जब मुझे मिलते तो मुझे गुस्से में घूरकर देखते। एक दिन मैंने उनसे कहा मास्टर जी मैं आपको फीस दे दूँगी। उधर घर पर इक्कठे रुपये निकल जाने पर दुबारा इस तरह पैसे जोड़ना बड़ा ही मुश्किल  था। थोड़े दिनों के बाद वे मास्टर जी मेरे घर आए और मेरी मम्मी से बोले ’’भाभीजी अनुपमा ने इस महीने फीस नहीं दी।’’ मेरी मम्मी ने आवाज़ दे कर मुझे अंदर से बुलाया। मैंने पूरी बात बता दी। कि वे पैसे मुझसे खो गए। इसके बाद मम्मी ने उनके सामने ही मेरे बहुत थप्पड़ लगाए।
जिस रेलवे स्कूल में मुझे 9 वीं कक्षा में पढ़ने भेजा वह को - एड स्कूल था। इस कक्षा में 50 लड़के और मैं अकेली लड़की थी। मैं हमेशा लंबी सी डेस्क और बैंच पर आगे बैठती थी । मैं पूरे साल में सिर्फ 2 ही बार अपनी कक्षा के लड़कों से बोली। वो भी 1 या 2 लड़कों से। जब मैंने उनसे बात की या कुछ पूछा तो सभी ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे कुछ अनहोना सा घटित हो गया हो या मैं लड़कों से बोलना भी जानती हूँ। ग्यारहवीं तक की पढाई मैंने विज्ञान विषय से जैसे - तैसे रट - रटा कर सैकिंड डिविजन से पास की। मुझे ट्यूशन भी लगवाया गया। मेरी दोनों बहनें सुंदर और गोरी थी और मैं काली थी इसलिए मुझे लड़कों के स्कूल में भेज दिया गया कि मुझसे कोई छेड़छाड नहीं करेगा। इसलिए ही मुझे बाहर जाने के खूब मौके मिले।

साइकिल सीखने का अवसर भी मिला। घर में 24 इंच की साइकिल थी जिसे मेरे पापा, छोटा भाई और मैं चलाते थे। मैं बहनों को खाना देने, भाई को स्कूल छोड़ने, राशन लेने, चक्की पर आटा पिसवाने साइकिल से जाती। 
ग्यारहवीं तक की पढाई मैंने विज्ञान विषय से की परन्तु फस्र्ट ईयर मे मुझे आॅर्गेनिक कैमिस्ट्री और फिजि़क्स बहुत कठिन लगने लगे और मैं बारहवी में फेल हो गई। मां का कहना था कि साइंस से ही फार्म भरो वरना हमें फार्म नहीं भरवाना। मैं आर्टस पढ़ना चाहती थी। मैं चीजों को याद कर लेती थी इसलिए जीव - विज्ञान मुझे बहुत अच्छा लगता परन्तु फिजिक्स में न्यूमैरिकल करने में मुझे बहुत ही दिक्कत होती थी। मेरी कलाओं में रुचि थी। मैं गाने खूब सुनती थी। हमारे घर में बडा - सा मरफी का रेडियो था जो कि मेरी बड़ी बहन पैदा हुई तब खरीदा गया था। मैं गीतमाला और आपकी फरमाइष पर खूब गाने सुनती, साथ -साथ गाती। उन दिनों मेरी माँ की लिखी कहानियां  अमिता, नारी जगत और युवक पत्रिकाओं में छपती थी। घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, सरिता, नूतन कहानियाँ, सच्ची कहानियाँ और मनोहर कहानियाँ पत्रिकाएं आती थी, जिन्हें मैं या मेरा भाई ए एच व्हीलर स्टाॅल, रेल्वे स्टेषन से खरीद कर लाते थे।  राजस्थान पत्रिका उस समय 30 पैसे का आता था जो कि रोज हाॅकर घर पर डाल कर जाता था। ये सभी पत्र - पत्रिकाएं मेरी मम्मी पढ़ती थी। जिन लेखों या चित्रों को वे ठीक नहीं समझती थीं उन पर वे स्याही छिड़क देती थीं जिससे हम नहीं पढ़ पाएँ परन्तु मैं उन्हें आँख गडा़ - गड़ा कर पढती थी। विज्ञान विषय अंततः मुझसे चला नहीं तो फिर राजस्थान विश्वविद्यालय से बी ए के बाद एम ए हिंदी व समाजशास्त्र से किया और फिर प़त्रकारिता एवं जनसंचार में डिग्री ली। इसके बाद पांच वर्ष का शास्त्रीय गायन सीखने के लिए भातखंडे संगीत महाविद्यालय जयपुर में प्रवेष लिया जिसमें एक वर्ष शास्त्रीय गायन सीखा। 

एक काली लड़की, जो इंसान बनने जा रही थी
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   ’बोध शिक्षा  समिति’ जयपुर में एक संस्था है जो कि कच्ची बस्तियों में बच्चों के लिए वैकल्पिक विद्यालय आरंभ करने जा रही थी। इसका आॅफिस जयपुर में बजाज नगर बी - 86 में था। लगभग 24 वर्ष पहले इसमें शिक्षिकाओं के लिए समाचार पत्र में विज्ञप्ति निकली। तब तक मैं बी ए कर चुकी थी। मैंने आवेदन पत्र भरा। वहां साक्षात्कार के लिए मुझे बुलाया गया। यह मेरा पहला साक्षात्कार था। इसमें हमें  

 ’’सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद  है,
 दिल पर रख कर हाथ कहिए देश क्या आजाद है-------!’’ 

 श्री रोहित धनकर ने सामूहिक रुप से गवाया। इसके बाद इसके अर्थ पर बात की गई। मिटटी से खिलौने बनवाए गए। कुछ लिखने को भी दिया गया और फिर अंत में घर परिवार और रुचियों की बात की गई। इसके बाद 16 सितम्बर 1989 को बोध    शिक्षा   समिति संस्था में बतौर शिक्षिका के तौर पर मैंने काम करना आरंभ किया। शुरूआती दिनों में आॅफिस का माहौल बड़ा अलग तरह का लगा। योगेन्द्र जी जो कि समन्वयक थे स्वयं झाड़ू लगाते थे। सुष्मिता जी जो कि रिसर्चर थीं पीने का पानी भरती थी, बिना पे्रस किए कपड़े पहनती थीं, इस आॅफिस में कोई चतुर्थ श्रेणी भी कर्मचारी नहीं था। वहां सब कुछ अजीब लगता था परन्तु सही लगता था। कुछ दिनों के बाद हम सभी मिलकर बारी - बारी से सफाई करने और चाय बनाने लगे। चाय के कप तीन - चार दिन तो हम सब झूठे ही छोड़ कर जाते रहे। चार - पांच दिनों बाद हमारे समन्वयक योगेन्द्र जी ने कहा कि ’’अपने यहां कोई चाय के कप धोने वाला नहीं है यदि हम अपने - अपने कपों को स्वयं ही धो दें तो कैसा रहेगा ?’’ इस बात पर हम सभी ने जोरदार सहमति जताई। परन्तु  हम सब भागते - भागते हुए घर  जाते तो कप बिना धुले कई बार छूट ही जाते थे। इस पर अगले दिन बात होती तो सभी कहते ’’मैं तो वहाँ बैठी थी, मैं तो धो कर गई थी आदि - आदि।’’ योगेन्द्र जी ने सुझाव रखा कि ’’यह भी हो सकता है कि हम सब 2 - 2 रुपये मिला कर कंाचा को दे दें तो वो हमारे कप धो दे।’’ कांचा आॅफिस के नीचे रहने वालों के यहां काम करता था। इस पर सबसे ज्यादा मैंने जोर दे कर हामी भरी और कहा ’’हाँ - हाँ यह ठीक है’’ इस सुझाव के पीछे क्या उद्देष्य हो सकता है, इससे मैं उस समय पूरी तरह अनभिज्ञ थी। एक कारण यह भी था कि आॅफिस का काम खत्म होते ही मैं साइकिल उठा कर घर भाग जाना चाहती थी। जिस दिन आॅफिस में देर हो जाती तो घर पर डाँट पड़ती। अब से पहले किसी बड़े व्यक्ति को नाम के साथ ’जी’ संबोधित करना मेरा यहीं से षुरु हुआ। प्रषिक्षण में हर मुद्दे / बात पर सबके विचार लिए जाते, सवाल रखे जाते और खूब बातचीत और बहस के बाद चीजें मिल - जुल कर तय होतीं। हम अपने ज्ञान से जो भी बोलते योगेन्द्र जी उसके सभी पहलुओं पर ध्यान दिलवाने के लिए खूब सवाल हमारे बीच रखते। सब खूब बात करते। हम सबके बीच एक बहुत ही सहज दोस्ती का रिष्ता कुछ ही दिनों में बन गया जो कि अभी भी है। कभी - कभी लगता कि छोटी सी बात पर इतनी बात करने की क्या जरुरत है ? परन्तु चर्चा करते तो बहुत अच्छा लगता परन्तु उस समय हम खुद भी बात या मुद्दे की गहराई में उतर रहे होते थे। बोध में हमारा तीन महीने का प्रषिक्षण हुआ। पहले एक महीने हम प्रातः 9ः00 बजे से षाम 6ः00 बजे तक आफिस में ही रहे। दूसरे महीने में हम आधे समय बस्तियों में चल रही बोधशालाओं का अवलोकन करने जाते, समुदाय के लोगों से मिलते और फिर बस्तियों से लौटकर आधा समय आॅफिस आ कर अपने अनुभवों को साझा करते। हम बस्तियों मे दो - दो के समूह में जाते थे।


  एक दिन मैं जयपुर में मालवीय नगर वाल्मिकी /हरिजन बस्ती सैक्टर 1 में गई।  इस बस्ती में सभी वे लोग रहते थे जो क शौचालयों की सफाई का कार्य करते हैं। वहाँ से आ कर मैंने अपने अनुभवों मे कहा कि ’’मैंने तो आज वहाँ एक राजपूत घर में पानी पिया’’ तो योगेन्द्र जी ने कहा कि  ’’ आपको क्या पता कि वे राजपूत हैं ?’’ मैंने कहा ’’उनके घर के बाहर नाम के आगे राजपूत लिखा था’’ योगेन्द्र जी ने कहा आप किस जाति की हो ? मैंने बड़े ही ठसके से कहा ’’हम तो ब्राह्मण है’’ उन्होंने कहा ’’ब्राह्मण तो नीचे होते हैं’’ मैंने कहा ’’नहीं ब्राह्मण सबसे ऊँचे होते हैं।’’ इस पर चली बहस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची परन्तु इसने थोड़ा मुझे हिलाया। प्रशिक्षण में हमारे साथ बहुत तरह के खेल, बालगीत, चेतनागीत गाना, विभिन्न मुद्दों पर बात करना जैसे रोटी क्यों फूलती है ? धर्म क्या है ? समझ क्या होती है ? पर बात हुई। शिक्षाशास्त्री
  वसीली सुखोम्लीन्सकी की पुस्तक ’’बाल हृदय की गहराईयाँ’’ पुस्तक सभी ने व्यक्तिगत रुप से खरीद कर पढ़ी। इस पुस्तक के कुछ - कुछ अंश  पढ़ कर सभी ने प्रस्तुत किया। कक्षा 1 से 5 तक की सभी विषयों की पुस्तकों को कभी व्यक्तिगत तो कभी समूहों में बैठ कर देखा व प्रस्तुत किया। हम गीत गाते, नाचते, खेल खेलते। एक दूसरे से अपने घर की बातें भी साझा करते। यहां काम करना मेरी किसी प्रकार की मजबूरी नहीं थी। 

     बोध में हमें अपने को अभिव्यक्त करने का पूरा अवसर मिला था इसलिए मैं अपने मन की बात बहुत ही सहज तरीके से कह देती थी। मैं हिंदी में ’अ’ वर्ण को ’ए’ उच्चारित करती थी क्योंकि हमें इसी तरह उच्चारित करना सिखाया गया था। राजस्थान में उस क्षेत्र में’ ’अ’ को ’ए’ ही उच्चारित करते हैं, जहां मेरी प्राथमिक शिक्षा  हुई थी। जब मैं ’अ’ को ’ए’ बोलती तब योगेन्द्र जी कहते कि ’अ’ बोलो तब मैं ’ऐ’ बोलते हुए कहती हां ’अ’ ही तो बोल रही हूँ। उनके उच्चारित करवाने पर भी मुझे ध्वनियों का अंतर समझ में नहीं आ रहा था। तब मैं बहुत सारी चीजों को ले कर सोचती कि एम ए तक मैंने क्या सीखा, मेरी पढ़ाई तो अब शुरु हो रही है। बोध में हर विषय पर खूब चर्चा होती थी। उस समय मुझे बहुत अच्छा लगता था और मैं सोचती थी कि इतनी अच्छी बातें तो मैंने कभी नहीं सुनीं। मैं अपनी मम्मी को कभी ले कर आऊँ तो कितना अच्छा हो। मैं ऐसा मन में ही सोचती थी। जब कोई  अच्छी, निष्पक्ष, सही लगनेवाली बात सुनती तो मेरे पूर्वाग्रह हिलते और फिर मैं उस विचार को मथते हुए आत्मसात करती और अपने नए विचार बनाने लगती। मैं पिछले 24 साल पहले ऐसी अनुपमा नहीं थी शायद मैं हर दिन बदली हूँ। और महसूस करती हूँ कि मैं एक नई अनुपमा बन गई हूं अभी पता नहीं कितना हर दिन और नया - नया मेरे अंदर आएगा और मुझे ताज़गी देता हुआ ऊर्जित करता रहेगा। जिस दिन हमारा प्रशिक्षण का अंतिम दिन था और अगले दिन से जब हमें बस्ती में काम करने जाना था तब मैंने योगेन्द्र जी से कहा ’’ योगेन्द्र जी, आपने हमारी ट्रेनिंग तो बहुत अच्छी की परन्तु यह तो बताया ही नहीं कि पढ़ाना कैसे हैं ’’? उन्होंने कहा ’’बस यही है ट्रेनिंग।’’  बाद में समझ आया कि यदि वे कोई एक तरीका बता देते तो वही हमारे लिए बाइबिल बन जाता। हमें तो कर के नए तरीके देखने सीखने की आजादी दी गई थी और उस पर अपना तर्क रखना, जानना, सवाल करने की छूट भी दी गई थी। बोधशाला नवाचार आधारित वैकल्पिक विद्यालय था। जिसमें शिक्षा  व्यवहारिक हो, वह जीवन में काम आए, और जिसमें शिक्षक  एक स्वचेता के रुप में अपने को विकसित करे यह उद्देष्य मुझे धीरे - धीरे समझ में आने लगा।

स्वयं सीखते हुए आगे बढ़ते जाना -
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बोधशालाओं में कक्षाएँ नहीं थीं, बच्चों के समूह थे जो कि उनकी आयु और स्तर के आधार पर बनाए गए थे। ये समूह हम ही ने बनाए थे। वहां हम बच्चों को 6 घंटे पढ़ाते, योजना बनाते, मूल्यांकन करते, समुदाय में संपर्क करते, बच्चों को कभी - कभी पार्क या पहाड़ पर घुमाने ले जाते। हमें कभी यह नहीं कहा गया कि हमें बच्चों को मारना नहीं है, बच्चों की षिकायत अभिभावकों से नहीं करनी है। परन्तु चर्चा और काम करते समय ही इन सबके बारे में हमारी एक समझ बनने लगी। एक बार 15 अगस्त पर हम आठ शिक्षिकाए गुरुतेग बहादुर सिक्ख बस्ती वाली बोधशाला  में थी। हम स्वयं ही बस्ती से बड़ा सा बांस झंडा फहराने के लिए माँग कर ले कर आए, लड्डू बाँटने के लिए हलवाई को आॅर्डर करने गए। हिसाब - किताब रखा। यहाँ काम करते हुए मुझे कभी नहीं लगा कि हमारे साथ कोई पुरुष सहकर्मी होता तो हम इस काम को बेहतर कर पाते। स्कूल की पुताई करना, उसकी सफाई करना, सजाना सभी काम बच्चे और हम मिल कर करते थे। मेरी मम्मी कभी भी लूना ले कर मेरे आॅफिस आ जातीं या मेरे भाई को मेरे आॅफिस मुझे बुलाने के लिए भेज देती । जब मेरे भाई से मैं आॅफिस में मेरे बुलाने का कारण पूछती तो वह कहता मम्मी कह रही हैं ’’हमें नौकरी नहीं करवानी।’’ ऐसा मुझे कम से कम महीने में 2 - 3  बार सुनना पड़ता था तब मैं मन ही मन कहती थी ’’ मैं तो काम करना चाहती हूं न।’’मेरे घरवालों को बाहर के किसी व्यक्ति को यह बताते हुए शर्म 
  आती थी कि मैं कच्ची बस्ती के बच्चों को पढ़ाने जाती हूं। इसलिए मेरी मम्मी कहती थी कि ’’मैं चाइल्ड  एजुकेशन में काम करती हूँ’’ फिर ज्यादा कोई कुछ नहीं पूछता था। इसी बीच मैंने समाजशास्त्र  में एम. ए किया। मेरा बहुत सारी घर की मान्यताओं और विचारों के साथ द्वंद्व चलता रहता था। कभी - कभी साइकिल पर रोते हुए बस्ती पहुंचती थी। सुबह जल्दी उठ कर खाना बनाना, घर की सफाई करना जैसे अनेकों काम छोटे - मोटे कर के साइकिल उठा कर भागती वहां भी समय पर पहुंचना   होता था। वह सही भी था। ऑफिस में जब देर तक रुकना होता तो मुझे बहुत डर लगता था कि मेरी मम्मी मुझे नौकरी नहीं छुड़वा दें। इसलिए तेज साइकिल चला कर जल्दी से घर पहँुच जाना चाहती थी। 25 रुपये साईकिल में हवा भरवाने के लिए महीने का खर्च अपने हाथ में रखती थी। शुरुआत में बोध में मुझे 1100 रुपये मासिक वेतन मिलता था जो चार साल बाद 1500 रुपये हो गया था। मैं कभी - कभी सोचती थी कि मैं पूरा पैसा घर पर देती हूं, घर का सारा काम कर के जाती हूं। और क्या करुँ ? हमारे समाजों में लड़कियों की मदद करते हैं, उन्हें संबलन नहीं देते। उन पर दया करते हैं, उनमें स्वाभिमान नहीं भरते। उसे यदि आगे बढ़ना है तो समाज द्वारा प्रदत्त सुविधाएं नहीं मिलेंगी उसे तो संघर्ष करते हुए उन्हें स्वयं ही अर्जित करना होगा। 

     एक बार मेरे पैर में फैक्चर हो गया तो बोधशाला के 30 - 35 बच्चे मेरे घर लगभग 3 किमी दूर पैदल चल कर मुझसे मिलने आए। वे अपने साथ मेरे लिए कागज पर पैंसिल से शुभ सन्देश भी लिख कर लाए थे। एक बच्चे विक्र्रम ने लिखा था ’’ दीदी आप ठीक हो जाओगी, आप रोना मत’’ और सच में बच्चों के वो पत्र पढ़ कर मैं रोई थी। मैंने काम करते समय जाना कि बच्चे कभी चोर नहीं होते जिनके बारे मे मैं यह धारणा ले कर गई थी कि बच्चे चीजें चुरा लेते हैं। हमने व्यवस्थाएं ऐसी बनाईं कि सभी बच्चों को लगता कि यदि वे लिखेंगे तो उन्हें कागज, पैंसिल मिल जाएगा, वह सबके लिए है। जब हम उपसमूहों में बच्चों के साथ काम करते तो बच्चे चित्र बना कर रंग भरते और फिर बीच में रखी प्याली में रंग रखते जाते। बच्चे और मैं मिल कर कक्षा कक्ष की सफाई करने, पैंसिल छीलने और बांटने, पुस्तकालय की पुस्तकें सिलने और जमाने का काम भी करते थे। जब कभी कोई बच्चा षोर करता और कहना नहीं मानता तब मैं कहती ’’अच्छा अब मैं चुप बैठ जाती हूँ।’’ तब अन्य बच्चे उसे डाँटते हुए कहते कि’’ ओ चुप हो जा’’ दीदी को कहने दे। ’’ हां दीदी कहो !’’  कभी - कभी बच्चे एकदूसरे को गाली भी देते तब समूह के बीच बात की जाती। जब बच्चों को लगा कि दीदी बात करेगी तो वे कागज के छोटे टुकड़े पर उस साथी का नाम लिखते और फिर गाली लिख देते। ऐसे सभी मुद्दों पर हम कक्षा में बातचीत करते। बच्चों में धीरे - धीरे स्व अनुशासन आने लगा।

     मैं प्रतिदिन बोर्ड पर योजना लिख देती थी कि आज हम पूरे दिन क्या - क्या करेंगे। तो बच्चे बोर्ड पर लिखे हुए को पढ़ने का प्रयास करते थे। ऐसा करते हुए मुझे काम में एक पारदर्शिता  भी लगती थी, बच्चों को पता होता था कि आज वे क्या - क्या करने वाले हैं। बस्ती में हम लोग संपर्क करते तो बच्चों की माँओं से भी बातचीत होती थी। कुछ महिलाओं ने कहा कि ’’दीदी हमको पंजाबी बोलनी आती है पर, लिखना नहीं आता हमें लिखना सिखा दो।’’ मुझे पंजाबी न बोलनी आती थी न ही गुरुमुखी लिखना। ’हँा’ उनके बीच रहते हुए मुझे उनकी भाषा समझ में पूरी तरह आने लग गई थी। जब मैं किसी शब्द को नहीं समझ पाती तो बच्चे मुझे बताते थे कि दीदी इस शब्द का यह मतलब होता है। कुछ बच्चे मतलब को मतबल भी बोलते थे और मैं वैसे ही ठीक समझ जाती थी जैसे कुछ लोग लखनऊ को नकलऊ बोलते हैं। बोधशाला में हमने ऐसी इच्छुक महिलाओं का समूह बनाया जो कि गुरुमुखी लिखना सीखना चाहती थीं फिर मैंने गुरुमुखी लिपि सीख कर महिलाओं को गुरुमुखी लिखना सिखाया। 

    खुद ने की खुद से बात  - ’’जब गलत नहीं तो डरना क्या ?’’
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1989 में राजस्थान में सांप्रदायिक दंगों के दौरान जयपुर की कुछ बस्तियों में झुग्गी - झोंपडि़यों को जला दिया गया। साम्प्रदायिक सद्भावना के लिए हमने शांतिमार्च निकाला और न्यूगेट पर धरना दिया। 1992 में भंवरी देवी जो कि, महिला विकास अभिकरण में साथिन थीं उनके साथ राजस्थान के दौसा जिले के भटेरी गांव में बाल - विवाह  रुकवाने पर सामूहिक बलात्कार कांड हुआ। जिसके विरोध में सैकड़ों संस्थाओं के कार्यकत्र्ता सड़कों पर उतर आए। इसके विरोध में मैंने गिरफ्तारी दी। लगने लगा कि जब गलत है तो विरोध से क्या डरना ? बोध में काम करते हुए मेरा दुनिया को देखने का एक अलग तरह का नजरिया बनने लगा। बोध में  आने से पहले मैं पूरी तरह से कट्टर  और अपनी बातों और मान्यताओं को सही मानने वाली थी परन्तु जब मुद्दों पर बात होती तो दूसरे की बात न्यायपूर्ण या सही भी लगती थी। कहते हैं न कि यदि ’’कप चाय से पूरा भरा हो तो चाय बाहर फैलेगी ही। कप को पहले थोड़ा खाली करना होता है तभी उसमें और चाय आ सकती है’’ या ’’ खिड़कियां खोलने पर ही बाहर की शुद्ध  हवा कमरे में प्रवेश  कर पाती है।’’ वहां चार साल रहते हुए मेरे विचार और सोच एक आकार लेने लगे। उन विचारों को मैंने आत्मसात किया इसलिए इसकी मेरे घर पर भी छाप पड़ी। यहां सिर्फ संस्था में बैठकर सैद्धांतिक  बात करना या सत्र का संचालन करना भर नहीं था।

   1992 में मेरे सहकर्मी कमल से मैंने काफी विरोध के बाद बिना दहेज के परिवार की ओर से, समाज के बीच विवाह किया। साथियों से ही 16,000 रुपया उधार लिया। मेरे विवाह को ले कर मेरे समूह के बच्चे बहुत उत्साहित थे परन्तु मैंने कहा कि ’’मेरी शादी दूसरे  शहर से हो रही है इसलिए मैं तुम सबको नहीं बुला सकँूगी। वैसे उन्हें इसलिए नहीं बुलाया गया था कि वे कच्ची बस्ती के बच्चे हैं और गंदे रहते हैं। अपने विवाह के समय मैंने चार दिन का अवकाश लिया। उन दिनों बच्चे समूह में क्या काम करेंगे ? इसकी योजना मैंने उनके साथ बैठ कर बनाई। बच्चों को पता था कि, उन्हें इन चार दिनों में क्या - क्या काम करना है। मेरे बिना बच्चे पूरे चारों दिन आए और उन्होंने लगभग सभी वे काम किए जो हमने मिल कर तय किए थे। हमारी कक्षा में बहुत सिखाने पर जोर न हो कर सीखने की स्थितियाँ बनाना कक्षा की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा था। समूह में लगभग बच्चे एक घंटे पुस्तकालय की पुस्तकें पढ़ते। बच्चों को घर पर पुस्तक देने के लिए मैंने एक पतले रजिस्टर में आवष्यक काॅलम बनाए। बच्चे काॅलम पढ़ कर स्वयं रजिस्टर में एंट्री करते थे। इस दौरान बहुत ही कम पुस्तकें फटीं और खोईं तो नहीं के बराबर। मेरी यह धारणा भी टूटने लगी कि बच्चों को दंड दिए बिना नहीं सिखाया जा सकता। मुझे लगने लगा कि हमें ही काम नहीं करना आता, सीखने की जरुरत तो हमें है कि, किसी को कैसे सिखाया जाता है।

आजा़दी चुनने की और मनचाहा करने की
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विवाह के बाद मेरा उपनाम वही रहा, जो था। आमतौर पर देश  के कई समाजों और राजस्थान में भी विवाह के बाद विवाहित स्त्री अपने पति का उपनाम अपने नाम के सामने लगाती हैं। यह एक परम्परा है, परिवार को एक इकाई मानने की। परन्तु मैंने अपना उपनाम तिवाड़ी ही रखा। मेरी बेटी अपने नाम के आगे उपनाम के रुप में स्वयं का ही घर का नाम लगाती है, बेटा मेरे पति का, मेरे पति स्वयं का और मैं मेरा। विभिन्न समाजों में विवाह के समय जन्मपत्री मिलवाने का रिवाज है और नहीं मिलने पर लड़की का नाम बदल कर जन्मपत्री मिलवा ली जाती है। यानि जो भी बदलना है वह, लड़की का ही बदलना है। लड़का पैदा होने से ले कर आजन्म ’श्री’ है परन्तु अविवाहित लड़की अपने नाम से पहले ’कुमारी’ व विवाहित ’श्रीमति’ लगाती है । मैं ईश्वर  को धन्यवाद् देती हूं कि कमल से विवाह कर के मैं अपने विचारों के साथ ही नहीं जी पाई बल्कि आगे भी बढ़ पाई। मैंने कभी विवाहित होने का प्रतीक चिह्न नहीं रखा। हर मोर्चे पर महिला को लड़ना होता है और अपने को साबित करना होता है। लेकिन मेरे अंदर मजबूती निष्पक्ष और दृढ़ विचारों से ही आई। मेरे परिवार में हम चार व्यक्ति हैं। कोई किसी से नहीं डरता और सब, सबसे डरते हैं। परिवार में सबको चुनने की आजादी है। मनचाहा करने की आजादी है परन्तु मनमाना करने की, किसी को नहीं। घर में अहं फैसले चारों की मीटिंग कर के ही लिए जाते हैं। मेरी बेटी प्रोफेशनल फोटोग्राफर और थियेटर ट्रेनर है। बेटा 12 वीं मे पढ़ता है वह 10 साल से थियेटर कर रहा है। बेटी पिछले वर्ष रतन टाटा ट्रस्ट व यू के गवर्नमेंट के एक प्रोजेक्ट के तहत तीन महीने के लिए इंग्लैंड गई जहां उसने धीमा सीखने वाले ;मंदबुद्धि  बच्चों के साथ  क्राफ्ट, फोटोेग्राफी व थियेटर पर काम किया। हमने बच्चों की क्षमताओं व रुचि के अनुसार बच्चों को पर्याप्त सीखने, करने के मौके दिए और अपेक्षाएँ नहीं रखीं कि उन्हें ये बनना है या वो बनना है। वो जो करना चाहते है, बस उसमें सहयोग किया। एक अभिभावक होने के नाते हमारा विश्वास  रहा है कि, सब बच्चों में प्रतिभा होती है, उन्हें बने हुए सांचों में फिट नहीं चाहिए। सब बच्चे सीखना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं। भला कोई बुरा इंसान बनना चाहता है ? बच्चों ने पढ़ाई बीच - बीच में छोड़ी भी। जब बेटे ने गिटार सीखने की इच्छा जताई। बच्चे जब स्कूल जाते थे और वहां जिस तरह की प्रतिस्पर्धा , दंड दिया जाता था उससे तो हमारा मन खराब ही होता था और मैं सोचती थी कि मैंने अपने जीवन में स्कूल में क्या - क्या सीखा ? परन्तु हमारे बच्चे  हमारे मित्रों, फोटोग्राफ्र्स, पत्रकार, थियेटर आर्टिस्ट, लेखकों, संस्थाओं में कार्यरत हमारे मित्रों से जुड़े रहे हैं जिससे उनका सीखना औपचारिक शिक्षा के साथ - साथ प्रभावी ढंग से तेजी से हो रहा है। हमने बच्चों के साथ लगातार संवाद बनाए रखा है और हमारा विश्वास  है कि ऐसा करने पर स्वअनुशासन बच्चों में स्वतः ही आता है। जैसा कि मेरे समूह के बच्चों में आता हुआ मैंने देखा था। बस हमने धैर्य रखा। बच्चों के दोस्त अब हमारे दोस्त और हमारे दोस्त अब, उनके दोस्त हैं। कुछ दोस्त हम चारों के दोस्त हैं। बहुत तरह के काम करते हुए मुझे मेधा पाटेकर का संघर्ष, तस्लीमा की आवाज़, इरोम चानू शर्मिला का अनशन, मदर टेरेसा की सेवा, गांधी का विचार के साथ कर्मशील  होना आदि ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये सब किसके लिए बोलते है ? किसके लिए लड़ते हैं ? हमेशा  मेरे दिल में एक सवाल की तरह रहता है और मैं अपने आदर्ष इनमें ढूंढने लगती हूं। कबीर को पढ़कर तो मैं कबीरमय हो गई। 
      मेरा अपने छोटे बच्चों को कभी पति के पास तो कभी कहीं - कहीं छोड़ना बहुत ही तकलीफदेह होता था। मेरे पास एम 80 दुपहिया थी जिस पर अपनी छोटी सी बेटी को चुन्नी से बांध कर मैं उसे दिन में रखने के लिए किसी - किसी लड़की को खोजने दिगंतर के पास कुदनपुरा गाँव जाती थी। कभी -कभी जब बेटे को छोड़ कर जाती और वह जब समझ जाता कि मैं अब उसे छोड़ कर जा रही हूँ तो वह रोता और मैं मुँह नीचे कर के आँसूं पोंछते हुए निकल जाती कि कोई नहीं देख ले कि मैं रो रही हूँ। कभी पति कहीं, कभी मैं कहीं। कभी हम साथ - साथ, तो कभी एक बच्चा एक जगह और दूसरा एक जगह रहे। अब भी बच्चों से अलग रहती हूं तो लगता है षनिवार, रविवार बड़े क्यों नहीं होते ? ’संधान’ में काम करते हुए राजस्थान के हर जिले में शिक्षक  प्रशिक्षण  के दौरान काफी बाहर जाना होता था। यहां काम करते हुए ही पता चला कि बहुत सारी ऐसी जगह हैं जहाँ ट्रेन नहीं जाती  क्योंकि  मेरे पापा रेलवे में थे और हम सब जगह टेªन से ही जाते थे। षहर से बाहर अकेले आना- जाना यहीं से शुरू  हुआ।

अच्छा काम, जो रुलाता है अब भी, कभी - कभी
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एक्षन एड जयपुर, राजस्थान में मैंने खिलती कलियाँ परियोजना में समन्वयक के रुप में साढ़े चार वर्ष कार्य किया। इसमें मैं जयपुर रहती थी परन्तु राजस्थान के सीकर, अजमेर और कोटा में काम के दौरान जाना होता था। कोटा व अजमेर में हम घर से निकलकर रेल्वे स्टेशन  पर आए हुए बच्चों को उनके घर पहुँचाने का काम करते थे। उन साढ़े चार वर्षों में हमने 375 बच्चों को उनके घर पहँुचाया जो कि विभिन्न कारणों से घर से निकल कर भाग आए थे। लोग इन्हें टपोरी, भगोड़े शब्द बोलते थे। मेरे दिमाग में सवाल आता कि कोई भी अपना घर क्यों छोड़ता है ? मेरे बच्चे तो अपना घर नहीं छोड़ कर भाग रहे। घटनाओं के पीछे होने वाले कारणों को हमेशा मेरा दिमाग कुरेदता रहा। ऐसी स्थितियों में मेरे अपने सवाल होते थे और अपने जवाब।

   अजमेर प्लेटफाॅर्म पर रहने वाले बच्चे कचरा बीन कर कबाड़ी को बेचने, ट्रेन में पेपर सोप बेचने और होटल पर कप प्लेट - धोने का काम करते थे। एक बार दिवाली से पहले उन्होंने थोड़े - थोड़े पैसे इक्कठे किए और फिर उनसे कुछ - कुछ नए कपड़े खरीदे। ये कपड़े वे दिवाली पर पहनने वाले थे। परन्तु तब तक इन्हें रखने के लिए उनके पास कोई सुरक्षित जगह नहीं थी। इन कपड़ों को उन्होंने रेलवे यार्ड में खड़े एक डिब्बे में छुपा दिया। डिब्बा बहुत दिनों से वहीं खड़ा था परन्तु एक दिन डीजल उस डिब्बे को ले गया। यह बात मुझे उनमें से एक बच्चे ने हँस - हँस कर बताई। यह बात अब भी हँसाती कम, रुलाती ज्यादा है। इस परियोजना में हम वाल्मिकी समाज की बालिकाओं के साथ भी सीकर के वार्ड नंबर 39 में काम कर रहे थे। वहां सामुदायिक केन्द्र में हम अनौपचारिक शिक्षा  उन बालिकाओं के लिए चलाते थे, जिनकी प्राथमिक शिक्षा  पूरी नहीं हुई थी। यह ऐसा केन्द्र था जिस पर आने वाली लड़कियां शौचालय की सफाई करने जाती थी और वहां से आ कर पढ़ाई करती थी। प्राथमिक शिक्षा  पूरी करने के बाद पांच लड़कियों ने मारु गर्वनमेंट हायर सैकण्ड्री स्कूल में प्रवेश  लिया। सीकर में यह स्कूल लड़कियों के लिए किसी काॅलेज से कम नहीं समझा जाता था। हमारे सेंटर पर अस्पृष्यता, घरेलू हिंसा जैसी बहुत सी सामाजिक समस्याओं पर भी बात होती थी। मैं वहां कालूराम हटवाल के घर में रुकती थी जो कि उसी समाज का व्यक्ति था।   शुरुआत में तो वे मेरे लिए बाहर से कोकाकोला मंगवाते थे। उनका सोचना था कि मैं उनके घर की चाय वगैरह नहीं पिऊँगी, बाद में मैं उनके घर बनी चाय या खाना भी खाने लगी। इसी परियोजना में मैंने देह व्यापार में लिप्त परिवार के बच्चों के साथ काम किया। इन बच्चों को  अन्य बच्चे वैश्या  या रंडी की औलाद कहते थे और यह कारण बच्चों को स्कूल से विमुख करने के लिए पर्याप्त था। नट समाज की 21 वर्षीय एक लड़की देह व्यापार के काम से निकलना चाहती थी उसके परिवार के सहयोग के बिना जब हम उसे देह व्यापार के काम से नहीं निकाल पाए तो उसने आत्महत्या कर ली। उसका नाम कविता था। वो कविता आज भी जैसे सवाल करती सुनाई देती है कि समाज आपके जीने का रास्ता पहले से ही क्यों तैयार रखता है, जिस पर किसी का जीवन चलना है। अरस्तू ने कहा था’’ हम स्वतंत्र पैदा हुए हंै।’’ गौतम बुद्य ने कहा ’’अप्प दीपो भवः’’ तुम अपना प्रकाश स्वयं बनो। तुम मानना मत अपनी आँखों से देखना।

    कोटा के रेलवे स्टेशन पर देश भर से बच्चे भाग कर आते थे। दो बच्चों को मैं व एक कार्यकर्ता  नेपाल उनके घर छोड़ने गए। उस बच्चे के पिता को जब पता चला कि उनका बेटा भारत के राजस्थान के कोटा शहर
  में हमारे पास है तो वे दो महीने तक नेपाल एक्षन एड के आॅफिस में साइकिल से चक्कर लगाते और पूछते हमारा लड़का कब आएगा ? हमारा  लड़का कब आएगा ? कितने सारे बच्चों को मेरी उपस्थिति में उनके अभिभावकों को सौंपा गया जब अभिभावक अपने खोये हुए बच्चों को हमसे प्राप्त करते तो वे और बच्चे लिपट - लिपट कर रोते थे और मुझे भी वह सब देख कर रोना आता था। यह काम उस समय मुझे दुनियाँ का सबसे बड़ा और पवित्र काम लगता था। इस परियोजना में अजमेर, कोटा और जयपुर के ’बाल संप्रेक्षण  गृह’ जहां अपचारी कहे जाने वाले बच्चों को रखा जाता है। मैंने उनके साथ भी काम किया। इन बच्चों के लिए बाल अधिकार अधिनियम का उल्लंघन होते हुए मैंने बहुत देखा। एक मीटिंग में राजस्थान की चीफ जस्टिस को मैंने बताया कि अजमेर के बाल सुधार गृह में उपेक्षित, अपचारी व स्पेषल होम तीनों तरह के बच्चे साथ में रहते हैं जो कि 5 -6 वर्ष से 18 वर्ष तक के हैं। यह बाल अधिकार अधिनियम के विरुद्य है। उन्हें अलग - अलग रखा जाना चाहिए। वहां बड़े बच्चे बहुत प्रकार से छोटे बच्चों का षोषण करते थे और छोटे बच्चे अपनी परेषानियों को स्टाफ के कर्मचारियों को नहीं कह पाते थे। मेरी इस बात का जवाब उन्होंने दिया कि ’’वहां की क्या बात करें ंवहाँ तो चूहे ऐसे ही घूमते रहते हैं।’’ किसी महत्वपूर्ण बात का जवाब नहीं देना हो तो कुछ भी कहा जा सकता है। बस मैंने अपने मन को यही कहा कि ’’वहां इनका बच्चा बंद नहीं है।’’ मैं हमेशा अपराधियों, कैदियों, अपचारी कहे जाने वाले बालक- बालिकाओं के प्रति संवेदनशील रही हूंँ कौन चाहता है कि वह बुरा व्यक्ति बने, उसके लिए मुझे व्यक्ति का परिवार, समाज, देष की नीतियां और कार्यरत लोग अधिक जिम्मेदार लगते रहे हैं। यहां काम करते हुए मुझमें काफी साहस भरा। 
कविताएँ लेने लगीं जन्म -वर्ष 2005 में मुझे उड़ीसा के भुवनेश्वर व पुरी के जगन्ननाथ मंदिर जाने का अवसर मिला।  भुवनेश्वर के लिंगराज मंदिर के बाहर लिखा है ’’सिर्फ हिंदुओं के लिए प्रवेष’’ और ऐसा ही जगन्नाथ मंदिर के बाहर लिखा है। वहां के पंडित ने मुझसे कहा मैडम आप गोआ से आई हो ? मैंने का ’’नहीं राजस्थान से।’’ उन्होंने मेरा नाम पूछा मेरे बता देने पर मेरा उपनाम पूछा। मैंने उनसे कहा ’’आपने मेरे बारे में इतना क्यों पूछा ’’ तो उनका कहना था कि ’’मैडम यहां हिंदुओं को ही प्रवेश  है। इंदिरा गांधी को भी रोक दिया था मंदिर में अंदर जाने से।’’ जब हम वहां गए तब पुरी के भगवान को बुखार हो रहा था। साल में 15 दिन वहाँ भगवान को बुखार होता है परन्तु दर्शनार्थी आ सकते हैं, चढ़ावा चढ़ा सकते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी रसोई देख सकते हैं जैसा कि वहाँ दावा किया जाता है। 100 रुपये का  लगभग 250 ग्राम प्रसाद खरीद सकते हैं। वहँं मैंने देखा कि जगह - जगह पैसे कम चढ़ाने पर पंडित बुरी तरह से श्रद्यालुओं से बोल रहे थे आगे चलो, आगे चलो। 2006 में हैदराबाद के मक्का मस्जिद में जब मैं अपने सहकर्मियों के साथ प्रवेश  कर रही थी तब एक महिला ने मुझे बाहर रोक लिया और कहा ’’औरतें अंदर नहीं जाती हैं।’’ ऐसे ही अनेक उदहारण दलितों को मंदिर में प्रवेष से रोकने के मैं सुनती रही थी। मेरे मन में कड़े शब्दों में सवाल बाहर आने लगे ’’शंकर  भगवान का नंदी बैल मंदिर के अंदर जा सकता है, गणेष जी का चूहा जा सकता है पर मुसलमान नहीं जा सकता, इसाई नहीं जा सकता, औरत मस्जिद में नहीं जा सकती। सभी धर्म किसी न किसी रुप में कहते रहे हैं कि कण - कण में भगवान है तो क्या इसाई में भगवान नहीं हैं दलित में भगवान नहीं है ? यदि हम सब ईश्वर की संतान हैं तो क्या औरत ईश्वर की संतान नहीं है ? अनेकों सवाल मैं अपनी कविताओं में करने लगी। धर्म की परिभाषा मैंने अपने लिए स्वयं तय की। कबीर को मैंने पढ़ा मुझे उनका फक्कड़पना बहुत भाता है।

कस्तूरी कुंडली बसै, मृग ढूंढे बन माहीं
ऐसे घट - घट राम हैं, दुनिया देखे नाहीं।

काकर पाथर जोरि ले, मस्जिद लेई चुनाय
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे,क्या बहिरा हुआ खुदाय।

कबीर आज भी प्रासंगिक है। जो कहते थे ’’ ईश्वर कहीं नहीं है, वो है, तो बस, तुम्हारे अंदर।’’

बहुत सी घटनाओं में मैंने अपने होने की तलाश की। अपने लिए तौर - तरीके से जीने के कारण लोग मुझे कहते आप आर्य समाजी हो ? आप किसी गुरु महाराज को मानती हो ? मेरे मना करने पर वे कहते किसी को तो मानती होओगी ? फिर अंत में वो मुझे नास्तिक भी कहते। मुझे आज तक नहीं पता कि मैं नास्तिक हूं या आस्तिक ? क्योंकि आम लोगों का कर्मकांडी होना धार्मिक होना है जो कि मेरा तो बिलकुल भी नहीं है। मुझे लगता है जो हम धारण करते है, वह धर्म है। धर्म और उपवास  की परिभाषाएं मैंने अपने लिए स्वयं गढ़ीं। मानना कुछ नहीं है। मैं कविताएं लिखने लगी। मेरी लिखी कविताएं विभिन्न प्रकार के भेदभावों पर सवाल उठाती हैं, तो कभी व्यवस्था पर, वे वंचितों की आवाज़ हैं, तेजी से बदलता बाजारवाद के प्रति आगाह करती हैं। मैं ऐसे काम करने लगी जिसमें सीधा - सीधा सामाजिक हित हो, सीधे - सीधे किसी वंचित व्यक्ति को मदद मिले। कितनी ही लड़ाई झगड़ों मे मैं बेपरवाह हो कर कूद गई, कभी - कभी डर भी लगा परन्तु मन में ये  ग्लानि नहीं रही कि मैंने कुछ नहीं किया। एक इंसान होने के नाते मेरी इस समाज, देष में क्या भूमिका है ? मेरे अंदर का आदमी हमेषा बाहर आता रहा कभी लेखक, कभी पत्रकार तो कभी सामाजिक कार्यकर्ता बनकर। मैंने अभी तक लगभग 125 कविताएं लिखीं जिनमें से 30 कविताएं देष के विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं व ई - मैगजीनस में प्रकाषित हुई हैं। एक कविता संग्रह ’’आइना भीगता है’’ बोधि प्रकाषन जयपुर से 2011 में प्रकाषित हुआ। 

    काम करने के दौरान ही कन्या भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, जैसे मुद्दों को समझने का अवसर मिला। रैली धरने ,खूब किए जयपुर के पास कालाडेरा में मेधा पाटेकर के नेतृत्व में कोकाकोला प्लांट के विरोध में 2005 में गिरफ्तारी दी। कोकाकोला प्लांट से लगातार आस - पास के गांव बंजर हो रहे हैं। एक बाॅटल कोकाकोला के षोधन  में 8 बाॅटल पानी की जरुरत होती है और यह कोकाकोला वह गरीब आदमी के लिए तो नहीं है, जिसके जमीन का पानी रीत रहा है और उसकी जमीन बंजर हो रही है। प्याऊ बोतल में बंद होती जा रही हैं। यह पानी भी कीटनाषकयुक्त है। सभी बोतलबंद पेयों में कीटनाषक होते हैं। दिमाग में आता था कि इस धरती के प्राकृतिक संसाधन तो सबके हैं न ! पानी कोई कैसे बेच सकता है ? यहाँ पे्रमचंद का ’ठाकुर का कुआ’ कहानी भी याद आती थी। इस सबमें मेरे पति कमल का सहयोग रहा। तभी षायद में इतनी मजबूत बन पाई। यह सब टुकड़ों में नहीं समग्रता में बना एक विचार है।

    पिछले चार वर्षो से मैं अपने जन्मदिन पर रक्तदान कर रही हूँ। एक सामान्य व्यक्ति के षरीर में साढ़े चार - पांच लीटर खून होता है मैंने संकल्प लिया कि मैं अपने जीवन में एक षरीर जितना रक्तदान  करुँ। जब किसी का एक्सीडेंट हो जाता है और परिवारजन नहीं आ पाते तब ऐसी स्थिति में जो लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं उ़न्हीं का रक्त काम आता हैं। रक्तदान, महादान है। लाखों रुपये से भी भारी पड़ता है रक्त उस समय। मैंने व कमल ने देहदान व नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा। डाॅक्टर हमारी देह को काम में लेते हुए कितना कुछ सीखेंगे और अन्यों की जान बचाएंगे। अपना जीवन जीने के बाद आप दूसरे को ये आँखें दे कर कितना सुंदर कार्य कर रहे होते हैं वह भी ये सुंदर दुनिया देख पाए जिसे कुदरत ने आँखें नहीं दीं। पिछले तीन वर्षं में मैंने 50 से अधिक पेड़ सार्वजनिक स्थानों पर लगाए। दो घंटे में हम एक आॅक्सीजन के सिलिंडर जितनी आॅक्सीजन ले लेते हैं यानि एक दिन मे 12 सिलिंडर औक्सीजन हम लेते हैं। पेड़ कितनी आॅक्सीजन देते हैं, हजारों पक्षी घोंसले बनाते हैं, कितने पषु तपती धूप में इनके नीचे छाँव पाते हैं, हवाएंँ चलती हैं, पर्यावरण षुद्य होता है। पर्यावरण के प्रति इतने सारे फायदों ने मुझे पेड़ लगाने के लिए पे्ररित किया। हम कितना खाते हैं, पानी पीते हैं और बदले में इसे क्या देते हैं ? इसी विचार को लेते हुए मैं खूब बागवानी करती हूं। श्र्रम में मुझे दृढ़ विष्वास है। पिछले कुछ वर्षों से मैं सर्दी के दिनों में अपने मित्रों से गर्म कपड़े एकत्र कर फुटपाथ पर रहने वाले लोगों को कपड़े देने जाती हूं। इस वर्ष  पाँच बच्चों को मैंने यूनिफार्म बनवाइ्र्र यह कोई बड़ा योगदान नहीं है परन्तु मुझे एक प्रकार की संतुष्टि देता है और होठ बुदबुदाते हैं रहीम की ये पंक्तियाँ
देनदार कोई और है, भेजत है दिन रैन,
लोग भरम मोपे करैं ताते नीचे नैन।
मेरे काम की षुरुआत की कड़ी यहाँ से आरंभ हुई -
1989 से 1993 तक मैंने जयपुर राजस्थान स्थित ’बोध षिक्षा समिति’ द्वारा कच्ची बस्ती में संचालित बोधषाला में षिक्षिका के रुप में कार्य किया। 
1993 से 1996 तक ’दिगंतर षिक्षा एवं खेलकूद समिति’ जयपुर में में समूह समन्वयक के रुप में कार्यरत रही। जिसमें षिक्षकों को प्रषिक्षण व षैक्षिक संबलन देने का कार्य किया व पुनः 2007 से 2008 तक ’क्वालिटी एजूकेषन प्रोग्राम’ बारां राजस्थान में फैकल्टी के तौर पर कार्यरत रही। वहाँ षिक्षक प्रषिक्षणों, डाइट व किषनगंज ब्लाॅक में सरकारी षिक्षकों के साथ सघन कार्य किया। 

Saturday, June 01, 2013

बनना एक शिक्षिका का : अनुपमा तिवाड़ी

बनना एक शिक्षिका का : अनुपमा तिवाड़ी-------------------------------------------------

एम.ए. के बाद काम की शुरुआत बतौर एक शिक्षिका के रुप में की थी। मैंने कभी सोचा नहीं था कि शिक्षिका बनूँगी, बस कोई भी नौकरी कर लेने की इच्छा थी। मेरा बचपन राजस्थान के बांदीकुई कस्बे में बीता। पिता वहाँ रेल्वे में मेलगार्ड थे।  माँ भी एम. ए. पास थीं और लेखन कार्य से भी जुड़ी हुई थीं। मैं ब्राहमण जाति के शिक्षित परिवार में जन्मी थी इसलिए स्वयं को श्रेष्ठ समझने का संस्कार घर से मिला था। घर में घोर अनुशासन के बीच पली-बढ़ी थी। 1988 में परिवार बांदीकुई से जयपुर आ गया।
इसी वर्ष ’बोध शिक्षा समिति’ द्वारा शहर की कच्ची बस्तियों में संचालित वैकल्पिक विद्यालयों में शिक्षक / शिक्षिका पद हेतु समाचार पत्रों में विज्ञप्ति निकाली गई थी। इस विज्ञप्ति की चौंकाने वाली बात यह थी कि शिक्षिका पद के लिए प्रशिक्षित होने की शर्त नहीं थी। मैंने भी आवेदन कर दिया। मेरा साक्षात्कार हुआ। यह साक्षात्कार एकदम अलग था। साक्षात्कार में हम से एक गीत  ’सौ में सत्तर आदमी.....’ सामूहिक रूप से गवाया गया । इस गीत में क्या है ? इस सवाल पर लिखने को कहा गया। मिट्टी से खिलौने बनवाए गए। ‘वर्तमान में शिक्षा की स्थिति’ मुद्दे पर समूह में चर्चा करने को कहा गया। लगभग आधा दिन इस प्रकार की गतिविधियों के बाद व्यक्तिगत साक्षात्कार लिया गया। अन्य आवेदक लड़कियों से पता चला कि कुछ तो स्नातक भी नहीं हैं, तब मुझे लगा कि मेरा तो सलैक्‍शन हो ही जाएगा क्योंकि मैं तो एम.ए. हूँ।  
कुछ दिनों के बाद मुझे चुन लिए जाने का पत्र प्राप्त हुआ। अब मुझे तीन महीने का प्रशिक्षण लेना था। संस्था की कार्यप्रणाली व विस्तृत परिचय हेतु सभी चयनित सदस्यों को आमंत्रित किया गया। 16 सितम्बर 1989 को संस्था में मेरा पहला दिन था।  मेरी माँ मेरे साथ वहाँ के तौर-तरीकों और लोगों को देखने-समझने के लिए मेरे साथ आईं थीं। इस प्रशिक्षण में हम 12 प्रशिक्षु थे। यह संस्था में नए प्रशिक्षणार्थियों का दूसरा प्रशिक्षण था।
शिक्षिका बनाम विद्यार्थी
जयपुर शहर में संस्था का एक छोटा सा आँगन था। यह आँगन ही कार्यालय भी था और प्रशिक्षण केन्द्र भी। प्रशिक्षण में काम के दिन की शुरुआत चेतनागीत, बालगीत और कविताओं को गाने से होती थी। प्रार्थना से नहीं, ऐसा क्यों हैं यहाँ ? यह सवाल बार-बार मन में उठ रहा था पर आयोजकों से पूछने की हिम्मत नहीं थी। तीन-चार दिनों के बाद हम सब इन गीत-कविताओं को अपनी एक अलग डायरी में नोट करते गए और कुछ दिनों के बाद लय पकड़ते हुए एक-एक पंक्ति बोल-बोलकर सभी बालगीतों को गवाने भी लगे थे। सभी का गाने का अभ्यास हो रहा होता था और झिझक भी टूट रही थी। चेतनागीत एक तरह की चेतना का आवाह्न कर हमारे अन्तरतम को जगा रहे होते थे।
डायरी
हर रोज किन्हीं दो जनों की डायरी पढ़ी जाती थी। हम सभी घर जाकर पिछले दिन हुए काम को व्यवस्थित रूप में लिखते थे और फिर उसे सबके सामने अगले दिन सुनाते थे। डायरी में हमने किसी चीज को कैसे समझा ? पिछले दिन कैसा लगा, कोई गतिविधि क्यों करवाई गई, इस प्रकार की बातें लिखते थे। यदि लिखने में कुछ छूट गया तो अन्य साथी उसमें डायरी सुनने के बाद बताते कि यह विचार या काम छूट गया है या उक्त काम क्यों किया गया था यह बातें भी डायरी में लिखते थे। इस तरह सब अपने सुझाव और राय देते हुए डायरी लिखने के काम को बेहतर बनाने व अपने व दूसरों को विचारों को व्यवस्थित करने मे योगदान देते थे। लिखी जाने वाली डायरी, पिछले दिन के काम की झलक देती थी। इस तरह डायरी पर चर्चा करते हुए हमें विभिन्न मुद्दों व काम की कुछ-कुछ स्पष्टता होने लगी थी। किए जा रहे काम या बात पर कोई भी सवाल पूछ सकता था। इस तरह साथियों के सुझावों और स्वयं लिखने के प्रयासों से हम सभी की समझ भी सुदृढ़ होती रही और डायरी लिखने का कौशल भी विकसित होता गया।
खेल ,चित्र और हस्‍तकार्य
हम हर दिन एक खेल खेलते थे। जिनमें अधिकतर खेल सहभागिता आधारित होते थे। इन खेलों में किसी विशेष सामग्री की आवश्‍यकता नहीं होती थी। कुछ खेल इस प्रकार थे - कोड़ा जमालशाही, रुमाल झपट्टा, तोता कहे सो कर, कानाफूसी। ये खेल हमें स्फूर्त और आनन्दित करते थे और हम नए खेल भी सीख रहे होते थे। जिन्हें बाद में हमने बच्चों को भी खिलवाया। हस्तकार्य का काम भी प्रतिदिन किया जाता था जिसमें कागज पर मनचाहा चित्र बनाना, कोलाज बनाना, कागज मोड़कर कुछ खिलौने बनाना जैसे काम किए जाते थे। यह सब करते हुए हम कुछ-कुछ नया सीख रहे थे। इन कामों में एक प्रकार की स्वतंत्रता थी जैसे चित्र बनाना है तो स्वतंत्रता थी कि कोई भी चित्र बनाएँ। किसी खास चीज का चित्र बनाना है ऐसा नहीं था। इसलिए सीखते, काम करते समय बाध्यता या ऊब महसूस नहीं होती थी।
अवलोकन, सवाल, चर्चा  
प्रशिक्षण के दूसरे महीने में हम आधे दिन, उन बस्तियों में जाते जिनमें बोधशालाएँ चल रही थीं। वहाँ जाकर चल रहे शिक्षण कार्य का अवलोकन करते। समुदाय के लोगों से मिलते, बच्चों से बात करते फिर आधे दिन बाद प्रशिक्षण केन्द्र पर आकर अपने अनुभव साझा करते। वहाँ से लौटते समय हमारे साथ बहुत सारे प्रश्‍न और अनुभव होते थे। वहाँ के स्कूलों को बोधशाला कहा जाता था। इन शालाओं में प्रार्थना नहीं होती थीं, कक्षाएँ नहीं थीं, परीक्षाएँ नहीं होती थीं। यह सब हमारे लिए बिलकुल नई बातें थीं। एक दिन हम मालवीय नगर वाल्मिकी समाज की बस्ती में गए वहाँ से आकर अपने अनुभव साझा करते हुए मैंने कहा कि, ’’हमने तो वहाँ  एक राजपूत घर में पानी पिया।’’ इस बात पर हमारे समन्वयक योगेन्द्र जी ने कहा कि, ’’आपको कैसे पता कि वे राजपूत हैं?’’  मैंने कहा ’’उनके घर के बाहर नाम के आगे राजपूत लिखा था।’’ इस पर उन्होंने कहा ’’आप किस जाति की हो ? ’’  मैंने बड़े ही ठसके से कहा, ’’हम तो ब्राह्मण हैं। ’’ उन्होंने कहा ब्राह्मण तो नीचे होते हैं।’’ मैंने कहा, ’’नहीं ब्राह्मण सबसे ऊँचे होते हैं।’’ हम किसी निर्णय पर नहीं पहुँचे परन्तु इस बात ने थोड़ा अन्दर तक झकझोरा। शुरुआती दिनों में हम कुछ चुप-चुप रहे परन्तु जब लगा कि यहाँ आराम से अपनी बात कह सकते हैं। तब चर्चाओं में उलझने-सुलझने और समझने का दौर चल पड़ा।
एक बार सवाल किया कि बोधशाला में प्रार्थना क्यों नहीं करवाई जाती ? तो जवाब सवाल के रूप में मिला, ’’प्रार्थना क्यों होनी चाहिए?’’  हमारे जवाब कुछ इस तरह के थे, ’’वह सभी स्कूलों में होती है। सरस्वती की प्रार्थना तो होनी ही चाहिए। वह तो विद्या की देवी हैं, हम तो शुरु से प्रार्थना कर रहे हैं।’’ आदि-आदि। इस पर बात हुई कि क्या प्रार्थना करने भर से विद्या आ जाएगी ? क्या बच्चों का मन प्रार्थना करने के लिए होता है ? क्या प्रार्थना में बोले जाने वाले शब्दों के अर्थ बच्चे समझ रहे होते हैं ? हम अपने बचपन को याद करें हम प्रार्थना में क्या कर रहे होते थे ?
क्या जो हम काम शुरू से कर रहे हैं वे सब ठीक हैं ? क्या उन पर विचार नहीं कर सकते ? यदि वे ठीक नहीं लगते तो क्या उन्हें बदल नहीं सकते या उनकी जगह कुछ और नहीं कर सकते ?
इस तरह की चर्चाएँ बहुत बार हुआ करती थीं। धर्म पर भी बात हुई कि धर्म क्या है ? ये चर्चाएँ दो-दो, तीन-तीन दिनों तक चलती थीं। मुझे ये बातें नई लगती थीं और सही भी। चर्चाओं में मुझे बहुत ही आनन्द आता था। प्रशिक्षण में चर्चा करने पर बहुत जोर था। सब एक तरह की स्वतंत्रता महसूस करते थे। मुझे कभी-कभी लगता था कि इतनी अच्छी बातें तो मैंने पहले कभी नहीं सुनीं। मैं अपनी माँ को कभी यहाँ ले कर आऊँ तो कितना अच्छा हो। हमें अपनी बात कहने में डर नहीं लगता था। यह जगह एक माहौल देती थी जिससे हम अपनी बात बेझिझक रख सकते थे।
संस्था में कोई सफाई करने वाला नहीं था, न ही कोई चाय बनाने वाला था। सब काम हम बारी-बारी से ही करते थे। शुरुआत में 2-3 दिन हमारे समन्वयक और अकाउंटेंट ने ही चाय बनाई और कप भी उन्होंने ही धोए। तीन-चार दिन बाद समूह में समन्वयक की ओर से बात रखी गई कि क्या यह ठीक होगा कि सब अपने-अपने कप धोकर जाएँ। इस पर सभी ने सहमति जताई। परन्तु फिर भी कुछ झूठे कप घर भागते-भागते छूट ही जाते थे। उन्हें बाद में हमारे समन्वयक और अकाउंटेंट धोते थे। अगले दिन छूट गए कपों पर बात होती तो सब कहते कि ’’मैं तो वहाँ बैठी थी, मैं तो धोकर गई थी।’’ दो-चार दिन इस पर लगातार बात की गई, फिर सब अपने-अपने कप धोने लगे।
शिक्षण का प्रशिक्षण
प्रशिक्षण में मुख्य रूप से दो तरह का था। एक जो हमें अपनी सामाजिक व्यवस्था, प्रचलित मान्यताओं, शिक्षा व हमारे क्रियाकलापों पर सोचने, समझने की ओर ले जाता था। दूसरा जिनका सम्बन्ध बच्चों के शिक्षण व उन्हें समझने से सम्बन्धित था। सीखने में दण्ड की व्यवस्था उन्हें सिखाने में कितनी कारगर होती है या उनका सीखना रोकती है ? इस प्रकार अनेक मुद्दों पर गहन चर्चाएँ की गई थीं। रोटी क्यों फूलती है ? समझ क्या चीज है ? ऐसे प्रश्‍नों  पर भी विमर्श किया गया था। कभी-कभी लगता कि हमारे आसपास की चीजों को देखने के नजरिए भी कितनी तरह के हो सकते हैं ?
प्रशिक्षण में 8 घंटे का समय तय था। परन्तु कभी-कभी चर्चाएँ चलतीं तो समय और ज्यादा भी हो जाता। तब मैं सोचती कि 5 बजे तक ही चर्चा करनी चाहिए। चर्चा बहुत ठीक लगतीं, परन्तु मुझे घर में देरी से पहुँचने पर डाँट का डर और कई साथियों को बस निकल जाने जैसे डर सताते थे। घर जाने के लिए हम सब लड़कियाँ ऐसे भागतीं कि बस पीछे मुड़कर भी देख लेंगी तो देर हो जाएगी। ऑफिस में सभी, समय पर या समय से पूर्व ही पहुँच जाते थे।
विषयों पर हमारी समझ को समृ़द्ध करने के लिए विश्‍वविद्यालय के कुछ प्रोफेसर भी आए थे। इनसे हमने विभिन्न विषयों के बारे में बात की। जैसे इतिहास के बारे में बात हुई कि इतिहास तो हिन्दी का भी हो सकता है, गणित का भी और किसी गाँव का भी। इस चर्चा से पहले मैं राजा, महाराजाओं और देशों की घटनाओं को ही इतिहास समझती थी। कहानी शिक्षण पर एक सत्र हुआ कि बच्चों को कहानी कैसे सुनाई जाए ? एक प्रशिक्षिका ने हमें कहानी बहुत ही रोचक तरीके और हाव-भाव से सुनाई।
बच्चे दुनिया को कैसे समझते हैं ? कैसे सीखते हैं ? हमें सीखने में, बच्चों की मदद कैसे करनी चाहिए ? बच्चों के बारे में उनका क्या कहना है जिन्होंने बच्चों के साथ लम्बे समय काम किया है ? यह समझने के लिए वसीली सुखोम्लीन्सकी की पुस्तक ’’बालहृदय की गहराईयाँ ’’ सभी ने पढ़ी। इस पुस्तक के एक-एक अध्याय में लेखक ने क्या कहा है इसे पढ़कर सभी ने बारी-बारी से अपने विचार प्रस्तुत किया। यह काम शुरुआत में हम सभी को बहुत कठिन लगा क्योंकि इस तरह की शिक्षा शास्त्रीय पुस्तक हम पहली बार पढ़ रहे थे और उसे सबके बीच प्रस्तुत कर रहे थे। संस्था के ऑफिस में एक छोटा पुस्तकालय भी था परन्तु हम उसमें से पुस्तकें लेकर नहीं देखते थे। एक बार जब हम कक्षा 1 से 5 तक की पुस्तकों का अवलोकन व विश्‍लेषण कर रहे थे तब हमने राजस्थान के शिक्षाक्रम व पाठ्यपुस्तकों को पहली बार देखा। मीना स्वामीनाथन की ’खेल क्रियाएँ’ व ’अरविंद गुप्ता’ की कबाड़ से जुगाड़ पुस्तकें काम में लीं। पुस्तकों को काम में लेने की आवश्‍यकता यहीं से आरम्भ हुई।
हमें अपने समाज, बच्चों को समझने, पाठ्यक्रम को पढ़ने, समझने, पुस्तकों पर काम करने के पर्याप्त अवसर मिले परन्तु यह ऐसा प्रशिक्षण नहीं था कि जिसके बाद हम कह सकें कि अब हम प्रशिक्षित हो गए हैं। हमारा प्रशिक्षण सतत सीखने का एक आरम्भिक हिस्सा था। हम सप्ताह के  शुरुआत में 5 दिन बच्चों के साथ काम करते और छठे दिन ऑफिस में कार्यशाला करते थे। जिसमें हम बच्चों के साथ किए गए काम को रिपोर्ट के रूप में लिखकर लाते थे। हमारे समूह में कितने बच्चे हैं ? इस सप्ताह बच्चों की नियमितता कितनी रही ? क्या-क्या काम किया गया ? नया काम क्या किया ? क्या दिक्कतें आईं ? क्यों आईं ? उन पर क्या प्रयास क्या किए ? यह सब बातें जवाबों के साथ होती थीं। जिससे यह स्पष्ट होता था कि जो कुछ हम कर रहे हैं उसके पीछे हमारी समझ क्या है ? सबके पास अपने तर्क होते थे। तर्क गलत भी हो सकते थे, इसकी पूरी आजादी थी इसलिए सही तक पहुँचने की पूरी सम्भावना थी। पढ़ी गई रिपोटर्स पर बातचीत होती थी।
इस तीन माह के प्रशिक्षण में, पहले महीने में 7 दिन और तीसरे महीने 15 दिन के लिए प्रशिक्षण को आवासीय भी रखा गया था। हम सभी ऑफिस में ही रहे। मिलकर सफाई करते, खाना बनाते, मिलकर उपसमूहों में शैक्षिक काम करते और देर रात तक बातें करते। मैंने अपने ऑफिस के लिए एक वॉल हैंगिंग, स्टेशनरी का सामान रखने के लिए मशीन से सिला और उसे गोटे से सजाया। त्यौहार पर मैं सबके लिए कभी हलवा, सलाद तो कभी अच्छा सा कुछ खाने के लिए बनाकर ले जाती। हम बहुत सी बातें आपस में साझा करते। हमें एक-दूसरे पर विश्‍वास भी होने लगा और हमारे बीच रिश्‍ते और गहरे होते गए। जो कि आज भी बहुत मजबूत हैं। वहाँ बने रिश्‍ते संस्था छोड़ने के बाद भी खत्म नहीं हुए।
जब प्रशिक्षण का अंतिम दिन आया और अगले दिन से हमें बस्ती में पढ़ाने जाना था तो मैंने कहा, ’’योगेन्द्र जी आपने हमारी ट्रेनिंग तो बहुत अच्छी की परन्तु यह तो बताया ही नहीं कि पढ़ाना कैसे है ?’’ इस पर उन्होंने कहा बस यही है ट्रेनिंग। बाद में समझ आया कि यदि वे हमें कोई एक तरीका बता देते तो शायद हम उसे ही अन्तिम मान लेते। स्वयं सोचते, देखते नहीं।
इस प्रशिक्षण ने मेरे दिमाग में हलचल शुरू कर दी थी, सवाल उठाने का साहस भर दिया था, चुनने का अधिकार लेने का संकेत दे दिया था, मैं एक स्वचेता इंसान बनने की ओर जा रही थी।
बच्चों के बीच
प्रशिक्षण के बाद हमने बच्चों के साथ काम करना आरम्भ किया। मैं गुरुतेग बहादुर बस्ती में जाने लगी। इस बस्ती में सिक्ख समुदाय के लोग रहते थे। हमने बच्चों और बस्ती के लोगों से सम्पर्क किया। बच्चों के साथ काम उनकी आयु और स्तर को देखते हुए समूह बनाकर किया। प्रत्येक समूह में लगभग 20 बच्चे थे। सबसे बड़ा समूह 9 से 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों का था। मैं इस समूह के साथ काम करने लगी। वहाँ अलग से बोधशाला के लिए कोई स्थान नहीं था। बच्चों को पढ़ाने का काम गुरुद्वारे के बगल में खाली पड़ी जगह और सामने किया जाता था। इस बस्ती में अधिकांश बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। हम तीन शिक्षक थे। बच्चों के हमने तीन समूह बनाए। काम के लिए एक समय सारिणी बनाई। जिसमें छह घण्टे बच्चों के साथ काम करना होता था। सबसे पहले हम बोधशाला में आकर सफाई करते। हमें सफाई करते देख बच्चे भी हमारे साथ सफाई करवाते, दरी बिछवाते। सामग्री व्यवस्थित करते। बस्ती की एक महिला पीने का पानी टंकी में भरती थी।
सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक कहानी,अभिनय, पुस्‍तकालय, हिन्‍दी, अँग्रेजी,गणित, पर्यावरण, हस्‍तकार्य और खेल के पीरियड होते थे।  
मैं हर दिन, समूह में किए जाने वाले काम की योजना बोर्ड पर लिख देती थी। बच्चे उसे पढ़ने का प्रयास करते थे ? बच्चों को पता होता था कि आज वे क्या-क्या करेंगे ?  शुरुआत में यह मैं उन्हें पढ़कर भी बताती थी। जो बच्चे नहीं पढ़ना जानते थे उनके लिए चित्रों वाली किताबें थीं। पुस्‍तकालय में कहानियों, कविताओं की लगभग 60-70 पुस्तकें थीं। जब बच्चों ने ये सभी पुस्तकें पढ़ लीं तो दूसरी बोधशाला के बच्चों को ये पुस्तकें देकर उनकी पुस्तकें हमने अपनी बोधशाला के बच्चों के लिए ले लीं। हम बच्चों के स्तर की पुस्तकें लेकर बच्चों के सामने रख देते थे। बच्चे स्वयं अपनी पसंद की पुस्तकें चुनते। पेज पलटते, चित्र देखते।  हम उनमें से कहानियाँ व कविताएँ सुनाते। इससे बच्चों का पुस्तकों से एक रिश्‍ता बनने लगा। बच्चे अनुमान से मोटे अक्षरों की पुस्तकों को चित्र की मदद से पढ़ने का प्रयास करने लगे। पुस्तकालय की इन पुस्तकों पर मैं व बच्चे प्लास्टिक के कवर चढ़ाते, पुस्तकों को जमाते। समूह में बच्चे पुस्तकें एकत्र करने, पेंसिल, हार्डबोर्ड देने-लेने जैसे काम करने में मेरी मदद करते। पुस्तकालय की पुस्तकों को हम कई प्रकार से काम में लेते। जैसे कभी कहानी सुनाने में। जब कहानी सुनाते तो उसके पात्रों और घटनाओं पर भी बात करते, सभी बच्चों को चित्र दिखाते हुए कहानी सुनाते। कभी-कभी बच्चे पसन्दीदा कहानी सुनाने की मांग भी करते।
कहानी पर अभिनय भी करवाया जाता। कक्षा में काम करने की प्रक्रिया में ही आनन्द गुंथा हुआ था। ऐसा नहीं था कि पढ़ते समय तो कक्षा गम्भीर बनी रहे और खेल के समय ही बच्चे खुश महसूस करें। बच्चे धीरे-धीरे समझने लगे कि काम ठीक से करने के लिए कुछ व्यवस्थाओं की जरूरत होती है। वे स्वयं धीरे-धीरे अनुशासित होने लगे और मुझे काम करने में सहयोग करने लगे। बच्चों और मेरे बीच आत्मीय रिश्‍ता बनने लगा था।
भाषा में काम करने के लिए कोई एक ही तरीका काम में नहीं लिया था। मैंने बच्चों से चित्र बनवाए और नाम लिखने को कहा। जब बच्चे अपना नाम नहीं लिख पाते तब मैं कागज पर उनका नाम लिखती। ऐसा तीन-चार बार करने के बाद बच्चे अपना नाम स्वयं लिखने लगे। इसके बाद मैंने बोर्ड पर सभी बच्चों के नाम लिखकर उनसे अपना व अपने 1-2 दोस्तों का नाम ढुँढवाया। बच्चों ने अपने-अपने नाम ढूँढकर बताए। इसके बाद उनके परिवार में जितने सदस्य हैं या जो-जो उनके घर में रहते हैं उनके चित्र बनवाए। चित्रों के नीचे मैंने उनके परिवार के सदस्यों के नाम लिखे। कुछ दिनों के बाद बच्चे हिन्दी के कुछ-कुछ वर्णों को पकड़ने लगे फिर उन वर्णों को जहाँ देखते उन्हें लगता कि यह तो उन्हें आता है तब वे लिखे शब्‍दों को पढ़ने का प्रयास करते। मैंने वर्णमाला चार्ट से वर्ण भी पढ़वाए। कुछ शब्‍द चित्र कार्ड भी बनाए जिनसे बच्चे चित्र की मदद से शब्‍द को पढ़ने लगे। जब बच्चों को अपना नाम हिन्दी में लिखना आ गया तब वे मुझसे कागज या स्लेट पर अँग्रेजी में अपना नाम लिखवाते। बच्चे जल्दी से जल्दी अपना नाम अँग्रेजी में लिखना सीख लेना चाहते थे। जब वे अँग्रेजी में अपना नाम लिख लेते तब उन्हें बहुत खुशी होती थी। इस प्रकार एक से अधिक तरीकों से बच्चों के साथ पढ़ने-लिखने पर काम किया गया। बीच-बीच में बच्चों के साथ श्रुतलेख का भी काम करवाया।
बच्चे जब कुछ लिखने लगे तब उनसे कहा कि जो तुम्हारे मन में आ रहा है वह लिखो। पहले वे सोचते कैसे लिखें ? इस पर मैं उनसे किसी त्यौहार या उनकी बस्ती में घटी किसी घटना के बारे में बात करती तो वे बताते फिर मैं कहती कि अब इसी बात को लिख दो। अब बच्चे अपनी बात लिखने की शुरुआत करने लगे। शुरुआत में उनकी लिखावट में वर्णो की बनावट बहुत ठीक नहीं थी, वे सीधी पंक्ति में भी नहीं लिखते थे। धीरे-धीरे, उनके वर्णों की बनावट में सुधार आता गया। बच्चों को श्रुतलेख लिखवाकर मैं बोर्ड पर लिख देती तब बच्चे स्वयं उसमें से देख-देखकर अपने शब्दों को ठीक करते। वे ईमानदारी से कहते कि मेरे पाँच शब्द गलत हैं, मेरे नौ शब्द गलत हैं। बच्चों के साथ काम करने के नए-पुराने तरीके काम में लेने की हमें पूरी आजादी थी परन्तु वह क्यों करवाया ? इसके पीछे क्या आधार था ? उसे हमें ध्यान में रखना होता था। कभी-कभी गलत भी कर बैठते थे परन्तु उसे गलती की तरह नहीं लिया गया। उसे एक सीखने की प्रक्रिया के रूप में ही लिया गया। साप्ताहिक बैठक में जब हम रिपोर्ट लिखकर ले जाते तब उस पर बात होती तो लगता कि इसमें यहाँ यह चूक हुई या इसको ऐसे भी किया जा सकता था।
अँग्रेजी विषय में हम कुछ अँग्रेजी की राइम्स हाव-भाव से करवाते। छोटी-छोटी कहानियाँ सुनाते। निर्देश देते हुए गो-कम, इन- आउट, थैंक्यू जैसे शब्द काम में लेते। कभी-कभी ए बी सी डी भी सिखाते। बच्चे अँग्रेजी भाषा तो नहीं सीख पाए क्योंकि हमारी कक्षा का यह माहौल नहीं था और न ही अँग्रेजी मुझे बोलनी आती थी परन्तु बच्चों में आत्मविश्‍वास पैदा हुआ कि वे अँग्रेजी के कुछ शब्द जानते हैं।
गणित में गिनने का काम हम ठोस चीजों, जैसे कंकर, माचिस की तीलियों से करवाते थे। लगभग आधे बच्चे 100 तक गिनना जानते थे। लिखना भी कुछ बच्चों को 40 - 50 तक आता था। वे 11 की लाइन में पहले 1-1 उन्नीस तक लिखते फिर उसके सामने 1-2-3 लिखते थे। वे कभी - कभी 69 को 96 भी लिखते थे। कुछ बच्चे 59, 69, 79 और 89 में भी अन्तर नहीं कर पाते थे। इन बच्चों के साथ ठोस से गिनते हुए और 11 को दस एक ग्यारह बोला जिससे उन्हें बोलने में ही पता चले कि इसमें एक दस यानि एक दहाई है और 1 इकाई है इसमें। बच्चे मेरे साथ - साथ 1 से 9 तक 1-1 कंकर उठाते जाते। इसके बाद बोर्ड पर चित्र बनाकर बताया गया। एक फूल, दो पेड़, तीन गिलास फिर उन चित्रों के सामने 1-2 -3 लिखा। लिखने में 1 से 9 तक की अंकाकृति को लिखकर बताया। 10 में 10 तीलियों का एक बण्डल है इसलिए 1 बण्डल के लिए लिखा है और उसके सामने 0 खुली तीली कोई नहीं है इसलिए 0 लिखा है। इस प्रकार 10 लिखना उसके मान के साथ बताया गया, 11 में 10 तीलियों का एक बण्डल और 1 तीली खुली है और 12 में 10 का एक बण्डल और 2 तीलियाँ खुली हैं इस प्रकार गिनते हुए 100 तक बच्चों को गिनती गिनने और लिखने का काम करवाया। बच्चों ने बड़ी ही जल्दी गिनती और फिर जोड़-बाकी, गुणा-भाग सीख लिए।
पर्यावरण अध्ययन में, मैं त्यौहारों पर बात करती। साफ-सफाई पर बात करती। छोटे-छोटे प्रयोग करती और बच्चों को पहाड़ पर घुमाने लेकर जाती। वहाँ हम पेड़ों के बारे में बात करते। बच्चे भी मुझे वहाँ के पेड़ों के बारे में बताते तो कुछ के बारे में मैं उन्हें बताती। हम खूब सारी अनौपचारिक बातचीत भी करते। कभी-कभी पार्क में जाते। वहाँ बच्चे बहुत सारे खेल खेलते।
हस्तकार्य में हम बच्चों के साथ बहुत तरह का काम करते थे कभी कोलाज बनाना, कभी चित्र बनाना तो कभी कागज मोड़कर पटाखे, नाव, फूल आदि बनाना। बच्चों को मनचाहे चित्र बनाने की छूट थी। इस प्रकार का काम वे 4-5 उपसमूहों में बैठकर करते। वे हार्डबोर्ड पर कागज रखकर पैंसिल से चित्र बनाकर रंग भरते। मैं मोम के रंग प्लास्टिक की प्यालियों में बीच में रख देती। बच्चे रंग भरकर, रंगों को प्यालियों में रखते जाते थे। जब मैंने बच्चों के साथ काम करना आरम्भ नहीं किया था तब सोचती और डरती थी कि कच्ची बस्ती के लोग चोर होते हैं। वहाँ के बच्चे पैंसिल और रंग वगैरह नहीं चुरा लें। परन्तु जब बच्चों के साथ काम किया तो जाना कि कच्ची बस्ती के लोग या बच्‍चे चोर नहीं होते हैं। बच्चों को विश्‍वास होता था कि पैंसिल, रंग सबके लिए हैं, सबको मिलेंगे। आज रखकर जाएँगे और जब कल आएँगे तो दीदी कल भी हमें काम करने के लिए पैंसिल और रंग दे देंगी। बच्चों के साथ काम करते हुए मैंने बच्चों और अभावों में जीने वाले लोगों पर भरोसा करना सीखा।
हम बहुत तरह के खेल खेलते। बच्चों के साथ काम करते हुए ही बहुत सारी छोटी-छोटी चीजों ने मेरे अन्दर बदलाव किए जैसे मैंने कभी यह नहीं कहा कि चलो तुम रुमाल झपट्टा खेल खेलो। हमेशा मुँह से यही निकला, ’’चलो अपन रुमाल झपट्टा खेल खेलते हैं।’’ बच्चों के साथ किए जाने वाले हर काम में मैं शामिल थी। जो कि मेरी बातचीत में भी मुझे महसूस होता था। खेल खेलते समय बच्चे नियमों का ध्यान रखते थे। यह मेरा ही काम नहीं था कि मैं किसी को आउट कहूँ। बच्चे और मैं अलग-अलग धुरी नहीं थे। जहाँ तक मुझे याद है किसी बच्चे ने कभी यह नहीं कहा कि मैं इसके साथ नहीं खेलूँगा।(यह फोटो बोध शिक्षण समिति,जयपुर के सौजन्‍य से)
आकलन,अनुशासन
हर रोज तीन बजे के बाद हम बच्चों द्वारा किए गए काम को जाँचते, अगले दिन किए जाने वाले काम की योजना बनाते और आवश्यक सामग्री का निर्माण करते। जो बच्चे नियमित नहीं आ रहे हैं या उस दिन शाला नहीं आए हैं उन बच्चों व उनके माता-पिता से सम्पर्क करने जाते। हर तीसरे महीने मूल्यांकन प्रपत्र में लिखते कि बच्चों ने सभी विषयों में क्या-क्या सीखा है। प्रपत्र के पहले कॉलम में बच्चे के स्तर को लिखते दूसरे कॉलम में उसके साथ जो काम किया उसमें वह कितना कर लेता है उसे लिखते और तीसरे कॉलम में आगे उसके लिए क्या योजना है।  बच्चा क्या नहीं कर पाया है यह नहीं लिखते थे। न ही बच्चों के माता-पिता से यह कहते कि उनका बच्चा क्‍या नहीं कर पाता है। हाँ,उनसे ही पूछते कि उनके बच्चे के बारे में उनका क्या कहना है? हम यह बताते कि आपका बच्चा क्‍या काम कर लेता है या सीख चुका है। अधिकतर बच्चों के माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे परन्तु वे इतना तो समझते ही थे कि अब उनका बच्चा किताब पढ़ लेता है या रुपये-पैसे गिन लेता है। विषयों के अतिरिक्त यह भी लिखते कि उसके व्यवहार, नियमितता, रुचियों, अनुशासन में भी क्या स्थिति है ? किसी बच्चे ने कोई शैतानी की या वह पढ़ने में ध्यान नहीं लगाता तो भी उसके माता-पिता से कभी शिकायत नहीं करते थे। उस बच्चे से ही बात करते। उसे ही अधिक समझने की कोशिश करते। गुरुद्वारे में महिलाएँ और पुरुष हमसे कभी-कभी शिकायत करने आ जाते। उनका कहना था कि हम बच्चों को मारते-पीटते क्यों नहीं हैं ? बच्चे हमसे डरते क्यों नहीं हैं? कभी-कभी तो वे हमें अनुशासित शिक्षक भी नहीं समझते थे। उनका मानना था कि शिक्षकों को तो बच्चों को कैसे भी कंट्रोल करना ही चाहिए।
बच्चों और हमारे बीच बहुत ही अच्छे सम्बन्ध हो गए। शुरुआती दिनों में हम खूब गीत-कविताएँ गाते, अनौपचारिक बातचीत करते तो बच्चों को खूब अच्छा लगता। हमसे कोई बच्चा डरता नहीं था। बच्चों की छुट्टी होने के बाद भी वो हमें छोड़कर नहीं जाते और वहीं धमाचौकड़ी करते रहते। हम बस्ती में पहुँचते तब हमसे पहले ही बहुत से बच्चे वहाँ होते। बच्चों के साथ गीत-कविताएँ गाने का काम, सभी समूहों को एकसाथ बिठाकर करते थे। पहले एक पंक्ति हममें से कोई एक साथी गाता फिर बच्चे और शिक्षक उसे दोहराते। धीरे-धीरे बच्चों को कुछ बालगीत व कविताएँ याद हो गए। वे मजे से इधर-उधर खेलते हुए भी गाने लगे। कहानी सुनाने और अभिनय करने का काम हम बच्चों के साथ अपने-अपने समूह में ही करते थे क्योंकि बच्चों के स्तर अलग-अलग थे। शाला में घण्टी बस शालारम्भ के समय ही लगाई जाती थी। एक शिक्षक के पास एक समूह में काम करने की जिम्मेदारी थी। योजना में सभी विषय शामिल किए जाते थे। यदि किसी विषय में काम दूसरे विषय के चलते नहीं हो पाया या कम हुआ उसे दूसरे दिन करने का प्रयास किया जाता था। परन्तु ऐसा क्यों हुआ इसे हम साप्ताहिक रिपोर्ट में अवश्‍य लिखते थे। जिससे स्थितियाँ समझने में मदद मिलती थी।
शिक्षिका नहीं, दोस्‍त  
शुरुआती दिनों में बच्चों के साथ अनौपचारिक बातचीत बहुत होती थी। सुचारु रुप से काम करने के लिए आवश्‍यक नियम भी बच्चों के साथ मिलकर ही बनाए जाते थे। समूह में बच्चे व हम सभी दरी पर नीचे घेरा बना कर बैठते थे। शुरुआत में बच्चे बहुत शोर भी करते थे। काम करते समय वे बीच-बीच में बोलते या आपस में झगड़ा करते तब मैं कहती कि, ’’अच्छा अब तुम बोलो मैं चुप होकर बैठ जाती हूँ ।’’ तो कुछ बच्चे शोर मचाने वाले बच्चों को चुप करते हुए कहते कि, ’’ओए तू चुप हो जा,दीदी को कहने दे।’’ बच्चे हमें ’दीदी’ और ’पुरुष’ शिक्षकों को सर बोलते थे, परन्तु बातचीत में तू ही कहते थे। धीरे-धीरे बच्चे हमें ’आप’ कहकर भी सम्बोधित करने लगे। हम शिक्षक सदस्य आपस में आप कहकर ही बात करते थे और शायद उन्होंने किसी और को भी आप कहकर बात करते हुए भी सुना हो।
जब कभी उनमें आपस में लड़ाई हो जाती तब वे कभी-कभी एक-दूसरे को गाली भी दे देते थे। जब बच्चों से मैं बात करती तो उन्हें लगता कि दीदी क्या सोचेंगी या सबके सामने बात करेंगी तो बच्चे कागज के छोटे टुकड़े पर गाली लिखकर उस बच्चे के पास डाल देते। इस पर जब बात होती कि यह किसने लिखा ? तो बच्चे ही कहते, ’’दीदी राइटिंग मिला लो।’’ जब इस पर बात होती कि यह लिखने से क्या होगा ? जिसने लिखा उसे कैसा लगा ? जिसके लिए लिखा उसे कैसा लगा बताओ ? तो बच्चे कहते बुरा लगा। कुछ बच्चे गाली बोलते हुए शर्माते भी थे। उन्हें लगता था कि यह गन्दी बात है। धीरे-धीरे बच्चों का गाली लिखना व बोलना बन्द हो गया। बच्चों के बीच ऐसा विश्‍वास था कि दीदी किसी की तरफदारी नहीं करेंगी। दोनों से बात करेंगी और जिसकी गलती है, उससे पूछेंगी कि उसने ऐसा क्यों किया ?
एक बार मेरे पैर में फ्रैक्चर हो गया तब मैं 40 दिन अवकाश पर रही। मेरे समूह के 15-20 बच्चे मेरे घर 3 किलोमीटर पैदल चलकर मुझसे मिलने आए। वे बच्चे मेरे लिए चिट्ठी भी लिखकर लाए। एक बच्चे ने अपनी चिट्ठी में लिखा, ’’दीदी आप रोना मत, आप ठीक हो जाओगी।’’ वह पढ़कर सचमुच मुझे रोना आया था। उस समय मेरे मन में बात आई  कि, ’’शिक्षक बच्चों को जितना प्यार करते हैं, बच्चे उससे कहीं ज्यादा अपने शिक्षक को प्यार करते हैं।’’
मेरे विवाह के समय मैंने चार दिन की छुट्टियाँ लीं। इन चार दिनों की मैंने बच्चों के साथ मिलकर योजना बनाई। जब मैं वापिस लौटी तो शायद ही कोर्इ काम था जो बच्चों ने नहीं किया। बच्चे धीरे- धीरे स्वअनुशासित होते गए। कोई अनुशासन उन पर थोपा हुआ नहीं था। बच्चे नियम बनाने में भागीदारी निभाते थे। हर काम में भागीदार बनते थे। इसलिए उनको स्कूल से और मुझसे, दोनों से लगाव था। समुदाय में एक बार एक लड़के ने जब मुझे कुछ अपशब्द कहे तो उसकी माँ ने उसे बहुत मारा और कहा कि, ’’ये हमारी बेटियाँ हैं, हमारे बच्चों को पढ़ाने आती हैं।’’
स्वयं में बदलाव
बच्चों के साथ काम करते हुए मैंने स्वयं बहुत सीखा। समुदाय में अभिभावकों को लगा कि उनके बच्चे तेजी से सीख रहे हैं तो उन्होंने यह भी कहना बन्द कर दिया कि इनको मारा करो, इनको कंट्रोल में रखो। समुदाय में सभी महिलाएँ पंजाबी भाषा बोलती थीं परन्तु गुरुमुखी लिखना नहीं जानती थीं। उन्होंने गुरुमुखी लिखना सीखने की इच्छा जताई। इसलिए मैंने गुरुमुखी लिपि लिखना सीखा और फिर महिलाओं को गुरुमुखी लिखना सिखाया।
मैं जब बस्ती में पहली बार आई थी तो मैंने देखा कि महिलाएँ सलवार घुटने तक चढ़ाकर हैंडपम्प पर पानी भर रही थीं। यह देखकर मुझे लगा था कि, ’’बस्ती की औरतों को शर्म नहीं होती है।’’ हमारे घर तो पानी के लिए नल लगे थे। उस समय मैंने यह नहीं सोचा कि यदि सलवार नीची रहेगी तो पानी में नहीं भीग जाएगी क्या ? यहाँ काम करने में शर्म से ज्यादा सहूलियत का मामला था परन्तु इतनी संवेदनशीलता मुझमें नहीं थी। अब ऐसी बातों को इस नजरिए से भी देखती हूँ।
पिछले 24 वर्षों से मैं सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाओं से जुड़ी रही हूँ। समय पालन मुझमें इस कदर आ गया है कि अब कार्यस्थल पर ही नहीं विभिन्न समारोहों में भी समय पर पहुँच जाती हूँ। बचपन में सजा या पिटाई के डर से स्कूल में समय पर जाती थी। ’बोध’ में काम करते हुए कार्यस्थल पर समय पर पहुँचना व्यवहार में आया। स्वयं ही इस बात को महसूस किया कि समय पर क्यों नहीं पहुँचना चाहिए।
बच्चों के साथ काम करते हुए यह विश्‍वास बना कि यदि स्वतंत्रता मिले तो सब अपनी पूर्ण क्षमताओं का प्रयोग करते हुए स्वअनुशासित होते हैं। इसलिए अपने बच्चों को भी पढ़ने, विषय चुनने की आजादी दी। यह समझ में आया कि बच्चे, बच्चे ही नहीं एक व्यक्ति भी हैं। बच्चों को पढ़ाते समय या अपने घर के बच्चों को कभी किसी तरह का दण्ड नहीं दिया। अपने बच्चों से कभी अपेक्षाएँ नहीं कीं, कि उन्हें यही विषय पढ़ना है या बड़े होकर यह बनना है। मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी रुचि के काम या विषयों में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। सबकी क्षमताएँ अलग-अलग होती हैं। मेरे घर के बच्चे स्वः अनुशासित और संवेदनशील बने हैं।
आसपास की दुनिया में कितने ही सारे अंधविश्‍वासों और रुढ़ियों पर सवाल मेरी जेहन में उठने लगे। इन पर सवाल उठाते हुए मैंने अपने जीवन को स्वयं अपने तौर तरीकों से जीने के लिए चुना। विरासत में मिली परम्पराओं में विवाहित होने के प्रतीक चिह्न नहीं रखना और विवाहित होने के बाद स्वयं का उपनाम नहीं बदलना जैसी चीजें मेरे व्यवहार में आईं। विभिन्न धार्मिक आडम्बर, जातिगत भेदभाव, रुढ़िगत परम्पराओं को मैंने पूरी तरह से नकारा। मैं वंचितों की स्थितियों और पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनी और कविताएँ लिखने लगी। मेरी कविताएँ विभिन्न भेदभावों पर सवाल उठाती हैं, वे वंचितों की आवाज हैं। (फोटो 'बोध शिक्षा समिति' जयपुर के सौजन्‍य से)
आज मैं अपने को एक मजबूत शख्सियत के रूप में देखती हूँ और यह कहती हूँ कि ’’यदि मैंने बोध में काम नहीं किया होता, तो मैं आज जैसी हूँ वैसी नहीं होती।’’ आज भी मूलतः मैं अपने को एक शिक्षिका के रूप में ही स्वीकार करती हूँ।

अनुपमा तिवाड़ी, सन्दर्भ व्यक्ति, हिन्दी, अजीम प्रेमजी फाउण्‍डेशन, टोंक, राजस्थान 

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