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Thursday, May 01, 2014

मैं रोज़ उदित होती हूँ ( माया एंजेलो का विद्रोही जीवन )


"मैं रोज उदित होती हूँ"
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एफ्रो -अमेरिकी लेखिका माया एंजेलो के जीवन पर विपिन चौधरी द्वारा लिखी किताब हाल ही में दखल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है | माया एंजेलो के संघर्षमय जीवन से जुड़े हर पहलुओं को संकलित कर विपिन ने हिंदी पाठकों को एक नायाब तोहफा दिया है |

किताब के कुछ रोचक अंश और किताब पर लिखी प्रसिद्द कवयित्री डॉ सविता सिंह जी की भूमिका आप सब फरगुदिया पर पढ़ सकतें हैं | लेखिका विपिन चौधरी को बहुत बधाई के साथ उनका पुनः स्वागत है फरगुदिया पर ...!


मैं रोज़ उदित होती हूँ

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माया एंजेलो के जीवन पर एकाग्र किताब ' मैं उदित होती हूँ' के तीन अलग-अलग अध्यायों के कुछ अंश


1.

बच्ची माया खुद नक्सली भेदभाव के अनुभवों से दो-चार होने के बाद बुरी तरह हिल गयी. वह यह समझने की कोशिश करती रही कि अश्वेत होना इतना कष्टदायक क्यों है. एक बार माया के दांत- दर्द के इलाज़ करने से श्वेत डाक्टर ने यह कह कर साफ़ मना कर दिया कि मैं अश्वेत लोगों का इलाज़ नहीं करता. इस घटना ने माया एंजेलो के कोमल मस्तिष्क पर बुरी तरह से प्रहार किया. इन घटनाओं से माया और भी उदास और गम्भीर होती चली गयी.

2 .


जिस घड़ी माया ने अपने गर्भधारण के भेद को अपनी माँ और सौतले पिता के सामने खोला तो उन दोनों में से किसी ने कोई हंगामा नहीं किया. बल्कि दोनों ने माया को जीवन के इस नए पड़ाव के लिए हिम्मत बंधाई। माया को उनके आश्वासन से बहुत बल मिला और उन्होंने अपने मन में ठान लिया कि इस बच्चे के जन्म के बाद का सफर वह अपने बूते ही तय करेंगी. माया एंजेलो के जीवन की यह ऐसी घटना थी जिस का असर उनकी पूरी जिंदगी पर पड़ना था. इस घटना के असर से उनका पूरा का पूरा जीवन प्रभावित हुआ भी और उनमें अपने जीवन की डोर स्वयं थामने की हिम्मत भी आती चली गयी.

3.

वर्ष १९६९ का वह दिन माया एंजेलो के जीवन में अद्भुत मोड़ ले कर आया था जब एक डिनर पार्टी में माया एंजेलो के करीबी लेखक दोस्त जेम्स बाल्डविन, कार्टूनिस्ट ‘जूल्स फेइफ्फेर’ और उनकी पत्नी, प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थान ‘रेण्डम हाउस’ के मालिक रोबर्ट लूमिस एकत्रित थे. पार्टी पूरी तरह अपने लय में डूबी हुयी थी, खाना-पीना और बातचीत का दौर एक साथ चल रहा था. तब रेंडम हाउस के सर्वेसर्वा मिस्टर रोबर्ट ने माया एंजेलो के जीवन की विविधताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें अपनी आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित किया,माया को मिस्टर रोबर्ट का यह सुझाव बेहद पसंद आया और उन्होंने तुरंत ही इसके दूरगामी परिणामों पर ध्यान देते हुए अपनी सहज स्वीकृति दे दी. तब माया ने मन ही मन अपने भूतकाल की अनगिनत कतरनों को बारहाँ याद किया और निश्चय किया कि उन्हें अपने जीवन को कागज़ पर जरूर दर्ज़ करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी एक अश्वेत स्त्री के जीवन की विषम परिस्तिथियों को जान सके. अपने जीवन के गुजरे हुए घटनाक्रमों को वर्तमान में बटोर कर, उन्हें माया कागज़ के पन्नों पर उकेरने लगी. निसंदेह, आत्मकथा लेखन का यह काम अतीत की गहरी, काली और तकलीफ़देह गुफा में गुजरने जैसा था. लेकिन माया एक अद्भुत स्मरणशक्ति और जिजीविषा की मालकिन थी जो किसी चीज़ को एक बार ठान लेने के बाद कभी पीछे नहीं हटती थी. एकाग्रचित होकर माया ने अपनी आत्मकथा लिखी और १९६९ में माया एंजेलो की पहली आत्मकथा (आई नौ व्हाय द केज्ड बर्ड सिंग्स) प्रकाशित हुई. इस आत्मकथा के प्रकाश में आते ही माया एंजेलो की ख्याति रातों-रात न केवल देश में बल्कि अंतरराष्ट्रीय कोनों में भी फ़ैल गयी. इस प्रचंड ख्याति से मिले सकारात्मक उत्साह से माया को अपने आगे लेखन के प्रति आश्वस्ति मिली और उन्होंने एक के बाद एक पाँच आत्मकथाओं की लंबी श्रृंखला लिख डाली.



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        विपिन चौधरी द्वारा माया एंजेलो के जीवन पर लिखीं किताब ( मैं रोज़ उदित होती हूँ ) पर प्रसिद्ध कवयित्री, स्त्रीवादी दार्शनिक, राजनैतिक विशेषज्ञ डॉ सविता सिंह क़ी भूमिका |

   कम ही ऐसे दुख हैं इस संसार में जो स्त्री की पराधीनता के दुख से बड़े हों, परंतु दुख यदि एक अश्वेत स्त्री का हो तो उसका रंग और भी गाढ़ा हो जाता है। माया एंजेलो, जो एक महान अश्वेत कवयित्री के रूप में दुनिया भर में पढ़ी और सराही जाती हैं और जिनका जन्म अमेरिका के नस्ल भेदी समाज में 1924 में हुआ, उनके बारे में जानना अमेरिका में बसे अश्वेत लोगों के इतिहास के बारे में भी जानना है। जब माया एंजेलो अभी बहुत छोटी थी तभी उनके माँ और पिता में तलाक हो गया और वे अपने भाई के साथ अपनी दादी के यहाँ रहने के लिए भेज दी गई। दादी रोज़मर्रा की ज़रूरी चीजों की दुकान चलती थी, जिसमें दोनों भाई-बहन उनकी मदद करने लगे. अपनी त्वचा के काले रंग के कारण वहाँ भी स्थितियाँ दुखदाई ही रहीं खासकर छोटी माया को दादी का अपमान बेहद खलता। सात साल की उम्र में माया जब अपनी माँ से मिलने गई तब वे अपने नए प्रेमी के साथ रह रही थीं, उस वक़्त माँ के प्रेमी ने माया का बलात्कार किया। पीड़ा की असंख्य वेदना ने इस छोटी बच्ची को इतना आघात पहुंचाया की वह सालों गुमसुम रही। बाद में माया अपनी आंतरिक शक्ति और ऊर्जा का इस्तेमाल करती हुयी पढ़ाई-लिखाई में जुट गईं और शेक्सपीयर से लेकर स्पेन्सर, चार्ल्स डिकिन्स तक पढ़ डाला। साहित्य ने उनके सम्मुख एक दूसरी दुनिया का पट खोला। बाद में माया के प्रिय कवि लारेंस पॉल डेनेबर, उनकी कविताओं की दुनिया में शब्दों का नया पराग लेकर आये और कुछ ज्यादा ही विशिष्ट फूलों का खिलना संभव हो सका जिसका परिणाम था माया द्वारा दर्जन भर से ज्यादा कविता संग्रहों का लिखना । हार्लेम लेखक संघ से जुड़ी माया एंजेलो लगातार सिविल राइट्स का हिस्सा बनी रही। मार्टिन लूथर किंग और मैलकॉम एक्स के साथ जुड़ी, दुनिया भर में जहां कहीं उन्हें मौका मिला काम करने गयी। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घाना में भी बीता जहां वे अपने एकलौते बेटे को लेकर गयी और उसे वहीं शिक्षित करने का मन बनाया। माया एंजेलो थियेटर से लेकर न्रत्य में भी इसी गंभीरता से जुड़ी रही। उन्होनें कवितायें भी खूब लिखीं. जो सबसे महत्वपूर्ण काम उन्होनें किया वह अपनी आत्मकथा का पाँच खंडों में लेखन, ये आत्म कथाएँ जैसे माया एंजेलो के जीवन का सत्य और इतिहास हो, समय जैसे माया एंजेलो ही जिसने एक ऐसा जीवन जिया जिसमें पीड़ा, संघर्ष और कवितायें एक दूसरे में मिल गयी थी। कविता का एक जीवन अश्वेत स्त्री का परिश्रम, संताप और नक्सली भेदभाव और उस समय में जी रहे, काम कर रहे दूसरे महान अश्वेत लोगों का संघर्ष सब माया की आत्मकथाओं में जगह पाते हैं। माया एंजेलो का जीवन यह भी समझाता है कि सामान्य जीवन की कितनी भी समृद्धियाँ और स्वतंत्रतायेँ कितने ही दूसरे लोगों की दस्ताओं और खून-पसीने से उपजाई गयी हैं। विपिन चौधरी द्वारा माया एंजेलो पर लिखी गयी यह किताब “ मैं रोज़ उदित होती हूँ” बड़े ही यत्न और प्रखरता से लिखी गयी है। हिन्दी पाठकों के लिए यह पुस्तक एक अभूतपूर्व प्रस्तुति है, जिसमें माया के जीवन और उनके संघर्षों को विपिन ने एक स्त्री की निगाह से देखने और समझने की कोशिश की है। उम्मीद करती हूँ कि हिंदी के पाठकों की इसे स्वीकृति मिलेगी और माया का जीवन उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा.

- सविता सिंह





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        बीसवीं सदी  की  सबसे प्रभावशाली अफ्रीकी -अमेरिकी व्यक्तित्वों में से एक  माया एंजेलो,  ने अपने  जीवन  और लेखन से सम्पूर्ण संसार पर एक छाप छोड़ी.  1969  में प्रकाशित  माया एंजेलो  की पहली आत्मकथा, आई क्नो  व्हाई दा केडङ  बर्ड सिंग्स ' अश्वेत समाज के किये यह एक जरुरी किताब आंकी गयी और नामचीन लोगों द्वारा इसकी ताक़ीदगी  की गयी कि सभी जागरूक लोग इसे पढ़ें और खासकर युवतियों को तो इस पुस्तक को  अवश्य ही पढ़ना चाहिए. 1970 में  रैंडम हाउस से प्रकाशित  माया एंजेलो द्वारा लिखित इस  प्रथम आत्मकथा संग्रह  को  राष्ट्रीय अवार्ड से नवाज़ा गया.  द न्यूयॉर्क टाइम्स,  पेपरबैक  नॉन फिक्शन  लिस्ट में  माया एंजेलो की  आत्मकथा  लगातार दो साल तक  बेस्ट सेलर लिस्ट में शामिल की गयी. यह किताब दरअसल  किसी रोमांटिक शिल्प की कारीगरी नहीं था, यह एक स्त्री का जीवन-दर्शन था जो माया एंजेलो  ने स्वयं जीया था  उस वक़्त  जब अश्वेत लोगों  के लिए उन्नति के सभी दरवाज़े, खिड़कियां और रोशनदान  बंद थे.    
उसी अश्वेत समाज में से निकलकर माया एंजेलो अमेरिका  के बौद्धिक समाज में  एक नयी  तरह की  नायिका के रूप में  अस्तित्व में आयी  जो अपने निजी  जीवन को सार्वजनिक करने का  हौंसला रखती थी, जिसने अपने अश्वेत और  एक स्त्री होने का दर्द एक साथ सहा. माया एंजेलो के इस प्रथम आत्मकथा संग्रहकी ऑडियो बुक, ई-बुक के द्वारा पूरे  विश्व में पढ़ी जा रही है. माया एंजेलो की आत्मकथाओ का संसार की कई भाषाओँ में अनुवाद उपलब्ध है.  दुनिया भर ने माया की जीवन-गाथा को  उनकी आत्मकथाओं द्वारा जाना। माया एंजेलो के जीवन में कई  सूत्र  छिपें हैं  जिसमे  स्त्री- जीवन की  सफल- कहानियां दर्ज हैं.  माया एंजेलो  अपने  जीवन की सभी  गलतियों को स्वीकारती है  उन्हें  अपने बगल  में बैठे पुरुष पर  नहीं  धकेल देती.  स्त्री  सशक्तिकरण का  सटीक मुहावरा  माया  एंजेलो  के यहाँ फलित  होता दिखता है.  
माया  एंजेलो ने अपने जीवन में  कई  व्यवसाय  अपनाये  और जम कर काम किया अपने जीवन के सभी  गुण -दोष  को शालीनता से स्वीकार  किया.  
लेखन  के  अलावा, फिल्मों, गीत संगीत, थिएटर  में  माया  एंजेलो ने  खूब काम किया और  इन सभी अभिव्यक्तियों में शामिल होने के परिणामस्वरूप वे  हरफनमौला  व्यक्तित्व बन कर  दुनिया ने सामने आयी.   उनके  व्यक्तित्व के तमाम पक्षों को  लेकर और  उनसे जमे  तामाम पहलू  इस किताब में समेटने की कोशिश की  गयी है , साथ ही उनके  सामाजिक, पारिवारिक  और राजनैतिक सम्बन्ध, उनके द्वारा की गयी देश-विदेश की यात्राएं  और उनके जीवन को घना करने वाले अनेकों प्रसंगों  को  शामिल  करने की कोशिश के परिणाम  स्वरुप माया एंजेलो की यह किताब  लिखनेकी कोशिश की गयी है. माया  एंजेलो की पाक - विद्या की एक विहंगम झलक से पाठकों को रुबरु  करवाने  की कोशिश करते  हुए  एक अध्याय  शामिल किया है.  कविताओं के लिए अलग अध्याय के साथ माया के बाल लेखन  पर भी कुछ लिखने का प्रयास किया गया है,  कुल मिला कर  एक जीवन में कई  जीवन को एक साथ जीने  वाली  प्रसिद्ध  लेखिका को समझने   के क्रम में यह किताब  अस्तित्व में आयी है.  
माया एंजे लो को पढ़ते हुए  उन से सम्बंधित कई चीजें सामने आयी. उन पर  काम करने  के दौरान सबसे बड़ी चुनौती तो  यही थी  कि माया एंजेलो  का  जीवन  और उनकी लिखी आत्मकथाऑ  के बीच  दोहराव न हो  और  यह किताब एक स्त्री की पीड़ा  रुदन न बन कर  रह जाए  बल्कि  जिस तरह  बुलंदी से माया ने  पीड़ा  को  बुनते  हुए अपनी उँगलियाँ मजबूत की उसी तरह एक सशक्त  पुस्तक  हिंदी पाठकों के लिए  तैयार हो सके.  
आशा है जो  पाठक माया एंजेलो  के जीवन के पहलुओं  से रुबरु हो चुके हैं  वे  इसे  दुबारा पढ़ कर  लाभान्वित होंगे  और  नए  पाठक सम्भवतः  माया  एंजेलो  के जीवन  से गुजरते हुए  उस समय  के वातावरण  और स्त्री  के जीवन की  दास्तान  से परिचित  होंगे.   
हिंदी के अलावा  दूसरी हिंदीतर  भाषाओँ में  स्त्री आत्मकथा  लेखन  काफी पहले से  परिपक्व था.  पर  स्त्री का  जीवन  तमाम आधुनिकता के बावजूद  कुछ कदम ही आगे बढ़ सका था.     
1876  में  बंगाली  स्त्री  सरबाशी घोष  द्वारा लिखी गयी जीवनी "बर्ड्स इन अ केज'  से लेकर 1968 में  माया एंजेलो की  आत्मकथा  से लेकर  आज  तक स्त्री के लिए कमोबेश स्तिथियाँ काफी जटिल रही हैं और समय के साथ और जटिल होती जा रही हैं. सामाजिक सरंचना के बदलाव  में  टूट फूट हो रही है उसका खामियाजा स्त्री को ही भुगतना पड़  रहा है.   एक अश्वेत स्त्री के तौर पर जब माया अपने संघर्षों को  लिखती  हैं तो  वह अपने साथ  उन तमाम स्त्रियों  की  दास्तान के कुछ  अशं  अपनी  आत्मकथा में  अन्यास ही ले  आती हैं  जो  उनके समय में अपने जीवन की दुविधाओं से साक्षात्कार कर रही थी.   माया  एंजेलो  का पूरा जीवन  ही  दरअसल  एक दस्तावेज़ है |


- विपिन चौधरी





Monday, October 08, 2012

विपिन चौधरी- स्त्री मुक्ति का विशाल आयतन और उसकी सामाजिक पड़तालें

अपने 50-55 साल के राजनैतिक, सामाजिक एवं साहित्यिक जीवन से गुज़रते हुये रमणिका गुप्ता जी ने स्त्री जीवन के जिन पहलुओं को देखा, परखा और समझा उसका दस्तावेजी रुप अभी लोकार्पित हुर्इ उनकी पुस्तक 'स्त्री मुक्ति: संघर्ष और इतिहास’ में बखूबी पढनें को मिलती है।

इस पुस्तक में इतिहास और वर्तमान में स्त्री मुक्ति की तमाम कुलबुलाहटों से लेकर धर्म, जाति व पितृसत्ता में जकड़ी स्त्री किस तरह अलग-अलग धरातलों पर मुक्ति के सपने देखती है, से लेकर धर्म, पितृसत्ता जाति में जकड़े उस सामाजिक स्तितियोंस्थितियों की विवेचना की है जिसकी भाषा धर्म विरोधी है जो आज की आधुनिक स्त्री की छवि को धूमिल करने में लगा हुआ है।

इस सबके अलावा स्त्रियों की अंर्त व्याख्या जो आज भी जाग्रत नहीं है, जो स्वयं को पुरुष निर्मित कसौटी पर तोलती है, जो नैतिकताओं को अपने पल्लू पर बाँध कर चलती है। क्रमवार व्याख्या समिमलित है।

यह हमारी विडम्बना है कि इसी आधी आबादी को बराबरी का दर्जा दिये बिना इक्कीसवीं सदी, सामाजिक समरसता के उदघोषी नारे के साथ आगे बढ़ रही है। केवल भारत में ही नहीं समूचे विश्व में सबसे खौफनाक आँकडे स्त्रियों के नाम पर ही दर्ज हैं। विकसित देशों में भी आर्थिक भेदभाव और शारीरिक उत्पीड़न की समस्याओं से महिलायें जूझ रहीं हैं। इसी देश में कहा जाता है जेंडर एक पश्चिमी शब्द है। हमारे यहाँ सब ठीक-ठाक है महिलायें आगे बढ़ रहीं हैं। वैज्ञानिक और राष्ट्रपति तक बन रहीं हैं। लेकिन जिस भारतीय समाज में 50 प्रतिशत महिलायें अनीमिया का शिकार हों, जहाँ साफ शौचालयों के लिये महिलाओं को लम्बी चौड़ी मुहिम चलानी पड़े, जहाँ पितृसत्ता के कमजोर प्रभाव वाले आदिवासी क्षेत्रों तक में स्त्री-पुरुष अनुपात चिंताजनक स्थिति में हो वहाँ स्त्री मुक्ति एक (लग्जुरियस थोट) ही समझा जाना चाहिए। जिसे एक छोटा सा वर्ग ही (अफोर्ड) कर सकता है। स्त्री मुक्ति कोर्इ थोपी जाने वाली चीज नहीं है। बिना स्त्री मुक्ति की चेतना के स्त्री सशक्तिकरण की योजनाओं पर काम करने पर अंजाम वही होता है जो ग्राम पंचायतों में आदिवासी को स्थान देने पर हुआ। महिला सरपंच को बुलाने पर उसका पति आपके सामने प्रस्तुत होता है। सरपंच महिला घर के भीतर बाल-बच्चों को संभाल रही होती है। ठीक ऐसा ही हाल महिलाओं को अपने पैत्तिक अधिकारों को देने पर हुआ। महिलायें उस सम्पत्ति पर अपना हक कबूल करने में हिचकती हैं और चुपचाप अपनी जमीन अपने भार्इयों के नाम कर देती है। 

स्त्री मुक्ति एक व्यक्तिगत प्रक्रिया है जहाँ स्त्री एक इंसान के तौर पर अपनी विवेचना कर सामाजिक बंधनों को नकारती है जबकि स्त्री सशक्तिकरण, समाज को साथ लेकर स्त्री के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। इसलिए सबसे पहले स्त्री को अपने ऊपर लगे टैबू से मुक्त होने कि जरुरत है। जिस तरह दो दशक पहले इको-फेमनिजम के जरिए सामाजिक स्तर पर जिस तरह सित्रायाँ जाग्रत हुईं। टैक्नालोजी के जरिये स्त्री चेतना को सूक्ष्म तरीके से प्रस्फुटित होते हुए देखा जा सकता है। शहर की महिलायें ब्लाग्स और सोशल साइटस के जरिये देश-दुनिया से सम्पर्क साध रही हैं वही गाँव की घूँघट ओढने वाली महिलाएं भी फोन पर बातें करती देखी जा सकती हैं। इन परिस्थितियों में घर और घर से बाहर का माहौल भी निश्चित तौर पर बदलता है स्त्री मुक्ति सशक्तिकरण को भी भारत जैसे विविधता वाले देश में कर्इ स्तरों पर लागू किया जाना चाहिए

सशक्तिकरण की अवधारणा हर पीढी के साथ बदल जाती है। 60-70 के दौर की महिलाओं को अपनी पढ़ार्इ के लिये संघर्ष करना पड़ता था आज की पीढ़ी के लिए अपना करियर सबसे महत्वपूर्ण है। आज दूर-दराज़ के गाँव कस्बों में माता-पिता अपनी बेटियों को आगे की पढ़ार्इ के लिये महानगर भेज रहे हैं लेकिन बहुत कम माता-पिता लड़की को अपना जीवन साथी चुनने की इजाजत दे रहे हैं तो यह पीढ़ी इसी संघर्ष के साथ दो-चार हो रही हैं।

इस पुस्तक के पृष्ठ-47 में रमणिका जी स्त्री असमानता की जड़ में धर्म को मान रही हैं पर आज के आधुनिक समय में धर्म को आउट डेटिड माना जा रहा है तो स्त्री के नाम पर यह भारी असमानता कैसे कायम रह गयी है? यह एक विचारणीय प्रश्न है।

आज महिलाओं की स्थिति में जो थोड़ा बहुत सुधार दिखार्इ पड़ रहा है। वे सुधार नहीं आधुनिकता के समांतर आये हुये बदलाव हैं। इन बदलावों ने स्त्री को उसकी गरिमा के साथ न स्वीकार कर कोमोडिटी बना कर पेश किया। काम-काजी स्त्री को सुपर-वुमैन का दर्जा दिया जा रहा है। घर और बाहर की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती स्त्री को देख कर सभी वाह-वाह कर रहे हैं जबकि पुरुष पर वही परम्परागत जिम्मेदारियाँ हैं जिसमें स्त्री को स्त्री का सहयोग न देना भी शामिल है।
पितृसत्ता के चलते स्त्री के प्लस प्वांटस को दबा कर रखा गया जिसमें लड़की होने के लिए जिम्मेदार 'वार्इ क्रोमोसोम का वैज्ञानिक सत्य भी शामिल है। स्त्री मुक्ति से स्त्री सशकितकरण की तरफ जाने वाला मार्ग कठिन जरुर है पर असंभव नहीं। वैसे भीहर संघर्ष भरी जददोजहद की माँग करता है।आज की स्त्री जब घर के भीतर होती है तो उसका संघर्ष वुमैन बनाम वुमैन के बीच होता है। क्योंकि घर में स्त्री मुक्ति, को अपनी माँ, सास, जेठानी अलग-अलग नज़रिये से देखती है और घर से बाहर निकलते ही उसकी मुक्ति का संघर्ष वुमेन बनाम सोसाइटी में तब्दील हो जाता है। वह उस समाज से टकराती है जो अपने काम काज निपटाती, पुरुषों से मेल-मुलाकात करती स्त्री को खुले-सांड की संज्ञा देता है।

रमणिका जी स्त्री को अपने निर्णय खुद लेने के लिये प्रोत्साहित कर रही हैं। वह उस सोशल ट्रैनिका के जरिये ही संभव है जिसकी शुरुआत घर से ही शुरु होती है। स्त्री मुक्ति के इसी क्रम में पुरुषों को बराबर का भागीदार बनाते हुए, हमें उन्हें इस बात का भरोसा दिलवाना होगा की महिलायें पुरुषों से नहीं उनकी नेतृत्व की भावना से पीडि़त है। पुस्तक के पृष्ठ-63 अध्याय में कर्इ बिंदु बताए गए हैं जो लम्बी बहस की माँग करते हैं।


स्त्री संबंधी कानून की जानकारी देता अध्याय पुस्तक का सबसे मजबूत व सुविचारित हिस्सा है।
पुस्तक का लोकार्पण समारोह 5 अक्टूबर को साहित्य अकादमी , दिल्ली के सभागार में साहित्यकार राजेन्द्र यादव की अध्यक्षता में हुआ कार्यक्रम में अर्चना वर्मा , विश्वनाथ प्रसाद तिवारी , निर्मला जैन , गीता श्री , कैलाश वाजपेयी , देवेन्द्र चौबे , महेश भारद्वाज , अनीता भारती , मनीषा पांडे , सुभाष नीरव , पंकज शर्मा , अर्चना वर्मा ने भाग लिया.

प्रारम्भ में लिखे निवेदन में रमणिका जी ने साफ किया है कि चुंकि पुस्तक ने संकलित आलेख समय-समय पर लिखे गये हैं। अत: बहुत स्वाभाविक है कि इनमें कुछ-कुछ बातों में दोहराव हो। अत: इन दोहरावों को इसी तरह लिया जाना चाहिए। स्त्री मुक्ति के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालती।

हरियाणा साहित्य अकादेमी द्वारा प्रेरणा पुरूस्कार से 2007 में सम्मानित युवा कवियत्री विपिन चौधरी हरियाणा के हिसार से है, आलोचक के साथ वो एक अच्छी रचनाकार भी है और कई रचनाओ का प्रकाशन हो चुका है “अँधेरे के मध्य से” (2008) और “एक बार फिर” (2008) उल्लेखनीय हैं। 

पुस्तक : स्त्री मुक्ति: संघर्ष और इतिहास | लेखिका : रमणिका गुप्ता | प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन | मूल्य : 300/- रुपये

तस्वीरें: लोकार्पण: स्त्री मुक्ति: संघर्ष और इतिहास


प्रस्तुति : शोभा मिश्रा व भरत तिवारी

Sunday, June 03, 2012

"फर्गुदिया के नाम - एक शाम " कार्यक्रम में विपिन चौधरी द्वारा सुनाई गयी दो कविताएँ


१ . पीड़ा का फलसफा
 दर्द को मुठ्ठी में कैद कर उसके फलसफे का पाठ

फिर चार- पांच दिन अपने हाल पर जीना
अपने तरीके से जूझना
अभ्यास  करना
सहजता से चाक-चौबंद रहने के लिए
और  सजगता भी ऐसी जो
धूनी की तरह सिर से पाँव तक अपना पसारा जमा ले


पीड़ा को अपनी गोदी में सुलाने के ये दिन
पीड़ा जो पीठ की तरफ से आती
या कभी तलवे से उठान भरती


हर बार दर्द का चेहरा बहुत अलग होता है
हर बार उससे जूझने का तरीका वही


हर दिलासा का दूत एक तरफ से आया
नज़दीक आये बिना पल में हवा हो गया


मानीखेज़ चीजें  गोल दिशा में डूब कर आयी
दुःख, प्रेम, ख़ुशी
फिर ख़ुशी, प्रेम, दुःख
सात राग बारी बारी से जीवन में आये
पर चार दिन वाली  इस सनातन पीड़ा
ने चारों दिशाओं से अपनी बर्छियां  चलायी


महीनें के इन चार दिनों वाली अबूझ पहेली से पहले पहल
परिचय विज्ञान की कक्षा ने करवाया  
जब सर झुकाए
मिस लीला को सुनाते और
सोचते,
 ‘क्या ही अच्छा होता
कि आज  कक्षा में बैठे ये सारे के सारे लडके लोप हो जाते’


फिर एक दिन स्वयं साक्षात्कार हुआ
कई हिदायतों से बचते बचाते
सिर छुपाते
कहर के पंजों के लडते रहने वाले इन दिनों से


खुदा, खुद
औरत की जुर्रत से भय खाता था
सो औरत को औरत ही बनाए रखने की यह जुगत उसकी थी


हम औरतों  के ये चार दिन अपनी देह की प्रकृति से लडते बीतते
तभी जाकर एक जंगली खुनी समुंदर को अपने भीतर जगह देने का साहस
इस आधी आबादी के नाम पर लिखा जा सका


इन चार दिनों में औरत का चेहरा भी
हव्वा का चेहरा के बिलकुल  करीब आ जाता है
हालाँकि  हव्वा भी अब बूढ़ी हो गयी है
इस चार दिनों वाली परेशानी से जूझने वालेउसके दिन अब लद गए हैं


इन्हीं भावज दिनों में अपनी भावनाओं को खोलने के लिए
किसी चाबी का सहारा लेना पड़ता है
कभी ना कभी हर औरत कह उठती है  
’माहिलाओं  के साथ  इस व्यवाहरिक  मजाक  को क्यों अंजाम दिया गया’
फिर एक मुस्कुराते बच्चे की तस्वीर को देख कर
खुद ही वह अपनी सोच वापिस ले लेती है


हर महीने जब  प्रकृति का यह तोहफा  द्वार खटखाता है
तब योनी गुपचुप एक आतंरिक योग में व्यस्त हो जाती है
अपरिहार्य कारणों से
पीड़ा की इस स्तिथी  में भी महिलाओं की उँगलियाँ  मिली  हुई (crossed ) रहती   हैं
जिनकी बीच कस कर एक उम्मीद बेपनाह ठाठे मारती है

यो प्रक्रति का पीड़ादायक रुदन
सहज तरीके से सुरक्षित बना रहता है
संसार की हर औरत  के पास
जब एक स्त्री पांचवे दिन नहा धो कर
आँगन में चमेली की महक के बराबर खड़ी होती हैं तो
प्रकृति  उसका  हाथ और भी मजबूती  थाम  लेती है


२ .चन्द्रो
  (स्तन कैंसर से जूझती महिलाओं को समर्पित) 
चन्द्रो,
यानी फलाने की बहु 
धिम्काने की पत्नी 
पहली बार तुम्हें चाचा के हाथ में पकड़ी एक तस्वीर में देखा 
अमरबेल सी गर्दन पर चमेली के फूल सी तुम्हारी सूरत 
फिर देखी 
श्रम के मजबूत सांचे में ढली तुम्हारी आकृति 
कुए से पानी लाती 
खड़ी दोपहर में खेतों से बाड़ी चुगती 
तीस किलों की भरोटी को सिर पर धरे लौटती अपनी चौखट    
ढोर-डंगरों के लिए सुबह-शाम हारे में चाट रांधने में जुटी  
किसी भी लोच से तत्काल इंकार करती तुम्हारी देह 
इसी खूबसूरती ने तुम्हें अकारण ही गांव की दिलफेंक बहु बनाया 
फाग में अपने जवान देवरों को उचक-उचक कोडे मारती तुम 
तो गाँव की सूख चली बूढ़ी चौपाल 
हरी हो लहलहा उठती 
गांव के पुरुष स्वांग सा मीठा आनंद लेते 
स्त्रियाँ पल्लू मुहँ में दबा भौचक हो तुम्हारी चपलता को एकटक देखती 
                                                                        
अफवाओं के पंख कुछ ज्यादा  ही चोडे हुआ करते हैं 
अफवाहें तुम्हे देख 
आहें भर बार- बार दोहराती 
फलाने की दिलफेंक बहु 
धिम्काने की दिलफेंक स्त्री 
इस बार युवा अफवाह ने सच का चेहरा चिपका 
एक  बुरी खबर दी 
लौटी हो तुम अपना एक स्तन 
कैंसर की चपेट में गँवा कर
शहर से गाँव   
डॉक्टर की हजारों सलाहों के साथ 
  
अपने उसी पहले से रूप में 
उसी सूरजमुखी ताप में 
इस काली खबर से गाँव के पुरूषों पर क्या बीती 
यह तो ठीक-ठीक मालुम नहीं 
उनके भीतर एक सुखा पोखर तो अपना आकार ले ही गया होगा 
महिलाओं पर हमेशा के तरह इस खबर का असर भी 
फुसफुसाहट के रूप में ही बहार निकला 
चन्द्रो हारी-बीमारी में भी 
अपने कामचोर पति के हिस्से की मेहनत कर 
डटी रही हर चौमासे की सीली रातों में 
अपने दोनो बच्चों को छाती से सटाए
निकल आती है 
आज भी   बुढी चन्द्रो 
रात को टोर्च ले कर 
खेतों की रखवाली के लिए  
अमावस्या के जंगली लकडबग्घे  अँधेरे में 

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