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Friday, December 05, 2014

जीवित रहूंगी मैं - निर्मला ठाकुर की कविताएँ



निर्मला ठाकुर की कविताएँ    

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    जब फेसबुक पर सभी वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह की पत्नी निर्मला जी को श्रद्धांजलि दे रहे थे, स्त्रीवादी रचनाकार सुधा अरोड़ा ने निर्मला ठाकुर के बारे में यह लिखा था --
 सब उन्हें कथाकार दूधनाथ सिंह की पत्नी के रूप में ही जानते हैं! बहुत कम लोग जानते हैं कि वे बहुत अच्छी कवयित्री और एक बेबाक समीक्षक भी थीं!  मेरी पहली किताब ''बगैर तराशे हुए'' की पहली समीक्षा उन्होंने ही लिखी थी -- श्रीपत राय सम्पादित ''कहानी'' पत्रिका में -- तब मुझे नहीं मालूम था कि वे दूधनाथ सिंह की पत्नी हैं ! 
बहुत स्नेही माँ और समर्पित पत्नी तो थीं ही! अक्सर अपने नामचीन पतियों के प्रभामंडल से तृप्त पत्नियां, अपने आप को गुमनामी के घेरे में आसानी से सरका देती हैं। निर्मला भाभी ने भी यही किया पर इधर उनका कवि मन बाहर आने को आकुल था। एक बार उन्होंने बताया कि एक हफ्ते में उन्होंने दस बारह कवितायेँ लिखीं। सन 2001 में कथादेश में जब मैंने मन्नू जी के बारे में एक टिप्पणी लिखी थी  ''कलाकार की पत्नी होना अंगारों भरी डगर पर नंगे पाँव चलना है !'' तो उन्होंने कहा - यह हम सब जानते हैं। 
फोन पर उनकी ममतामयी मीठी आवाज़ को भुला पाना मुश्किल है ! 

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    आज जब मध्यवर्ग के परिवारों की हम एक ऐसी पीढ़ी को देख रहे हैं जो घर से बगावत करके वहां की चहारदीवारी से बाहर निकल आई है और बाहर की दुनिया में अपने लिए जगह बना रही है , हम उस पिछली पीढ़ी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते जिसने नई पीढ़ी के लिए यह ज़मीन तैयार की ! वरिष्ठ कथाकार दूधनाथ सिंह की पत्नी निर्मला ठाकुर अपने एकांत में अपनी व्यथा ऐसी कविताओं में रचती रहीं और किताब में छपवा कर चुप हो रहीं ! फेसबुक का एक बड़ा पाठकवर्ग इन रचनाओं से अनजान ही रहा ! फरगुदिया के पाठक पाठिकाएं पढ़ें और देखें कि सीधी सहज शब्दावली के भीतर छिपी परतों में आम औरत की कितनी गाथाएं छिपी हैं ! वरिष्ठ कवयित्री निर्मला ठाकुर को उन्हीं की पंक्तियों के पत्र- पुष्प समर्पित करते हुए यह श्रद्धांजलि !













मध्यमवर्गीय 
परिवार की औरत

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मैं कभी जी नहीं सकी

अपना जीना

बचपन में माँ ने सिखाया

ऐसे जियो

जैसे मैं कहती हूँ

पिता ने

जैसा मैं चाहता हूँ

भाई-

तुझे सबकी सुननी है

मैं सुनती रही सबका कहना

भाग-भागकर पूरी करना

सबकी मांग

पिता को चाय

तो भाई को कॉफ़ी

बहन को दूध की बोतल

तो माँ को पेट का चूरन

सब मर्ज़ की जैसे

मैं ही थी दवा

इन सबके बीच

चूल्हा - चक्की

माँ के बार -बार माँ बनने की त्रासदी में

अपने भाई-बहनों को

सहेजती 


होती गई मैं बड़ी

बीच-बीच

छत के नीरभ्र एकांत में

उड़ान भरते युवा सपने

मामूली थे वे

सपने

नौकरी की इक्षा

आत्मनिर्भरता की चाहत

ऐसा कुछ कर गुजरने की ख़्वाहिश

जो देता संतोष मुझे

और जीना की सार्थकता

देखते ही देखते

पीले हुए हाथ

भर मांग सिंदूर ले

मैं अब पूरी तरह अधिकार में थी

अपने पति - परमेश्वर के

गुलाम

बिन खरीदी

कौड़ियों के मोल ...

उसने कहा

भूल जाओ अपना वह घर बार

अब सब कुछ तुम्हारा

यहीं है

यही है असली घर- ठिकाना

जैसा मैं चाहूँ

उसी तरह जियो ...

देखते-देखते

भूल गई सपने

भूलने की कोशिश की तमाम बरस

जो थे मेरे अपने

भूल गई अपने लिए

जीना

धीरे -धीरे

उतर आई झुर्रियां

शरीर था

थकता गया

बेटा साधिकार बोला एक दिन

माँ, अब मैं हूँ

मेरी ही सुननी होगी बात

जैसा मैं कहूँ -

आह, किस-किस की सुनूँ मैं

जीवन भर सुना ही सूना तो

थक गई हूँ | बेहद

थकान - अथाह

आह, अब तो मांगती हूँ - दुआ

कि मेरे साथ जो हुआ

सो हुआ

पर अगली पीढ़ी की

कोई भी लड़की

कोई भी औरत

अपना जीवन जिए

और अगली सदी में

मेरी तरह

किसी की शर्तों पर
ना जिए |

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जीवित रहूंगी मैं
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जीवित रहूंगी मैं

अपने बच्चों में

बेटी बताएगी अपने बचपन की बातें

जब भी अपने बेटे से

जब

वहीं कहीं मैं भी हूंगी

उन चर्चाओं में

उन यादों में।


बेटियां कभी नहीं भूलतीं

अपनी मांओं को

उनके सुख-दुख को

क्योंकि बेटियां बनती हैं एक दिन

मेरी तरह एक

मां

और मांएं

नानी बन

सजीव हो जाती हैं

किस्से-कहानियों में

जीवित रहूंगी मैं।


संगम की धारा को जब भी देखेगा बेटा

मुझे क्या भूल पाएगा ?

जानती हूं


उसकी स्मृतियों में

मैं

संगम बन रहूंगी

जिसे समय-असमय

उम्र की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते

वह दुहराएगा जरूर।


कल मैं न रहूं

पर रहूंगी जीवित तब भी

उनकी धमनियों में

घुलमिलकर।






वक्त की धार

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कहां से कहां पहुंचा देती है

वक्त की यह धार

एक फूल की तरह खामोश

प्यार!

हवाएं के बीच सहेजने की कोशिश

बार-बार

टूटता जाता है मन का यह

तार

सांझ गिरती है

और उदास

रात चुपके से आती है

और-और

पास।




दाम्पत्य

 
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वे झगड़ते हैं


आपस में लगाते हैं

आरोप-प्रत्यारोप चीखते चिल्लाते हैं

अन्त में बदहवास

थककर

36 की संख्या में

सो जाते हैं(शायद)

लेकिन एक तस्वीर है

ड्राइंग रूम में

जहां वे अभी भी

एक दूसरे को तकते

मुस्कराते विभोर

63 की संख्या में मुखातिब है

कौन सी संख्या सच है

बताएंगे आप!



कोई भी चीज़
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कोई भी चीज़

बेअसर हो ही जाती है।

आख़िरकार

तुम भी।


दुखी होना न तुम्हारे वश में

था

न मेरे।

जीने के लिए

मरना तो पड़ता ही है।

एक न एक दिन

हर किसी को

राह निकालनी ही होती है

एक रोटी

एक घर।


प्रेम

या अविश्वास

कभी न कभी

हर चीज़ बदल जाती है।

तुम भी।

तुम तगड़े हो रहे हो

भविष्योन्मुख।

मैं घरेलू

आत्मोन्मुख।

क्योकि दुखी होना न तुम्हारे वश में था

न मेरे।




बिटिया
-------
फूलों-भरे पेड़ की डाली सी

मेरी बिटिया

हँसती है

होठों से

आँखों से

कपोलों के गहवर से

दूर दिगन्त तक उसकी हँसी फैलती है

और

मीठी खुशबू बिखेरती चली जाती है

इस कमरे, उस खिड़की

इस बिस्तर, उस कुर्सी

किताबें, फूलदान, मोमबत्ती

सब महक- महक उठतें हैं

आलोकित हो जातें हैं

वह हँसी

वह आँखें

कपोलों के नन्हे गहवर

मुझमें भरतें हैं जीवन

पुनर्जन्म इसी तरह होता है।







बेटे के लिए
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(1)

कहीं फूल के खिलने की एक मुद्रा

मुझे मुग्ध करती है

वह नन्हा- सा मुखड़ा

गुलाब है

जूही है

कुंदकली है

झर-झर झरता निर्झर है

मुझे आप्लावित करता

खिलखिल रोशनी है

अपनी नन्ही बाहों को फैलाता हुआ

यह एक जाड़े की मीठी धूप है

यह मेरी कविता है

मुझे ही रचती है

अनेको बार।

(2)

वह जो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में

संजोये हुए हैं- ढेर सारे सपने

अपने

माँ के, पिता के, भाई- बहन के

शुभ आशीर्वाद- सा

छाया रहता है घर के हर कोने में

वह उत्सव है

वह वसंत है

यह मौसम है

वह आकाश- यहां से वहाँ अनंत विस्तार में

सागर- तरंगित होता हुआ

दुनिया को हिला देने की ऊर्जा लिए

एक सार्थक लड़ाई के लिए सन्नद्ध

वह जागृति है

वह मशाल है

वह वर्तमान है।


जिन्दगी
------------


(1)

धीमे धीमे

सरकती जा रही यह

जिन्दगी

जाड़ों की धूप सी

प्यारी और प्यारी

लगती जा रही

यह जिन्दगी

लेकिन अजब है यह

कि बस

बन्द मुट्ठी में बंधी ज्यों रेत-सी

खिसकती जा रही

यह जिन्दगी।

(2)

जिन्दगी

स्वीट पी की खुशबू है

फैलती है यहां से वहां

आदिम चाह-सी

जिन्दगी जो खुला प्रांगण है

जिन्दगी जो

धूल, धूप, हवा

और पानी

गृहस्थी का उत्सव

और आंगन है

मात्र यही तो हर क्षण

धड़कनों का साक्षी

साथी है

फिर भी

अब, कहां

साथ छोड़ जाए

भरोसा नहीं

यह जिन्दगी।

(3)




बीतते जा रहे हैं

बरस पर बरस

रीतते जा रहे हैं

मौसम दर-मौसम

चुक जाएगा यह जीवन भी

एक दिन

एकाएक।


......यूं ही सोचते रह जाएंगे

अब करेंगे ऐसा कुछ

जाने कब से अपेक्षित था जो

ऐसा कुछ.........।




एक मनःस्थिति

 
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देखो तो


अब निहार सकती हूं

मैं आकाश का विस्तार

धरती का रूप

अकेली सड़क का मधुर एकान्त

सुन सकती हूं

झरते हुए पत्तों का

उदास, आत्मीय संगीत

नए पत्तों की लय

यह दुनिया कितनी खूबसूरत हो गई है

देखो तो

क्या से क्या हो गई हूं

मैं!


तुम्हारे जाने पर
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(1)
अच्छा हुआ तुम चले गए

अब कुछ सोच समझ सकती हूं

उन संवादहीन दिनों को

एक नाम दे सकती हूं

रिक्तता की खाई

मौन से भर सकती हूं।


चलो, तुम छोड़ गए

गहरे पानी में

(कोई बात नहीं)


(2)
कहीं कुछ नहीं होता

और बहुत कुछ घटता

काटता चलता है

अंधकार में

लहरों के उत्थान-पतन में

अरारों का गिरना

किसने जाना ?

-जिसने बांधा

वही

फिर-फिर उसी का टूटना

किसने तब जाना

घहरा कर

दम तोड़ना

एक नाटक

बिना मंच, बिना संयोजन के

होता है

मैं पात्र हूं (पर कहां हूं)

मेरे इर्द-गिर्द जो है

जो कुछ हो रहा है

वहां तो नहीं हूं

किन-किन व्यथाओं में

अभिभूत

उदास और रिक्त

और-

नामहीन हूं।

(3)

हंसी आती है अब प्रेम-प्रदर्शन पर

और विश्वास की बात

उदास कर जाती है

खुशियां हर बार

आहत हो

मौन के द्वार

टूट गिरती हैं।


राग जो अपना है

धुंध में डूबा है

वसन्त का अन्त

समझ में आता है।










Monday, November 19, 2012

पाँच कविताएँ - खुशबू सिंह

स्त्रीविमर्श के क्षितिज से मुखर होती आवाज़ों में, एक नाम युवा कवियत्री खुशबू सिंह का भी है. उनकी परिपक्व होती रचनाओं से आशा करी जा सकती है कि एक शैली का निर्माण होगा. उनकी कल्पना की उड़ान को सही दिशा मिले और वो औरों को भी अपनी रचनाओं से उस सही दिशा को दिखा सकें इसी उम्मीद के साथ , आपके सामने रखी जा रही हैं उनकी पाँच कविताएँ.

१. मैं जब भी खेलती                        

मै जब भी खेलती
बहुत दिल से खेलती
तुम हो कि खेल खेल में दिल ही तोड़ गए ...

वो डोर
जिसके दोनों सिरों को थामा हमने
एक तुम्हारा, एक मेरा
कई खेल खेले उस एक डोर से
कभी हाथों में घुमाते हुए
कभी कल्पनाओं की पतंगे उड़ाते हुए
          
कितने संवाद दौड़े जाते थे उन पर
नट की चाल
कभी कभी चुप्पी के दौर में
बस उँगलियों के पोरों से दे दिया करती थी
एक झनझनाहट
जिसकी झंकार रेंगती हुई पहुँच जाती
दोनों तरफ
मुस्कान बिखेरती हुई

वो डोर... डोर नहीं
कड़ी थी दो शख्सो के बीच 

मुझे बहुत प्रिय थी ...

दिन रात खेलती उस डोर से
डोर रेशम सी कोमल न थी
न ही मांजे सी धारदार
बस एक आम डोर
जो हर घर में मिल जाया करती है
अपनेपन की ...

कभी कभी तुम पूछते इन खेलों में
डोरी का रंग तो बताओ ?
मैंने तो डोर देखी बस
रंग उसके हर पल बदलते ही मिले

दिन रात जो खेले थे, खुले आसमान के नीचे
अब एक रंग भला रहता भी कैसे ?

तुम पूछते गए ...
मै बताती गई
जितने भी रंगों को पहचान सकती थी
सुनाती रही
तुम जितनी बार पूछते
हर बार रंग बदल जाता

और मै झूठी हो गई

शायद तुम्हारा चश्मा एक रंग दिखाता होगा
मैंने तो नन्ही नंगी आँखों से
इन्द्रधनुषी रंग देखे ...

मै खेलती रही बताती रही रंग
रही अपने खेल में ही मग्न
कभी कभी किया नजरंदाज
तुम्हारे बार बार के सवालों को ...

फिर तुमने धागा तोड़ दिया ...

बिलख उठी मै अपने बचपन की बच्ची सी ...
क्यों तोडा ???

तरस था या एहसास अपनी निष्ठुरता का
कि एक गाँठ बाँध दी तुमने
उस टूटी डोर में

रोते रोते ही ज़मीन पर पड़े
उस गांठदार धागे को उठाया
और थमा दिया उसका एक सिरा फिर से
तुम्हारे ही हाथों में
कहा हम फिर से खेलेंगे ...

हम फिर से खेले
मै डोर में उलझ गई
तुम रंगों पर अटक गए ...

एक बार, दो बार, तीन बार ...
बार बार
अपनी छटपटाहट उस डोर पर उतारी तुमने
मेरे बिलखने पर फिर जोड़ भी देते ...

जितनी बार खुलती
मै रोती.....फिर तुम्हे थमा देती
गाँठ बाँध दो... हम खेलेंगे
तुम पसीज जाते और गांठ बांध देते
ये हुनर तुम में ही था
कितनी ही गांठे बांधीं तुमने ...

तोड़ी भी तो तुम्ही ने थी

लेकिन अब डोर पहले जैसी न रही
सभी संवाद इन गांठो में ही अटक बिखर जाते है
टूटी डोर की गांठों ने
इसे और कमजोर कर दिया
अब
पोरों की एक हरकत भर से खुल जाती हैं
सारी कड़ियाँ

देखा था न !! डोर कितनी छोटी हो गई
इतनी कि हम आमने-सामने आ गए

अब मुझे रोता देख भी तुम्हे कुछ न होता
तुम्हे सिर्फ रंग जानना था
ये भी न सोचा मुझे " कलर ब्लाइंडनेस " भी हो सकता है

डोर टूट चुकी थी
तुम अपनी ललक में जल्लाद से निष्ठुर हो चले
खेल भी सब ख़तम हो गए ...

फिर एक रोज
उस टूटी डोर को तुम्हारी हथेलियों पर रख
कहना पड़ गया
इसे अपने रंग में रंगवा लो
या चूल्हे में चढ़ा दो

अलविदा !!

२. आनर किलिंग                           

अपने गालों पर उभरी
उन पांच उँगलियों को देख
उसे याद आया ...

दी थी कभी उसने
अपनी ऊँगली
उन छोटे छोटे नर्म गुद्दरे हाथों में
जो सीख रहा था अपनों के अहसास को

बरबस मुस्कुरा देती
उस मखमली छुवन से
उस मुलायमी पकड़ से

खुद एक गोद से उतर
लड़खड़ाते क़दमों से
उसने गोद ली थी
उम्र भर की एक ज़िम्मेदारी...
वो बड़ी बहन हो गई थी

तीन रोज़ की रातों को मिटा
एक नाम रखा ...
बार बार उसी नाम को दोहरा
जाने क्या क्या बातें करती
वो भी तो मुस्कुराता था
भर जाती भीतर तक
उस मुस्कान से ...

निश्छल चमक वाली आँखों को
इक टुक निहार
खुद ही नज़र उतार लेती
बावरी कभी कभी माँ सी हो जाती थी

वही आज "जड़" हो सोच रही
क्या प्रेम वाकई इतना बड़ा गुनाह है
प्रेम - एक भाव
जिसे जीने की चाह हो गया अपराध
जिसने मिटा दी
स्नेह की सभी स्मृतियाँ !!

लगातार रिसते  बेरंग लहू से
चेहरा लहुलुहान हो रहा था
सनती रही रात भर उसी लहू में

कदमो में आखिरी साँसों के लिए
कुछ तड़प रहा था
और फिर
दम तोड़ गया |

वो उठी ...
मिटाने लगी सारे सबूत
पानी की छपकियाँ मार

कुछ ख़ास थोड़े ही हुआ था ...
बस...एक रिश्ते की मर्यादा की
मान के लिए कर दी गई थी
"ऑनर किलिंग "

३. नाजायज़                               

ए बगीचे के फूल!!
तुम्हे महकना आता है ...
अच्छा है |

पर सुनो ...

इस बगीचे के कुछ उसूल है
महकना होगा तुम्हे...नियमों पर यहाँ
बिखरना होगा ...
माली की ही पुकार पर

करना होगा इनकार तुम्हे
हर उस शय से
जो दर्ज नहीं किसी अनदेखे कायदे में|

नहीं तो जान लो ...
मुहाल हो जायेगा
जीना  तुम्हारा

और साबित कर दी जाएगी
तुम्हारी खुशबू ... नाजायज़ !!

४. क्या ये ही प्यार है                      


मुझे प्रेम है
तुमसे कहूँ तो तुमसे
खुद से कहूँ तो खुद से

मुझे प्रेम है अपनी हर ख़ुशी से
अपने खिलखिलाने से
अपने मुस्कुराने से
कह सकते हो इसलिए भी
कि मुझे प्रेम है तुमसे ...
क्योंकि दी है तुमने
सैंकड़ो वजह मुस्कुराने की
होती है ख़ुशी तुमसे
तुम्हारे होने से

भा जाते है ताने तुम्हारे
और तुम्हारी पाबंदियां भी
खिलखिला जाती हूँ
तुम्हारे 
चिढ़ जाने से

और मुस्कुरा जाती हूँ
आँखों से लेकर होठों तक
तुम्हारे सामने होने भर से

तुम्हारा साथ
देता है ख़ुशी
इसीलिए प्रेम है तुमसे ...

बड़ी मतलबी सी हूँ न
शायद स्वार्थ है प्रेम नहीं

हाँ ! एक बेमतलबी सा सवाल
इस ख़ुशी में घूमता रहता है हरदम
अभी भी घूम रहा है
तुमसे पूछूँ
शायद तुम बता सको ...

ये ख़ुशी तुमसे ही क्यों होती है ??

५. ठोकर                                 

भरे सवेरे 
ठोकर लगी 
गिरी नहीं - संभली ।
लड़खड़ाहट ने 
कुछ पलों को रोका 
दर्द था...
फिर आभास हुआ 
ठोकर खाकर ही चलना सीखा जाता है 
सोचा - 
अब तक चलना ही नहीं सीखा क्या 
कितनी और ठोकरें ...
ये याद है मुझे 
पहले कई बार गिरी हूँ मै 
कई बार ठोकर लगी है 
जिसकी याद तब तक रही 
जब तक के दर्द रहा ।
कभी ये तो सोचा ही नहीं 
चलना सीखना होगा 
कि रास्ते पर ध्यान देना होगा 
होता ये रहा कि ध्यान दर्द पर ही रहा 
और दर्द ख़त्म होते ही 
फिर पुराने ढर्रे पर वापस 

अभी दर्द है 
शायद इसीलिए ये सवाल कर सकी खुद से
कि आखिर कब तक 
और ठोकर खानी होगी
कब तक और दर्द सहना होगा
कब मै चलना सीखूंगी

मुझे “अब” ये मालुम हुआ है
ठोकर हमें गिराती नहीं 
बल्कि हमें चलते रहना सिखाती है 
और बढ़ा सकती हैं हमारा आत्मविश्वास
रुकाव, ठहराव जरुर होता है 
इन ठोकरों में एक पल का 
पर एक निरन्तरता भी होती है 
- चलते रहने की

हर ठोकर सीख देने आती है ।
                                                                           
परिचय :-  खुशबू सिंह
पिता - श्री सी० बी० सिंह
जन्म - १२- अगस्त
निवास स्थान - दिल्ली
स्थान - मूलतः बुलन्द्शहर, उत्तर प्रदेश
शिक्षा - समाजशास्त्र में स्‍नातकोत्‍तर  
परवरिश- हरियाणा के भिन्न भिन्न जिलों में; मुख्यतः सिरसा, फतेहाबाद, रोहतक एवं नारनौल  

(ऊपर चित्र साभार गूगल से लिये गये हैं यदि कोई चित्रकलाचित्र इत्यादि किसी सर्वाधिकार का उलंघन हो तो कृपया सूचित करें उसे हटा दिया जायेगा )

Friday, November 02, 2012

अनुपमा तिवाड़ी की बात करती कविताएँ

अनुपमा तिवाड़ी
  की बात करती कविताएँ

जयपुर, राजस्थान की युवा कवियित्री अनुपमा तिवाड़ी । हिन्दी व समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर तथा पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातक हैं ।
पिछले 24 वर्षो से स्वयमसेवी संस्थाओं में कार्यरत और वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन राजस्थान से जुड़ी हैं ।
आपकी कविताए व कहानियाँ अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं । अनुपमा का पहला कविता संग्रह आईना भीगता हैजयपुर के बोधि प्रकाशन से 2011 में प्रकाशित हुआ है ।

अनुपमा की इन कविताओं की अपनी इंसानियत है अपनी आवाज़ें हैं जो कभी प्रेमिका के रूप में अपनी व्यथा साफ़ शब्दों में कहती नज़र आती हैं, कहीं तालिबान को ललकारती हैं । एक तरफ़ आदमी के अमानवीय  चेहरे को उजागर करती हैं तो वहीँ दूसरी ओर स्त्रीविमर्श ।
आइये उनकी कुछ कविताओं को पढ़ें, उनसे सीखें और काव्य का आनंद उठायें  ।

 आना - जाना                                  
न तुम मुझे बुलाते हो
न मैं तुम्हें छोड़ कर जाती हूँ
तुम तो अपनी जगह तटस्थ हो
मैं ही आती हूँ
और मैं ही जाती हूँ

आदमी के अंदर एक आदमी रहता है                 
आदमी के अंदर रहता है
एक और आदमी ।
रहते हैं दोनों
साथ - साथ।
पर खूब झगड़ते हैं
चलते रहते हैं
उनके बीच द्वंद्व
उन दोनों को झगड़ते देखा है
मेंने बहुत बार
एक रात तो रात के आदमी ने कह दिया
" देख जैसे - जैसे तू बूढ़ा होगा, मैं और, और जवान हौऊँगा"
उस रात दोनों में खूब हुई थी कहासुनी ।
और फिर तबसे  रात का आदमी दिन में रहने लगा था
चुप-चुप ।
पर रात तो उसकी थी न !
मैंने अपने बुजुर्गो से सुना था
"कि पहले ये दोनों हमेशा साथ-साथ रहते थे
पता नहीं इनके बीच ऐसा क्या हो गया कि दोनों रहने लगे है
अब अलग-थलग" ।
दिन का आदमी अब उसे सुनना ही नहीं चाहता
पर वो भी है न, चुप नहीं बैठेगा
चाहे हार जाए दिन के आदमी से
रात के आदमी, मैंने सुना है तुम बहुत ताकतवर हो
तुम लड़ो न दिन के आदमी से
पता है तुम ही जीतोगे
तुममें बहुत ताकत है यार !
बस बाहर आ कर खड़े हो जाओ
और दिन में भी चलो उस आदमी के साथ
जो तुमसे अलग-थलग घूम रहा है
फिर देखो आदमी, आदमी लगने लगेगा।

छुअन तुम्हारी                                   
तुमने छुआ मुझे आंखो से
छुआ मुझे आवाज़ से
छुआ मुझे दिल से
पर छुआ नहीं ।
फिर भी छुआ कितना
तुमने मुझे ।



मलाला                                        
13 साल की मलाला
तुम जियो 113 साल
तुम नहीं मरोगी गोली से
तुम्हारी धमनियों में बहता लहू का हर कतरा कितना गरम है
तुम्हारी सपनीली आंखो में लड़कियों के शिक्षित होने के सपने हैं
तुम्हारी आवाज़ आसमान से बात करती है
भला, ऐसी फौलाद लड़की को कौन मार सकेगा ??
तालिबानियों तुम मारो एक मलाला
एक हज़ार मलाला
पैदा हो जाएंगी
ठीक  पत्थरचट्टे की तरह
जिसके हर पत्ते से एक नया पौधा उग आता है
तालिबानियों, तुम नहीं जानते
बंदूक के कारखाने में जितनी बंदूके बनती हैं
उससे कहीं ज्यादा आवाज़े हुमकती है दिलों में ।
बेताब होती हैं
बाहर आने के लिए
हाथ बढाती हैं आगे
छूने को आकाश ।

कामकाजी स्त्रियाँ                                
कामकाजी स्त्रियाँ
ले कर घूमती हैं
बड़ी - बड़ी गठरियाँ
आंसुओं की।
मिलते ही अपनी - सी
वे खोलती हैं
अपनी - अपनी  गठरियाँ
करती हैं साझा
आँसू.......
अपनी अंगुलियों में फंसाए
एकदूसरी की अंगुलियाँ
देती हैं सांत्वना।
उनकी बेबस आंखे पढ़ती हैं
एकदूसरी को गहरे से
पर, होठ कहते हैं
औरतों में बहुत ताकत होती है

वो धार्मिक                                     
मैं बचपन में समझती थी
पाखंडियों को धार्मिक
जितना पाखंडी
उतना धार्मिक ।
आज धार्मिकों को डर है
पाखंडियों से
ये कैसे धर्म हैं ?
इंसान को इंसान से डर ?
क्योंकि,
वे धार्मिक नहीं कट्टर हैं ।
डर बिठाया था
मेरे अंदर बचपन में ।
अन्य धर्मावलंबियों से
पर आज में डर गई
अपने ही धर्म के लोगों से
क्योंकि, उनके कान बंद
और मुँह हाथ खुले थे ।

प्रेम                                           
कितना मारा है
तुम सबने मिलकर
इस प्रेम को ।
पर, ये मुआ मारा कहाँ है ?
मरेगा भी नहीं
पलता रहेगा
तुम्हारे दिल के कोने में पड़ा
कितनी बात करता है
यह तुमसे
जब तुम अकेले होते हो

खिड़की                                        
तुम्हारा दिल था
बंद दरवाज़ा
मेरा खुली खिड़की ।
उस दिन आए तूफान के बाद से
खिड़की आज तक बंद है ।

रेत सी जिंदगी                                  
जानता हूँ  कि
जिंदगी
रेत सी फिसल रही है
मुट्ठी से
पर तुम्हारी आंखो से छलक़ती हँसी में
विस्तार पा रही है
मेरी जिंदगी ।

स्त्रियाँ और प्रेम                                  
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं
धोखा खाती हैं
प्रेम करती हैं
धोखा खाती हैं
स्त्रियाँ प्रेम करती हैं....


(ऊपर चित्र साभार गूगल से लिये गये हैं यदि कोई चित्र, कलाचित्र इत्यादि किसी सर्वाधिकार का उलंघन हो तो कृपया सूचित करें उसे हटा दिया जायेगा )

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