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Saturday, August 04, 2012

चेतना की 'मशाल' रोशन करती अरुण देव जी की कविताएँ




अरुण देव
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय , कविता संग्रह ज्ञानपीठ से २००४ में प्रकाशित
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख
ई पत्रिका समालोचन का संपादन
www.samalochan.blogspot.com

सम्प्रति- सहायक प्रोफेसर
साहू जैन कालेज,नजीबाबाद (बिजनौर,उ.प्र.)
मोब.- 09412656938
ई.पता- devarun72@gmail.com

अरुण देव की कविताएँ

(फर्गुदिया के कार्यक्रम में २३/७/२०१२., इण्डिया गेट, नई दिल्ली में पढ़ी गईं)



1-हत्या
उसकी हत्या हुई थी.
सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था.
 खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई.
वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला,
कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है.
 लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था.
चेहरे पर थकान.
जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.
 एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी.
कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी.
अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई,
चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार



अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती
तो इसे स्वाभाविक माना जाता,
उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था,
इसी किस्म से कुछ कहा जाता.
और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी.
उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था.
यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती,
उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी
क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.







2-मेरे अंदर की स्त्री

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ

तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी.

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