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Wednesday, February 27, 2013

डा.अलका सिंह की कविताएं

डा.अलका सिंह ************
2000 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से आधुनिक इतिहास विभाग से स्वतंत्रोतर भारत में ‘उत्तर प्रदेश में महिलओं की स्थिति’ विषय पर शोध कार्य. 1999 से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य. आधी दुनिया और एक छात्रा की डायरी दो चर्चित कालम, कई लेख प्रकाशित
पिछले 15 – 16 सालों से सरकारी, गैर सरकारी संगठ्नों के साथ महिला मुद्दों पर विशेष् कार्य साथ ही स्वास्थ्य और क्लाईमेट चेंज जैसे मुद्दों पर भी कार्य
फिलहाल – अमृता संस्था की अध्यक्ष
उत्तर मध्य रेलवे की
घरेलू हिंसा कमीटी में  सलाहकार 
तथा सेक्सुअल हैरश्मेंट  कमीटी की सद्स्य के रूप मे जुडाव




भूल गयी थी कुछ तुमसे प्यार करते करते 


तुमसे प्यार करते करते
भूल गयी थी कुछ कूट विचार
माँ के
जो याद आये हैं बरसों बाद आज
पीछे मुड्कर देखते हुए कि -
डांटती नहीं हूँ मैं
ना ही रोकती हूँ दुनिया देखने से
बस आगाह करना चाहती हूँ एक औरत को
जो बनाने जा रही है एक रिश्ता
घर के बाहर और उडने की कोशिश में है
एक घोसले के जिसके तिनके तिनके को वो
खोजेगी, बुनेगी और सहेजेगी
बताना चाहती हूम उस औरत को कि
ये घर से बाहर बनता हुआ एक ऐसा
रिश्ता है जो
अनुभूति के साथ हर रोज बढता है
सवंरता है , आकार लेता है और गुम हुए से लगते है
कई अर्थ
पर सच में ऐसा होता तो क्यों कुरेद कर कुरेद कर
पूछती तुमसे और बार बार सवाल करती ?
समझाती रही है वह मुझे कि
यह शीतल है जैसे चांद की रोशनी
कोमल है जैसे गुलाब की पंखुडी
मदमादा है जैसे महुए का नशा
किंतु चांद के दाग , गुलाब के कांटों और
महुए के नशे का भी एक सह है
और यही सच धीरे- घीरे
सामने आता है
यह बताने के लिये खडी हूँ तेरे आस पास
कि जब भी तू दहलीज़ के बाहर
कहीं जुडेगी तो जीयेगी कुछ वैसा ही
जिससे गुजरती रही हूँ मैं
इसलिये उतरने को बेताब हूँ तुझमें विचार बन
कि हुनर सिखा सकूँ
नये समय में स्त्री होने का
बता सकूँ कि जना है जिसको औरत ने
वह मालिक बन जाता है एक वक्त के बाद
क्योंकि औरतें खोजाती रहीं हैं अपने उस मालिक को
कभी चांद से बातें कर
कभी शाम में अकेले खुद से बुदबुदाते हुए
और कभी प्रेम गीत गाते हुए
डूब जाती हैं एक ऐसी दुनिया में
जहां सब प्रेम में डूबा उसका
अपना संसार है
जानते हो –
तुमसे प्रेम करने की यात्रा में
माँ के कूट वचन को बेमानी समझ
झटक आयी थी उसी के द्वार
पर आज सच में गुलाब के उस कांटे ने
डसा है पहली बार
सोच रही हूं उठा लाऊँ वो पोटली
और बीन लूँ सारे कूट
अपनी बची यात्रा को नया कर जीने और
अपनी जवान होती बेटी के अन्दर
विचार बन उतरने के लिये 



एक नदी का ज़ख्म      

माना कि
हम
उसे पूजते रहे हैं सदियों
पर
अब भी सब अनजान हैं
कुछ बातों से
और सबके नाम लिखी उसकी एक पाति से
जिसमें लिखा है
उसका बचपन , यौवन और सुनहरे दिन
अंतिम अध्याय
अथाह दर्द और
अग्रह से भरा है
यह वसीयत है एक नदी की
जिसे पढकर
गयी थी उसके पास मिलने
हुलस कर नहीं आयी वो
मेरे पास पहले की तरह
दूर से ही
घुटनों पर खडी हुई
निहारा
और वहीं पसर गयी
इतनी वेदना !!
इतना अश्य दर्द !!!!
सोच ही रही थी कि उसने
बुलाया, कहा कि
फुर्सत से आओ
तो कभी बात हो
दिल खोलकर
तो दिखाऊँ अपना जख्म
मुझे पूजने से पहले इसे
देखना जरूर
एक बार
यह भी देखना कि
इतने साल कैसे रही हूम मैं
और कितना सहा है
व्यवभिचार
माँ थी मैं ऐसा सब कहते थे
फिर भी बालात होता रहा ये
अत्याचार
मुझे पूजने से पहले
सुनना जरूर एक बार
जानती हूँ मृत्यु के कगार पर हूँ 
 अपनी पीडा से अधिक इस पीडा में हूँ
कि मेरे जाने के बाद फिर जुलसेगी ये भूमि
और इंतज़ार करना होगा
सगर के पुत्रों को
सदियों एक भगीरथ का





ऊँचे ओहदे पर बैठी वह ___________________


1.

दफ्तर के सबसे ऊँचे ओहदे पर बैठी वह
कई आंख को चुभती है दिन - रात
लोग अक्सर कहनियां सुनाते हैं
एक दूसरे को उसके अतीत की
और बताते हैं राज
उसके ऊपर वाली कुर्सी पर बैठने के
किंतु वह निरंतर काम में लग्न
तोडती जाती है हर बाधा और बनाती जाती है
नया मुकाम
अभी कल ही जब उसे एक नया ओहदा मिला
बन गयी है फिर से
एक नयी कहानी

2.

जब वह नयी नयी दफ्तर में आयी थी
हर रोज लोग उसके इर्द गिर्द
घूमते थे
हौले हौले मुस्कुराते थे
नयी बॉस  मैडम है
एक दूसरे को सूचना देते थे
जैसे समझाते थे कि
महिला है तो काम कम ही जानती होगी
यह भ्रम धीरे धीरे टूटने लगा
जब
काम में माहिर ईमानदार बॉस  ने
हर रोज अपनी समझ का परिचय दे
काम का हिसाब देना और लेना शुरु किया
और बस तब से
किस्से ही किस्से और हज़ारों कहानियां
कभी उसके चरित्र की, कभी आदतों की
और कभी उसके मुस्कुराने के मतलब की

3.

आज उसके ही चरित्र पर गढे गये
किस्सों की कुछ चिन्दियाँ
उड्कर उसके कान तक पहुँची
हैरान नहीं है फिर भी
खडी है चुप सोचती
कि इतने किस्सों के बीच
क्या मैं ही अकेली हूँ ?
या वो सब हैं जिनके परों ने
अभी अभी फड्फडाना सीखा है ? क्या जडों पर वार करने वाली इन कुल्हाडियों के बीच
निढाल हो जाना होगा ?
या फिर इन कुल्हाडियों की धार को
हर रोज भोथडा करना होगा
मजबूती से ?
डरना –घबराना तो नहीं ही होगा
इन स्थितियों के बीच
तेज़ ना ही सही किंतु
चलना तो होगा ही इन छींटों से अने सने
बढने के लिये

4.

आज दफ्तर में मीटिंग रखी है
उसमें कुछ सवाल रखे हैं
सामने सबके
कि
कौन हूँ मैं?
क्यों हूँ यहां?
क्या करती हूँ ?
यह तौहीन किसलिये ? ये किस्से किसलिये ?
और मांग रही है जवाब
एक सन्नाटा पसरा है
मीटिंग खत्म है और सब
व्यस्त हैं सवाल का जवाब
खोजने में
एक दूसरे से पूछ्ने में
सवालों के जवाब ...........

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