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Sunday, January 27, 2013

मनीषा कुलश्रेष्ठ से एक आत्मीय मुलाकात में हुई बातचीत....

मनीषा कुलश्रेष्ठ       
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'कठपुतलियाँ' 'शालभंजिका' 'केयर ऑफ़ स्वात घाटी' ' बौनी होती परछाई ' , 'गन्धर्व-गाथा' शिगाफ' जैसे कहानी संग्रह , लघु उपन्यास और 'शिगाफ़' जैसे चर्चित उपन्यास से साहित्य जगत में बहुत ही कम समय में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी सहज,सरल, सहृदय और विनम्र कथाकार मनीषा कुलश्रेष्ठ से कहीं ना कहीं कविता-पाठ में अक्सर मुलाकात हो जाती है. कथाकार के साथ-साथ वो एक कुशल गृहिणी, कवयित्री ... और चित्रकार भी हैं. 

अक्सर जब भी उनसे फ़ोन पर बात होती तो वो मुझे बहुत ही आत्मीय भाव से अपने घर आमंत्रित करतीं , एक दिन उनसे मिलने उनके घर भी गयी , एक अद्भुत अनुभव था उनसे मिलना , जैसा संवेदनशील उनका लेखन है वैसी ही वो स्वयं भी हैं.

कुछ देर उनके घर उनके साथ समय बिताकर उन्हें बहुत करीब से जानने का मौका मिला, उन्होंने मेरे लिए चाय स्वयं ही बनायीं , चाय बनाते समय वो अपनी मेड की बेटी छुटकनी का जिक्र करते हुए भावुक हो गयीं थी, छुटकनी की कहानी भी 'फर्गुदिया' की जैसी थी .

बालकनी में चाय की चुस्कियों का मज़ा लेते हुए वो अपनी शादी का जिक्र करते हुए बिलकुल छोटी बच्ची सी लग रहीं थी, शादी के पहले मनीषा ने अंशु जी से मजाक में जिक्र किया होगा कि 'मुझे तो बिना सास वाली ही ससुराल चाहिए थी' वो वाकया सुनाते हुए उनके चेहरे पर एक शरारती मुस्कान दौड़ गयी थी लेकिन दूसरे ही पल सासू माँ के ना होने पर शादी के बाद उन्होंने किन कठिनाइयों का सामना किया वो सब याद करके ... अपनी सासू माँ को याद करके उनकी आँखें भीग गयीं थीं.

अभी हाल ही में उनके उपन्यास 'शिगाफ' को 'गीतांजलि लिटरेरी' एवार्ड मिला, 
जनवरी 2013  का 'लमही' अंक मनीषा कुलश्रेष्ठ  पर आधारित है.


उन्हें स्वयं लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली, लेखन विधा सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण सुझाव गृहणियों के लिए, और भी बहुत कुछ है उनसे हुई इस बातचीत में ...
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जब भी आपसे मिलती हूँ , आपकी आँखों को पढ़ती हूँ, आपकी आँखें हर किसी के चेहरे और आँखों की कहानी पढने को आतुर नज़र आतीं हैं. ऐसा है क्या ?

मनीषा कुलश्रेष्ठ -
थोडा मुस्कुराते हुए .. – “ हाँ .. ऐसा है .. यहाँ दिल्ली कैंट के सदर में मैंने कल एक समोसे वाले को देखा, उसे देखकर मुझे ये लगा कि वो पूरा का पूरा एक कहानी का पात्र है, क्योंकि इतने बड़े और आधुनिक दिल्ली शहर के छोटे मोहल्ले में आस – पास के विकास से बेखबर, अमिताभ बच्चन जैसे बाल रखे समोसे बना रहा है और बड़ी लगन से बना रहा है. उसका लोगों को बड़े प्यार से खिलाना, मानो दुनियावी शातिरी उसे छू भी न गई हो. उसे देखकर मुझे लगा कि मैं अपने कस्बे में लौट आई हूँ. मै ने उसके पीछे एक कहानी का पात्र देखा और उत्सुकतावश दुबारा गई.

हाँ ..ऐसा है मैं हर व्यक्ति के पीछे की कहानी ढूँढने की कोशिश करती हूँ , मुझे मज़ा आता है, मुझे जो ऊपर दिखता है या दिखाया जाता है उसमें बहुत कम रूचि रहती है, मुझे बर्फ के नीचे के जीवन में ज्यादा रूचि रहती है. मेरे सामने मुखौटे चलते नहीं हैं, मैं प्यार से हटा कर कहती हूँ , “ हाँ अब बात करो.”


-आस-पास की घटनाओं और संगी-साथियों से जुडी बातों को लेकर क्या  हर समय कथा-कहानी-उपन्यास का एक खाका मन में तैयार होता रहता है ..?

मनीषा कुलश्रेष्ठ - नहीं .. ऐसा तो नहीं है कि हर समय मन में एक खाका ही तैयार होता रहे .. ज़िन्दगी में और भी चीज़ॆं हैं करने को. हाँ किसी भी कहानी का या नॉवल का एक प्रस्थान बिंदु होता है, वह जब सामने आता है तो जरुर उसके बाद वह कुलबुलाहट मेरे अन्दर रहती है, और तब उस पर कलम को चलना होता है, तो ज़रूर सोते-उठते हर समय वो खाका मेरे दिमाग में रहता है.


-शादी के पहले से लिख रहीं हैं, शादी के बाद ( जाहिर सी बात है ) कुछ समय के लिए लिखना छूटा होगा, एक लम्बे अंतराल के बाद फिर लेखन शुरू करने में किस तरह की दिक्कतें आई ..?
परिवार वालों खासतौर पर अंशु जी ने किस तरह आपका साथ दिया ..? या फिर जैसा कि आमतौर पर होता है " छोडो न यार ये सब करके अब ..क्या करोगी " ऐसा कहकर समझाने की कोशिश की ..? 

मनीषा कुलश्रेष्ठ - शादी से पहले भी लिखती थी लेकिन पहचान एक छोटे स्तर पर ही मिली थी, आज जो इतनी बड़ी पहचान है वो नहीं बनी थी, हाँ ... शादी के बाद लम्बे अंतराल तक सब छूट गया था लेकिन मैंने मेरे नवजात बच्चों पर ..उनकी मुस्कान पर या प्रतीक्षा पर कविताएँ लिखकर अपनी उँगलियों को मैंने हरकत में रखा .. मैं डायरियां भी लिखती थी ..लेकिन लिखने को मैंने तब तक गंभीरता से नहीं लिया जब तक बच्चे स्कूल नहीं जाने लगे, जब वो स्कूल जाने लगे तब मैंने वेबसाइट शुरू की .. वेबसाइट शुरू की तो संपादकीय हमेशा मुझे ही लिखना होता था ... संपादकीय के साथ दोबारा से लिखना शुरू हुआ .


जहां तक अंशु की बात है तो हिंदी की पहली वेबसाइट बनाने में ही जिस व्यक्ति ने मेरा साथ दिया हो .. मेरे आगे कप्यूटर पर हिंदी की संभावनाओं की खिड़की ही जिस व्यक्ति ने खोली हो तो वो फिर पीछे कैसे हट सकता है ...उन्होंने मुझसे कभी नहीं ये कहा कि "छोडो न यार" बल्कि वो हमेशा मेरे साथ रहे, मेरे पहले पाठक और आलोचक भी.



- अब तक जितना भी मैंने आपको पढ़ा है उसके अनुसार कह सकतीं हूँ कि आप अपनी कहानियों में महिलापात्र को मर्यादित,संस्कारिक ढंग से पेश करती हैं , समकालीन लेखन और फ़िल्में पाश्चात्य संस्कृति को फ़ॉलो कर रहा है लिव-इन-रिलेशनशिप को कहानियों और फिल्मों में जायज ठहराना कहाँ तक उचित है , परिवार जैसी संस्थाएं वैसे ही टूट रहीं हैं, आने वाली पीढ़ी को ऐसी कहानियों और फिल्मों से क्या संदेश जा रहा है ..?

मनीषा कुलश्रेष्ठ - जहां तक मेरी नायिकाओं की बात है ..उस संकीर्ण अर्थ में मर्यादित तो नहीं हैं वे ! मेरा अर्थ मतलब उन्होंने मर्यादा ओढ़ी हुई नहीं है! वे जैसी हैं वैसी हैं. फिर कोई मैं आदर्श कथाएँ या प्रेरक गाथाएँ तो लिखने नहीं बैठी हूँ ना ! दरअसल नैतिकता और मर्यादा , गरिमा .. इन तीनों चीज़ों को अलग तौर पर देखतीं हूँ.. मर्यादा मेरे लिए ओढ़ी हुई चीज़ है, इसके आगे गरिमा मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण है ..एक स्त्री की गरिमा क्या है ... नैतिकता के मापदण्ड सबके अपने अपने. हर समाज, हर व्यक्ति के. तो मेरी नायिकाएँ ओढ़ी हुई मर्यादाएं , नैतिकता नहीं लिए हुए हैं ... लेकिन हाँ .... परिवार संस्था में उनका विश्वास है ... क्योकि मेरा स्वयं का विश्वास है .. मुझे लगता है कि हम इतनी गुफाओं के आदिम जीवन और आरंभिक समूहों से लेकर आज तक न जाने कितनी सभ्यताओं को पार करके परिवार की इकाई तक पहुंचे हैं तो इस परिवार के होने में कितनी सारी सुरक्षाएं जुडी हैं, स्त्री और बच्चों की और स्वयं पुरुष की भी ... मैं इस परिवार की सुरक्षा में पुरुष को अलग नहीं कर सकती ....मैं पाती हूँ कि पुरुष भी घर में आकर परिवार की तरफ लौटकर स्वयं को बहुत सुरक्षित महसूस करता है .

लिव-इन-रिलेशनशिप और सिंगल मदर्स के कॉंसेप्ट के बारे में कहना चाहूंगी कि लिव-इन-रिलेशनशिप वापस जंगल की ओर, आदिम जीवन की ओर लौटना है, जंगल जहाँ एक बाघिन या एक चिड़िया अकेले बच्चे पालती है ... और उसकी मज़बूरी होती है अकेले बच्चे पालना ... आपने देखा होगा कि मादा को अकेले बच्चे पालने होतें हैं और या फिर बंदरों के झुण्ड को भी देखा जाए तो हमेशा उसमें मादाओं के साथ ज्यादती होती है ...उनके बच्चों के साथ ज्यादती होती है .. तो जब हम इतनी सभ्यताएँ पार करके आज हम समाज की विकसित अवधारणा तक पहुंचे हैं, परिवार की अवधारणा तक पहुंचे हैं तो वापस से हम अकेले क्यों हो जाएँ ...? और हम क्यों अकेले बच्चे पालें .. जब बच्चा पुरुष का और स्त्री दोनों का है ... तो स्त्री अकेले बच्चे क्यों पाले ... ? तो मेरे ख़याल से लिव-इन-रिलेशनशिप में स्त्री की ही अस्मिता की हानि है.

मैंने पढ़ी हैं वे कहानियाँ शोभा, इस विषय को एक कहानी की तरह प्रस्तुत करना ठीक है, कहानियों में समाधान और संदेश नहीं होते, कहानियाँ वहाँ पर ख़त्म हो जातीं हैं, जहां से संदेश शुरू होतें हैं, कहानी को बस कहानी की तरह ही पढ़ा जाना चाहिए . कहानियाँ तो एक दृश्य, एक स्थिति प्रस्तुत करती हैं, उनके पक्ष में तो पैरवी करता हुआ कोई लेखक लेखिका नज़र नहीं आता. बल्कि इस तरह की कहानियाँ लिखना तो एक तरह से चेताना ही हुआ समाज को. कहानीकार तट्स्थ होकर लिखता है, वह कोई पैरवी या समाधान नहीं देता. हाँ स्यूडो बोल्ड्नेस और दिखावटी आज़ादी से मुझे आपत्ति होती है.

और रही इस तरह की कहानियों और फिल्मों का आने वाली पीढ़ी के ऊपर प्रभाव पड़ने का तो पहले हम ये तो जान लें नई पीढ़ी कितना इन कहानियों को पढ़ती हैं... फिल्में जरूर देखती है.
 देखो शोभा हमने भी सब कुछ देखते, पढ़ते जीवन जिया...बने कि बिगड़े नहीं पता, फिर हर बच्चे के पास अपने एक पारिवारिक संस्कार होतें हैं, अगर वो संस्कार अच्छे हैं, बच्चे सुरक्षित हैं तो कहानी और फिल्मों का बच्चों पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है, वे ऑबजेक्टिव हो कर सब देखते चलते हैं. और ये बनना – बिगड़ना रिलेटिव है. मेरी माँ के समय में बिगड़ने की परिभाषाएँ और थीं और हमारे समय में और, आजकल और...

मेरे घर में ही बहुत सारी बातों पर हम बच्चों से खुलकर बात करतें हैं ..जो कि अपने समय में सोच नहीं सकती थी कि अपने पिता से मैं ये बातें कर सकती थी ! मेरे पिता टी टोटलर थे, शादी के बाद घर में सजी हुई बार देख कर मुझे अजीब लगता था  लेकिन इस तरह सामने रखे होने पर भी मेरे बच्चों की इसमें कोई रूचि नहीं है, उनको पता है कि पापा भी सोशियली ड्रिंक करतें हैं.. कहने का मतलब ... सब कुछ संस्कारों पर डिपेंड करता है. मेरी बेटियों को आज़ादी है कि बाहर या छुप कर लड़कों से बात करने की जगह, हमारी उपस्थिति में घर पर आएँ उनके क्लासमेट या मित्र. इसलिए मुझे लगता है जितना चीज़ें ‘टैबू’ होंगी उतना उनकी ललक बढ़ेगी. इसलिए मेरे अनुसार युवाओं को सन्देश – देखो यह सब ज़माना है..अच्छा – बुरा. आप क्या चुनते हो यह आपके संस्कार !



- अक्सर शीर्ष पर बैठे लेखकों की उपलब्धियों के पीछे उनकी मेहनत,लगन और त्याग का जिक्र होता है ... वहीँ लेखिकाओं की उपलब्धियों के बारे में उन्ही शीर्ष पर बैठे लेखकों के कंधों की सीढ़ी का जिक्र किया जाता है ... आज आप स्वयं शीर्ष प़र बैठी लेखिकाओं में से हैं .. कैसा लगता है ऐसा सुनकर ... ?

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