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Sunday, August 05, 2012

चेतना की 'मशाल' रोशन करती अंजू शर्मा

अंजू शर्मा
कवयित्री, लेखिका, ब्लॉगर
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख प्रकाशित होतें रहतें हैं
कविता पाठ के आयोजन में बतौर कवि और आयोजक सक्रिय भूमिका



अंजू की अधिकतर कविताएँ ही अपने आप में एक सम्पूर्ण स्त्री विमर्श है , 'मशाल' कार्यक्रम में उन्होंने अपनी एक  प्रभावशाली कविता "पब से निकली लड़की"  का पाठ किया ..


पब से निकली लड़की

पब से निकली लड़की
नहीं होती है किसी की माँ, बेटी या बहन,
पब से निकली लड़की का चरित्र
मोहताज हुआ करता है घडी की तेजी से
चलती सुइयों का,
जो अपने हर कदम पर कर देती हैं उसे कुछ और काला,

पब से निकली लड़की के पीछे छूटी
लक्ष्मणरेखाएं हांट करती हैं उसे जीवनपर्यंत,
जिनका लांघना उतनी ही मायने रखता है जितना कि
उसे नैतिकता का सबक सिखाया जाना,

पब से निकली लड़की अभिशप्त होती है एक सनसनी में
बदल जाने के लिए,
उसके लिए गुमनामी की उम्र उतनी ही होती है
जितनी देर का साथ होता है
उसके पुरुष मित्रों का,

पब की लड़की के कपड़ों का चिंदियों में बदल जाना
उतना ही स्वाभाविक है कुछ लोगों के लिए,
जैसे समय के साथ वे चिन्दियाँ बदल जाती हैं
'तभी तो', 'इसीलिए' और 'होना ही था' की प्रतिक्रियाओं में,

पब से निकली लड़की के,
ताक पर रखते ही अपना लड़कीपना,
सदैव प्रस्तुत होते हैं 'कचरे' को बुहारते 'समाजसेवी'
कचरे के साथ बुहारते हुए
उसकी सारी मासूमियत अक्सर
वे बदल जाते हैं सिर्फ आँख और हाथों में,

पब से निकली लड़की की आवाजें,
हमेशा दब जाती हैं
अनायास ही मिले
चरित्र के प्रमाणपत्रों के ढेर में,
पब से निकली लड़की के ब्लर किये चेहरे पर
आज छपा है एक प्रश्न
कि उसका ३० मिनट की फिल्म में बदलना
क्या जरूरी है समाज को जगाने के लिए,
वह पूछती है सूनी आँखों से
क्या जरूरी है ....उसके साथ हुए इस व्याभिचार का सनसनी में बदलना
या जरूरी है कैमरा थामे उन हाथों का एक सहारे में बदलना.........

Saturday, August 04, 2012

चेतना की 'मशाल' रोशन करती अरुण देव जी की कविताएँ




अरुण देव
युवा कवि और आलोचक
क्या तो समय , कविता संग्रह ज्ञानपीठ से २००४ में प्रकाशित
पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और लेख
ई पत्रिका समालोचन का संपादन
www.samalochan.blogspot.com

सम्प्रति- सहायक प्रोफेसर
साहू जैन कालेज,नजीबाबाद (बिजनौर,उ.प्र.)
मोब.- 09412656938
ई.पता- devarun72@gmail.com

अरुण देव की कविताएँ

(फर्गुदिया के कार्यक्रम में २३/७/२०१२., इण्डिया गेट, नई दिल्ली में पढ़ी गईं)



1-हत्या
उसकी हत्या हुई थी.
सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था.
 खेतों से होकर गुजरता था. वही से वह गायब हुई.
वही गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला,
कई दिनों बाद. चेहरा झुलसा हुआ. कपड़ो से पहचानी गई.

पिता ने ज़ोर देकर कहा कपड़ो से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है.
 लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज़ बचाई.

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था.
चेहरे पर थकान.
जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो.

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे.
 एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढाने की.

वह सिपाही बनना चाहती थी.
कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी.
अन्त समय उसने मोबाईल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई,
चचेरे भाई थे. ऐसा उस लड़की की जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे. बार-बार



अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती
तो इसे स्वाभाविक माना जाता,
उसके इस स्वेछाचार का अन्त यही होना था,
इसी किस्म से कुछ कहा जाता.
और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती.

उसकी बस हत्या हुई थी.
उसका किसी से प्रेम या शारीरिक सम्बन्ध नहीं था.
यही राहत की बात थी.

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रौशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती,
उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी
क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे.







2-मेरे अंदर की स्त्री

तुम्हारे अंदर जो अँधेरा है
और जो जंगल है घना, भीगा सा
उबड खाबड से बीहड़ हैं जो दु:स्वप्नों के
उसमें मैं एक हिरन की तरह भटकता हूँ
कोई गंध मुझे ढूंढती है
किसी प्यास को मैं खोजता रहता हूँ

यहाँ कुछ मेरा ही कभी मुझसे अलग होकर भटक गया था
मैं अपनी ही तलाश में तुम्हारे पास आया हूँ

कब हम एक दूसरे से इतने अलग हुए
की तुम स्त्री बन गई और मैं पुरुष
क्या उस सेब में ऐसा कुछ था जो तुमने मुझे पहली बार दिया था

उस सेब के एक सिरे पर तुम थीं
मुझे अनुरक्त नेत्रो से निहारती हुई और दूसरी तरफ मैं था आश्वस्त...
कि उस तरफ तुम तो हो ही

तब से कितनी सदियाँ गुज़री
कि अब तो मेरी भाषा भी तुम्हें नहीं पहचानती
और तुम्हारे शब्द मेरे ऊपर आरोप की तरह गिरते हैं
तुमने भी आखिरकार मुझे छोड़ ही दिया है अकेला
अपने से अलग
हालाकि तुम्हारी ही अस्थि मज्जा से बना हूँ

तुमसे ही बनकर तुम्हारे बिना कब खड़ा हो गया पता ही नहीं चला
तुम्हारे खिलाफ खड़ा हुआ
यह मेरा डर था या शायद मेरी असहायता
कि मेरा प्रतिरूप तुम तैयार कर देती थी
जैसे कोई जादूगरनी हो
देवि.... दुर्गा.... असीम शक्तियों वाली
सुनो !. तुम्हारे कमजोर क्षणों को मैंने धीरे धीरे एकत्र किया

जब मासिक धर्म से भींगी तुम नवागत की तैयारी करती
मैं वन में शिकार करते हुए तुम्हें अनुगामी बनाने के कौशल सीखता
जब तुम मनुष्य पैदा कर रही थी मेरे अंदर का पुरुष तुम्हें स्त्री बना रहा था

और आज मेरे अंदर का स्त्रीत्व संकट में है
मैं भटक रहा है जंगल-जंगल अपनी उस आधी स्त्री के लिए जो कभी उसके अंदर ही थी.

_________

Friday, August 03, 2012

चेतना की 'मशाल' रोशन करतीं सुमन केशरी जी

सुमन केशरी
शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और यूनिविर्सिटी आफ वेस्टर्न आस्ट्रेलिया से ।
कविता संग्रह : याज्ञवल्क्य से बहस
संपादन : जे.एन.यू में नामवर सिंह

आजकल नेशनल डिज़ास्टर मनेजमेंट ऑथोरिटी में डाईरेक्टर हैं , कवि एवं शोधकारी , सामाजिक विषयों में बेबाक राय रखने वाली, स्त्री विमर्श में सर्वदा अलग विचार रखने वाली |





वरिष्ठ कवयित्रीसुमन केशरी अग्रवाल ने अपनी एक कविता 'धुंध में औरत' और  'औरत' के साथ अपनी बात रखी। अपने प्रभावशाली वक्तव्य  में सभी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने कहा ...यूं तो समाज में हर स्तर पर असहिष्णुता और इसके फलस्वरूप हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं पर आधी आबादी कही जाने वाली औरतों के विरुद्ध हिंसा की घटनाओं और उनके स्वरूपों में जो बढ़ोतरी हुई है उनसे तो रोंगटे ही खड़े हो जाते हैं. आज औरतें घर की चारदीवारी से लेकर बाजार के चौक तक कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. और यह सब तब हो रहा है जब विकास की गाड़ी में स्त्रियाँ बराबर के पहियों की तरह हिस्सेदारी निभाने के लिए न केवल तैयार हो रही हैं बल्कि वे अपने पूरे वजूद के साथ अपने दायित्वों का घर और बाहर -दोनों धरातलों निर्वाह कर रही हैं. हर साल आने वाले बारहवीं के रिजल्ट और यहाँ तक कि सिविल सर्विसेज के रिजल्ट यही तो दिखा रहे हैं कि अब औरतें बराबरी से कंधे से कंधा मिला कर चलने में सक्षम हैं , चल रही हैं.

तो फिर स्त्री के शरीर को एसिड से जला देने से लेकर जननांगो में पत्थर भर दिए जाने , सामूहिक बलात्कार और सरेआम एक साथ कई दरिंदों द्वारा मारपीट और नोच-खसोट तक की घटनाएं क्यों ? और इन सबके साथ ऐसे फरमान क्यों कि स्त्रियाँ जींस नहीं पहनेंगी, माथा ढकेंगी , मोबाईल का इस्तेमाल नहीं करेंगी और भाई, पिता, पति या पुत्र के साए तले ही घर से बाहर कदम रखेंगी .

ये सब घटनाएं और फ़रमान पितृसत्तात्मक मानसिकता के किस स्तर की सूचना देते हैं? ऐसा क्यों है कि जो समाज लड़कियों को पढ़ाने और उन्हें आर्थिक स्तर पर आगे आने के लिए रास्ता बनाता है वही उस स्त्री के तन और मन दोनों पर काबिज रहना चाहता है और उसे खुदमुख्तार नहीं बनने देना चाहता?


1-
धुंध में औरत


----------------



चीरती धुंध को
निकलती है एक अस्पष्ट आकृति
खुद को समेटे
चौकन्नी सी
अपने पूरे वजूद से आहटों को सुनती
बेआवाज तेज कदम उठाती
बढ़ती है औरत
धुंध से धुंध तक
चीरती हुई
धुंध।

कुछ आहटें हैं पास
कहकहे लगातीं, आवाजें कसतीं
बुलातीं, मनुहार करतीं


काँपता है तन
पत्ते सा पतझर में

मन को समेटती
अपने पूरे वजूद से आहटों को सुनती
बेआवाज तेज कदम उठाती
जा छिपती है औरत
धुंध में।


2-'औरत'

------------------

रेगिस्तान की तपती रेत पर
अपनी चुनरी बिछा,
उस पर लोटा भर पानी
और उसी पर रोटिय़ाँ रख कर
हथेली से आँखों को छाया देते हुए
औरत ने
ऐन सूरज की नाक के नीचे
एक घर बना लिया।

Wednesday, July 04, 2012

"एक शाम फरगुदिया के नाम" काव्य संध्या में रश्मि भारद्वाज द्वारा पढ़ी गई कविता








बिजूका


देह और मन की सीमाओं में

नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....

अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं

और देह उसकी खरीदी जा सकती है

टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....


गरीब की बेटी नहीं पायी जाती

किसी कविता या कहानी में

जब आप उसे खोज रहें होंगे

किताबों के पन्नों में ........

वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच

गोबर में सनी बना रही होगी उपले

या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...

सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती

खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....



आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया

कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से

उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के

कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में

देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....


आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी

कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी

बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....

यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर

दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की

और बचा सके गरीब की बेटी को

नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......



गरीब की बेटी नहीं बन पाती

कभी एक अच्छी माँ

कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में

कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....

ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है

अपनी नन्ही सी जान को

किसी भी कारखाने या होटल में

चौबीस घंटे की दिहारी पर .......




अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी

कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....

शुक्र बाज़ार में दस रुपए में

मिल जाता है उसका मंगलसूत्र

उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....




आप सिखा सकते हैं उसे मायने

बड़े-बड़े शब्दों के 

जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे

लेकिन नहीं सीखेगी वह

कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है

जिस पर लिखा है एक ही शब्द

भूख ........

.और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....



गरीब की बेटी नहीं जीती

बचपन और जवानी

वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा

जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है

इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !

वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....

दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है

जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी




कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....( रश्मि भारद्वाज)

Monday, July 02, 2012

"एक शाम फरगुदिया के नाम" काव्य संध्या में रश्मि भारद्वाज द्वारा पढ़ी गई कविता


बिजूका

देह और मन की सीमाओं में
नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....
अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं
और देह उसकी खरीदी जा सकती है
टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....

गरीब की बेटी नहीं पायी जाती
किसी कविता या कहानी में
जब आप उसे खोज रहें होंगे
किताबों के पन्नों में ........
वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच
गोबर में सनी बना रही होगी उपले
या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...
सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती
खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....

आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया
कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से
उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के
कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में
देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....

आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी
कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी
बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....
यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर
दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की
और बचा सके गरीब की बेटी को
नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......

गरीब की बेटी नहीं बन पाती
कभी एक अच्छी माँ
कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में
कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....
ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है
अपनी नन्ही सी जान को
किसी भी कारखाने या होटल में
चौबीस घंटे की दिहारी पर .......

अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी
कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....
शुक्र बाज़ार में दस रुपए में
मिल जाता है उसका मंगलसूत्र
उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....

आप सिखा सकते हैं उसे मायने
बड़े-बड़े शब्दों के
जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे
लेकिन नहीं सीखेगी वह
कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है
जिस पर लिखा है एक ही शब्द
भूख ........
.और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....

गरीब की बेटी नहीं जीती
बचपन और जवानी
वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा
जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है
इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !
वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....
दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है
जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी
कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....( रश्मि भारद्वाज)

Monday, June 18, 2012

"एक शाम - फ़रगुदिया के नाम " कार्यक्रम में डॉ सविता सिंह जी द्वारा प्रस्तुत कविताएं

डॉ सविता सिंह 
-----------------------





१- आघात 
_______

इस पहर एक आवाज़ आती है

अपनी ही साँस चलने की
इस पहर मेरे ही प्राणों के स्पंदन से
चलती है यह सृष्टि
इस पहर चीज़ों के यूँ होने का
मैं ही हूँ सुखद उदगम

इस पहर एक चिड़िया अपने घोंसले में
स्वप्न देख रही है
की यह दुनिया सुन्दर हो रही है
एक स्त्री अपनी व्यथा को उतारकर
रख रही है एक तरफ ____
चिरपरिचित अपने परिधान को
अपने लम्बे बालों को खोलकर दोबारा बाँध रही है
जैसे किसी तैयारी में हो
कहीं जाने की आतुरता हो उसमें
एक सादगी में जैसे वह उतरना चाहती हो
पार करना चाहती हो जैसे कोई नदी

वह पार उतर भी जाती है
जाती हुई दिखती है फिर उधर
जिधर प्रकृति है और हरीतिमा
नए परिधान उसके
जिसमें प्रसन्नचित्त वह प्रतीक्षा करती है
नए आघात की


२- नया एकांत
_____________

आखिरकार अपनी भाषा में हूँ सुकून से

मुझे खोजने आ सकतें हैं मेरे प्रेमी
मैं मिलूंगी भी अब शायद उन्हें सजी-धजी
उनका स्वागत करती
अब मुझमें कोई संशय नहीं
न भीरुता पहले वाली
जरा भी रहस्यमय नहीं रहूंगी अब मैं
जैसे मैं थी जब नहीं समझती थी भाषा के तिलिस्म को
उसके विस्तार को

इस समय कितनी सहज हूँ मैं
साधारण कितनी साधारण
सचमुच जैसी मैं हूँ
अपनी कविता में जीवन की समझ की तरह
व्यथित-आनंदित एक राग की तरह खुद को गाती
बेफिक्र जैसे कोई नदी
चुपचाप बहती किसी जंगल में

अपनी भाषा में फिर भी कितनी सबके साथ हूँ
बिना किसी द्वेष और स्पर्धा के
जो झिझक है थोड़ी बहुत दूसरों को लेकर
वह कविता की ही है
वह खुद उसे झाड़ लेगी जब वह नया समाज बना लेगी
इसका यकीन है भाषा को ही

मैं हूँ सुकून से जैसे पहले कभी न थी
आश्वस्त भी कि प्रेम पहचान लेगा इस नए एकांत को

३-सपनें और तितलियाँ
_____________________

एक लंबे सपने का यह छोटा सा हिस्सा है

इसमें मैं बेदम भाग रहीं हूँ
देखतीं हूँ एक घने जंगल में हूँ
पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की  तरह आश्वस्त
जंगल के जीवों के बीच निर्भय
उनके प्रलापों से अवगत
इधर-उधर घूमती पास की  नदी तक जाती
बैठती किसी पुराने पत्थर पर

तभी आता है कोई घोड़े पर सवार
पास उतरता है मेरे
फिर कहता है ढूँढ़ता रहा है वह कई जन्मों से मुझे
कि मेरे पास उसके कुछ फल और नदियाँ हैं
कि वह भूखा और प्यासा है
पीने आया है अपने हिस्से का जल मुझमें ....... कवितांश

Thursday, June 07, 2012

"फर्गुदिया के नाम- एक शाम " कार्यक्रम में स्नेह सुधा नवल जी द्वारा सुनाई गयी तीन कविताएँ


1 - सीमा

जितना तप यशोधरा के
व्यक्तित्व में हैं
शायद ही किसी
बुद्ध में हो

जितना संघर्ष
इस मुट्ठी भर हृदय में हैं
शायद ही किसी
विश्व युद्ध में हो |

2 - गौतम

अच्छा हुआ गौतम !
की तुम
इस युग में
नहीं हुए
अगर होते
तो __
मेरे साथ
अस्पताल की
बैंच पर बैठ
दुसाध्य रोगी,
असमय वृद्ध
और कई शव
देखने के बावजूद भी
शायद तुम्हें
कुछ  नहीं व्यापता
और तुम
बुद्ध बनने से
वंचित रह जाते |





3 - स्त्री-पुरुष



मुझे कहा जाता रहा _

स्त्री बूंद है, पुरुष सागर
प्रकृति का नियम
बताता रहा मुझे बार-बार ज़माना
नदी की नियति सागर में समाना
पर सच कहूँ _
मैंने तो विपरीत पाया
जब ज्ञान आया
नदी तो पुरुष है चंचल मदमाता
हिलोरे डुलाता भागता सीमा रहित
और स्त्री लगी सागर
सीमित,शांत और गंभीर
पर
प्रकृति का सच
सच है आज भी
की नदी की नियति अंततः
सागर ही है
अतः
पुरुष बूंद है, स्त्री गागर
पुरुष नदी है, स्त्री सागर | 

Sunday, June 03, 2012

"फर्गुदिया के नाम - एक शाम " कार्यक्रम में विपिन चौधरी द्वारा सुनाई गयी दो कविताएँ


१ . पीड़ा का फलसफा
 दर्द को मुठ्ठी में कैद कर उसके फलसफे का पाठ

फिर चार- पांच दिन अपने हाल पर जीना
अपने तरीके से जूझना
अभ्यास  करना
सहजता से चाक-चौबंद रहने के लिए
और  सजगता भी ऐसी जो
धूनी की तरह सिर से पाँव तक अपना पसारा जमा ले


पीड़ा को अपनी गोदी में सुलाने के ये दिन
पीड़ा जो पीठ की तरफ से आती
या कभी तलवे से उठान भरती


हर बार दर्द का चेहरा बहुत अलग होता है
हर बार उससे जूझने का तरीका वही


हर दिलासा का दूत एक तरफ से आया
नज़दीक आये बिना पल में हवा हो गया


मानीखेज़ चीजें  गोल दिशा में डूब कर आयी
दुःख, प्रेम, ख़ुशी
फिर ख़ुशी, प्रेम, दुःख
सात राग बारी बारी से जीवन में आये
पर चार दिन वाली  इस सनातन पीड़ा
ने चारों दिशाओं से अपनी बर्छियां  चलायी


महीनें के इन चार दिनों वाली अबूझ पहेली से पहले पहल
परिचय विज्ञान की कक्षा ने करवाया  
जब सर झुकाए
मिस लीला को सुनाते और
सोचते,
 ‘क्या ही अच्छा होता
कि आज  कक्षा में बैठे ये सारे के सारे लडके लोप हो जाते’


फिर एक दिन स्वयं साक्षात्कार हुआ
कई हिदायतों से बचते बचाते
सिर छुपाते
कहर के पंजों के लडते रहने वाले इन दिनों से


खुदा, खुद
औरत की जुर्रत से भय खाता था
सो औरत को औरत ही बनाए रखने की यह जुगत उसकी थी


हम औरतों  के ये चार दिन अपनी देह की प्रकृति से लडते बीतते
तभी जाकर एक जंगली खुनी समुंदर को अपने भीतर जगह देने का साहस
इस आधी आबादी के नाम पर लिखा जा सका


इन चार दिनों में औरत का चेहरा भी
हव्वा का चेहरा के बिलकुल  करीब आ जाता है
हालाँकि  हव्वा भी अब बूढ़ी हो गयी है
इस चार दिनों वाली परेशानी से जूझने वालेउसके दिन अब लद गए हैं


इन्हीं भावज दिनों में अपनी भावनाओं को खोलने के लिए
किसी चाबी का सहारा लेना पड़ता है
कभी ना कभी हर औरत कह उठती है  
’माहिलाओं  के साथ  इस व्यवाहरिक  मजाक  को क्यों अंजाम दिया गया’
फिर एक मुस्कुराते बच्चे की तस्वीर को देख कर
खुद ही वह अपनी सोच वापिस ले लेती है


हर महीने जब  प्रकृति का यह तोहफा  द्वार खटखाता है
तब योनी गुपचुप एक आतंरिक योग में व्यस्त हो जाती है
अपरिहार्य कारणों से
पीड़ा की इस स्तिथी  में भी महिलाओं की उँगलियाँ  मिली  हुई (crossed ) रहती   हैं
जिनकी बीच कस कर एक उम्मीद बेपनाह ठाठे मारती है

यो प्रक्रति का पीड़ादायक रुदन
सहज तरीके से सुरक्षित बना रहता है
संसार की हर औरत  के पास
जब एक स्त्री पांचवे दिन नहा धो कर
आँगन में चमेली की महक के बराबर खड़ी होती हैं तो
प्रकृति  उसका  हाथ और भी मजबूती  थाम  लेती है


२ .चन्द्रो
  (स्तन कैंसर से जूझती महिलाओं को समर्पित) 
चन्द्रो,
यानी फलाने की बहु 
धिम्काने की पत्नी 
पहली बार तुम्हें चाचा के हाथ में पकड़ी एक तस्वीर में देखा 
अमरबेल सी गर्दन पर चमेली के फूल सी तुम्हारी सूरत 
फिर देखी 
श्रम के मजबूत सांचे में ढली तुम्हारी आकृति 
कुए से पानी लाती 
खड़ी दोपहर में खेतों से बाड़ी चुगती 
तीस किलों की भरोटी को सिर पर धरे लौटती अपनी चौखट    
ढोर-डंगरों के लिए सुबह-शाम हारे में चाट रांधने में जुटी  
किसी भी लोच से तत्काल इंकार करती तुम्हारी देह 
इसी खूबसूरती ने तुम्हें अकारण ही गांव की दिलफेंक बहु बनाया 
फाग में अपने जवान देवरों को उचक-उचक कोडे मारती तुम 
तो गाँव की सूख चली बूढ़ी चौपाल 
हरी हो लहलहा उठती 
गांव के पुरुष स्वांग सा मीठा आनंद लेते 
स्त्रियाँ पल्लू मुहँ में दबा भौचक हो तुम्हारी चपलता को एकटक देखती 
                                                                        
अफवाओं के पंख कुछ ज्यादा  ही चोडे हुआ करते हैं 
अफवाहें तुम्हे देख 
आहें भर बार- बार दोहराती 
फलाने की दिलफेंक बहु 
धिम्काने की दिलफेंक स्त्री 
इस बार युवा अफवाह ने सच का चेहरा चिपका 
एक  बुरी खबर दी 
लौटी हो तुम अपना एक स्तन 
कैंसर की चपेट में गँवा कर
शहर से गाँव   
डॉक्टर की हजारों सलाहों के साथ 
  
अपने उसी पहले से रूप में 
उसी सूरजमुखी ताप में 
इस काली खबर से गाँव के पुरूषों पर क्या बीती 
यह तो ठीक-ठीक मालुम नहीं 
उनके भीतर एक सुखा पोखर तो अपना आकार ले ही गया होगा 
महिलाओं पर हमेशा के तरह इस खबर का असर भी 
फुसफुसाहट के रूप में ही बहार निकला 
चन्द्रो हारी-बीमारी में भी 
अपने कामचोर पति के हिस्से की मेहनत कर 
डटी रही हर चौमासे की सीली रातों में 
अपने दोनो बच्चों को छाती से सटाए
निकल आती है 
आज भी   बुढी चन्द्रो 
रात को टोर्च ले कर 
खेतों की रखवाली के लिए  
अमावस्या के जंगली लकडबग्घे  अँधेरे में 

Friday, June 01, 2012

मै यूँ ही प्रवाहित हो गई जल में - निरुपमा सिंह


............ निरुपमा सिंह .......
कवित्री , लेखिका
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 




मैं फरगुदिया

भ्रूण बन रोप दी गई अनचाही धरा में

निरीह (बाप )और गरीब (माँ )द्वारा ..

नियति अपने अंश को आकार देता

जीवन बन चुका था ...

ठीक नौ माह बाद ...

पता नहीं माँ के खेत में काम करने की मज़बूरी ?

या प्रसवपीड़ा ?

मै आ चुकी थी बिना किसी झंझट का

..वस्त्र पहने !

रंग -रूप भी भगवान ने

अमीरों की चाहत की तरह  भर दिया था

'माँ' के थप्पड़ से सहेजती अपने को

पिता की क्रूर आँखों का पहरा

आईना देखने से डरती मै !

सखी -सहेलियों को विदा करते

कब मैंने बचपन को छोड़ दिया ..सुध ही नही

अलहडपन को समेट लौट रही थी .......

.......................रास्ते में बालिग़ करार ..............

.............देते हुए ........मुझसे मेरे जीने का हक छीन लिया गया .

पत्थर मेरी आँखे ...........बर्फ मेरी साँसे .....

घर लौटने का मकसद ...धुंधलाने लगा ...

..........समय की रेत सी (भभकती )सड़क ....

जिन पर से ज़बरन खीचती माँ ...........

ले गई मुझे सीलन भरी कोठारी में ......

पीले दांतों वाली ...काली छाया ने

अनुभवों के मापदंड पर

मृत घोषित कर दिया ..........

........मरने के बाद ..कोई सार्वजनिक जगह नही थी

जहाँ मेरा दाह-संस्कार हो सके ?

कंधे तो चार चाहिए थे .

..पर ...मै तो बिना कंधे वाले समाज की उत्पति थी ....

खैर !!!!!!!!!!

अपने ही भाई बहनों द्वारा ....घसीटती.. पहुंचाई ..गई ..श्मशान तक

संस्कारगत ..कुछ विधियाँ बाक़ी /संवेदनावो के फूल सरीखी ...

सफ़ेद फूल ..मेरी अपवित्रता के लिए ठीक न थे ...

और लाल ...मुझ पर चढ़ाया नही जा सकता था !!

उहापोह में ...

जलाये जाने की विधि किनारे आ गई ..

लड़की और विपन्नता दोनों ...एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में..

...जितनी लकड़ी मुझें जलाने के लिए चाहिए थी .....

उतने में मेरे परिवार का कई दिन चूल्हा जलता !

संकोच ...निःसंकोच को दबोचता ....

मै यूँ ही प्रवाहित हो गई जल में..

............मेरा वज़ूद ...पीपल की पेड़ पर

............".अपवित्र चुड़ैल "बना टांगा जा चुका है(रहस्यमयी मृत्यु )

.....दूर कहीं से शंख ध्वानि ....किसी और किशोरी को ..

अपवित्र करने का शंख नाद कर रहा था ...........!!


............ निरुपमा सिंह .........कवयित्री , लेखिका 

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