Showing posts with label मनीषा कुलश्रेष्ठ. Show all posts
Showing posts with label मनीषा कुलश्रेष्ठ. Show all posts

Wednesday, February 20, 2013

सायबर लव - आलेख, मनीषा कुलश्रेष्ठ


 सायबर लव        
*************

"सोशल नेटवर्किंग साईट्स से घर बैठे हमें बहुत महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिल जातीं हैं , इस आभासी दुनिया के मित्रों से मिलकर बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है लेकिन सायबर प्यार के मामले में ज़रा संभलकर रहने की जरुरत है, इंटरनेट के माध्यम से डिस्काउंट में मिले प्रेम से ज़िन्दगी संवरने के चांसेज कम होतें हैं , डिप्रेशन में जाने के ज्यादा होतें हैं ... 'अहा ज़िन्दगी '  फरवरी माह के प्रेम महाविशेषांक में प्रकाशित कथाकार,उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखा  आलेख 'फरगुदिया' पर आप सभी के लिए ..."  


सायबर लव और सायबर संबंध भले ही भारत में, इस दशक के उत्तरार्द्ध में मध्यमवर्गीय शहरों और मध्यमवर्गीय समाज में लोकिप्रिय हुए हों, मगर पन्द्रह साल पहले भी चैट रूम्स में सायबर रोमांस, सायबर फ्लर्टसायबर सेक्स अस्तित्व में थे. तब सोशलनेटवर्किग साइट नहीं हुआ करती थीं. उन्हीं दिनों से सायबर रोमान्स के चलते विकसित देशों में बहुत से दिल जुड़े  भी तो दिल टूटे भी, घर बसे भी, उजड़े  भी. टूटे दिलों और उजड़े  घरों के लोग मनोवैज्ञानिक सहायता के लिए मनोचिकित्सक के क्लिनिक के लिए जाने लगे. फिर वह समय आया जब अमेरिका और जापान में तभी सायबर रोमान्स पर सायकियाट्रिक वर्कशॉप होने लगी थीं. इन दस सालों में बहुत सारी अजीबोगरीब सायबर सफल प्रेम, सायबर मैरिजेज, सायबर असफल प्रेम, सायबर प्रेम अपराध, सायबर डेट रेप की कहानियां सामने आईं. इस किस्म के प्रेम पर चर्चित देशी (मित्र)और विदेशी फिल्में(यू हैव गॉट मेल) बनीं.  जुकरबर्ग़ के स्वयं के प्रेम ने फेसबुक को इतना बड़ा माध्यम बना दिया.

अब जिस तरह से आम भारतीय सोच में बदलाव आया है और इंटरनेट का बूम आया है, युवा, सोशल नेटवर्किंग साइट्स का दीवाना होने लगा है. जिस तरह से सायबर प्रेम परवान चढ रहा है, मुझे लगता है जल्दी ही हमें भी ऐसी ही मनोचिकित्सकीय कार्यशालाओं की जरूरत पड़ने लगेगी. बीसवीं सदी के बीतते हुए पनपी इस तकनीकी को सलाम कि सायबर स्पेस ने हमारी सामाजिक सीमाओं को विस्तार दिया है और हमारी काम करने की पद्धत्ति को बदला है. मगर इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के ही साथ इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग और ऑनलाइन डेटिंग की वेबसाइटों के चलते जाने कितनी सायबर प्रेमकहानियों ने स्क्रीन पर जन्म लियाकुछ भ्रूणावस्था में ही मर गईं¸ कुछ स्क्रीन पर ही बनीं और बिखर गईं¸ कुछ सफल सायबर प्रेम कहानियां बनी और विवाह में परिणत हुईंदेश की सीमाओं के भीतर और तमाम वैश्विक हदों के बाहर जाकर मिसाल बनीं . कुछ प्रेम अपराधकथाओं में बदल गईं. सायबर प्रेम की गाथाएं लिखने बैठें तो सच्चे अनुभवों पर कई कई महाकाव्य बन जाऐंगे.

सायबर प्रेम यानि ई - क्रश, या 'क्रॉसिंग द लाईन ऑनलाईन'. कुछ भी कह लेंप्रेम तो प्रेम है. प्रेम में पडना अपने आप में एक सम्मोहन है. प्रेम शब्द से प्रेमएक मानसिक अवस्था है, अति होने पर मनोविकार भी.

          इतिहास गवाह है कि स्त्री और पुरुष अपने लिए सही जीवनसाथी पाने के लिए या प्रेम भर करने के लिए, सदियों से तरह  तरह के साधनों का उपयोग करते रहे हैं¸ चाहे वे कबूतर हों¸ दूतियां हों¸ चूडी बेचने वालियां हों. सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मिनी और चित्तौडग़ढ क़े महाराणा रतनसिंह और अलाउद्दीन खिलजी की प्रेम¸ अंधे आकर्षण¸ शौर्य और बलिदान की यह ऐतिहासिक त्रिकोणात्मक गाथा पुष्टि करती है इन साधनों की. सत्तर¸ अस्सी और शुरूआती नब्बे के दशक में प्रेम हरेक को सहज सुलभ नहीं था, कॉलेज और रेस्तरां लडक़े - लडक़ियों से भरे तब भी थे¸ मगर अभिव्यक्ति के माध्यम अतिसंक्षिप्त थे. दिल की बात कई बार जबां पर ही अटक जाती थी, अस्वीकृति का भय लगातार बना रहता था. अब सायबर स्पेस है न यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा कुंवारे सायबर - खाक छान रहे हैं.
आजकलबेहतर साथी की तलाश में. पहले की तरह यह नहीं कि मोहल्ले की सबसे ठीक कन्या पर आकर सब्र कर लिया जाए या क्लास में महज एक ढंग का अनार हो और सारे के सारे, सौ बीमार हों.

हालांकि ऑनलाइन संबन्ध, सहज सम्बन्धों से एकदम अलग तरह से विकसित होते हैं. लव एट फर्स्ट साइट की जगह लव एट फर्स्ट बाइट. इस सायबर प्रेम में दैहिकता की सीमा पाटने के लिए इसकी अपनी भाषा विकसित हो चुकी है¸ संक्षिप्त और मारक मसलन ठहाके के लिए LOL¸ आलिंगन के लिए < >¸ कस के आलिंगन करना हो तो <<< >>>¸ चुम्बन के लिए हैं इमोटीकोन्स. फिर स्माइलीज हैं न जो आपकी मनोदशा बताते हैं चैटिंग के दौरान. सक्सेसफुल ऑन लाईन डेटिंग के गुर बताती हैं कई वेबसाइट्स¸ जबकि ऑनलाईन डेटिंग को भुना रही हैं कई वेबसाइट्स. ऑनलाईन डेटिंग में आम प्यार की तरह ही आनंद और पीड़ा दोनों आपको प्रसाद में मिलते हैं. यहां कुछ कह नहीं सकते, कि आपको क्या मिलने वाला है प्रेम के नाम पर,  चांसेज फ़िफ्टी - फिफ्टी! आपको आपका सच्चा प्रेम भी मिल सकता या एक अच्छा - खासा धोखा भी. मान लीजिए कि पटना की प्रमिला 'क्यूट पॅमेला' बन कर रामपुर के रामभरोसे बनाम 'रैम्बो' को सायबर डेट कर रही है, पिछले सात महीने सेदोनों की सायबर उम्र कुछ भी हो सकती है और असल उम्र कुछ और. यही बात पेशे और शैक्षणिक स्तर पर भी आ जाती है. सायबर विस्तार अपने आप में बहुत विस्तृत होते हुए भी अलग तरह की सीमाएं रखता है. छल और धोखे की शत - प्रतिशत संभावनाएं यहां हैं¸ अज्ञात और गोपनीयता के पर्दे में लिथड़ा प्रेम कई बार बहुत दुखदायी हो जाता है. ऐसे में आप चैटरूम में किसी अनजान कूल डूड या क्यूट बेब या फिर लकी लिप्स या माचो मैक के प्रेम की आड़ में बस फालिंग इन लव की चक्करदार जाईंट व्हील की राइड का मजा भर ले रहे होते हैं. जो हो सकता है सच में मिलने पर निराश- हताश करे. या फिर आप चारों खाने चित्त धाराशाई मिलें.

        आईए जानें कि मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं एक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इंटरनेट पर अकसर लोग अपनी आभासी छवि पेश करते हैं. जानकर भी और अनजाने भी ऑनस्क्रीन इमेज में अकसर लोग अपनी वह छवि बनाते हैं जैसा कि वे खुद को देखना चाहते हैं¸ या इस खामख्याली में रहते हैं कि वे ऐसे हैंअपने व्यक्तित्व का सच में खुद उनको नहीं पता होता है विरोधाभास उनकी सायबर छवि में खूब दिखता हैवहां वो गढ़े हुए यानि ऑल्टर्ड सेल्फ होते हैं¸ अपनी आदर्श छवि में बंधे हुए स्वयं को पेश करते हुए. अपनी व्यक्तिगत और असल छवि को लेकर उनमें आत्मविश्वास नहीं होता. वे खुद भी महसूस करते हैं कि वे जब ऑनलाइन होते हैं तो ज्यादा खुश और आत्मविश्वासी होते हैं. ये चीजें सायबर संबंध को भुरभुरा बनाती हैं. रोमांच, सायबर रोमांस का पहला गुण है. एक दूरस्थ अजनबी में प्यार को खोज पाने का रोमांच. फरफेक्ट सोलमेट ढूंढने के चक्कर में एक से दूसरा, तीसरा, फिर न जाने कितने सायबर प्रेम. सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर इनबॉक्स प्रेम बड़ा लोकप्रिय है, रंग लगे न फिटकरी....परफेक्शन प्रेम का किश्तों में, इसमें यह तो उसमें वह ! यह तय है कि इसायबर संबन्धों में एकनिष्ठता भी फिर वर्चुअल ही होती है, हर बार प्रेम में पड़ने का रोमांच ज्यादा से ज़्यादा होता है. भले ही आज का आपका परफेक्ट सोलमेट एकदम कल ही एक भ्रम साबित हो! वह एक ऊबी हुई गृहणी या कॉल सेन्टर में बैठा कोई टेलीकॉलर हो सकता है¸ या फिर कोई सायको अधेड. वजह यही है कि इंटरनेट को प्रेम के नाम पर एक पलायन की तरह इस्तेमाल करने का आंकड़ा बढ ग़या है. ऊबे हुए लोग¸ हीनभाव से ग्रस्त लोग इस अवास्तविक संसार से बहुत आकर्षित होते हैं. वे सोचते हैं कि हम बस वही हैं, जो हम टाईप करते हैंलिखते हैंकहते हैं. अपने रूपरंग¸ व्यवहार¸ वजन और स्टायल और छवि को लेकर यहाँ आसानी से झूठ बोला जा सकता हैहाल ही में एक भारतीय लडक़ी ने दूर विदेश में बैठे एक लडक़े को ऐश्वर्या राय का फोटो भेज कर लिख दिया यह मैं हूँ. अब अंतर्राष्ट्रीय खबर बन चुकी ऐश को किसी चैनल पर देख कर विदेशी लडक़े ने इस बात पर हंगामा काटा और यह खबर भारतीय मीडिया में भी आ गई. बल्कि अब तो यह आस-पड़ोस और परिवारों में होने लगा है कि सोशल नेटवर्किंग साईट पर प्रेम हुआ और स्कायप’ पर सगाई. जब शादी हुई तो कभी नियामत साबित हुई तो कभी ‘कयामत’ !

ऑनलाइन रोमांस में दूसरी चीज स्पीड होती है. आकर्षण और निकटता के बीच ऐसी कई धीमी अवस्थाएं होती हैं¸ जिनमें बार - बार मिल कर एक - दूसरे को समझना और हल्का आशंकित होना भी है. लेकिन इस स्पीड के चलते प्रेम की ऐसी कई जरूरी अवस्थाएं अनजान छूट जाती हैं, जो कसौटी का काम कर सकती हैं. ऑनलाईन रोमांस में आकर्षण और निकटता के बीच कुछ नहीं होता. आकर्षण¸ इंस्टेन्ट अभिव्यक्ति और फिर सायबर लव जो कि न जाने कब 'सायबर लस्ट में बदल जाता हैफिर एक समय बाद यह भी उबाऊ होने लगता है. इस प्रेम का त्रिआयामी चित्र पूरा कभी सामने नहीं आता. एक व्यक्ति को व्यक्तित्व बनाने में बहुत से आयाम काम करते हैं. ऑनलाइन टायपिंग से आप व्यक्ति का स्वभाव¸ काम¸ गुण पूरा पूरा नहीं जान सकते. आप नहीं जान सकते कि उसे कब किस बात पर गुस्सा आता है¸ उसके कपड़े  पहनने का ढंग कैसा है¸ वह हकलाता है या बोलता है तो मुंह से थूक गिरता है, या उसकी चाल में लचक है.
यह सच है कि कुछ हद तक, किसी न किसी तरह का 'सायबर सम्बन्ध' संभव है. सायबर आकर्षण की अपनी जगह है, इस संसार में. मगर सायबर प्रेम? क्या यह संभव है?
मैं पूरी तरह से सहमत हो ही नहीं पाती कि यहाँ लोग अपने सही रूप में खुद को कंप्यूटर स्क्रीन पर पेश करते होंगे. सायबर दुनिया में लोग वह सब चीजें कह - सुन लेते हैं जो वो रू-ब-रू कभी कहने का साहस न जुटा पाऐंगे. यहां वे संकोचहीन होते हैं, बल्कि यह संकोचहीनता की अवस्था 'अति' पार करके मनोवैज्ञानिक ग्रंथि बन जाती है. संकोचहीनता की यह अति एक परदे के पार, एक परदे के पीछे 'अज्ञात' बन जल्दी ही किसी अजनबी को अपना सब कुछ बता देने, किसी पर भी सहज ही विश्वास कर लेने, बहुत निकट महसूस करने की हदों के पार ले जाती है. सायबर स्पेस में अंतरंगता बहुत तेजी से विकसित होती है.

सायबर-स्पेस के सोशल-नेटवर्क में आमतौर पर लोग खुद को वैसा प्रस्तुत करते हैं जो उनकी कल्पनाओं के अनुसार आदर्श होता है मगर सच्चे तौर पर नहीं. वे अपने 'आल्टर्ड सेल्फ' और 'आल्टर्ड ईगो' के साथ आपके सामने होते हैं.  मैं इसे 'प्रोजेक्टिव आइडियलिज्म' कहूंगी. जब आप सामने वाले को देख,सुन,महसूस नहीं कर रहे होते हो, बस एक खाली स्क्रीन और कीबोर्ड आपके सामने होता है, तब हम अपनी उन खूबियों को पेश करते हैं जो हमें बेहद पसंद होती हैं. चाहे वे हममें हो न हों. हम अपने ही सपनों के 'खुद' बन जाते हैं.उसमें हम वो सारे रंग भरते हैं जो खूबियां हमें दूसरों में पसंद होती हैं. फिर जब सामने भी कोई है तो वह भी इस मानसिकता के तहत यही सब करता है, वह प्रतिक्रिया में आपके 'आइडियल प्रोजेक्शन' की होड़ में अपना भी आदर्श स्वरूप प्रस्तुत करेगा ही न ! वह क्यों पीछे रहेगा? आप की सोच में वह अपनी सोच जोड़ेगा, कई बार आपको लगेगा कि  'वाह ! यह कितना कुछ मेरे जैसा है न!' या 'कितना समझता है यह मुझे' यही पहला कदम है सायबर आकर्षण का. इंटरनेट पर आपके 'आदर्श स्व' को हवा देने वाले और सायबर रोमान्स को उकसाने वाले 'इंटरनेटी केसेनोवा' भरे पड़े  हैं. जिन्हें अमरीकी मनोवैज्ञानिक सायबरहोलिक्स या इलेक्ट्रॉनिक कोल्ड टर्कीज का नाम देते हैं.

ऑनलाईन फ्लर्टिंग की शुरूआती हल्के - फुल्के संवाद के बाद शुरू होती है. ऑनलाइन डेटिंग या सोशल नेटवर्किग साइट के पन्नों पर या फिर चैटरूम में. शुरूआत अकसर व्यक्तिगत बातों के शेयर करने से होती है. फिर दो अजनबी एक दूसरे के दोस्त बनने लगते हैं. धीरे - धीरे दिल खुलते हैं. - मेल्स या मैसेजेज का एवेलान्च आता है. वर्चुअल उपहारों, फूलों के चित्र, चुम्बनों वाले स्माइली, एनीमेटेड लव सिग्नल्स अदले - बदले जाते हैं. कोई भी प्यार भरा दिल इस सब के संक्रमण से ग्रसित हुए बिना फिर रह सकता है भला? हर बार धडक़ते दिल और पसीजी हथेलियों से आप माऊस थामते हैं. अपने इनबॉक्स में नई ई - मेल या सोशलनेटविर्किग साइट के आपके प्रोफाइल पेज पर नया मैसेज या नोट देख कर पेट में गड्ढे बनते - बिगडने लगते हैं. फिर तस्वीरों की अदल बदल की बारी आती है. सच्ची तस्वीर हो तो फिर उम्मीदों और सपनों पर आघात लगने का भय बना रहता है या उम्मीदों के पंख लगने शुरु होते हैं. कई  बार  सपनो का राजकुमार या स्वप्न सुंदरी मिल जाती है मगर कई बार महज धोखा. सायबर प्रेम का सबसे मुश्किल दौर होता है मिलन, जो सारे वर्चुअल रोमांस के पत्ते झड़ा सकता है. एक ब्लॉग पर मैं ने किसी का अनुभव पढा था कि मुंबई के एक रोमियो महाशय जहाज पकड क़र सुदूर उत्तरपूर्व के एक सुन्दर शहर में पहुंचे. तयशुदा जगह परएक क्यूट चिक की प्रतीक्षा में खड़े  हुए उसे एक छोटी बच्ची मिली आर्किड्स लिए 'ये मेरे भाई ने भेजे हैं. खेद है वह नहीं आ सका.' छ: महीने लम्बी चैट्स , प्यार भरी - मेल्स वह जिसे करता रहा वह 'चिक' नहीं, 'डूड' था!  यह एक छोटी सी बात ही तो थी जो उसका 'स्वीटहार्ट' बताना ही भूल गया.

        मुझे इस प्रेम पर कई बार हैरानी होती है, प्रेम के शुरूआती प्राकृतिक संकेत, बायलॉजिकली तो दैहिक भाषा के ककहरे मसलन मुस्कान, मुद्राओं, आवाज और आंखों के मूक संवाद में छिपे होते हैं. प्राकृतिक प्रेम में शारीरिक बनावट, दैहिक भाषा, आवाज व्यवहार सब कुछ एक बडी भूमिका निभाते हैं. यहाँ तो बस स्क्रीन और छपे शब्द, कुछ छायाचित्र. वेबकैम का इस्तेमाल तो लोग बहुत अंतरंग होने के बाद ही करते हैं. वैबकैम और वॉयस मैसेज के बावजूद परस्पर संवाद के त्रिआयामी प्रभाव अनुपस्थित ही रहते हैं. कोई शक नहीं कि सायबर स्पेस ने हमारी सामाजिक सीमाओं को विस्तार दिया है और हमारी काम करने की पद्धत्ति को बदला है. यहाँ तक कि इसने मित्र बनाने और बेहतर साथी ढूंढने में एक विस्तृत साधन की भूमिका निभाई हैबावजूद सफल सायबर प्रेमगाथाओं और विवाहों के इंटरनेट सच्चे प्रेम का संवेदनात्मक विकल्प बन सकेगा इस पर मुझे हमेशा संदेह रहा है और रहेगा, क्योंकि एक नैसर्गिक निकटता के लिए अब या बाद में सायबर प्रेमियों को मिलन की दरकार तो रहती ही है. अकसर मिलने पर स्क्रीन से अलग व्यक्तित्व से मिलने पर सायबर इमेज में जोड और घटाव का अनुभव सायबर प्रेमियों को होता ही है जो कि उत्साहजनक या निराशाजनक कुछ भी हो सकता है.
 
वैवाहिक रिश्तों में खटास की एक वजह बनता जा रहा है, यह वर्चुअल रोमानियत का आकाश कि जब भी कोई ऊबा हुआ या अकेलापन महसूस करे तो एक क्लिक के साथ यह आपके लिये खुल जाता है बस पंख पसारने की देर है. तनाव, ऊब, पारिवारिक दबावों के चलते विवाहित लोगों के सायबर लवर्स में बदलने का प्रतिशत बढता जा रहा है. हैरानी की बात है इनमें घरेलू गृहणियों की संख्या विश्वभर में बहुत ज्यादा है. सायबर संसार सबसे ज्यादा महिलाओं को रास आता है क्योंकि यहां उन्हें उनकी दैहिक सुंदरता को लेकर नहीं आंका जाता. उनके बढते वजन और बिगड़ते आकार को लेकर 'आंटीजी' नहीं समझता. पुराने फोटो को देखकर ये सायबर रोमियो वही टायप करते हैं जो वे सुनने को तरसती रही हैं असल लाइफ में. महिलाओं की यह प्रवृत्ति उन्हें शोषित होने की तरफ धकेलती रही है सदियों से तो वर्चुअल संसार में भी यह प्रवृत्ति भुनाई जाती है. ऑनलाइन रोमियोज की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करते हैं. बात मिलने जुलने पर आती है तो डेट रेप जैसे कई किस्से सामने आते हैं.

आज के कारपोरेट समय में ऑफिस रोमान्स की जगह अब सायबर रोमान्स शादियां तोडने की खास वजह बनता जा रहा है. क्योंकि जब दिवा स्वप्नों और सायबर प्रेम के बीच झूलते हुए कोई वास्तविकता को ही भूलने लगे तो असल जिन्दगी के समीकरण तो बिगडेंग़े ही. यह और कुछ नहीं सूखे किनारों पर बैठ अपने पैरों की उंगलियां पानी में डालने जैसा कुछ है. यह देखने जैसा भर है कि उस पार की घास कहीं ज्यादा हरी तो नहीं
बेहतरी इसीमें है, ना - ना करते भी सायबर प्यार हो बैठे तो उसे जल्दी असलियत की जमीन पर ले आएं. शादीशुदा हैं तो बाज एं, अकेले हैं तो जल्दी ही मिलने की तारीख तय कर लें क्योंकि चाहे प्रेम कितना ही वर्चुअल हो, दिल टूटने पर पीड़ा तो वर्चुअल नहीं होती वह तो असल होती है. अगर इंटरनेट पर प्रेम डिस्काउंट में मिलता है तो पीड़ा एक के साथ एक मुफ्त मिलती है. ऐसे में जरूरी तो यह है कि हम उस 'कॉमन सेन्स' का इस्तेमाल करें जो आजकल 'अनकॉमन' है.

मनीषा कुलश्रेष्ठ     





Friday, September 14, 2012

कहानी - बिगड़ैल बच्चे - मनीषा कुलश्रेष्ठ

bharat tiwari Manisha Kulshreshtha shobha mishra hindi kahani
जैसा कि हाल ही में मुझे विदित हुआ है और मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि इस कहानी को मॉस्को विश्वविद्यालय में बी.ए. अंतिम वर्ष के छात्र पढ रहे हैंयह मेरी शुरुआती कहानी है, 2004 में वागर्थ नवलेखन विशेषांक में छ्पी थी और हिन्दी साहित्य में मेरे नाम की सुगबुगाहट शुरू कराने में इस कहानी का नाम भी शामिल है "बिगड़ैल बच्चे "मेरे युवा पाठकों की प्रिय कहानी है. हमेशा इस कहानी को सुनने की माँग करते रहते हैं. आज इसे फरगुदिया में प्रकशित होता देख प्रसन्नता हो रही है ...  मनीषा  कुलश्रेष्ठ 14.9.2012 , नई दिल्ली 



bharat tiwari Manisha Kulshreshtha shobha mishra hindi kahaniवे तीन युवा पिंक सिटी ट्रेन से सुबह-सुबह छ: बजे मेरे बाद चढ़े थे। रेल के इस सबसे पीछे वाले, सुनसान पड़े डिब्बे की मानों रुकी हुई सांसें एकाएक चल पड़ी हों... तेज़ स्वर में बातचीत, छेड़छाड़ करते हुए तीनों सामान स्वयं लादे, विदेशी पर्यटकों की नकल में ये पर्यटक साफ-साफ देसी नज़र आ रहे थे। बात-बात में... फकिन... फकअप... फकऑल...! मुझे बहुत नागवार गुज़र रहा था। 

आते ही धम्म से उन्होंने सारा सामान सामने की सीट पर पटक दिया था। एक खुल्लम-खुल्ला सी, मध्यवर्गीय मगर आधुनिक किस्म की लापरवाही उनकी हर बात से झलक रही थी, चाहे वह बातचीत का लहजा, सामान फेंकने का ढंग, चाल-ढाल या कि बाल हों, चप्पलें हों, चाहे बिना मोजों वाले जूते हों या... फेडेड जीन्स हो। वे जो कर रहे थे उनकी नज़र में फैशन था, आधुनिकता थी। इस आधुनिकता में उनका मध्यवर्गीय अभाव कुछ ढंक रहा था तो कुछ उघड़ रहा था। 

पिंक सिटी दिल्ली के सरायरोहिल्ला स्टेशन से सीधे छ: बजे चलती है और दोपहर तीन बजे जयपुर पहुंचती है, सो सुबह साढ़े पांच बजे ही मुझे मेरा बेटा ट्रेन में बिठाकर, सामान व्यवस्थित कर, एक कप एस्प्रेसो कॉफी सामने के स्टाल से लाकर मुझे पकड़ाकर चला गया था। 


पहले से बैठा... बल्कि खाली बैठा भारतीय यात्री... उस पर महिला यात्री... और फिर मेरे जैसा कल्पनाशील यात्री, हर नये चढ़ने वाले यात्री के वेशभूषा, शक्ल, बातचीत के लहजे, नामों के चलन के अनुसार उसका प्रदेश-परिवेश भांपने का प्रयास करता है, यकीन मानिए बस वैसा ही कुछ मैं भी कर रही थी। अजीब किस्म का शौक है ना... दूसरों के मामले में नाक घुसाने का नितान्त भारतीय शौक! 

निश्चित रूप से तीनों गोआ के निवासी लग रहे थे, केवल शक्लो-सूरत से ही मैंने यह निश्र्चय नहीं किया था... क्योंकि लड़की ने जो टी-शर्ट पहनी थी उस पर सामने ही लिखा था, `माय गोआ, द हैवन ऑन द अर्थ।' गले में काले धागे में चांदी का बड़ा-सा क्रॉस लटका हुआ था। यही नहीं वे कभी अंग्रेजी में और कभी कोंकणी भाषा में बात कर रहे थे। अपना गिटार, कैमरा, वॉकमैन के अलावा तीन पुराने से बैग, ढेर सारे चिप्स और कोल्ड ड्रिंक की बॉटल्स और कुछ पत्रिकाएं लेकर वे तीनों चढ़े थे... और अब वे मेरे एक दम सामने वाली सीटों पर अस्त-व्यस्त से जम गये। एक लड़की तो थी ही, बाकी दो लड़के थे। एक छोटा, एक बड़ा। 

तीनों उत्तर भारत के टूरिस्ट मैप पर सर से सर जोड़कर नज़र गड़ाकर कुछ कार्यक्रम बना रहे थे... कोंकणी में। लापरवाही से उनका कैमरा सीट के कोने में रखा था, मैं मन ही मन कुनमुनायी लगता है इन्हें उत्तर भारत... खासतौर पर दिल्ली के जेबकतरों-उठाईगीरों का कोई अनुभव ही नहीं है या कभी कुछ सुना भी नहीं। मैंने सोचा आगाह करूं... पर मेरी तरफ डाली गयी उनकी उदासीन दृष्टि अब तक मुझे चिढ़ा गई थी सो मैंने सोचा, “हंह मुझे ही क्या पड़ी है!' 

मैप देखने के बाद तीनों अपनी-अपनी जगह पर खिसक गये। बैग ऊपर वाली बर्थ पर लापरवाही से फेंक दिये गये थे। गिटार बड़े वाले लड़के ने अपने पास गोद में बहुत प्यार से रख लिया, जैसे कोई पालतू जानवर हो। वॉकमैन छोटे से ने कान पर लगा लिया, खाने-पीने का सामान लड़की ने अपने पास के बैग में डाल लिया था। 

लड़की सांवली होने के बावजूद आकर्षक थी। दरम्याने कद की, पतली और प्यारी सी। हां बाल बेढंगे से थे... घुंघराले काले कालों में, कत्थई और सुनहरे रंग की कई लटें रंगा रखी थीं। ऐसा लग रहा था कि सफेद बालों को घर पर मेंहदी लगाकर छुपाने की कोशिश हो। मुझे अपने कॉलेज की मिसेज बतरा याद आ गईं, वो अपने खिचड़ी बालों में मेंहदी लगाकर ऐसी ही लगा करती थी, पर यह फैशन है आजकल का, बेढंगा फैशन! मेरे अन्दर की प्रौढ़ होती महिला किचकिचाई! 

लड़कों में से छोटा लड़का चेहरे-मोहरे से उसका भाई लग रहा था, (हां भई... उसकी नाक और होंठों की बनावट बिलकुल लड़की जैसी ही थी... वह लड़की ज़रा लुनाई लिये हुए सांवली थी और यह बिलकुल काला) वही... जिसने कानों में अब वॉकमैन के इयर प्लग लगा रखे थे और पैर हिलाते हुए गुनगुनाता जा रहा था...। कभी-कभी वह आस-पास के वातावरण से बेखबर ज़रा ऊंची आवाज़ में गाने लगता था... तब लड़की उसे कोहनी मार देती थी। 

बड़े लड़के के हाथ गिटार के तारों को हल्के-हल्के सहला रहे थे, वह कोई अंग्रेजी गीत गुनगुना रहा था और मीठी नज़रों से लड़की को देख रहा था, लड़की ने मुस्कुराकर नज़रें खिड़की के बाहर दौड़ा दीं। स्टेशन पर चहल-पहल बढ़ गई थी। जिस खिड़की के पास वह लड़की बैठी थी... वहां दो-चार सड़क छाप मनचले मंडराने लगे थे। ठेठ सड़कछाप हिन्दी के कुछ गन्दे फिकरे कसे गये जो लड़की को समझ नहीं आये पर वह लड़की होने की छठी इन्द्री से समझ गई कि उसके कपड़ों पर कुछ कहा गया है। 

उसने आधी खुली पीठ वाला, छोटा सा, बड़े गले का नाभिदर्शना टॉप पहना हुआ था। नाभि में चांदी की बाली पहनी हुई थी। बड़ा लड़का उसका असमंजस तुरन्त समझ गया, आवेश की हल्की परछाईं उसके चेहरे पर आई। उसने उसे बैग में से निकालकर एक लम्बी बांह की शर्ट पकड़ा दी थी। फिर छोटे लड़के को खिसकाकर खिड़की के पास बिठा दिया था। लड़की को बीच में बिठाकर वह उसके एकदम करीब उसके कंधों पर अपनी बांह का सहारा देकर बैठ गया। लड़की ने लापरवाही से उसकी दी हुई शर्ट को पहन लिया था, लेकिन बिना बटन लगाये। 

अब तक ट्रेन ने सीटी दे दी थी। जिन्हें इस ट्रेन में चढ़ना था... चढ़ गये थे और अपनी-अपनी जगह खोजने लगे थे। यह एक सेकेण्ड क्लास का डब्बा था। मेरे बगल में एक अधेड़ सज्जन आ बैठे थे... और उनकी पत्नी भी। छोटा लड़का अब एकदम मेरे सामने था... उसने हरा बरमूडा और फूलों की छींट वाली पीली शर्ट पहन रखी थी। सामने के कुछ खड़े बाल सुनहरे होने की हद तक ब्लीच किये हुए थे। ट्रेन चलते ही इस छोटे लड़के ने वॉकमैन की आवाज़ बढ़ा दी थी। इतनी कि मैं तक सुन पा रही थी। एक घना शोर और बीच-बीच में किसी पॉप गायिका की आवाज़। एक मिनट बाद जब मुझसे शोर सहन नहीं हुआ तो मैंने उसके पास थोड़ा झुककर पूछ ही लिया, `मैडोना है ना!' मैंने सोचा वह बात में छिपे व्यंग्य को समझेगा और आवाज़ धीमी कर देगा। 

`हह...।' उसने कहा। 


Sunday, August 26, 2012

"कठपुतलियाँ" - कहानी संग्रह , मनीषा कुलश्रेष्ठ

: मनीषा कुलश्रेष्ठ
एम.फिल (हिंदी साहित्य), विशारद (कथक)
पाँच कहानी संग्रह (बौनी होती परछाई, कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं,केयर ऑफ़ स्वात घाटी, (गंधर्व-गाथा)
दो उपन्यास (शिगाफ़, शालभंजिका )
अनुवाद - 'माया एँजलू की आत्मकथा' वाय केज्ड बर्ड सिंग' के अंश, लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास 'हाउस मेड ऑफ़ डान' के अंश , बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद
पुरस्कार व सम्मान: 
चंद्रदेव शर्मा पुरस्कार - 1989 (राजस्थान साहित्य अकादमी ),
कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप -२००७, डॉ घासीराम वर्मा सम्मान -2009 ,
रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष -2010 (राजस्थान साहित्य अकादमी) , कृष्ण प्रताप कथा सम्मान- 2012
शिगाफ़' का हायडलबर्ग (जर्मनी) के साउथ एशियन मॉडर्न लेंग्वेजेज़ सेंटर में वाचन
स्वतंत्र लेखन और हिंदी वेबपत्रिका 'हिंदीनेस्ट' का दस वर्षों से संपादन .



altकठपुतलियाँ : मनीषा कुलश्रेष्ठ 



सुगना जब-जब कोठरी के अंदर-बाहर जाती, दरवाज़े के पीछे लटकी कठपुतलियां उससे टकरा जातीं... उसे रोकतीं अपनी कजरारी, तीखी, फटी-फटी आंखों से, चमाचम गोटे के लहंगों वाली रानियां, नर्तकियां और अंगरखे-साफे वाले, आंके-बांके, राजा-महाराजा और घोड़े पर सवार सेनापति। ढोलकी वाला विदूषक और सारंगी वाली उसकी साथिन। दीवाना मजनूं और नकाब वाली उसकी लैला। कभी सुगना उदास होती तो इन कठपुतलियों का एक साथ ढेर बनाकर ताक पर रख देती और सांकल लगाकर गुदड़ी पर ढह जाती। कभी गुस्सा होती तो ज़ोर से झिंझोड़ देती सबके धागे। कुछ मटक जातीं, एक दूसरे में अटक जातीं। किसी नर्तकी की गर्दन उसी के हाथों में उलझ जाती। कोई राजा डोर से टूट मुंह के बल गिरा होता। ढीठ मालिन टोकरी समेत उसके ऊपर। प्यार आता तो उनके धागे सुलझाती, टूटे जेवर ठीक करती, उधड़े गोटे-झालर सींती या नए कपड़े बनाती।
कभी-कभी वह अपने हाथ-पैर देखती तो उसे लगता उनमें भी एक अदृश्य डोर बंधी है। उसे महसूस होता कि ये जो वक्त है न, नौ से चार बजे का, वह दो प्रस्तुतियों के बीच परदा डाल के मंच के पीछे लटका दी गई कठपुतली के आराम का समय है। अब होती हैं कुछ दीवानी कठपुतलियां, देह के साथ-साथ मन भी पसारने वाली। वह भी वैसी ही एक बावरी कठपुतली है... जो डोरों से मन को विलग कर नया खेल रचती है। सूत्रधार की समझ से परे का खेल। कुछ मौलिक कुछ अलग जो जीवन का विस्तार दे जिसमें उसकी अलग भूमिका हो, इंतज़ार करती बीवी, बच्चे पालती मां से एकदम अलग। अपनी देहगंध से बौराती, अपने मन से संसर्ग का साथी चुनती एक आदिम औरत की सी भूमिका। वह इन अनचाहे रिश्तों के डोरों से उलझकर थक गई है। ये रिश्ते जो उसके ख़ून तक के नहीं हैं। उसके ख़ून के रिश्ते तो कहीं दूर छिटक कर गिर गये हैं। छोटका भाई याद आता... किसी और ड्योढ़ी नाते बैठी मां याद आती। ऐसी ड्योढ़ी जहां से उसे कभी कोई बुलावा नहीं आने वाला। बापू होता तो उसकी कोई तीज यूं सासरे में बीतती?
कितना हंसी थी उसकी सहेलियां, जब उन्हें पता चला था कि उसका ब्याह गांव-गांव जाकर, स्कूलों, मेलों और त्यौहारों, शादी-ब्याह में कठपुतली का खेल दिखाने वाले के साथ तय हुआ है। `तुझे भी नचाएगा वो लंगड़ा कठपुतली बनाकर।' कहकर उसकी पक्की सहेली रूनकी हंसते-हंसते रो पड़ी थी।
धाक धिना धिन धा... चीं... चीं... चीं... अब आ रही है तुर्क के तैमूरलंग की सवारी... चूं च्यू धिन धिन धा...!
बापू तो कहीं और बात तय कर गये थे, वो जोगेन्दर था... दसवीं फेल था। जीन्स की पेन्ट और लाल कमीज पहनता और धूप का चश्मा लगाता। सब जोगी कहते। पर उनके आंखें मूंदते ही लेन-देन की बात पर बाई ने तीन साल पुराना रिश्ता तोड़ दिया। रिश्ता टूट गया तो जहन में गूंजता नाम भी पीछे छूट गया। तेरह साल की सुगना बाई का ब्याह तीस बरस के अपाहिज और विधुर कठपुतली वाले रामकिसन से हो गया। सुगना के सपने में पैर कटी कठपुतलियां आने लगीं। बापू के मरने के दो साल के अन्दर ही, उसकी बाई ख़ुद जाके पास के गांव के एक खेती-किसानी वाले दूसरी जात के आदमी के घर नाते बैठ गयी थी और अपने संबंध की जल्दी में सुगना का गौना पन्द्रह साल की होने से पहले ही कर दिया, बिना सगुन-सात, लगभग खाली हाथ भेज दिया सासरे। ज़मीन-घर सब बेच के छोटके को लेकर वह चली गयी।
घूंघटे में से ऊंटगाड़ी से उतर कर चलते हुए रामकिसन को देखा था... बलिष्ठ देह के होते हुए भी एक पैर पोलियो की मार ने पतला कर दिया था सो एक हाथ गोड़े पे टिका के हचक-हचक कर चलता था। यूं साइकिल भी चला लेता था... एक पैर से तेज़-तेज़ पैडल मारता, दूसरा पैर सहारे के लिए दूसरे पैडल पर बस ज़रा-सा टिकाता... यह छोटा पैर पहुंचता भी नहीं था दूसरे पैडल तक, पर सायकिल की गति में कमी नहीं आती।

पन्द्रह बरस की सुगना, सात और चार बरस के बंसी और नंदू, जिनकी वो मां बन गई थी। तोते की तरह `मां   , `बाई  ' रटते नंदू-बंसी। वह सोचती कि वो और उसका छोटका भाई तो बाई के सगे बालक थे... जब वो बाई के आगे-पीछे `मांए' या `बाई ए' कहते हुए घूमते तो बाई कितना रीस जाती... चिल्लाती... `चोप!' सुगना खीजती नहीं थी, पर सुनती भी नहीं थी। वह सोचती कि यह मुझे नहीं, बादलों के पार जा के बसी अपनी मां को पुकारते हैं अभागे।

Monday, July 30, 2012

चेतना की "मशाल" रोशन करती चर्चित कहानीकार मनीषा कुलश्रेष्ठ

मनीषा कुलश्रेष्ठ

एम.फिल (हिंदी साहित्य), विशारद (कथक)
पाँच कहानी संग्रह (बौनी होती परछाई, कठपुतलियाँ,
कुछ भी तो रूमानी नहीं,केयर ऑफ़ स्वात घाटी, (गंधर्व-गाथा)
दो उपन्यास  (शिगाफ़, शालभंजिका )

अनुवाद - 'माया एँजलू की आत्मकथा' वाय केज्ड बर्ड सिंग' के अंश,
लातिन अमरीकी लेखक मामाडे के उपन्यास 'हाउस मेड ऑफ़ डान' के अंश , बोर्हेस की कहानियों का अनुवाद


पुरस्कार व सम्मान: चंद्रदेव शर्मा पुरस्कार - 1989 (राजस्थान साहित्य अकादमी ),
कृष्ण बलदेव वैद फेलोशिप -२००७, डॉ घासीराम वर्मा सम्मान -2009 ,
रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष -2010 (राजस्थान साहित्य अकादमी) , कृष्ण प्रताप कथा सम्मान- 2012


शिगाफ़' का हायडलबर्ग (जर्मनी) के साउथ एशियन मॉडर्न लेंग्वेजेज़ सेंटर में वाचन
स्वतंत्र लेखन और हिंदी वेबपत्रिका 'हिंदीनेस्ट' का दस वर्षों से संपादन . 






चर्चित कहानीकार मनीषा कुलश्रेष्ठ ने गुवाहाटी प्रकरण को तालिबानी करतूत करार दिया और अपनी नाच गाने को पेशा मानने वाली जाति की महिलाओं की एक कहानी " रक्स की घाटी और शब-ए-फ़ितना"       के कुछ मार्मिक अंश सुनाए जिसके माध्यम से स्त्री की दुर्दशा की एक और तस्वीर सामने आई .....





" रक्स की घाटी और शब-ए-फ़ितना" 

और अब कोई उम्मीद नहीं बाकी.....

एक दिन यूँ हुआ ‘एफ एम’ पर तीन चोरी से नाच देखने वालों और दो साज़िन्दों को सरेशाम चौक में कोड़े मारने का ऎलान हुआ और शहर के सब वाशिन्दों को तमाशा देखने बुलाया गया.
उस तारीख को आधी रात बरबाद और टूटी हवेली का “ख़ारा कुआँ” गूँज गया और एक जामुनी किरण पानी में से निकली और अँधेरे में लहर बनाती सारी हवेली में फैल गयी, जैसे किसी ने रात में आतिशबाज़ी चलायी हो। चमकते हुए पानी पे एक अक्स औंधा तैर रहा था।
'गुलवाशा!

शोरे शुदबाजखुबाबे अदम चश्म कुशुदेम,
दी देम के बाकीस्त शबे फितना गुनुदेम।
(दुनिया के शोर ने मुझे जन्नत के ख़्वाब से जगा दिया और मैं इस दुनिया में आ गया लेकिन यहां का हँगामा देखकर मैंने फिर आँखें बन्द कर लीं और मौत की पनाह ली।)

क्या अब भी लुबना कहती है - "मेरा दिल कहता है कि बेहतर समय आएगा और मैं उम्मीद करती हूँ कि तब तक मैं तो जीवित रहूँगी."

0000000000

ग़ज़ाला ने एक ख़त में लुबना को लिखा, वह ख़त बिना पते के कहीं न पहुँच सका.

अम्मा पगलाई सी छाती धुनती हैं, जब लोगों को अपने खच्चरों पर सामान लादे, बिना मुड़े मैदानी शहर की तरफ जाते देखती है. मुझसे कहती हैं, मैं बस करूँ, स्कार्फ से मुँह ढक लूँ. किसी भले, अमीर अधेड़ से शादी कर लूँ, लड़कियों को किताब पढ़ाना और खुद कंप्यूटर पढ़ना बन्द कर दूँ?”
“ क्या तुम्हें अब भी मानना चाहिए इस कानून को जो ईश्वर के नाम से हर धर्म में औरतों के लिए अलग से बनाया जाता रहा है.” मेरा कम्प्यूटर टीचर मुझसे पूछता है.

“हाँ क्यों नहीं, मेरा भी एतकाद है, इस ईश्वर में और उसके बनाए कानून में, अम्मी और गुलवाशा की तरह ही, लेकिन क्या करूँ कि पिछले कई दिनों से मेरे कान रोते बच्चों और माँओं की कराहों को सुन रहे हैं. मैं अपने घर, तबके और आने वाले वक्त में अमन की पूरी तबाही देख पा रही हूँ. “

“तुमने कभी सोचा है? स्कूल जाती लड़कियों को कोई कैसे जला सकता है? नाचना – गाना धर्म के खिलाफ कैसे हो सकता है?” वह फिर पूछता है. मैं क्या जवाब दूँ? औरतों और बच्चियों को फुसफुसा कर पढ़ाते हुए मैं थक गई हूँ...उन्हें क्या - क्या नहीं समझाती, यह मजहबी कानून और इसका सही मतलब मगर सुनने वालियों के कान बहरे हैं और आँखें उजाड़, ज़बानें उमेठ दी गई हैं....मेरी भी हिम्मत टूट रही है अब.

“मुझे उम्मीद है – क्या तुम्हें है कि एक दिन ये कान देखेंगें और आँखें सुनेंगी. ज़बानों की उमेंठनें खुल जाएंगी.” कहते हुए, कभी कभी मेरा टीचर अपनी बैसाखी खिड़की से टिका कर, मुझे थाम कर मेरा माथा चूमता है. उस रात मैं सपना देखती हूँ, न केवल हम तीनों बहनों के होंठ, न केवल संगीत गली की हर लड़की बल्कि रक्स की घाटी की हर औरत के होंठ बैंगनी से फिर गुलाबी हो गए हैं और सेब के पेड़ों के बीच, हरे कच पत्तों में झुण्ड – के झुण्ड अब्बा की कोई रोमांटिक बंदिश गुनगुना रहे हैं. टहनियाँ रबाब की तरह बज रही हैं.

Friday, July 20, 2012

मनीषा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह और उपन्यास




मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास

फेसबुक पर LIKE करें-