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Saturday, June 06, 2015

प्रकृति मेरे माता पिता के समान है - प्रगति मिश्रा





















   अपने जीवन के १८ साल मैं इस दुनिया में बिता चुकी हूँ. स्कूल में हर साल ५ जून को कोई न कोई कार्यक्रम हुआ करता था जिससे हम सब प्रकृति की तरफ अपनी जिम्मेदारियों के प्रति  जागरूक होते थे. स्कूल में चार्ट, पोस्टर, भाषण , नाटक  के माध्यम से हमे समझाया जाता था कि हर साल हम अपने पर्यावरण को किस तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. इस्तेमाल कहना ठीक नहीं होगा, हम हर वर्ष अपने पर्यावरण को पहले से भी ज्यादा नुक्सान पहुंचाते हैं और फिर एक दिन उसे सुधारने की बातें करते हैं. स्कूल में कितना आसान लगता था इन सब विषयों के बारे में चर्चा करना लेकिन अब समझ आता है कि टीचर्स क्या कहा करती थी - जो तुमने १२ साल एक स्कूल में सीखा, वो यहाँ सीखना बहुत आसान है लेकिन तुम सब असल ज़िन्दगी में  अपनी विद्या  का कितना इस्तेमाल करोगे, वही बताएगा कि तुम सबने अपने विद्यालय से क्या सीखा. आज मैं कॉलेज में पढ़ती हूँ. और सच कहूँ तो हर कोई अपने भविष्य की बात करता है - कहाँ जॉब करेंगे, किस पैकेज में जायेंगे, और मैं भी कहीं न कहीं इन्ही बातों के बारे में सोचती हूँ. पर अगर  अकेले में अपने आप से हम सब पूछें तो एक सवाल मन  में आता है - जिस भविष्य की हम कल्पना कर रहे हैं वो तो तभी सुन्दर होगा जब हमारे आस - पास का पर्यावरण सुन्दर होगा. ज़ाहिर सी बात है इंसान की ज़रुरते कभी पूरी नहीं होती हैं. उसे कितना भी मिले, हमेशा उससे ज्यादा की ही चाह रहती है. आज से कुछ साल बाद हम में से अधिकतर लोगों के पास शायद पैसे की कमी नहीं होगी लेकिन जब हमें दूषित वातावरण में सांस लेने में बहुत तकलीफ होगी  तब  हम  साफ़ - सुथरा  पर्यावरण   बहुत याद करेंगे लेकिन  तब यह समझने में बहुत देर हो चुकी होगी कि पैसे से  सब कुछ नहीं खरीदा जा  सकता है. 





हम सब कारण जानते हैं कि हमारा पर्यावरण ऐसा क्यूँ होता जा रहा है. आपकी वजह से, मेरी वजह से यानी हम सबकी वजह से. हमे पता है कि हमारी कुछ आदतों को सुधारने से ही हम अपने पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं. उसे बर्बाद होने से बचा सकते हैं. लेकिन कोई पहला कदम नहीं उठाना चाहता. दिमाग में एक तरह की धारणा है न - जब आज तक कुछ नहीं हुआ तो शायद आज से ४०-५० सालों में भी नहीं होगा और उससे ज्यादा तो हमारी ज़िन्दगी होगी भी नहीं, तो क्यूँ सोचें हम पर्यावरण के बारे में?

पांचवी क्लास में वैल्यू एजुकेशन की किताब में एक टॉपिक पढ़ा था: SUSTAINABLE DEVELPOMENT, मुझे इसके  पीछे की वजह नहीं मालूम, पर जब भी कोई मुझसे कहता है कि हम पर्यावरण के बारे में क्यूँ सोचे तो मैं ये विषय समझाने लगती हूँ. इस सस्टेनेबल डेवलपमेंट के अनुसार हमे पर्यावरण को बचाना है क्यूंकि ये प्रकृति हमे आने वाली पीढ़ी से उधार मिली है और हमे इसे उन्हें सही सलामत सौंपना है. और जब हम उन्हें प्रकृति सौपेंगे तो इस बात का ध्यान रखना है कि हम उन्हें वैसा ही पर्यावरण दे जैसा हमसे हमारे बड़ों ने उधार पर लिया था.


The actual line quoted by native American Chief Seattle was : “ We have not inherited this earth from our ancestors, we have borrowed it from our children.”

    हम २१वी सदी के लोगों में निस्वार्थ भावना का अभाव है. हमे लोगो को सही बात समझाने के लिए भी कहीं न कहीं विश्वास दिलाना पड़ता है कि इसमें आप की ही भलाई है और SUSTAINABLE DEVELOPMENT के अनुसार ये गलत भी नहीं है. आज के दिन अनेक लोग इस बात को कलम या भाषण के द्वारा ज़रूर दूसरों तक पहुचाएंगे कि - प्रकृति ने हमे बहुत कुछ दिया है. मैं कहती हूँ, प्रकृति मेरे माता पिता के समान है. जिस तरह आज से कुछ वर्ष बाद मैं अपने माता - पिता का दिया कुछ भी नहीं लौटा पाऊँगी उसी तरह प्रकृति ने मुझे १८ साल तक  ऐसा वातावरण दिया जिसके कारण मैं स्वस्थ  हूँ, सुखी हूँ. लोग अपना पर्यावरण दूषित न करे, आस पास सफाई रखें, अपने वाहनों का कम इस्तेमाल कर उन वाहनों का अधिक उपयोग करें जिससे प्रकृति को ज्यादा  नुक्सान न हो. अब यहाँ सिर्फ प्रकृति को चोट न पहुंचाने के आलावा भी एक विषय है जिसके बारे में लिखना मैं जरुरी  समझती हूँ. हम प्रकृति को दो चीजे ही दे सकते हैं: पहला, उन्हें कम से कम नुक्सान पहुंचाना. दूसरा, जो भी हमे प्रदान किया जा रहा है हम उसे सही तरीके से इस्तेमाल करे यानी उसे बरबाद न करे. कहा जाता है कि जब तक इंसान को उसके ‘कम्फर्ट जोन’ से न निकला जाये तब तक वो आसानी से मिल रही सुविधाओं का मोल नहीं समझता. लेकिन हम सब क्यों इंतज़ार करे कि प्रकृति हमसे यह सुविधाएं छीन ले?  हम आज से, अभी से ये संकल्प लेते है कि प्रकृति से जुडी हर चीज़ हमारी ज़िम्मेदारी है और ये हमारा दायित्व बनता है कि हम आगे आयें और इन्हें बचाएं. अगर हम सभी गौर करें तो पायेंगें कि प्रकृति को इतना नुक्सान पहुँचाने के बाद भी वो कभी हमे कुछ भी देने से इनकार नहीं करती. परन्तु इसका मतलब ये नहीं है कि आज से कुछ वर्ष बाद भी वो आपकी हर ज़रूरत इसी प्रकार पूरी करती रहेंगी. हम सबकी माँ प्रकृति अपने उस चरण पर हैं जहाँ हमारे कारण वो बहुत बीमार हैं, और हमे ज़िम्मेदार संतानों की तरह उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखना है. और इस बार अपने लिए नहीं, अपनी माँ के लिए.....


---- प्रगति मिश्रा

Wednesday, September 17, 2014

वर्चस्व की राजनीति और हाशिये की परम्परा - हेमा दीक्षित

हेमा दीक्षित

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कानपुर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक एवं विधि स्नातक. हिन्दी साहित्य एवं अंग्रेजी साहित्य लेखन में रूचि. हाल ही में ‘कथादेश’ के जनवरी २०१३ के अंक में और ‘समकालीन सरोकार’ अगस्त-अक्टूबर २०१३ में 'जनसंदेश' टाइम्स में कवितायें प्रकाशित. २०१४ में 'उम्मीद' में एक लम्बी कविता एवं 'यात्रा' में कवितायें प्रकाशित बोधि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित स्त्री विषयक कविताओं के संग्रह स्त्री हो कर सवाल करती है में भी कविताओं का प्रकाशन. विधिनय प्रकाशन, कानपुर द्वारा प्रकाशित द्विमासिक विधि पत्रिका 'विधिनय'की सहायक संपादिका. कानपुर से प्रकाशित ‘कनपुरियम’ एवं ‘अंजुरि’ पत्रिकाओं में कवितायें प्रकाशित. जनसंदेश टाइम्स, नव्या ई पत्रिका, खरी न्यूज ई पत्रिका, अनुनाद, पहली बार ब्लॉग, आपका साथ-साथ फूलों का ब्लॉग, नई-पुरानी हलचल ब्लॉग, कुछ मेरी नज़र से ब्लॉग एवं’फर्गुदिया’ ब्लॉग, शब्दांकन ब्लॉग पर कवितायें प्रकाशित .






वर्चस्व की राजनीति और हाशिये की परम्परा
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औरतें धार्मिक स्थलों की सर्वेसर्वा के रूप में इतनी कम और यदा-कदा ही क्यों दिखाई देती है ... ??


सवालों के लिए उनके हलों की उत्कंठा ही हमें दौड़ाती है आखिर इस सवाल की उत्पत्ति के कारक कहाँ है ... आखिर धार्मिक स्थल है क्या ... और क्यों इतना महत्वपूर्ण है उनका सर्वेसर्वा होना ... उनके सर्वेसर्वा होने के मायने और हासिल क्या है ... और वो आखिर करते क्या है ...


धार्मिक स्थल आखिर है क्या ...

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बेहद मोटे तौर पर कहने की कोशिश करने पर कहा जा सकता है कि समस्त जीवित मृत प्राणियों के ऊपर भी एक सर्वशक्तिमान सत्ता की परिकल्पना अथवा एक सर्वोच्च शक्ति की ऐसी अवधारणा को, जिससे ऊपर इस सृष्टि में कुछ भी नहीं है एक धूल का कण भी नहीं, जो परम सत्ता है जो अपनी विद्यमानता में सार्वभौम है सम्पूर्ण सृष्टि का नियंत्रण जिसमें निहित है ... उसे भिन्न-भिन्न नाम रूपों में गढ़ा गया ...

इस स्थूल प्राणहीन गढ़न को अपने फलने-फूलने और संचालन हेतु मानवीय शक्ति की सहायता से ही संचालित होना था आखिर यह ईश्वरीय संकल्पना उनके ही भयों एवं निराकरणों को दृष्टिगत रखते हुए की गई उपज जो थी ...

उस संकल्पना के इर्द-गिर्द रची-गढ़ी गई प्रक्रियाओं एवं व्यवस्था को सतत रूप से चलाने और स्थायित्व प्रदान करने वाली कार्यप्रणाली को ही कालांतर में धर्म कहा गया और उनके संचालित होने के स्थलों को धार्मिक स्थल ...

सारे तर्कों से परे जो सर्वशक्तिमान जनक और संहारक होगा अविवादित रूप से उसके पास ही सारे सर्वोच्च वर्चस्व निहित एवं केंद्रीभूत होने थे और हुए ...

धार्मिक स्थल क्यों महत्वपूर्ण हैं और वह क्या करते है ...

किसी भी विस्तार में न जाते हुए अपनी बात अपने शब्दों में कही जाए तो “धर्म और ईश्वर का प्रतिनिधि होना इस दुनियाँ के किसी भी कोने में सबसे बड़े वर्चस्व का स्वामी होना है “...

धार्मिक स्थल सदैव से ही अपने मूल उद्गम से ही शक्ति, सत्ता, सम्पदा एवं सर्वोच्च वर्चस्व का एकीकृत केंद्र रहे है | बड़ी से बड़ी मानवीय ताकतें भी धर्म एवं ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होती है |

मुद्दे का सवाल है कि ऐसा वर्चस्व क्या खायेगा जो उसकी क्षुधापूर्ति के साथ-साथ, उसके स्वामित्व की संतुष्टि के नीचे पददलित होने के लिए एक वृहद् दुनियाँ सतत निर्मित रख सके |

जवाब की खोज मुझे कमजोर एवं निरीह इयत्ताओं की एक बेहद बिखरी एवं विक्षिप्त दुनियाँ के विस्तार में ले जाती है |

किसी भी स्वामित्व के समक्ष सबसे बड़ा प्रश्न अपने अस्तित्व की सतत रक्षा का होता है | कोई भी छोटी बड़ी सत्ता सिर्फ तभी तक अस्तित्वमयी होती है जब तक उसके पास कमजोरों की मौजूदगी बनी रहे | सत्ता के स्वामित्व हेतु सबसे अहम् कार्य होता है अपने को शक्तिवान बनाए रखना |

शक्ति सिर्फ और सिर्फ अन्यों की उपस्थितियों पर शासन नियंत्रण एवं उसके अबाध व्यवस्थापन द्वारा ही प्राप्त होती है | इसके लिए सत्ताएं अपने लिए एक विशेष प्रकार का चरित्र गढ़ती है ... और वह है ऐसे उपायों की सतत खोज की योग्यता जिसके द्वारा लोगों को तोडा जा सके कमजोर किया जा सके |संक्षेप में ऐसे अस्त्रों का निर्माण जिनसे एक व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत उसके सोचने-समझने की क्षमता को कुंद किया जा सके |

सत्ताओं को हांकी जा सकने भीड़ का निर्माण करना होता है | सत्ताएँ लोगो की रीढ़ को तोड़ती है | स्वयं हर तरह की शक्ति और सम्पदा हासिल करती है | सत्ताएँ येन-केन-प्रकारेण लोगों को शारीरिक,मानसिक एवं सामजिक दासत्व के चक्र में एक अदद उपनिवेश में परिवर्तित कर उनका दोहन करती हैं | अपने वर्चस्व का राज-पाट चलाती है |

स्त्रियाँ अर्थात आधी दुनियाँ अनादि काल से इस जगत की सबसे बड़ी मूक कामगार शक्ति है | स्त्रियाँ समाज एवं सृष्टि चक्र की रीढ़ है |


आधी दुनियाँ का अर्थ क्या है ...

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आधी दुनियाँ शब्द मेरे लिए एक ऐसी शक्तिशाली मध्यमान रेखा है जो बाकी आधी दुनियाँ से हर मायने में सम पर हो उत्पत्ति,वृद्धि,क्षमता एवं योगदान सभी क्षेत्रों में ...
स्वामित्व की कामना रखने वाली सत्ता इच्छाएं ऐसी वृहद् शक्ति की उपस्थिति को स्वतंत्र,शक्तिमयी, अस्तित्वमयी एवं रचनाधर्मी कैसे छोड़ सकती थी /है |
जो भी स्वतंत्र है ,शक्तिमय है ,अस्तित्वमय एवं रचनाधर्मी है उसकी अपनी निजी सत्ता होगी |
वह सहभागी धर्म में तो जी सकता है परन्तु सर झुकाए पीठ के पीछे हाथ बांधे दासत्व में कदापि नहीं जियेगा | उसकी ग्रीवा सधी और तनी होगी | वह उठी हुई तर्जनी का जवाब उठी हुई तर्जनी से ही आँखों में आँखें डाल कर ही देगा |
घुटनों के बल रेंग कर सत्ताओं के कोड़े खाने को स्वतंत्र अस्तित्व कभी भी किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं करेंगे |
सत्ताओं ने तय किया कि स्वतंत्र अस्तित्व की अवधारणा को ही स्त्रियों के लिए सिरे से कुचल दो | एक स्त्री को स्त्री ही न रहने दो बाकी वह जो कुछ भी कहलाएगी हम बताएँगे | उसके होने की परिधियाँ हम तय करेंगे |
सत्ताएं स्वामी हुई | पुरुष रूप हुई | बाक़ी आधी दुनियाँ उनके दासत्व की प्रजा रूप | इस प्रजा को अलग-अलग नाम-रूपों में बेहद षडयंत्रकारी तौर पर दिखावटी स्वरूपों में महिमामंडित किया गया | बेटी, बहन, माँ, पत्नी, प्रेयसी, कुलवधू, नगरवधू इत्यादि-इत्यादि | खाकें और साँचें तमाम उद्देश्य एक कि इन सभी खाकों का कोई न कोई स्वामी होगा | यह स्वतंत्र स्वस्वामित्व में नहीं जियेंगी | स्त्रियों की स्वतंत्र सत्ता में कोई भी अधिकार नहीं छोड़े गए | मातृत्व का नैसर्गिक अधिकार तक भी नहीं | जो दिखावटी तौर पर छोड़े भी गए उन तक स्त्रियों की पहुँच के रास्ते और दृष्टि बाधित कर दी गई | जन्म से मृत्यु तक उन पर सिर्फ और सिर्फ किरदारों और कर्तव्यों के अंधत्व लाद दिए गए | कोल्हू के आँखों पर पट्टी बंधे बैल की तरह किरदार और दायित्व जीवन-मरण प्रश्न बना कर बांधे गए | सत्ताओं के कोल्हू ने अपने वर्चस्व की भूख में किसी और को नहीं स्त्रियों को पेरा और अपने लिए परम स्वतंत्रता और संतुष्टियाँ हासिल की |
वंचितों के वर्गों का बने रहना ही सत्ताओं के हाड-माँस एव रक्त-मज्जा को पुष्ट एवं पोषित करता है |
स्त्रियों से भूख, प्यास, सोना, जागना, प्रेम, साथी, नित्यक्रिया आदि जैसे मामूली से मामूली और नैसर्गिक हकूक भी बड़े सलीके और अहद से तमाम नियमों एवं आवरणों के तहत छीन लिए गए | शिक्षा, संपत्ति, स्वतंत्रता, समानता, एवं धर्म तो बहुत ही बड़ी चीज़े थी | ऐसी जिनके बल पर सत्ताएँ टिकती और मिटती है |
धर्म और उससे शासित समाज ने लज्जा और चरित्र (यौन-शुचिता) दो ऐसे रोग स्त्री के सम्पूर्ण जीवन पर आरोपित किये जिन्होंने स्त्री की रीढ़ तोड़ डाली | यह रोग इतने शक्तिशाली थे / है कि इन्होने स्त्री को हर स्तर पर तोड़-मरोड़ डाला |
इस हद तक कि स्त्रियाँ अपने जन्मगत कर्म मल-मूत्र त्याग को भी नियंत्रित करना सीखने हेतु बाध्य हुई | गाँव जवार में आज तक वह सुबह मुँह अँधेरे ही किसी छिपे कोने में सामूहिक मल-त्याग के लिए निकलती है | अपनी तथाकथित ‘इज्जत’ की सुरक्षा के लिए कई स्त्रियों के समूह में ही निकलती है | लम्बे समय तक मूत्र-त्याग न करने से अधिकाँश महिलायें तमाम रोगों की शिकार बनती है | सिर्फ गाँव-देहात ही क्यों आधुनिक शहरों में घरों से बाहर निकलने वाली काम-काजी स्त्रियाँ भी इस आरोपित लज्जाधर्म की अनचाहे अनजाने ही शिकार है |
इसी लज्जाधर्म के तहत एक छोटी बच्ची को उसके समस्त शारीरिक अंगों के नामों से परिचित कराया जाता है पर उसे योनि (vagina ) के लिए कोई शब्द ही नहीं दिया जाता है उस अंगविशेष के प्रति उसके चैतन्य होते ही बस लज्जा बोध दे दिए जाते है बहुत खोजने पर भी मुझे कोई शब्द योनि के लिए नहीं मिलता है | उसके विपरीत पुरुषों के लिंग के लिए तमाम शब्द है जो छुटपन से ही प्रयुक्त होते सुने गए है और आम भाषा एवं जीवन के चलन में है |(यहाँ भाषा में मौजूद अश्लील भाषायी शब्दों को विचार में नहीं लिया गया है ) एक जैविक संरचना का अस्तित्वमूलक शब्द ही भाषा एवं चलन की याददाश्त में लिखा ही नहीं गया ... आखिर क्यों ...
एक बच्ची की योनि भी ढँक कर रखो उसका दिख जाना समस्त स्त्रीजाति के लिए लज्जा का विषय हो जाता है आस-पास उपस्थित स्त्री समूह अपने को नग्न महसूस करने लग जाते है और कपडा ले कर दौड़ पड़ते है ढंकने-मूंदने को ...
योनि क्यों इतनी लज्जास्पद बना दी गई ... उत्तर एक है ... सिर्फ अस्तित्त्व के नकारात्मक बोध के साथ एक जीवन की वृद्धि को प्रारंभ से ही निस्तेज कर डालने के लिए ...
योनि के लिए कोई शब्द नहीं सिर्फ एक नकारात्मक भाव बोध और वह है असुरक्षा ...
उसका अर्थ है सतत लूटी जा सकने वाली किसी चीज़ की मौजूदगी ...
एक ऐसी कीमती बोझ ‘वस्तु’ जिससे कोई छुटकारा इस जीवन में संभव ही नहीं है | जिसका संरक्षण और छिपाव ही सबसे बड़ा स्त्री धर्म है |
लज्जाधर्म और यौन शुचिता की सिल को अपनी छाती पर दुपट्टा और आँचल बना कर टाँगे स्त्रियाँ अनजाने ही जन्मांध सी , शासकों द्वारा बेहद बारीक महीन पीसा और लहू में घोला गया शोषण धर्म, ख़ुशी-ख़ुशी मुस्कुराते हुए खा-पी और ढो रही है |
उनकी मुक्ति और सत्तावान होने की स्वप्नित अवधारणा एक ऐसे विद्रोह का बबूल है जो अनादिकाल से चली आ रही पितृसत्ता को क्षत-विक्षत कर देगा | शोषण धर्म को चिंदी-चिंदी कर फूंक देगा |
धार्मिक स्थलों की सत्ता से वंचित रखने के लिए सत्ताओं ने माहवारी होने के कारण स्त्री की अपवित्रता के कुचक्र का ऐसा मकड़-जाल बुना जिसमें वह स्त्री के होने के प्राथमिक एवं मूलभूत पायदान को ही खा चबा जाता है | अपने अस्तित्व को दिए गए इस अपवित्रता मूलक धक्के से स्त्री आजीवन नहीं उबर पाती है |
किसी स्त्री का रजस्वला होना सृष्टि का,जीवनचक्र का सबसे बड़ा उत्सव है | उत्सव उसके होने का, उसके सृष्टा होने का , सृष्टा अर्थात ईश्वर के समकक्ष होने का , उसके स्वतंत्र अस्तित्व होने का | सत्ताएं ठीक इसी जगह , इसी बिंदु , इसी चरण पर उसके हाथ-पाँव ,सोच-समझ बाँध देती है , बाधित कर देती है |
यह पवित्रता और अपवित्रता के मध्य खेला जाने वाला ऐसा दुष्चक्र है जिसमें स्त्री एक लतगौंजी-हथगौंजी गेंद के सिवाय कुछ नहीं है | इस खेल को खेलने वाले उसे हर स्तर पर कमजोर कर देते है तोड़ देते है | शारीरिक शुचिता इतनी बड़ी जिम्मेदारी और भय बना दी जाती है ठीक इसी उत्सवधर्मी मोड़ पर कि वह आजीवन इस जिम्मेदारी और भय के साये से बाहर नहीं आ पाती है | जाने-अनजाने अभिशप्त है स्वयं इसका हिस्सा बने रहने को और इस दुष्चक्र के सतत प्रवाहमान बने रहने के लिए अपनी संततियों को भी इसमें झोंकने के लिए |
यदि स्त्रियाँ इस दुष्चक्र इस होमयज्ञ से बाहर निकल आएँगी इस लज्जाधर्म से बाहर निकल आएँगी और धार्मिक सत्ताएं हासिल करेंगी तो वह वर्चस्व के सबसे प्रधान मुकाम पर बैठेगी | पितृसत्ता के ठाठ, मक्कारी, अय्याशी और अकड़ के बेहद फूले उड़ते हुए गुब्बारे की हवा को निकाल कर उसे जमीन पर पटक देंगी | वह धर्म की आड़ में चलते इस दुष्चक्र के समस्त खोखलेपन को जान लेंगी |
यही हो भी रहा है पढ़ी-लिखी जागरूक स्त्रियाँ, प्रश्न करती, तर्जनी उठाती, आँख मिलाती स्त्रियाँ सत्ता वर्ग की तिलमिलाहट का बायस है |
अब तक शासक वर्ग के रूप में चली आ रही पितृसत्ता को उकडूँ बैठने की मुद्रा में होने का स्वप्न भी गंवारा नहीं है | यह एक अलग बात है कि स्त्रियों के स्वभाव में दमन और प्रतिशोध के बीज नहीं बोये गए है | वह एक साथ खड़ी होना और मुस्कुराना चाहती है | स्वतंत्रता और समानता से प्रेम करना चाहती है, सोना-जागना, हगना-मूतना चाहती है , खुल कर कर मुक्त कंठ से हँसना चाहती है | एक इंसान की तरह से चुनने और होने की आजादी चाहती है | एक व्यक्ति होने के चयन की आज़ादी जिसमे उसके गलतियाँ करने और चूक जाने का और उन्हें सुधारने का अधिकार मूलभूत रूप से सम्मिलित है |
पितृसत्ताएं स्त्री की अस्मिता में एक ऐसी आततायी घुसपैंठ है जो उनकी साँसों पर चौबीसों घंटे पाँव धरे ही रहती है |
इन चौबीस घंटे सोते-जागते, मरते-जीते, चलने वाले दबावों ने स्त्रियों के जीवन को नरक के गर्त में झोंक रखा है | वह घायल है पर घाव देख पाने की सामर्थ्य से हीन है यदि सामर्थ्य पा भी लेती है अपने को देख भी लेती है तो उन्हें मरहम लगाने एवं बंद दरवाजे खोलने की सतत् जंग में अपने को होम करना पड़ता है | सतत् विरोध, पथभ्रष्ट और बागी होने के आहारों का अनवरत विषपान करना पड़ता है |
योनि-चरित्र उन्हें सब कुछ दिखता है सिवाय उनके स्वयं के |
स्त्रियाँ, स्त्रियाँ नहीं रह जाती है बागियों में परावर्तित कर दी जाती है और सत्ताएं बागियों का रूपांतरण सब कुछ विध्वंश और विनाश के गर्त में ले जाने वाली भयावह आग उगलती तोपों के रूप में कर देती
है |
सत्ताओं की इस नृसंश, बेहद क्रूर वर्चस्ववादी दुनियाँ में बहुतेरी खाप सल्तनतें है और खाप सल्तनतों की

सबसे बड़ी तौहीन है उनकी ‘प्रजा’ अर्थात स्त्रियों के मुँह में जबान होना |
असहिष्णु सत्ताएं मुँह में जबान रखने वाली, विरोध में तिलमिला उठने वाली, आँख में आँख डाल कर सीधी खड़ी और चुप रहो, अपनी औकात मत भूलों सुनने पर कदापि पीछे न हटने वाली स्त्रियों के झोंटे उखाड़ डालना चाहती है |


उन्हें शारीरिक, मानसिक और सामाजिक पटल पर बड़ी सिद्धहस्तता से अनवरत चलते रहने वाले सार्वजनिक बलात्कार का शिकार बनाया जाता है |
ऐसी शक्तियों से कुछ भी पाने के लिए इन दुष्चक्रों को समझना और इनके पालित दृढ संस्कारों को काट कर फेंकना होगा तभी वर्चस्व के इस चक्र में कोई पैठ संभव होगी |

अपने जीवन को इस अतार्किक जेलर समाज और इस देह धरे की जेल में जबरन कैद किये जाने के निराधार दंड से मुक्त करने के लिए स्त्री को चौतरफा श्रम और जद्दोजहद करनी होगी |
इससे भी एक कदम आगे बढ़ कर अपने ऐसे सार्वजनिक बलात्कार के लिए अपनी पूर्ण क्षमता से सामर्थ्यवान होना पड़ेगा |
यौन-शुचिता एवं लज्जाधर्म की अर्थी को कंधा देने के लिए इनके प्रमाणपत्र बांटने वालों के साथ अपनी ऊर्जा बिना गवाएं अपनी राह स्वयं निर्मित करनी होगी |

----- हेमा दीक्षित -----

लेखिका, कवयित्री

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साभार उत्पल पत्रिका

Sunday, September 14, 2014

हमारी आज़ादी की लडाई की भाषा फैसलों की भाषा नहीं थी - स्वाती ठाकुर

हमारी आज़ादी की लडाई की भाषा फैसलों की भाषा नहीं थी -  स्वाती ठाकुर 


14 सितंबर को हम देश भर में प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं
एक तरह का उत्सव का सा माहौल सभी सरकारी संस्थाओं में दिखाई देता है। इस दौरान कभी एक हफ्तेकहीं एक पखवाड़े या फिर एक महीने तक ये उत्सव चलता रहता है। इस दौरान हिंदी को लगभग पूजा-अर्चना या फिर एक तरह की श्रद्धा के भाव से देखा जाता है। इस तरह की उत्सवधर्मिता का विरोध इस आलेख का उद्देश्य कतई नहीं है। पर इन सबके पीछे वस्तुस्थिति को यथार्थपरक रूप से समझना अधिक उपयुक्त होगा। उत्सव मना लेने से कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती। साथ ही यह भी कि भाषा का विकास इन उत्सवों का मोहताज़ नहीं। किसी भाषा के लिए एक दिन मुकर्रर कर देने से कुछ नहीं होने वालाहर दिन व्यवहार के स्तर पर भाषा के प्रयोग में ही उसका सम्मान हैउसका विकास है। इस तरह के उत्सव भाषा की वास्तविक स्थिति दिखाते हैंजिस दिन हमें याद करना पड़ता है अपनी भाषा की उस समृद्ध परंपरा कोजो आज खोती जा रही है। इस दिन हम अमूमन अपनी भाषा के प्रति अपने कर्तव्यों को याद करतेकराते हैं। पर भाषा के प्रति अपना दायित्व हमारे ज़ेहन में हमेशा होना चाहिए। किसी भी भाषा का विकास अतीतजीवी होकर परंपरा के गौरवगान कर देने भर से संभव नहीं है और न एक दिन विशेष को हिंदी की वस्तुस्थिति पर चिंता ज़ाहिर कर के। समस्याओं पर चिंता ज़रूरी हैयह चिंता पहला कदम है किंतु उनके निवारण की दिशा में किए जाने वाले निरंतर प्रयास ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है जिसे हम उत्सव समापन कर भुला देते हैं। और इस तरह से हम अपनी भाषाओं का दिवसपखवाड़ा और माह और अब तो शपथ समारोह मनाकर एक ऐसा संसार बना रहें हैंजो मुझे तो डरावना ही लग रहा है।
हिंदी राजभाषा के रूप में स्वीकृत हो चुकी है बावज़ूद इसके हिंदी अपने ही देश में सम्मानजनक स्थिति में नहीं है। यह सच है कि भारत विविधताओं वाला देश हैजिसके बारे में कहा भी गया है:
चार कोस पर पानी बदले
आठ कोस पर बानी

यहाँ कई भाषाएँ है। संविधान की आठवीं अनुसूची के ही अंतर्गत 22 भाषाओं को स्थान प्राप्त है। फिर सभी भाषाओं के तहत ढेर सारी बोलियाँ। पर हम सब यह भली भाँति जानते हैं कि हिंदी पर वरीयता या हिंदी की वर्तमान स्थिति की वजह भारत की अन्य भाषाएँ नहीं हैं वरन् उस अंग्रेज़ी भाषा को मिली है जो गैर भारतीय है और जिस भाषा के ज़रिए हम पर शासन किया गया था।
हिंदी के राजभाषा होने की वजह से एक तरह की संवैधानिक बाध्यता अवश्य दीखती हैसरकारी कार्यालयों व संस्थाओं मेंपर यदि हम थोड़ी तह में जाकर इसकी पड़ताल करेंतो पाएँगे कि अधिकांश कार्य मूलत: अंग्रेज़ी में हो रहा हैहिंदी में कार्य करने की बाध्यता यहाँ अनुवाद के माध्यम से पूरी की जा रही है।

विधा के साथ साथ विषय के रूप में विकसित होते अनुवाद की भूमिका निश्चय ही महत्वपूर्ण हैजो कि व्यक्ति के भाषाई ज्ञान की सीमा को ज्ञान की सीमा नहीं बनने देता और इस तरह से हमारी भाषा से इतर भाषा में व्यक्त ज्ञानसाहित्य तक हमारी पहुँच को संभव बनाता हैपर यह सोचने की बात तो ज़रूर है कि हमारे अपने देश में हमारी भारतीय भाषाएँ  अनुवाद की भाषा बन के रह गयी हैंसरकारी परीक्षाओं से लेकर सरकारी दफ्तरों तक में  हम अपनी भाषाओं को अनुवाद की भाषा बनते देख ही रहें हैंजहाँ यह साफ़ लिख दिया जाता हैकि किसी भी तरह की विसंगति होने पर अंग्रेज़ी मान्य होगी।
अभी हाल ही में आंदोलन का रूप ले चुके यूपीएससी के भाषा संबंधी विवाद को भी इस परिप्रेक्ष्य में समझे जाने की ज़रूरत है। यूपीएससी भारत की सर्वोच्च प्रशासनिक संस्था है। जिसमें जाने का ख्वाब लगभग हर तबके के लोग देखते हैं। एक छोटे तबके की होने के नाते मैं इतना तो कह सकती हूँ कि वहाँ इस सेवा का कुछ अधिक ही क्रेज़ हैजिसे लोग 'लाल बत्ती वाली गाड़ी' से जोड़ते हैं। ऐसे तबके जहाँ के लोगों का अंग्रेज़ी ज्ञान अपेक्षाकृत कमज़ोर हो सकता हैक्योंकि जिस परिवेश में वे रहे हैं और जिसमें उन्होंने शिक्षा पाई हैवहाँ न उन्हें व्यवहार में अंग्रेज़ियत मिली और न शिक्षा मेंइस वजह से वे बहुतों की नज़र में गँवई बने रहे और उस भद्रता से वंचित रहेजो तथाकथित अंग्रेज़ी शिक्षा और परिवेश से आती है। किसी एक भाषा की जानकारी न होना या उस भाषा में प्रवीणता प्राप्त न हो पाने का अभिप्राय किसी सेवा के लिए अपात्र हो जाना कतई नहीं होता खासकर तब तो बिलकुल नहीं जब वह भाषा उस देश की न हो। देश की शीर्षस्थ प्रशासनिक संस्था मानी जाने वाली यूपीएससी में यही हुआ। बहसों के उस दौर में बहुत सारे प्रबुद्ध पूर्व प्रशासनिक सेवकों ने स्पष्ट रूप से अपनी राय ज़ाहिर की जिसका अभिप्राय स्पष्ट रूप से अंग्रेज़ी को वरीयता देना था। भारत में भारत की ही भाषाओं के माध्यम से परीक्षा न दे पाना और यदि ऐसा हो भी पाता हैतो जाँच करने के लिए सिर्फ अंग्रेज़ी के मॉडल पेपरों का प्रयोग काफी दुखद है और यह कहीं न कहीं अवसरों की समानता को बाधित करता है।
किसी भी भाषा का कोई दोष नहीं होता है और न ही कोई भाषा ऊपर-नीचे हुआ करती है। ऐसी सोच जो भारत में बुरी तरह से व्याप्त हैउसके पीछे एक खास तरह की मानसिकता कार्य करती है। अपनी भाषा के प्रयोग को लेकर कुंठा या असम्मान का भाव स्वाभाविक कतई नहीं है। यह कहना कि हिंदी भाषा में रोज़गार के अवसर नहीं हैं या कि अंग्रेज़ी ऐसे कई अवसर प्रदान करता है कतई सही नहीं जान पड़ता। ये ज़रूरतें तैयार की गई हैं नहीं तो क्या वज़ह हो सकती है कि सरकारी संस्थाओं में लिपिकों के लिए ली जाने वाली परीक्षाओं में अंग्रेज़ी की ही जाँच की जाती है। जहाँ तक रोज़गार की संभावनाओं की बात है उसे हिंदी माध्यम में सृजित किया जा सकता है यदि व्यवस्था चाहे तो। पर समस्या यह है कि हिंदी पर अंग्रेज़ी को वरीयता देने की प्रवृत्ति भी वहीं से तैयार की गई है। और इसी प्रवृत्ति की वज़ह से हिंदी का न्यूनतम प्रयोग दीखता है और जो दीखता है वह भी या तो बनावटी या फिर ढेरों त्रुटियों से युक्त। अंग्रेज़ी बोलते या लिखते वक़्त हमारे यहाँ जो सचेतता दिखाई देती हैहिंदी के प्रयोग के प्रति उसका नितांत अभाव है।
कभी हिंदी के प्रख्यात कथाकार प्रेमचंद ने कहा था भाषिक गुलामी से मुक्त हुए बिना वास्तविक आज़ादी संभव नहीं है। इस लिहाज़ से हम आज़ादी के वास्तविक मायने तभी हासिल कर पाएँगे जब कि हम इस भाषिक गुलामी से आज़ाद न हो जाएँ।
भारत की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा जिसमें बड़ी बड़ी संस्थाओं में कार्यरत लोग भी शामिल हैंइस बात से अनभिज्ञ हैं कि हिन्दी भारत की राजभाषा है। एक अनुभव मेरा यह भी रहा है जब हिन्दी के प्रयोग सम्बन्धी मेरे आग्रह के ज़वाब में मुझे यह कहा गया कि द्विभाषिक रूप से काम करने में बिना वजह समय और संसाधन की बर्बादी हैसाथ ही यह भी कि हिन्दी भी हमारी भाषा नहीं है। दक्षिण भारत में यह स्थिति बहुत आम है और वस्तुस्थिति यह है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा नहीं मान पाए हैं। इसे बहुत अस्वाभाविक भी नहीं कहा जा सकता और ऐसी स्थिति में उनपर हिन्दी थोपा जाना सही नहीं होगा।पर मैं उस मानसिकता से हैरान अवश्य हूँजो अंग्रेज़ी के प्रयोग को सहर्ष स्वीकार रहा है और उसे विकास से जोड़ रहा है।ऐसा करके वह अपनी भाषा को भी दरकिनार ही कर रहा है।
कभी कभी मुझे लगता है कि हमारा समाज एक ओढी हुईजिसे हम आयातित भी कह सकते हैंमानसिकता से संचालित हो रहा है। तभी तो हमें अपनी भाषा में विकास के तत्व नज़र नहीं आते और हम खुद अपनी भाषाओं को मरने दे रहे हैं और हमें इस बात का तनिक भी अफसोस नहीं क्योंकि हम विकसित (?) हो गए हैंक्या हम अपनी भाषाओं के विकास के साथ अपना विकास नहीं कर सकते..??
मैं यहाँ राजेश जोशी की लंबी कविता भाषा की आवाज़’ को उद्धृत करना चाहती हूँ:
बोलते बोलते एकाएक
मुझे अपनी आवाज़ पुराने दासों की तरह लगी
मुझे एकाएक लगा कि यह अधीनों की भाषा है
जिसमें मैं सोच रहा हूँ और बोल रहा हूँ
लेकिन यह कब हुआ और कैसे हुआ?हमें तो लगता था कि यह हमारी आज़ादी की लड़ाई की भाषा है
स्वतंत्रता और नए नगरों के बनने की प्रक्रिया के बीच
लाखों लोगों ने अपने पुराने डेरों के उजड़ने और नए डेरों के बसने
के साथ-साथ बनाया है हमारी इस भाषा को
कि इसमें उनके आपस में बतियाने और गाने-बजाने की आवाजें हैं
कि उनके काम -धंधों की दिक्कतोंउनकी खुशियों और दुःख से बनी है यह भाषा
कि रोटी बेटी के सम्बन्धों के साथ बनाए हैं उसने नए कुटुंब
पर शायद हमीं से हुई थी चूक हम ही नहीं देख पाए थे
कि हमारी आज़ादी की लडाई की भाषा फैसलों की भाषा नहीं थी
आधी रात के अँधेरे में
फैसले तो उसी शासक की भाषा में लिखे गए थे
जिसके खिलाफ हम लड़े थे
बाज़ार पहले ही चुरा चुका था हमारी जेब में रखे सिक्कों को
और अब वह सौदा कर रहा था हमारी भाषा का
और हमारे सपनों का
पुराने अनुभव की कमीज़ पहन कर
नए विमर्श की शब्दावली के सामने खड़ा था मैं अकबकाया हुआ
और नए बाज़ार में सौदा-सुलुफ करता एक विदूषक की तरह लग रहा था
महत्वाकांक्षाओं के मायालोक में कहीं नहीं थी हमारी भाषा
कहीं दूर कोने-कुचालों से कभी-कभी सुनाई पड़ती थी
उसकी बहुत धीमी और पराजित आवाज़
बिना लड़े ही हम हार रहे थे अपनी लडाई!

यहाँ बस यही कहना चाहूंगी की बिना लड़े हमें अपनी यह लड़ाई नहीं हारनी है। और इस लड़ाई को हम अपनी भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से निश्चय ही जीत सकते हैं और इस बात को झुठला भी सकते हैं कि विकास के अवसर का हमारी भाषा में अभाव है।
हिंदी भाषा एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से अंग्रेज़ी का प्रभाव स्वत: ही कम हो जाएगा जो कि राजभाषा कार्यान्वयन नीति एवं दिशानिर्देश का निहितार्थ है। हम सभी जानते हैं कि भाषा का प्रसार व विकास एक सामूहिक कार्य होता है। आइए हम यह संकल्प लेते हैं कि आज के दिन से हम सभी पहले से और अधिक प्रतिबद्ध होते हुए एकजुट होकर पूरी सकारात्मकता व उत्साह के साथ अपने अपने स्तर पर राजभाषा के प्रयोग को और अधिक बढ़ाएँगे। अपने अपने स्तर पर हम सभी सभी क्षेत्रों से संबंधित ज्ञान को अपनी भाषा में सृजित करने का प्रयास करेंगे। ताकि आने वाले समय में हमें अपनी भाषा के लिए एक दिन तय न करना पड़ेऔर मेरे लिहाज़ से हमारी ज़िम्मेदारी किसी एक भाषा के प्रति न होकर अपने देश की हर भाषाओं को लेकर होनी चाहिए।


स्वाती ठाकुर
शोधार्थी-हिंदी विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय

Thursday, March 20, 2014

लिव -इन -रिलेशनशिप ---वर्जना या आज का सच ! सरस दरबारी

सरस दरबारी
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    लिव -इन -रिलेशनशिप ---वर्जना या आज का सच !
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   तान्या एक संभ्रांत परिवार में पली, आधुनिक विचारों वाली युवती थी.. उच्च शिक्षा का मन बना वह विदेश में एम्.एस.करने चली गयी. शिक्षा पूरी होने के बाद नौकरी भी मिल गयी. अब तक तो कॉलेज के हॉस्टल में रहने, खाने की सुविधा थी. पर अब उसे सारा इंतज़ाम खुद करना थामहंगाई इतनी की BHK का जुगाड़ बैठा पाना भी मुश्किल था, लेकिन इस वक़्त सिर पर छत सबसे बड़ी ज़रुरत थी सो उसने अपने खर्चों में भारी कटौती कर एक बेडरूम  हॉल का फ्लैट किराये पर ले लिया. इससे खर्चे का बोझ और बढ़ गया.
कुछ समय बाद उसीके ऑफिस के एक कलीग, श्लोक से  उसकी दोस्ती हो गयी. दोस्ती घनिष्टता में बदल गयी और दोनोंने  विवाह करने का मन बना लिया. पर इसके लिए परिवार की रज़ामंदी ज़रूरी थी. पर जब तक बैंक से लिया गया एजुकेशन लोन चुकता हो जाये ...विवाह के लिए घर पर कोई राज़ी होता. तो सालभर तो शादी का कोई सवाल ही नहीं था.
ऐसे में दोनों ने तय किया चलो पहले लोन ही उतारते हैं, जब तक सिर पर यह दायित्व रहेगा, हम और कुछ सुचारू रूपसे नहीं कर पाएंगे.
पहला कदम था , खर्चों में कटौती. दो अलग अलग गृहस्थियाँ चलाना काफी महँगा था, सो उन्होंने सोचा क्यों हम साथ रहें, इससे हमारे खर्चे आधे हो जायेंगे. और तान्या ,श्लोक के स्टूडियो अपार्टमेंट में शिफ्ट हो गयी. सब कुछ बहुत आसान हो गया. उनके खर्चे बचने लगे , वे एक दूसरे को ज्य़ादा  समय देने लगे , समझने लगे और सालभर में एक दूसरे की कमियों, अच्छाइयों को पूरी तरह जान गए.

साथ रहनेवाली बात काफी समय तक घर वालों से छिपाकर रखी, क्योंकि जानते थे यह बात उन्हें कभी हज़म नहीं होगी. तान्या ने ज्य़ादा  से ज्य़ादा  पैसे भेजकर अपना लोन भी चुकता कर दिया और उचित समय देखकर घरवालों पर अपनी पसंद ज़ाहिर कर दी, और हंसी ख़ुशी उनका विवाह संपन्न हुआ.

यह तो था एक पहलू
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   पर सभी इन दोनों की तरह मैच्यौर और समझदार नहीं होते.
"लिव इन रिलेशनशिप ", आज, यह शब्दावली जितनी आम हो गयी है उतनी आज से ५० साल पहले नहीं थी. ऐसा करना तो क्या उसकी कल्पना भी अविश्वसनीय थी.
'भला ऐसा भी कहीं होता है ...शादी से पहले साथ रहना...छी: छी:'
लेकिन वक़्त बदला . समय का पहिया घूमता गया. हमेशा की तरह धारणाएं बदलीं, संस्कार बदले ,रूढ़ियाँ बदलीं , और शनै: शनै: कल का ग़लत, आज का सही बनता गया .पुरानी प्रथाएं, रूढ़ियाँ वर्जित होती गयीं और जो कल 'अविश्वसनीय' था आज सम्भव होने लगा.
कोई भी शै पूरी तरह स्याह या सफ़ेद नहीं होती. सिर्फ मात्रा या अंश का अंतर होता है ...कहीं पर सफ़ेद का अंश ज्य़ादा होता है,कहीं काले का. और यही तय करता है की वह कितना सही है या कितना ग़लत; कितना मान्य है या कितना अमान्य!
लिव इन रिलेशनशिप भी ऐसी ही एक वर्जना है ...टैबू हैहमारा समाज जिसे स्वीकारने से छिटकता है .
पश्चिमी देशों में यह एक आम समझौता है ...जब तक मन रहा साथ रहे, जब मन भर गया, अलग हो गए..!!
'यह समाज की सबसे मज़बूत संस्था,' परिवार', की बुनियाद पर गहरा प्रहार है', 'उच्श्रृंखलता की चरम सीमा है' , और 'विवाह जैसे पवित्र बंधन के नाम पर गाली है' . यह है हमारी धारणा, क्योंकि हमारे संस्कारों ने हमें यही सिखाया. लेकिन आज की पीढ़ी की सोच बदली है. उनका तर्क है की विवाह के बाद हमें जिसके साथ पूरा जीवन व्यतीत करना है, उसे जानना बहुत
  ज़रूरी है. जिसके पल्ले से हमें बांधा जा रहा है उससे हमारी सोच  मेल खाती भी है कि नहीं, इसे समझना ज़रूरी है.

फ़र्ज़ कीजिये कि अरेंज्ड या प्रबंधित विवाह के बाद , विवाहित जोड़े को एहसास हो कि वे दोनों ही परस्पर विरोधी सोच, स्वाभाव और व्यक्तित्व, के मालिक हैं तब वे इस रिश्ते का बोझ कैसे ढो पाएंगे ……तब उनके दांपत्य जीवन का क्या हश्र होगा .....और अगर वे संस्कारों में बंधकर या बड़ों के दबाव में आकर समझौता कर भी लें तो क्या यह उन दोनों के साथ न्याय होगा ....और ऐसे समझौते से हुए बच्चे ....वे किस मन:स्तिथि से गुज़रेंगे, जब ऐसे माहौल में पलेंगे जहाँ भावनात्मक सुरक्षा नहीं है....ऐसे में वे कितना और कैसे पनपेंगे ..आगे चलकर उनका व्यक्तित्व कैसा होगा  .... क्योंकि माता पिता के मध्य तनावबच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालता है.

अमूमन लिव -इन रिलेशनशिप लोग इसलिए पसंद करते हैं कि वे पारिवारिक जीवन से जुड़े उत्तरदायित्वों और जटिलताओं से दूर रहकर, केवल उससे जुड़े सुख भोगना चाहते हैं . अगर महज इसीलिए कोई लिव इन रिलेशनशिप की पैरवी करता है, तो यह सर्वथा अमान्य है .....ऐसी ही प्रवृत्तियों की वजह से इस किस्म का समझौता या जीने का ढंग , हमारे समाज में मान्य नहीं है.

इसीके साथ एक दूसरा प्रश्न भी उठता है .... कि लिव इन रिलेशनशिप से हुए बच्चों का भविष्य क्या है? जब उन्हें जन्म देने वाले ही एक दूसरे के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित नहीं हैं, तो वे बच्चों के प्रति क्या उत्तरदायित्व निभाएंगे ? ऐसी उपज का क्या होगा जहाँ उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, परिवार की आत्मीयता और संरक्षण नहीं मिलेगा. यह समस्या तो दोनों प्रकार की स्तिथियों में सम्भव है जहाँ अनिच्छा से विवाह हुआ हो, या जहाँ ज़िम्मेदारियों को वहन करने की अनिच्छा हो.

लेकिन बदलती सोच, बदलते परिवेश और उनसे जुड़े हालातों  ने लिव इन रिलेशनशिप को किसी हद तक स्वीकृत किया है. अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे मान्यता दे दी है और संसद को उन औरतों और बच्चों की सुरक्षा के लिए कड़े नियम बनाने की ताकीद दी है जो इस रिश्ते से प्रभावित होंगे, या हो रहे हैं.


समाज शास्त्री डॉ.सेलिन सनी जो की रिसर्च इंस्टिट्यूट , राजागिरी कॉलेज ऑफ़ सोशल साइंस में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं, का मानना है कि  "समय के साथ सोच बदली ज़रूर है , पर आज भी विधिवत संपन्न हुआ विवाह ही पति पत्नी के बीच सबसे पवित्र बंधन माना जाता है". दरअसल लिव- इन रिलेशन एक सहूलियत का विवाह ( मैरिज ऑफ़ कन्वेनियन्स ), या एक अनुकूलता या अविरोध का विवाह (मैरिज ऑफ़ कम्पैटबिलिटी) है कि वचनबद्धता या प्रतिबद्धता ( कमिटमेंट ) का विवाह . और मैं समझती हूँ कि वचनबद्धता , विश्वास और समर्पण , यह हर रिश्ते की नींव की वह ईंटें हैं जहाँ से रिश्तों की ईमारत उठनी शुरू होती है, फिर चाहे वह  ईमारत किसी ज़मीन पर खड़ी हो.
-सरस दरबारी


जन्मतिथि -  सितम्बर  १९५८
ब्लॉग       - www.merehissekidhoop-saras.blogspot.in
ईमेल       - sarasdarbari@gmail.com

 इटावा (.प्र ) में जन्म हुआ
मुंबई विश्व विद्यालय से राजनितिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री l
विद्यार्थी जीवन में कई कवितायेँ लिखीं और अंतर महाविद्यालय कहानी लेखनकविता लेखन प्रतियोगिताओ में कई पदक और ट्राफी प्राप्त कीं .
प्रखर साहित्यिक पत्रिका 'दीर्घामें 'विशेष फोकस ' के अंतर्गत ११ कविताओं का प्रकाशन.
नवभारत टाइम्स में कविताओं का प्रकाशन
आकाशवाणी मुंबई से 'हिंदी युववाणी ' व् मुंबई दूरदर्शन से 'हिंदी युवदर्शनका सञ्चालन
'फिल्म्स डिविज़न ऑफ़ इंडियाके पेनल पर 'अप्रूव्ड वोईस'
फिर विवाहोपरांत पूर्णविराम
३० साल बादफेब्ररी २०१२ सेब्लॉग की दुनिया में प्रवेश और फिर लेखन की एक नए सिरे से शुरुआत.
रश्मि प्रभाअवं हिंदी युग्म प्रकाशन का काव्य संग्रह "शब्दों के अरण्य में " अवं  सत्यम शिवम् का कविता संग्रह "मेरे बाद " ( उत्कर्ष प्रकाशन ) की समीक्षा
साझा काव्य संग्रह - शब्दों के अरण्य मेंअरुणिमाबालार्कएवं शब्दों की चहलकदमी




  

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