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Wednesday, July 04, 2012

"एक शाम फरगुदिया के नाम" काव्य संध्या में रश्मि भारद्वाज द्वारा पढ़ी गई कविता








बिजूका


देह और मन की सीमाओं में

नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....

अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं

और देह उसकी खरीदी जा सकती है

टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....


गरीब की बेटी नहीं पायी जाती

किसी कविता या कहानी में

जब आप उसे खोज रहें होंगे

किताबों के पन्नों में ........

वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच

गोबर में सनी बना रही होगी उपले

या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...

सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती

खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....



आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया

कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से

उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के

कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में

देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....


आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी

कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी

बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....

यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर

दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की

और बचा सके गरीब की बेटी को

नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......



गरीब की बेटी नहीं बन पाती

कभी एक अच्छी माँ

कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में

कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....

ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है

अपनी नन्ही सी जान को

किसी भी कारखाने या होटल में

चौबीस घंटे की दिहारी पर .......




अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी

कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....

शुक्र बाज़ार में दस रुपए में

मिल जाता है उसका मंगलसूत्र

उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....




आप सिखा सकते हैं उसे मायने

बड़े-बड़े शब्दों के 

जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे

लेकिन नहीं सीखेगी वह

कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है

जिस पर लिखा है एक ही शब्द

भूख ........

.और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....



गरीब की बेटी नहीं जीती

बचपन और जवानी

वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा

जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है

इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !

वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....

दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है

जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी




कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....( रश्मि भारद्वाज)

Monday, July 02, 2012

"एक शाम फरगुदिया के नाम" काव्य संध्या में रश्मि भारद्वाज द्वारा पढ़ी गई कविता


बिजूका

देह और मन की सीमाओं में
नहीं बंधी होती है गरीब की बेटी....
अपने मन की बारहखड़ी पढ़ना उसे आता ही नहीं
और देह उसकी खरीदी जा सकती है
टिकुली ,लाली ,बीस टकिये या एक दोने जलेबियों के बदले भी ....

गरीब की बेटी नहीं पायी जाती
किसी कविता या कहानी में
जब आप उसे खोज रहें होंगे
किताबों के पन्नों में ........
वह खड़ी होगी धान के खेत में,टखने भर पानी के बीच
गोबर में सनी बना रही होगी उपले
या किसी अधेड़ मनचले की अश्लील फब्तियों पर ...
सरेआम उसके श्राद्ध का भात खाने की मुक्त उद्घोषणा करती
खिलखिलाती, अपनी बकरियाँ ले गुजर चुकी होगी वहाँ से .....

आप चाहें तो बुला सकते हैं उसे चोर या बेहया
कि दिनदहाड़े , ठीक आपकी नाक के नीचे से
उखाड़ ले जाती है आलू या शक्करकंद आपके खेत के
कब बांध लिए उसने गेहूं की बोरी में से चार मुट्ठी अपने आँचल में
देख ही नहीं सकी आपकी राजमहिषी भी .....

आपकी नजरों में वह हो सकती है दुश्चरित्र भी
कि उसे खूब आता है मालिक के बेटे की नज़रें पढ़ना भी
बीती रात मिली थी उसकी टूटी चूड़ियाँ गन्ने के खेत में ....
यह बात दीगर है कि ऊँची – ऊँची दीवारों से टकराकर
दम तोड़ देती है आवाज़ें आपके घर की
और बचा सके गरीब की बेटी को
नहीं होती ऐसी कोई चारदिवारी ......

गरीब की बेटी नहीं बन पाती
कभी एक अच्छी माँ
कि उसका बच्चा कभी दम तोड़ता है गिरकर गड्ढे में
कभी सड़क पर पड़ा मिलता है लहूलूहान....
ह्रदयहीन इतनी कि भेज सकती है
अपनी नन्ही सी जान को
किसी भी कारखाने या होटल में
चौबीस घंटे की दिहारी पर .......

अच्छी पत्नी भी नहीं होती गरीब की बेटी
कि नहीं दबी होती मंगलसूत्र के बोझ से....
शुक्र बाज़ार में दस रुपए में
मिल जाता है उसका मंगलसूत्र
उसके बक्से में पड़ी अन्य सभी मालाओं की तरह ....

आप सिखा सकते हैं उसे मायने
बड़े-बड़े शब्दों के
जिनकी आड़ में चलते हैं आपके खेल सारे
लेकिन नहीं सीखेगी वह
कि उसके शब्दकोश में एक ही पन्ना है
जिस पर लिखा है एक ही शब्द
भूख ........
.और जिसका मतलब आप नहीं जानते ....

गरीब की बेटी नहीं जीती
बचपन और जवानी
वह जीती है तो सिर्फ बुढ़ापा
जन्म लेती है , बूढ़ी होती है और मर जाती है
इंसान बनने की बात ही कहाँ ..... !
वह नहीं बन पाती एक पूरी औरत भी ....
दरअसल , वह तो आपके खेत में खड़ी एक बिजूका है
जो आजतक यह समझ ही नहीं पायी
कि उसके वहाँ होने का मकसद क्या है ....( रश्मि भारद्वाज)

Tuesday, June 26, 2012

"एक शाम - फर्गुदिया के नाम" कार्यक्रम में मेरी (शोभा मिश्रा) कविता

शोभा मिश्रा _______________ 


"मौन हुई पवित्रता "
__________________


वो खुद एक गुड़िया सी
अपनी गुड़िया सजाती हुई
बहुत खुश होती थी
कंघी,रिब्बन,लाली,बिंदी
सभी कुछ था उसके पास
अपनी गुड़िया को सजाने के लिए
रंगीन कपड़ों में सजी
अपनी गुड़िया में देखती थी अपनी छवि
खेल-खेल में उसकी गुड़िया की बरात आती,डोली सजती
लाल कपडे की कतरन से साड़ी पहना
विदा कर देती अपनी गुड़िया को एक गुड्डे संग
कल्पना चावला,सानिया मिर्ज़ा को अपना आदर्श मान
कभी किताबों के आसमान में खोयी रहती
कभी अहाते के पास ..
खेल के मैदान में पसीना बहाती रहती

सोलह बसंत देख चुकी वो
पूरे आत्मविश्वाश और लगन के साथ
अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ी जा रही थी
तभी उसे समझाया जाता है
एक गठबंधन के बारे में
एक ऐसा गठबंधन ...
जिसमें उसका वर कोई साधारण पुरुष नहीं होगा
वो ईश का प्रतिनिधित्व करने वाला
सभी के लिए ईशतुल्य है
वो ईश उसका स्वामी होगा

स्वीकार नहीं था उसे ये गठबंधन
अपनों ही द्वारा उसके मन-मस्तिष्क में ..
गठबंधन का जो बीज बोया गया था
उस बीज को उन्हीं के द्वारा रोज सींचा जाने लगा
और अंततः उस बीज का एक अंकुर
उसे अपने भीतर नज़र आया
वो अनमने मन से तैयार हो गयी उस गठबंधन के लिए
न उसकी बरात आई न डोली सजी
वो ले जाई गयी अपने ईश के घर

वहाँ उसे दिखी सफ़ेद लिबास में कुछ स्त्रियाँ
एक असीम शान्ति थी उन स्त्रियों के चेहरे पर
आँखों में करुणा और कोई रहस्य भी था
उसे स्नान करवाया गया ,सफ़ेद वस्त्र पहनाये गए
उसने सुना कुछ मन्त्रों का उच्चारण
उसके भीगे लम्बे केशों को पहले एक एककर
फिर गुच्छों में हाथों से खींचकर
उसके सर से अलग किया जाने लगा
कराह उठी वो एक असह पीड़ा से
अपनी गुड़िया के नाजुक केशों को वो कैसे संवारती थी
याद करती रही .. और सिसकती रही

न विरोध ..न चीखी
क्योकि इसी तरह होगा उसका श्रृंगार
उसे पहले से ही बताया गया था
चोटी,जूड़ा ना गजरा
केश रहित उसके सर से कहीं कहीं खून की बूँदें रिस रहीं थीं
जो डर और वेदना से आये पसीने के साथ मिलकर
उसके पूरे चहरे को बदरंग कर रही थी
नहीं था उसकी आँखों में काजल
डबडबाई और भयभीत आँखें
होंठों की पपड़ियों की लाल दरारें साफ़ दिख रही थी
उसने आईने में अपना श्रृंगार नहीं देखा
लेकिन कल्पना कर सकती थी अपने विकृत रूप का

सजा धजाकर उसे ईश के सन्मुख ले जाया गया
वो गंगाजली बनी , फूल बनी , भोग बनी
इस पूजा से अनजान
समर्पित हो गयी अपने ईश के चरणों में
ईश को पूज वो अपनी देह की पीड़ा से
और उसकी आत्मा 'उसकी ' पीड़ा से कराह उठी
उसकी देह और आत्मा
पूरी रात एक दूसरे का आलिंगन कर सिसकती रही

वो सुबह उठी
आज की सुबह एक अजीब सा सन्नाटा ओढ़े हुए थी
चिड़िया अपना चहचहाना भूलकर
सहमी सी उसे निहार रही थी
ये नयी सुबह रोज की तरह सबके लिए
रंगीन प्राकृतिक छटाओं से रंगी हुई थी
लेकिन उसे सिर्फ एक रंग याद करने को कहा गया है
वो है सफ़ेद रंग ........!!!




(शोभा)


Monday, June 18, 2012

"एक शाम - फ़रगुदिया के नाम " कार्यक्रम में डॉ सविता सिंह जी द्वारा प्रस्तुत कविताएं

डॉ सविता सिंह 
-----------------------





१- आघात 
_______

इस पहर एक आवाज़ आती है

अपनी ही साँस चलने की
इस पहर मेरे ही प्राणों के स्पंदन से
चलती है यह सृष्टि
इस पहर चीज़ों के यूँ होने का
मैं ही हूँ सुखद उदगम

इस पहर एक चिड़िया अपने घोंसले में
स्वप्न देख रही है
की यह दुनिया सुन्दर हो रही है
एक स्त्री अपनी व्यथा को उतारकर
रख रही है एक तरफ ____
चिरपरिचित अपने परिधान को
अपने लम्बे बालों को खोलकर दोबारा बाँध रही है
जैसे किसी तैयारी में हो
कहीं जाने की आतुरता हो उसमें
एक सादगी में जैसे वह उतरना चाहती हो
पार करना चाहती हो जैसे कोई नदी

वह पार उतर भी जाती है
जाती हुई दिखती है फिर उधर
जिधर प्रकृति है और हरीतिमा
नए परिधान उसके
जिसमें प्रसन्नचित्त वह प्रतीक्षा करती है
नए आघात की


२- नया एकांत
_____________

आखिरकार अपनी भाषा में हूँ सुकून से

मुझे खोजने आ सकतें हैं मेरे प्रेमी
मैं मिलूंगी भी अब शायद उन्हें सजी-धजी
उनका स्वागत करती
अब मुझमें कोई संशय नहीं
न भीरुता पहले वाली
जरा भी रहस्यमय नहीं रहूंगी अब मैं
जैसे मैं थी जब नहीं समझती थी भाषा के तिलिस्म को
उसके विस्तार को

इस समय कितनी सहज हूँ मैं
साधारण कितनी साधारण
सचमुच जैसी मैं हूँ
अपनी कविता में जीवन की समझ की तरह
व्यथित-आनंदित एक राग की तरह खुद को गाती
बेफिक्र जैसे कोई नदी
चुपचाप बहती किसी जंगल में

अपनी भाषा में फिर भी कितनी सबके साथ हूँ
बिना किसी द्वेष और स्पर्धा के
जो झिझक है थोड़ी बहुत दूसरों को लेकर
वह कविता की ही है
वह खुद उसे झाड़ लेगी जब वह नया समाज बना लेगी
इसका यकीन है भाषा को ही

मैं हूँ सुकून से जैसे पहले कभी न थी
आश्वस्त भी कि प्रेम पहचान लेगा इस नए एकांत को

३-सपनें और तितलियाँ
_____________________

एक लंबे सपने का यह छोटा सा हिस्सा है

इसमें मैं बेदम भाग रहीं हूँ
देखतीं हूँ एक घने जंगल में हूँ
पेड़ों पत्तों के बीच उन्हीं की  तरह आश्वस्त
जंगल के जीवों के बीच निर्भय
उनके प्रलापों से अवगत
इधर-उधर घूमती पास की  नदी तक जाती
बैठती किसी पुराने पत्थर पर

तभी आता है कोई घोड़े पर सवार
पास उतरता है मेरे
फिर कहता है ढूँढ़ता रहा है वह कई जन्मों से मुझे
कि मेरे पास उसके कुछ फल और नदियाँ हैं
कि वह भूखा और प्यासा है
पीने आया है अपने हिस्से का जल मुझमें ....... कवितांश

Sunday, June 03, 2012

"फर्गुदिया के नाम - एक शाम " कार्यक्रम में विपिन चौधरी द्वारा सुनाई गयी दो कविताएँ


१ . पीड़ा का फलसफा
 दर्द को मुठ्ठी में कैद कर उसके फलसफे का पाठ

फिर चार- पांच दिन अपने हाल पर जीना
अपने तरीके से जूझना
अभ्यास  करना
सहजता से चाक-चौबंद रहने के लिए
और  सजगता भी ऐसी जो
धूनी की तरह सिर से पाँव तक अपना पसारा जमा ले


पीड़ा को अपनी गोदी में सुलाने के ये दिन
पीड़ा जो पीठ की तरफ से आती
या कभी तलवे से उठान भरती


हर बार दर्द का चेहरा बहुत अलग होता है
हर बार उससे जूझने का तरीका वही


हर दिलासा का दूत एक तरफ से आया
नज़दीक आये बिना पल में हवा हो गया


मानीखेज़ चीजें  गोल दिशा में डूब कर आयी
दुःख, प्रेम, ख़ुशी
फिर ख़ुशी, प्रेम, दुःख
सात राग बारी बारी से जीवन में आये
पर चार दिन वाली  इस सनातन पीड़ा
ने चारों दिशाओं से अपनी बर्छियां  चलायी


महीनें के इन चार दिनों वाली अबूझ पहेली से पहले पहल
परिचय विज्ञान की कक्षा ने करवाया  
जब सर झुकाए
मिस लीला को सुनाते और
सोचते,
 ‘क्या ही अच्छा होता
कि आज  कक्षा में बैठे ये सारे के सारे लडके लोप हो जाते’


फिर एक दिन स्वयं साक्षात्कार हुआ
कई हिदायतों से बचते बचाते
सिर छुपाते
कहर के पंजों के लडते रहने वाले इन दिनों से


खुदा, खुद
औरत की जुर्रत से भय खाता था
सो औरत को औरत ही बनाए रखने की यह जुगत उसकी थी


हम औरतों  के ये चार दिन अपनी देह की प्रकृति से लडते बीतते
तभी जाकर एक जंगली खुनी समुंदर को अपने भीतर जगह देने का साहस
इस आधी आबादी के नाम पर लिखा जा सका


इन चार दिनों में औरत का चेहरा भी
हव्वा का चेहरा के बिलकुल  करीब आ जाता है
हालाँकि  हव्वा भी अब बूढ़ी हो गयी है
इस चार दिनों वाली परेशानी से जूझने वालेउसके दिन अब लद गए हैं


इन्हीं भावज दिनों में अपनी भावनाओं को खोलने के लिए
किसी चाबी का सहारा लेना पड़ता है
कभी ना कभी हर औरत कह उठती है  
’माहिलाओं  के साथ  इस व्यवाहरिक  मजाक  को क्यों अंजाम दिया गया’
फिर एक मुस्कुराते बच्चे की तस्वीर को देख कर
खुद ही वह अपनी सोच वापिस ले लेती है


हर महीने जब  प्रकृति का यह तोहफा  द्वार खटखाता है
तब योनी गुपचुप एक आतंरिक योग में व्यस्त हो जाती है
अपरिहार्य कारणों से
पीड़ा की इस स्तिथी  में भी महिलाओं की उँगलियाँ  मिली  हुई (crossed ) रहती   हैं
जिनकी बीच कस कर एक उम्मीद बेपनाह ठाठे मारती है

यो प्रक्रति का पीड़ादायक रुदन
सहज तरीके से सुरक्षित बना रहता है
संसार की हर औरत  के पास
जब एक स्त्री पांचवे दिन नहा धो कर
आँगन में चमेली की महक के बराबर खड़ी होती हैं तो
प्रकृति  उसका  हाथ और भी मजबूती  थाम  लेती है


२ .चन्द्रो
  (स्तन कैंसर से जूझती महिलाओं को समर्पित) 
चन्द्रो,
यानी फलाने की बहु 
धिम्काने की पत्नी 
पहली बार तुम्हें चाचा के हाथ में पकड़ी एक तस्वीर में देखा 
अमरबेल सी गर्दन पर चमेली के फूल सी तुम्हारी सूरत 
फिर देखी 
श्रम के मजबूत सांचे में ढली तुम्हारी आकृति 
कुए से पानी लाती 
खड़ी दोपहर में खेतों से बाड़ी चुगती 
तीस किलों की भरोटी को सिर पर धरे लौटती अपनी चौखट    
ढोर-डंगरों के लिए सुबह-शाम हारे में चाट रांधने में जुटी  
किसी भी लोच से तत्काल इंकार करती तुम्हारी देह 
इसी खूबसूरती ने तुम्हें अकारण ही गांव की दिलफेंक बहु बनाया 
फाग में अपने जवान देवरों को उचक-उचक कोडे मारती तुम 
तो गाँव की सूख चली बूढ़ी चौपाल 
हरी हो लहलहा उठती 
गांव के पुरुष स्वांग सा मीठा आनंद लेते 
स्त्रियाँ पल्लू मुहँ में दबा भौचक हो तुम्हारी चपलता को एकटक देखती 
                                                                        
अफवाओं के पंख कुछ ज्यादा  ही चोडे हुआ करते हैं 
अफवाहें तुम्हे देख 
आहें भर बार- बार दोहराती 
फलाने की दिलफेंक बहु 
धिम्काने की दिलफेंक स्त्री 
इस बार युवा अफवाह ने सच का चेहरा चिपका 
एक  बुरी खबर दी 
लौटी हो तुम अपना एक स्तन 
कैंसर की चपेट में गँवा कर
शहर से गाँव   
डॉक्टर की हजारों सलाहों के साथ 
  
अपने उसी पहले से रूप में 
उसी सूरजमुखी ताप में 
इस काली खबर से गाँव के पुरूषों पर क्या बीती 
यह तो ठीक-ठीक मालुम नहीं 
उनके भीतर एक सुखा पोखर तो अपना आकार ले ही गया होगा 
महिलाओं पर हमेशा के तरह इस खबर का असर भी 
फुसफुसाहट के रूप में ही बहार निकला 
चन्द्रो हारी-बीमारी में भी 
अपने कामचोर पति के हिस्से की मेहनत कर 
डटी रही हर चौमासे की सीली रातों में 
अपने दोनो बच्चों को छाती से सटाए
निकल आती है 
आज भी   बुढी चन्द्रो 
रात को टोर्च ले कर 
खेतों की रखवाली के लिए  
अमावस्या के जंगली लकडबग्घे  अँधेरे में 

Friday, June 01, 2012

मै यूँ ही प्रवाहित हो गई जल में - निरुपमा सिंह


............ निरुपमा सिंह .......
कवित्री , लेखिका
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित 




मैं फरगुदिया

भ्रूण बन रोप दी गई अनचाही धरा में

निरीह (बाप )और गरीब (माँ )द्वारा ..

नियति अपने अंश को आकार देता

जीवन बन चुका था ...

ठीक नौ माह बाद ...

पता नहीं माँ के खेत में काम करने की मज़बूरी ?

या प्रसवपीड़ा ?

मै आ चुकी थी बिना किसी झंझट का

..वस्त्र पहने !

रंग -रूप भी भगवान ने

अमीरों की चाहत की तरह  भर दिया था

'माँ' के थप्पड़ से सहेजती अपने को

पिता की क्रूर आँखों का पहरा

आईना देखने से डरती मै !

सखी -सहेलियों को विदा करते

कब मैंने बचपन को छोड़ दिया ..सुध ही नही

अलहडपन को समेट लौट रही थी .......

.......................रास्ते में बालिग़ करार ..............

.............देते हुए ........मुझसे मेरे जीने का हक छीन लिया गया .

पत्थर मेरी आँखे ...........बर्फ मेरी साँसे .....

घर लौटने का मकसद ...धुंधलाने लगा ...

..........समय की रेत सी (भभकती )सड़क ....

जिन पर से ज़बरन खीचती माँ ...........

ले गई मुझे सीलन भरी कोठारी में ......

पीले दांतों वाली ...काली छाया ने

अनुभवों के मापदंड पर

मृत घोषित कर दिया ..........

........मरने के बाद ..कोई सार्वजनिक जगह नही थी

जहाँ मेरा दाह-संस्कार हो सके ?

कंधे तो चार चाहिए थे .

..पर ...मै तो बिना कंधे वाले समाज की उत्पति थी ....

खैर !!!!!!!!!!

अपने ही भाई बहनों द्वारा ....घसीटती.. पहुंचाई ..गई ..श्मशान तक

संस्कारगत ..कुछ विधियाँ बाक़ी /संवेदनावो के फूल सरीखी ...

सफ़ेद फूल ..मेरी अपवित्रता के लिए ठीक न थे ...

और लाल ...मुझ पर चढ़ाया नही जा सकता था !!

उहापोह में ...

जलाये जाने की विधि किनारे आ गई ..

लड़की और विपन्नता दोनों ...एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में..

...जितनी लकड़ी मुझें जलाने के लिए चाहिए थी .....

उतने में मेरे परिवार का कई दिन चूल्हा जलता !

संकोच ...निःसंकोच को दबोचता ....

मै यूँ ही प्रवाहित हो गई जल में..

............मेरा वज़ूद ...पीपल की पेड़ पर

............".अपवित्र चुड़ैल "बना टांगा जा चुका है(रहस्यमयी मृत्यु )

.....दूर कहीं से शंख ध्वानि ....किसी और किशोरी को ..

अपवित्र करने का शंख नाद कर रहा था ...........!!


............ निरुपमा सिंह .........कवयित्री , लेखिका 

"एक शाम - फर्गुदिया के नाम " कार्यक्रम में डॉ सोनरूपा द्वारा प्रस्तुत कविता



















तुमने ले ही लिया था

जन्म

कि तुम्हे लेना था

लोरियाँ ,थपकियाँ नहीं थीं तुम्हरे लिए

मगर तुम थी तो छोटी सी बच्ची ही ना

सो ही जाती थीं पैरों ,हाथों ,को पेट से लगा के

बढ़ने लगी थीं तुम

कि तुम्हे बढ़ना ही था

रोटियां बस खाने को नहीं थीं तुम्हारे लिए

दिन भर के काम का मेहनताना था तुम्हारा

जो ईधन देता रहे तुम्हारी अंतडियों को

तुम रजस्वला हो गयी थीं

कि तुम्हे होना ही था

अब तुम कुम्हार की चाकी पर चढ़ ही गयी थीं

पकने कि लिए

तुम्हारे उभरते बदलाव चमकने लगे थे निगाहों में बहुतों के

अचानक तुम तोड़ दी गयीं

लेकिन तुम्हे टूटना नहीं था

कच्चे गीले बर्तन से भी कोई पानी पी गया

और चाक से गिर कर तुम बिखर गयीं ऐसे चक्रव्यूह में

जिसे भेदना तुमने भी सीखा ना था .....

तुम्हे बहुत कुछ होना था

मगर तुम हो ना पायीं

तुम पवित्र थीं गिरजे के घंटे की मुंदरी की तरह

हैवानियत ने छुआ तुम्हे

तुम बजीं भी मगर एक चीख की तरह,

महकना था तुम्हे सुगंध की तरह

तुम बिखर गयीं भस्म की तरह,

खेलना था तुम्हे बच्चों की तरह

मगर तुम खेली गयीं खिलौनों की तरह,

तुम्हे कहना था बहुत कुछ

मगर तुम कह ना पायीं

‘बच्ची’ से ‘स्त्री’ बनने तक

तुम हो ही जातीं

तीखी ,कसैली ,पैनी

इस समाज की बदौलत

आक्रोश का लावा धधकता रहा होगा तुम्हारे अंदर तब तक


जब तक तुम्हारी चिता की सुलगती लकड़ियों ने उसे ठंडा ना कर दिया होगा

क्या अग्नि ही काट थी तुम्हारी

































Thursday, May 31, 2012

आप सभी का धन्यवाद् !!! by Shobha Mishra on Tuesday, May 29, 2012 at 12:16pm ·



फर्गुदिया , नाम लेते ही मन के आकाश पर चिड़िया सा एक चित्र उभर जाता है । उसकी उम्र भी अभी उड़ने की ही थी । पूरा जहाँ जानना था उसे ; लेकिन हमारा समाज उससे किसी शिकारी और कसाई से भी ज्यादा क्रूरता से पेश आया और आज बस उसका नाम रह गया है, और रह गया है वह कलंक जो हमारे समाज के माथे पर आज भी व्याप्त है । वैसे तो वह एक गाँव की साधारण सी लड़की ही थी। लेकिन आज जब भी समाचार , अखबार मे कहीं देखती-सुनती हूँ उसी तरह की दरिंदगी तो जैसे जिंदा हो उठती है वह मेरे भीतर।
आज से करीब एक साल पहले जब मैंने फेसबुक पर सिर्फ महिलाओं के लिए एक ग्रुप बनाया और नाम फ़र्गुदिया रखा तो मुझसे फ़र्गुदिया के बारे में बहुत सारे प्रश्न किये गए ..जैसे .. ये फरगुदिया क्या है , कौन है , उसकी कहानी क्या है ...? इत्यादि ... हर किसी को मैं फरगुदिया शब्द का अर्थ और उस लड़की जिसका नाम फर्गुदिया था उसके बारे में समझाती रही , आज फरगुदिया ग्रुप में करीब 400 महिला सदस्य हैं , ग्रुप के लगभग सभी सदस्य आज फरगुदिया नाम से परिचित हैं, वो कौन थी , उसके साथ क्या हादसा हुआ ... लगभग सभी कुछ |
 दिनांक 27 / 5 / 12 को संजय मिश्रा जी ,सईद अयूब और मैंने मिलकर  ' फर्गुदिया के नाम एक शाम ' का आयोजन किया , कार्यक्रम में सब के साथ मिल –बैठ कर फर्गुदिया के बहाने हम सबने समाज, स्त्री-जीवन और उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार किया | आप सभी के सहयोग से यह संभव होगा ऐसी उम्मीद तो अवश्य थी पर एक संशय भी था कि अपनी व्यस्तताओं से कैसे लोग समय निकाल पाएंगे। मेरा कद और नाम ऐसा तो ऐसा था नहीं कि लोग बस नाम सुनके चले आते। लेकिन वह दो लाइनें जो पढ़ा करती थी कल मेरे लिए भी सही साबित हो गईं की ‘लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया ’|  कार्यक्रम में आए सभी मित्रों , अतिथियों और विद्वतजनों की आभारी हूँ कि सबने अपनी गरिमापूर्ण सहभागिता प्रदान की | आदरणीय नन्द भारद्वाज जी, पुरुषोत्तम अग्रवाल जी और हरीश नवल जी की विशेष आभारी हूँ | आप सब एक संस्था, एक विधा का प्रतिनिधित्व करते हैं | अग्रवाल जी जो देश की दो महान संस्थाओं से जुड़े हैं, बिना किसी औपचारिकता के समय से आए और अंत तक हमारे बीच रहे, प्रसन्नता से अधिक यह गर्व की बात है | और सच कहूँ तो शायद हर जगह वह इतना समय नहीं देते होंगे | आशा करती हूँ कि भविष्य में भी आप तीनों विद्वतजन और सभी सहयोगी मित्र इसी तरह सहयोग करते रहेंगे | कार्यक्रम सफल रहा या नहीं इसका निर्णय आप सभी करेंगे , मुझे तो बस यही लगा कि जैसे कोई कर्ज चुकता किया हो मैंने | एक संतोष का भाव है अब | आप सब के सहयोग से कुछ सार्थक पहल की शुरुआत हो गयी | इसे बनाए रखना आप सब की ज़िम्मेदारी है ।अब मेरी फर्गुदिया का नाम सिर्फ फेसबुक तक ही सीमित नहीं है फेसबुक के बाहर भी सभी की जुबान पर फर्गुदिया का नाम है | " क्यों न पृथ्वी का नाम फर्गुदिया रख दें " लीना जी की कविता की आखिरी पंक्तियों ने तो फर्गुदिया के लिए बहुत बड़ी बात कह दी !!! सच .. मेरा सपना भी यही है पृथ्वी का नाम फर्गुदिया रख दें और आसमान में फर्गुदिया नाम की बहुत सारी चिड़िया उड़े ......वरिष्ठ कवयित्रियों सविता सिंह जी , सुमन केसरी जी , स्नेह सुधा नवल जी के साथ साथ लीना मल्होत्रा राव , अंजू शर्मा , डॉ सोनरूपा विशाल , विपिन चौधरी , रश्मि भारद्वाज , निरुपमा सिंह , स्वाति ठाकुर की आभारी हूँ |स्वयं कवि और समाज सेवी प्रेम भारद्वाज जी ,डॉ गीता सिंह भी कार्यक्रम में मौजूद थे उनका भी हार्दिक आभार | मुकेश मानस जी , भरत तिवारी जी ,वंदना ग्रोवर जी  , पूनम मटिया  ,राघवेन्द्र अवस्थी जी , रविन्द्र के दास जी , स्वतंत्र भारत , सुबोध कुमार जी , रूपा सिंह , स्नेह देसाई , धीरज कुमार , नरेन्द्र कुमार , रोहित कुमार , भास्कर ठाकुर , सुशील , महेश दीक्षित जी , मंजू दीक्षित जी , चंद्रकांता , सखी समूह की सह संचालिका अरुणा सक्सेना जी भी कार्यक्रम में उपस्थित थी , आप सभी का हार्दिक आभार |और आखिर में अपने पति संजय मिश्रा जी को बहुत बहुत धन्यवाद देना चाहूंगी जो सही मायने में इस कार्यक्रम के आयोजक थे |
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    • Nand Bhardwaj आपने सच्‍चे मन से एक संवेदनशील सामाजिक समस्‍या और स्‍त्री-अस्मिता से जुड़े ज्‍वलंत प्रश्‍न को इस कार्यक्रम के माध्‍यम से उठाया है, इसे ओर बेहतर ढंग से आगे ले जाना चाहिये, समान सोच वाले लोगों के बीच इसे और प्रभावशाली तरीके से उठाया जाना चाहिये, तभी हम अपने रचनाकार मानस को कहीं सुकून दे पाएंगे। हमारी शुभकामनाएं सदा आपके साथ हैं।
      Tuesday at 12:26pm ·  ·  11

    • Chandrakanta Ck शोभा दी जिस अग्निलीक की शुरुआत अपने की है उसे जारी रखियेगा प्रश्न किया जाना जरुरी है और जब वह रचनात्मकता के माध्यम से किया जाये तब और भी सुखद.एक और बात की आपकी लेखनी बेहद साहसी है संवेदना में लिपटी अनवरत लिखते रहिये..
      Tuesday at 12:29pm ·  ·  8

    • Shobha Mishra सर , आप जैसे अनुभवी और वरिष्ठजनों के सुझावों का अनुशरण कर हम निश्चित ही इस सामाजिक समस्या को और बेहतर ढंग से सबके सामने लायेंगें , आपका हार्दिक आभार Nand Bhardwajजी !!!
      Tuesday at 12:41pm ·  ·  5

    • Shobha Mishra Chandrakanta मेरी इस पहल में इतने लोगों का साथ जुड़ना एक शुभ संकेत है , रचनात्मकता और दूसरी तरह की गतिविधियों के माध्यम से ये सफ़र अनवरत चलता रहेगा ..:)
      Tuesday at 12:48pm ·  ·  3

    • Aruna Saxena समय पर नहीं पहुँच सकी इसका अफ़सोस रहेगा .....लेकिन जितने पल की साक्षी रही ..लाजवाब पल थे ........बे मिसाल क्षण थे ...
      आयोजन कुशलता पूर्वक संचालित हुआ ........शोभाजी और अयूब जी को हार्दिक बधाई .

      Tuesday at 1:28pm ·  ·  4

    • निरुपमा सिंह साथी हाथ बढ़ाना ...
      Tuesday at 1:37pm ·  ·  4

    • Leena Malhotra shukriya shobha.. ye jeevan kee kavita hai..aapne ek bada kaam kiya hai..
      Tuesday at 1:47pm ·  ·  4

    • Rashmi Bhardwaj शोभा दी , आपके इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाये कम है ... कार्यक्रम से अनारा देवी और मंजु दीक्षित जैसे व्यक्तित्व का सम्मान हो या फरगुदिया की स्मृतियों को यूं सँजोये रखना ... सब कुछ अनुकरणीय है .... इस सुंदर आयोजन के लिए आप ढेरों बधाई की पात्र हैं ... यह रिपोर्ट भी बहुत सुंदर लिखी है आपने एकदम मन से ...
      Tuesday at 1:59pm ·  ·  8

    • Vipin Choudhary aapka karyakram achcha raha shobha jee ham sabko es anuthey kryakram me shamil ho kar achcha laga
      Tuesday at 3:48pm ·  ·  5

    • Sushil Krishnet परिंदों को मंज़िल मिलेगी यकीनन , ये फैले हुये उनके पर बोलते हैं..... आपने जिस सार्थक पहल की शुरुआत की है , वह अपने गंतव्य तक अवश्य पहुंचेगी ....... पहले सफल सोपान की बधाइयाँ और आगे के लिए शुभकामनाएं ........
      Tuesday at 6:39pm ·  ·  4

    • अंजू शर्मा शोभा दी बधाई और शुभकामनायें....इस नयी शुरुआत का सभी ने सवागत किया है.....आपके जज्बे और भावनाओं को सलाम.....
      Yesterday at 2:42am ·  ·  3

    • Poonam Matia शोभा आपने एक सफल प्रयास कर एक चेतना जगाई है .समाज में इसकी आवश्यकता है ........आपको बधाई
      22 hours ago ·  ·  3

    • Shobha Mishra धन्यवाद Aruna जी .. .. आपसे मिलकर बहुत ही ख़ुशी हुई ..:)
      19 hours ago ·  ·  1

    • Shobha Mishra शुक्रियाNirupma दी .. आपने भरपूर साथ दिया मेरा !
      19 hours ago ·  ·  1

    • Shobha Mishra dhanywad Leena ji ..!
      19 hours ago · 

    • निरुपमा सिंह Shobha Mishra बहन भी कभी बहन को शुक्रिया कहती है ?
      19 hours ago ·  ·  1

    • Shobha Mishra shukriya Rashmi .. dher saaraa pyaar ...:)
      19 hours ago · 

    • Shobha Mishra Nirupma Di , Shukriya wapas leti hoon .. aur aapko gale lagaa rahi hoon ..:)
      19 hours ago ·  ·  1

    • Shobha Mishra dhanywad Vipin ..:)
      19 hours ago · 

    • Shobha Mishra Sushil aap jaise mitron ka saath nishchit roop se meri is pahal ko apne gantavya tak pahunchayegi .. dhanywad Sushil !!
      19 hours ago ·  ·  2

    • Shobha Mishra Shukriya अंजू !
      19 hours ago ·  ·  1

    • Shobha Mishra dhanywad Poonam ji !!
      19 hours ago ·  ·  1

    • Suman Keshari Agrawal बहुत अच्छी शुरुआत बहुत अच्छी रिपोर्ट...सचमुच मेरे मन में भी एक चिड़िया उड़ती है फरगुदिया का नाम लेते ही...अनारा देवी और मंजु जी की उपस्थिति बहुत प्रेरणा दायक रही...
      19 hours ago ·  ·  4

    • Shobha Mishra Aapse bahut prerna milti hai Suman Di .. aapki Garimamay upasthiti bahut prernadayak rahi .. Aabhaar Suman Di !!!
      18 hours ago ·  ·  2

    • Sudesh Bhardwaj Karyakram m shameel nahi huaa...............karyakram apne maksad m safal rahaa iski khushi hai.......m bhi hotaa to achchha lagtaa ........mujhe is karyakram m khud ke shameel naa ho paane ki kami hameshaa khalegi.........fargudiya kaa wakt lautegaa jaroor Shobha Mishraji.........jab is rath m itne Maharathi sawaar hon........usko kaun rok saktaa hai......
      13 hours ago ·  ·  2

    • Vandana Grover फर्गुदिया के नाम इस शाम ने इस डर को भी दूर किया है कि समाज निरंतर असंवेदनशील हो रहा है ... यह एक बानगी है सिर्फ ..फर्गुदिया चेतना पर दस्तक देती महसूस हो रही है ... .. ज़रुरत होती है एक पहल की और आपने वो करने का हौसला किया है ...बधाई..Shobha ..
      9 hours ago ·  ·  4

    • Shobha Mishra Dhanywad Sudesh ji !!
      2 hours ago · 

    • Shobha Mishra Vandana ji , aap sabhi ke sahyog se hi Fargudiya ke paksh me awaz uthane ka Hausla mujhme aayaa ... Dhanywad Vandana Ji !!

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