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Thursday, March 09, 2017

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?





"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?"
 इस प्रश्न पर कुछ सम्मानित वरिष्ठ, युवा लेखिकाओं, महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के विचार आज फरगुदिया पर पढ़िए !
आदरणीय  सरला महेश्वरी जी, सुधा दीदी, वंदना शर्मा दीदी, कविता वाचक्नवी दीदी, मीना दीदी, किरन दीदी, विजय पुष्पम दीदी, उषा राय जी ...
प्रिय आभा बोधि जी, नाइस हसन जी, प्रत्यक्षा जी, आराधना सिंह, डॉ विभावरी, चंद्रकांता  सहयोग के लिए आप सभी का बहुत आभार!!


  

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी
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"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न सीधे तौर पर नीति-निर्णायक निकायों में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा हुआ है। इसमें महिलाओं की चिंताजनक स्थिति नीतियों को तय करने में उनकी भागीदारी की अनुपस्थिति का संकेत देती है । यह सत्ता में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा पहलू है ।
अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आंदोलनों का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है।
महिलाओं में राजनीतिक शक्ति न्यस्त हो, यह कोई सिर्फ भारतीय मामला

नहीं है।इसका विरोध करने वाले इसे सवर्णों के द्वारा सब कुछ हथिया लेने की एक साजिश कहते हैं । लेकिन वास्तविकता में यह लंबे काल से दुनिया के जनतांत्रिक प्रशासनिक निकायों की एक साझा चिंता का विषय रहा है।इस पूरे इतिहास से हम सभी परिचित हैं।
हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का प्रश्न अचानक ही नहीं उत्पन्न हुआ है।1974 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार की गयी रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था। और इसमें विशेष तौर पर इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की ख़राब स्थिति के लिये उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी ज़िम्मेदार है और इससे उबरने के लिये विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था कि असमानता के वर्तमान ढ़ाचे को तोड़ने के लिये इस प्रकार का संक्रमणकालीन क़दम लिंग की समानता तथा जनतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवाल की दृष्टि से कोई पश्चगामी क़दम नहीं होगा, बल्कि यह वर्तमान व्यवस्था की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर ढ़ंग से समानता और जनतंत्र के दूरगामी लक्ष्यों की सेवा कर सकेगा।
1974 की स्टेटेस रिपोर्ट, 1988 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की संस्तुतियाँ और फिर 1995 में राष्ट्रीय महिला कन्वेंशन के प्रस्ताव में विधानसभा और संसद में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण की माँग को इसी रूप में देखा जाना चाहिये।
लेकिन चिंता की बात है कि आज तक महिला आरक्षण बिल अधर में लटका हुआ है।कभी ओबीसी के नाम पर तो कभी महिलाओं की योग्यता का सवाल उठाकर, कभी इसे प्रोक्सी पोलिटिक्स, यानी वाइव्ज ब्रिगेड के ख़तरे के रूप में, तो कभी घर-परिवार के टूटने के नाम पर लटकाया जा रहा है।
हमारे पितृसतात्मक समाज में राजनीतिक पार्टियाँ भी पुरुष-प्रधान समाज के स्थापित मूल्यों को प्रतिबिम्बित करती हैं जिसे सामाजिक-आर्थिक ढ़ाचे में बिना कोई ढांचागत परिवर्तन किये बदलना मुश्किल है।
पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6.1 प्रतिशत महिलाएँ हैं। हमारे देश की स्थिति तो हमारे पड़ौसी देशों से भी बदतर है।
इस बात को समझते हुए भी कि सिर्फ आरक्षण ही सारी समस्याओं का हल नहीं है, मैं इस बात को कहना चाहूँगी कि सामान्य तौर पर वंचित और उत्पीड़ित महिला समाज में जितनी भी राजनीतिक जागृति पैदा होगी, उससे पूरे समाज के जनतांत्रिक रूपान्तरण की प्रक्रिया को ही बल मिलेगा।"

--सरला माहेश्वरी
पूर्व सांसद,राज्य सभा
लेखिका, अनुवादक




"​भारत बहुलतावादी देश है। भारतीय समाज बहुरंगी है। यहाँ बहुत तरह की विचारधाराएं हैं , मत वैभिन्य हैं - वामपंथ है, दक्षिण पंथ है, मार्क्सवाद है, समाजवाद है लेकिन एक सत्ता ऐसी है जिसे लेकर बहुत छोटे से तबके को छोड़ कर सब एकजुट हो जाते हैं ! वह है - पितृसत्ता। पुरुष वर्चस्व और सामंती अवधारणा। समाज के हर क्षेत्र में पितृसत्ता की रुग्ण जड़ें इतनी गहरी धंसी हुई हैं कि उसपर कोई नए फूल, कोमल पत्ते अंकुर निकलने की गुंजाइश नहीं रह गई है ! फिर भी उन जड़ों को सींचने में देश का एक बड़ा तबका जुटा है ! ऐसी स्थिति में स्त्रियों की भागीदारी कहाँ तक हो पाएगी।
समाज के किसी भी क्षेत्र में किसी भी तबके की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक व्यवस्था में वह प्रावधान होना चाहिए जो उस तबके को सहभागी बनाने में मदद करे।
हमारे देश में स्त्रियों को लेकर एक दुविधा बनी रहती है कि इनको कितनी आजादी दी जाए, जो पितृसत्ता के खिलाफ न जाती हो। थोड़े बहुत बदलाव को छोड़कर निर्णय लेने का अधिकार आज भी पितृसत्ता के हाथों में महफूज है, जो बड़े करीने से अपना खेल कर रहा है और जिबह होने वाली महिलाएं जान भी नहीं पाती कि उनके पर कतरे जा चुके हैं। जो जान-समझ पाती हैं, उन पर करारा प्रहार होता है। जो असहमति में मुंह खोलती हैं, उन पर चरित्रहीनता का फतवा जारी कर दिया जाता है !
धार्मिक संहिताएं सदियों से स्त्री को नियंत्रण और पाबंदियों में रहने का आदेश देती हैं और आज भी उसी लीक पर देश का नियन्ता वर्ग चल रहा है ।


राजनीति में सहभागिता का पाठ समभाव के बिना पूरा नही हो सकता । हमारे देश में घर से लेकर, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, खेत-खलिहान और दफ्तरों तक में महिलाओं को कमतरी का अहसास कराया जाता है। स्त्रियों की सीमा रेखा आज भी घर परिवार की देहरी बना दी जाती है।
राजनीति में महिलाओं का प्रतिशत कम होना सिर्फ भारत की समस्या नहीं है ! पूरे विश्व में इसे देखा जा रहा है। पिछले दिनों अमेरिका में लेडी क्लिंटन अगर चुनाव जीत जातीं तो अमेरिका की पहली महिला प्रेसिडेंट होने का  इतिहास रचतीं।
राजनीति के लंबे इतिहास में महिला नेत्री उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। इंदिरा गांधी से लेकर सुचेता कृपलानी, भंडारनायक से लेकर मार्गरेट अल्वा तक अधिकांश ने सत्ता में जाकर भी महिलाओं की बेहतरी के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। महिलाओं के हक़ में किसी भी बड़े फैसले को पारित होने में दशकों लग गए। कारण यह भी है कि उनकी आवाज़ सुनी ही नहीं गई, चाहे वह सुभाषिनी अली हों या वृंदा करात। परिवार के तहत आईं नेत्रियों ने सत्ता में ओहदा तो लिया पर पर्याप्त हस्तक्षेप नहीं किया। महिलाएं जब तक वर्ग, जाति और धर्म की फांस से बाहर नहीं निकलती तब तक राजनीति तो क्या घर में भी उनकी सहभागिता सार्थक और सम्मानजनक नही हो सकती है। धर्म का ध्वज वाहक बने रहने से पितृसत्ता ही मजबूत होती है। पितृसत्ता और स्त्री चेतना या स्त्री अस्मिता एक दूसरे के विलोम होते हैं।
पर यह भी बहुत बड़ा सच है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा की मारी महिलाऐं, देश के सामने कोई बड़ा आदर्श प्रस्तुत कर पाने में अक्षम रही हैं। सच तो यह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी शुद्ध रूप से महिला अधिकारों के लिए पूरे देश की महिलाएं कभी एक मंच पर नही आ पाईं । ​​आरक्षण बिल लंबे अरसे से इस या उस कारण से पारित नहीं किया जा रहा है। ​
पर हाँ, ​इरोम शर्मीला का राजनीति में उतरना और ​युवा वर्ग का बेख़ौफ़ होकर अपनी बात कहना हममें एक उम्मीद जगाता है ! वह सुबह कभी तो आएगी ......"

--सुधा अरोड़ा
लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता





"इस मामले में एशियन देशों का हाल काफी बुरा है ! भारत में 'महिलाओं की राजनीति' में भागीदारी का प्रतिशत विश्व में 98 नम्बर पर है ! क्या ये आश्चर्य की बात नही कि युगांडा जैसा देश नम्बर एक पर है ? यह बात अलग है कि इंदिरा,सोनिया, जयललिता मायावती, ममता बनर्जी और महबूबा मुफ्ती आज के दौर की वे महिलाएं थीं या हैं जो अपनी अपनी पार्टी की प्रधान तक बनी ! बहुत सी महिलाएं है ऎसी जो राजनीति में अपनी छाप छोड़ गई पर आधी आबादी की हिसेदारी पर बात की जाए तो लगता है अब समय आ गया है कि जिस तरह से संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों में हमारी हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई उसी प्रकार हरेक दल को अब इस दिशा में विचार करना चाहिए कि देवगौड़ा सरकार द्वारा लाया गया महिला आरक्षण बिल लोक सभा में भी पारित किया जाए ! क्यों कि पुरुषों ने पॉलटिक्स को अपना ऐसा अखाड़ा बना डाला है जहां या तो स्त्रियाँ ऊँचे पदों तक आ नही पातीं या उनके खानदान की स्त्रियों के सिवाय ऊँचे पद पर किसी सामान्य स्त्री को टिकने ही नही दिया जाता अथवा उनके द्वारा 'नियुक्त' स्त्री मात्र स्टार प्रचारक मार्का शोपीस या कठपुतली बना कर रख दी जाती है ! अजब विरासत छाप राजनीति का दौर है यह !


जिस दिन भारतीय समाज की आखिरी स्त्री भी राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व,नितांत अपने दम पर कर पाएगी, उसी दिन इस मसले पर यह देश 98 के दयनीय पायदान से ऊपर कहीं आ पायेगा !
अब हाथ कंगन को आरसी क्या , हमारे उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी का आँकड़ा ही जरा देख लीजिए 17 वीं विधान् सभा की 403 में से 98 सीटें आधी आबादी को दी गई हैं मतलब 25 प्रतिशत से भी कम 😊 और इनमे भी इन दलों का हाल ये है कि अपनी अपनी बहुओं बेटियोंं में कितनी ही सीटें बाँट दी गई ! Bjp ने 370 में से सर्वाधिक 46 सीटें महिलाओं को दीं हैं , तो कॉंग्रेस की 105 सीटों में से मात्र 5 महिलाओं को मिलीं और सपा ने 299 में से सिर्फ 29 महिलाओं को टिकिट दिए हैं और बसपा जिसकी मुखिया एक महिला ही है वहाँ टिकिट बंटवारे में महिलाओं की सबसे बड़ी उपेक्षा की गई यहाँ हाल ये कि 400 सीटों पर सिर्फ 21 महिला प्रत्याशी हैं तो भाई ये तो सच्चाई है इस् सदी में भारतीय राजनैतिक परिपेक्ष्य में महिला हिस्सेदारी का !
इसलिए स्वाभाविक है हमारा ये लगना कि 20 साल की अपनी यात्रा में जो महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से आगे नही जा पाया है उसे अब आगे बढ़ाया जाए क्यों कि अधिकार माँगने से मिल नही रहा है दोस्तों 😊 ये सोच पाना असम्भव न् हो तो कठिनतर अवश्य हो चला है कि कोई स्त्री नितांत अपने दम पर उठे टिके और बढ़ती चले और राष्ट्रीय राजनीति में भी ऊंचाइयों तक पहुँचे , बिना किसी बड़ी आर्थिक बैकग्राउंड के, बड़े घरानों या पारिवारिक पृष्ठभूमि के या अन्य प्रकार की बैसाखियों के और तमाम राजनैतिक दुश्चक्रों,कलंक कथाओं,उठा पटक, बाधाओं को पार करती हुई अपनी सामर्थ्य ,चाह और देश के प्रति अपनी अभिलाषाओं स्वप्नों को साकार कर सके ! क्यों कि राजनीति का सबसे बड़ा उद्देश्य देश समाज की सेवा ही तो है ! पर अफ़सोस प्रायः उनके ये उद्देश्य क्षरित होते हैं प्रधानी से लेकर मंत्री पद तक जाते जाते उनकी ये यात्रा कठपुतली से सत्ता तक की रह जाती हैं और "सत्ता कभी स्त्रीलिंग नहीं होती " 😊 प्रायः स्त्री होने का जरूरी दायित्व कहीं पीछे छूट ही जाता है इसलिए मैं उन महिलाओं के प्रति बेहद आदर सम्मान बल्कि श्रद्धा से भरी हूँ जिन्होंने दूर दराज के उपेक्षित इलाकों , स्त्रियों , दलितों और आदिवासियों के प्रति अपने सेवा संकल्प को किसी राजनैतिक दलदल में न् धंसने दिया , न् झुकने दिया , वे न् कठपुतली बनी और न् अपनी ही महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ीं ! इसके विपरीत उन्हें अपने वे पवित्र ध्येय हमेशा स्मरण रहे जिनके कारण वे इस क्षेत्र में उतरीं थीं !

---वंदना शर्मा
कवयित्री




"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक संरचना पर काफ़ी कुछ निर्भर करती है । मार्था नसबौम जैसा कहती हैं कि-स्त्रियों के राजनीतिक भागीदारी की क्षमता में एक महत्वपूर्ण अवरोध हिंसा का ख़तरा है ।
पित्रसत्तात्मक समाज अनेक तरीक़ों से स्त्रियों को दबाता कुचलता है । घरेलू हिंसा , यौन शोषण , साक्षरता दर का कम होना , इन सब कारणों ने भी स्त्रियों के आर्थिक और राजनीतिक अवसरों पर अपना प्रभाव डाला है ।

स्त्रियों की सामाजिक और राजनीतिक स्तरों में सक्रिय भागीदारी की क्षमताओं को कम किया है ।

स्त्री सशक्तिकरण  के पहल के बावजूद अब भी संसद में स्त्रियों की भागीदारी सिर्फ़ बारह प्रतिशत है । पंचायतों में भी स्त्रियाँ proxy नेता , मुखिया ही हैं । फिर भी नियमों का विसरण और व्यापन ही सामाजिक जड़ता को तोड़ने का काम करेगा । स्त्रियाँ जितनी आत्म निर्भर होंगी , जितना स्वाभिमान और साहस से भरीपूरी होंगी उतना ही सार्वजनिक स्पेस को क्लेम् करेंगी , राजनीतिक और सामाजिक दायरों पर अपना दावा पुख़्ता करेंगी |"

--प्रत्यक्षा सिन्हा
लेखिका 





"शिक्षा ,खेलकूद ,चिकित्सा ,इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी,फ़िल्में ,बैंकिंग ,व्यापार ,अंतरिक्ष , सेना और यहाँ तक की अंडर वर्ल्ड में भी महिलाएं पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं ,यहाँ तक कि युद्ध रिपोर्टिंग जैसे साहस भरे कामो को अंजाम दे रही हैं और अपना आप मनवा रही हैं ।राजनीति जैसे क्षेत्र में उनकी आम दरफ्त कम क्यों है यह एक शोध का विषय हो सकता है ।सफाई कर्मी से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक स्त्री ने पूरी निष्ठा और ज़िम्मेदारी से भागीदारी की है लेकिन फिर भी राजनीति में पूर्ण कालिक सक्रिय महिलाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं । देश की आधी आबादी के सक्षम होने के बावजूद राजनीति में उनकी भागीदारी दाल में नमक के बराबर ही है ।
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी मात्र कागज़ों और बहसों तक सीमित रह जाती है ।महिला आरक्षण विधेयक आज तक लागू नही हो पाया ,नही तो जैसे अन्य क्षेत्रों में स्त्रियां अपनी सक्षम भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं वैसे ही राजनीति में भी कर पातीं।यदि कोई सीट महिला के लिए आरक्षित नही घोषित की गयी हो तो सामान्य सीट अमूमन किसी पुरुष उम्मीदवार को ही दी जाती है ।गांव पंचायत जैसे छोटे चुनावों में भी यदि महिला सीट है तो प्रधान महिला भी जनरल मीटिंग्स में नही जाती है या नही जाने दिया जाता है ।उसका पति ही या ससुर ही प्रधान कहा जाता है ।जबकि महिला प्रधान जहाँ कहीं थोडा दबंग होती हैं उस क्षेत्र का विकास अनुपात में कहीं

अधिक हुआ होता है ।
हकीकत यही है कि आधी आबादी अभी तक अपनी मूलभूत आवश्यकताएं ही नही पूरी कर पा रही है तो पूर्णकालिक राजनीति कैसे कर पायेगी ! ये अलग बात है कि इंदिरा गांधी जैसी महिला देश की प्रधानमंत्री रही लेकिन उसके पीछे उनकी सलाहियत कम और नेहरू परिवार से होने का आभामण्डल अधिक प्रभावी था ।ऐसे ही नज़्म हेपतुल्ला ,तारकेश्वरी सिन्हा ,मोहसिना किदवई ,या शीला दीक्षित भी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से आगे आ पायीं ।अन्य महिलाएं जो किसी प्रदेश में मंत्री या मुख्यमंत्री या किसी अच्छे पोर्टफोलियो में रहीं ,उनके पीछे भी परिवार या किसी न किसी समर्थ व्यक्तित्व का हाथ रहा ।

हालाँकि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर अच्छी खासी तादाद महिला प्रतिनिधिओ की है फिर भी ज़िम्मेदार पदों पर कुछ ही महिलाएं हैं ।साथ ही राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न होने में ,इस क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण भी है ।यदि कोई दबंग लड़की या महिला यहाँ आना भी चाहती है तो परिवार वाले असुरक्षा और पीठ पीछे होती आलोचना और भद्दी बातों को देखते हुए जाने की अनुमति नही देते ।यदि विरोध करके किसी तरह आ भी जाये तो राजनीति के खुर्राट भेड़िये साबुत निगल लेने को तैयार बैठे मिलते हैं ।स्त्रियोचित संकोच ,आर्थिक पराधीनता ,चुनाव में होने वाले अंधाधुंध खर्चे भी यहाँ आने से पहले बार -बार सोचने को विवश करते हैं ।
समय की मांग यही है कि अधिकाधिक महिलाएं राजनीति में आएं और महिला विषयक कानूनों को पारित करने में अपना योगदान दें ,तभी आधी आबादी का दर्द कुछ कम होगा ।"

विजय पुष्पम्
सी 35 ,एच .ए.एल.टाउनशिप
फैज़ाबाद रोड 226016
(09415516679)




ऐसी मुश्किल में लगन और अलख की काम आएगा
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"प्रकृति प्रदत संरचना को विस्तार देने वाली स्त्री को ही पीछे ढकेलने की राजनीति दुखद है। सोचनीय और निंदनीय यह भी है कि संसार कितनी तेज गति से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस संसार में, इस समाज में स्त्री अभी भी पुरूष के साथ या बराबरी की जगह पाने के लिए भागती हुई , खीसटती हुई तड़प रही है। तरस रही है। इस तरह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण “बंदिश” हैं। बंदिशों की साजिशें हैं। पित्रसत्ततात्मक समाज महिलाओं को अपनी मिल्कियत समझता आया है। और लाख हजार कोशिशों के बावजूद वह महिला को अपनी जरुरत की सामग्री समझता रहेगा। अफसोस की उसमें भी साथ देंगी रहेगी औंरतें!

पुरुष ने ऐसा जाल बुना, जहाँ औरत ही औरत का विरोध करने के षड्यंत्र में भागीदारी लेती रहेगी। समाज के बुरी नजरों की दुहाई देते हुए, उसे डरा –धमका कर पीछे ढकेलता रहेगा समाज। इसे समझने के लिए कहीं दूरी जाने और सोचने की जरुरत नहीं। अपने घर-परिवार, अड़ोस-पड़ोस से वाकिफ होना ही काफी है। जिस समाज में बेटियों को देर रात बाहर रहने के अंजाम से डराया जाता है, उस समाज में राजीनीति में भागीदारी बहुत दूर की कौड़ी है । और तो और पिता, भाई, पति अक्सर उन महिलाओं को लांक्षित करते पाए जाते हैं, जिन महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से समाज में अपनी जगह बनाई हों। तो कुल मिला कर स्त्री कुछ करे तो लांक्षन,और न करे तो कुढ़ मगज।

स्त्री को हमेशा मर्यादा की दुहाई देकर बरगलाया गया। ताकि समय बीतता रहे और दुनिया से अंजान स्त्री चूल्हें-चौके तक समीति रह, पुरूष की सेवा में तल्लीन रहे। पुरुष, दरअसल स्त्री प्रतिद्वंदी से भय खा कर ऐसा करता है। उसे इस बात को इतना घोट कर पिला दिया जाता है कि वह यदि स्त्री से हार गया तो वह पुरूष कैसा ? मर्दानगी की दुहाई में पुरूष जितना आगे बढ़ने और बढ़ाने की कोशिश में मन नहीं लगाता, उतना वह फेल ने हो, या प्रतिद्वंदी स्त्री से पीछे न रह जाए..इस बात को ज्यादा तवज्जो देता है? ऐसे समीकरण वाले समाज में स्त्री को मर्यादा की दहाई देना पुरुष के लिए सबसे सरल रास्ता है। और मर्यादा के नाम पर बौराई स्त्री –एक अच्छी बेटी, एक अच्छी बहन, एक अच्छी पत्नी और अंत में एक अच्छी माँ बन कर अपने जीवन की संपूर्णता पर इतरा उठती है। वह स्त्री एक वास्विक संपूर्णता का अनुभव करती है। इसमें भी कोई दो राय नहीं। अपने जीवन और अपने कर्तव्य से फारीग ।

यानि की वस्तु(स्त्री) को तंत्र के संचालन योग्य कैसे समझा जा सकता है! यह पुरूष प्रधान समाज, अपनी षड्यंत्री तरकीबों को तब तक अमल में लाता रहेगा, जब तक स्वय स्त्रियाँ जागेंगी नहीं! मान मरजाद को धता बता कर, खुद के लिए बेकल हो कर घर से बाहर भागेंगी नहीं। भागने का अर्थ स्पष्ट करना जरुरी नहीं। वह सवाल में निहित व संकलित है खुद। ऐसी स्थिति में स्त्री के लगन और अलख ही काम आएँगे...."

--आभा बोधिसत्व
9820198233
apnaaghar@gmail.com

  




"आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है, इसका क्या कारण है ? ये सोचने का विषय है | आज देश में चारों ओर विकास  की बयार बह रही है | विकास  की इस बहती बयार ने भी महिलाओं को विशेष प्रभावित नहीं किया है | आज भी  आधी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी मूलभूत सुविधाओं से दूर है | आवश्यकता है उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की, उनके लिए स्वस्थ माहौल मुहैया करवाने की ताकि वे  घरों से बाहर निकल कर समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें| पर दुर्भाग्य इस बात का है कि इसके लिए जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहें हैं | घर हो या बाहर, दफ्तर हो या राजनीतिक क्षेत्र हर स्थान पर उनका शोषण होता है और वह अपनी बात खुल कर किसी से कह नहीं पातीं |  उनके लिए हमारे पितृ सत्तात्मक समाज ने अनेकों लक्ष्मण रेखाएँ खींच रखी हैं, ढ़ेरों बंदिशे और बाधाएं खड़ी कर रखी हैं ताकि वो उन्हीं में उलझी रहें और उनके बाहरी क्षेत्र में दखल ना दे सकें जिससे पुरुषों का वर्चस्व बना रहे, और अगर कोई महिला इन तमाम बंदिशों और दायरों को पार कर बाहर निकल अपना आस्तित्व साबित करने का प्रयास करती भी है तो हमारे पुरुष वर्चास्व समाज में उन्हें  चरित्रहीन साबित करने की होड़ लग जाती है, ताकि उन लांछनों से

शर्मशार होकर वे  अपने बढ़ते हुए कदम वापस खींच लें | हालाकि कई महिलाओं ने पुरुषों द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा को पार कर समाज में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई है पर इनकी गिनती बहुत कम है |  आज भी देश में महिलाओं के लिए समुचित शिक्षा व्यवस्था नहीं है | महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी है फिर भी वह पुरुषों की साक्षरता दर से कम है |
भारतीय परिवारों की तरह भारतीय राजनीति में भी पुरुषों का दबदबा रहा है और वही राज करते आये हैं बावजूद इसके इंदिरा गाँधी ने पन्द्रह वर्षों तक प्रधानमंत्री के पद पर आसीन रहीं |
आज जरूरत है देश की आधी आबादी को मुख्य धारा से जोड़ने की | जरूरत है उनके प्रति अपना नजरिया बदलने की | अगर इन्हें अवसर मिले तो वह बहुत कुछ कर सकती हैं | महिलाएं एक समय  में एक से अधिक विषयों पर सोच सकती हैं, एक साथ एक से अधिक कार्य कर सकती हैं जब कि पुरुष एक समय  में एक ही कार्य करता है वो भी तब, जब उसकी पत्नी उसको उसके कार्य क्षेत्र के लिए पूरी तरह तैयार कर के भेजती है |
कुल मिला कर महिलाओं के साथ बहुत भेदभाव किया जाता है | उसकी स्थिति में आज भी कोई बहुत विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है । हर स्थान पर पुरुषों का दबदबा है घर, दफ्तर हो या राजीनीति ! कहीं भी महिलाओं के लिए स्थितियां सामान्य नहीं हैं ।
 महिला आरक्षण बिल के अनुसार संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था है परन्तु वास्तविकता इससे अलग है ।
और अंत में राजनितिक पार्टियाँ महिलाओं को एक बड़ा वोटबैंक तो मानती हैं पर प्रत्याशी के रूप में उन्हें टिकट देने से हिचकिचाती हैं । यही सब कारण हैं कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है ।"

--मीना पाठक





"प्रथम तो राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है, और मध्ययुगीन परम्परा से सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यद्यपि 20 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह बढ़नी प्रारम्भ हुई किन्तु वह केवल कला और सौन्दर्य के क्षेत्र में, या स्पष्ट कह लें तो फिल्मों में और तत्पश्चात् सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अर्थात् नर्सिंग एवम् अध्यापन में।
दूसरा कारण यह कि राजनीति मुख्यतः अनीति की शरणस्थली रहती आई है, जहाँ अपराध और कपट को या तो संरक्षण और प्रश्रय मिलता आया है अथवा उस से संघर्ष और जय-पराजय। स्त्रियों की प्रकृति से यह सार्वजनिक समेकित द्वन्द्व मेल नहीं खाता।


तीसरे, समाज में कार्यों का विभाजन इस प्रकार का रहता आया है कि स्त्री परिवार और गृहस्थी की धुरी होती है, वह परिवार और सन्तान से सम्बन्धित दायित्वों से इतना अवकाश और छूट नहीं पाती कि वह निरपेक्ष भाव से ऐसे किसी अवसर /अध्यवसाय को समय दे सके।
चौथा, कई अर्थों में यह 'महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं' भी माना/कहा जा सकता है। जिन परिवारों की पद-प्रतिष्ठा और सुरक्षाकवच-सा स्त्रियों को मिला उन परिवारों की स्त्रियाँ मुख्यतः राजनीति में आईं भी।

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में स्त्री का स्थान बनाना भी स्वयम् में चुनौती है। तभी तो संसद में आरक्षण का प्रस्ताव तक पुरुष वर्चस्ववादी दलों ने लाने नहीं दिया। राजनीति में अपराधीकरण कम हो तो धीरे-धीरे यह अनुपात बढ़ेगा, या स्त्रियाँ अपराध की अभ्यस्त हो जाएँ तब भी बढ़ेगा। स्त्री-वर्चस्व बढ़ने ओर्र राजनीति के मानवीय पक्ष की अपेक्षा तब की जा सकेगी।"

- कविता वाचक्नवी

लेखिका  





"मेरे ख़याल से सामान्यतः हमारा समाज स्त्रियों में राजनीतिक समझदारी के विकास के अवसर ही उपलब्ध नहीं होने देता. इसके बावजूद यदि किसी महिला का रुझान सक्रिय राजनीति में हो गया तो घोषित रूप से अतिरिक्त समय और श्रम की माँग करने वाले इस क्षेत्र में आने पर महिला के समाज द्वारा उसके लिए निर्धारित भूमिकाओं से समझौता एक अनिवार्य शर्त बन कर उभरता है, लिहाज़ा महिलाओं के राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होने की

राह पुरुषों की तुलना में आसान नहीं रह जाती.

कह सकते हैं कि महिला के राजनीति में सक्रिय होने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति के साथ-साथ धारा के विपरीत चल पाने का जज़्बा बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसके अभाव में अपनी सामाजिक, जैविक और पारंपरिक भूमिकाओं से बंधी महिलायें सामान्यतः इस क्षेत्र को प्रोफेशन के तौर पर नहीं अपना पातीं! एक ऐसे समाज में जहाँ टीचर, नर्स, डॉक्टर जैसे चंद प्रोफेशंस को महिलाओं के लिए मुफ़ीद माना जाता हो अगर कोई महिला राजनीति को अपना कार्यक्षेत्र बना भी ले तो ज़्यादातर मामलों में समाज उसे आत्मनिर्भर तरीके से काम कर पाने की सलाहियत नहीं दे पाता. देश की ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षित सीटों पर निर्वाचित महिलाओं की जिम्मेदारियां और काम-काज का निर्वहन उस महिला के पिता, पति, भाई या बेटे द्वारा किया जाना बहुत आम है. इन हालात के बावजूद आज हमारे देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में कार्यरत जुझारू महिला नेताओं का होना इस बात का संकेत है कि यदि अवसर मिलें तो महिलायें बेहतर राजनीतिज्ञ साबित हो सकती हैं. महिलाओं की शख्सियत में इस आत्मविश्वास के विकास में निःसंदेह उनकी उच्च शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की अहम भूमिका है. "

--डॉ विभावरी




"मुख्यधारा कि तरह राजनीति में भी महिलाओं कि उपस्थिति मिसिंग है .पॉलिसी मेकिंग और डिसीजन मेकिंग राजनीति के दो प्रमुख बिंदु हैं लेकिन महिलाओं का सामाजिकरण या वैचारिक कंडिशनिंग इस तरह से होने ही नहीं दी जाती वे राजनीति में भागीदारी का सोचें.राजनीति में स्वप्रेरित महिलायें कम हैं जहाँ हैं वहां भी या तो परिवारवाद का प्रभाव है या उन पर राजनीतिक उम्मीदवारी थोप दी गयी है. यह एक बड़ा कारण है कि स्थानीय निकायों में एक तिहाई आरक्षण के बावजूद महिलाओं कि राजनितिक उपस्थिति प्रभावी नहीं हो पायी है.

यह बात किसी से छिपी नहीं है की महिलाओं में नेतृत्व के गुण कूट कूट कर भरे हैं फिर भी उस नेतृत्व का दायरा उसकी होममेकर की भूमिका तक सीमित कर दिया जाता है.बाकी राजनीति का अपराधीकरण जैसे जुमले केवल महिलाओं को डराने के लिए हैं . जब महिलायें एक अपराधी समाज का सामना कर सकती हैं तो राजनीति का क्यूँ नहीं ?
जागरूक महिलायें खुद को राजनितिक भागीदारी के लिए तैयार करें तो कोई ठोस परिवर्तन हो .और उनकी यह भागीदारी निश्चित ही विकृत हो चुकी वर्तमान राजनीति से इतर एक स्वस्थ राजनितिक परिवेश का निर्माण करेगी."

--चंद्रकांता
लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता




"हमारे घरों में लड़कियों को सहेली के घर जाने तक के लिए झूठ बोलना पड़ता है,फोन पर बात करने,घर पर आने-जाने के हर पल का हिसाब देना होता है।  खुल के बोली गई बातों पर घर के ही तिलमिलाए लोगों के फ्रस्ट्रेशन से जूझना होता है।  हमारी शक्तियां हमारी संवेदनशीलता की वज़ह से इन छोटी-छोटी व्यर्थ की लड़ाइयों में इतनी ख़र्च हो जाती है कि हमारी उड़ानों की ऊँचाई,उनकी परिधि नि:संदेह घटती जाती है।लंबी,ऊँची

उड़ान भरने की हमारी महत्वकांक्षा को हमारे चरित्र से यूं गूँथ दिया जाता है कि अपनी महत्वकांक्षाओं को हम ख़ुद किसी संगीन गुनाह की तरह देखने लगते हैं। राजनीति ही क्यूं खेती,सेना,ड्राइवरी,व्यापार बहुत सी जगहों पर आधी आबादी आधी तो दूर एक चौथाई उपस्थिति भी दर्ज़ नहीं कर पाती।  
सुषमा स्वराज,मायावती,स्मृति इरानी जैसी और कुछ महिलाओं को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो बाकी महिलाएं चाहे वह गाँव की प्रधान हों,विधायक,सांसद हों उनके सरपरस्त उनके पति या परिवार का कोई सदस्य होता है और राजनीति में होकर भी उनका कोई निर्णय नहीं होता। उनका राजनीतिक अस्तित्व केवल नाम का होकर रह जाता है।"

--आराधना सिंह
कवयित्री 





"हमें राजनीति में वैसे ही उतरना चाहिए जैसे इरोम शर्मिला उतरी हैं। सोलह वर्षो तक अनशन पर बैठी रही इरोम ने जब राजनीति में उतरने का फैसला लिया तब उनके परिवार के सदस्य भी इस निर्णय से खुश नहीं हुए। देवी की छवि में रुढ़ होती जा रही लौह महिला का सामान्य जन में घुल-मिल कर काम करने के प्रति मणिपुर की जनता का एक हिस्सा सहज नहीं हो पा रहा था। जब लौह महिला के राजनीति में आने आने का स्वागत और विरोध हो रहा है तो हम तो सामान्य स्त्रियाँ हैं। हमारी राजनीति की राह और कठिन होगी। लोकतंत्र के इस सबसे बड़े उत्सव में क्या हम निर्णय को प्रभावित कर सकने की भूमिका में हैं? उम्मीदवार के रूप टिकट देना तो दूर की बात है, चुनावी घोषणा पत्रों में स्त्रियों को आकर्षित करने वाली घोषणाएँ गायब रहती हैं।


पिछले चुनावों में एक महिला उम्मीदवार (अपनी समझ से योग्य उम्मीदवार) के पक्ष में घर-घर वोट माँगने के दौरान आमतौर पर यह बात सुनने को मिली-‘‘ये (पति) जहाँ कहते हैं, हम वहीं वोट दे देते हैं।’’स्त्रियों में राजीतिक चेतना का अभाव दिखाई दे रहा है। राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है। यह एक मुख्य वजह है कि हम समाज में निर्णायक भूमिका में नहीं उतर पा रही हैं। बहन जी’ हों या ‘दीदी’ ये भी जब सत्ता में आती हैं तो हमें भूल जाती हैं क्योंकि आधी आबादी ‘चुनाव जिताऊ फैक्टर’ नहीं है। जनसत्ता समाचार पत्र की 6 मार्च की रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर में दो चरणों में होने वाले चुनावों में कुल दस महिला उम्मीदवार हैं। उत्तर प्रदेश में 344, पंजाब में 81, उत्तराखंड में 56, और गोवा में 18 महिलाएँ मैदान में हैं। इसमें भी कई महिला उम्मीदवार ऐसी भी हैं, जैसे मड़ियाहूँ सीट से माफिया डान मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मैदान में हैं। उस पर भाई लोगों की टिप्पणी है-‘‘सब जानत हैं कि भइया जी लड़ रहे हैं। भाभी का नामे भर है।’’ पंचायत चुनावों में स्थिति बेहतर है। वहाँ महिलाएँ विजयी होकर बहुत काम कर रही हैं। भले एक नया शब्द ‘प्रधान-पति’ भी चलन में आया हो। राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए। महिलाओं को अपने विरुद्ध हो रही राजनीति को समझना होगा, जिसकी शुरुआत परिवार से होती है और जो राष्ट्रीय स्तर तक पसरी है।


...किरण सिंह

लेखिका
3/226, विश्वास खण्ड, गोमती नगर

फोनः 09415800397





"भारत में महिला राष्ट्रपति प्रधान मंत्री यहाँ तक कि राजनीतिक दल की अध्यक्ष बनती है लेकिन यह परेशान करने वाली बात है कि राजनीति में महिलाओं की कुल भागीदारी महज़ 10.86 प्रतिशत ही क्यों है ? पंद्रहवीं लोक सभा इसलिये महत्व रखती है कि इसमें महिलाओं का प्रतिशत पहली लोकसभा से लेकर चौदहवीं लोक सभा तक सबसे ज्यादा है । एक अनुमान

के मुताबिक यदि महिला आरक्षण बिल पास हो जाता तो 543 सदस्यों वाली लोक सभा में महिला सांसदों की संख्या 61से बढ़कर 181के करीब हो जाती । मेरा मानना है कि न सिर्फ़ भारत में बल्कि वैश्विक पटल पर भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है ।आजादी के बाद हमने कई समस्याओं पर मिशन की तरह काम किया और लक्ष्य को प्राप्त किया ।अत : हमें इस दिशा में भी सोचना और काम करना चहिये ।"

---उषा राय
लेखिका




" सियासत में औरतों की मौजूदगी कम होना काबिले फ़िक्र है। 2014 में हम 188 मुल्कों मे 117 वां नंबर रखते थे पर 1 फरवरी 2016 तक के आंकलन के हिसाब से अब 191 देशों में हमारा नंबर 144 वां हो गया है।

हिंदुस्तानी समाज में औरतों की कोई आज़ाद आवाज़ अभी भी नहीँ बन पाई है। राजनीति में महिलाओं का आना किसी निश्चित प्रक्रिया के तहत नहीँ हो पा रहा है । कुछ नेताओं की पत्नियाँ बेटियाँ मजबूरी में आ गई कुछ को किसी नेता की मौत के बाद जगह मिली। कुछ गलैमर के कारण आई।
कुल मिलाकर वंशवाद और वोट पॉलिटिक्स को ही बढ़ावा मिला है। उनका हिस्सा लोकसभा और राज्य सभा में सुनिशचित होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा समाज को अधिक मानवीय और बराबरी पर आधारित होने के लिए निहायत ज़रूरी है।"




 ------नाइस हसन
लेखिका, महिला अधिकार कार्यकर्ता






प्रस्तुति: किरन सिंह
            शोभा मिश्रा







Tuesday, February 24, 2015

जो स्त्रियां सच लिखती हैं, उन पर लांछन लगते ही हैं!- रमणिका गुप्ता


बात-चीत 20.11.2014


१. कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती. दुनिया भर के जनतांत्रिक आंदोलनों का अंतिम आदर्श भी यही अभिव्यक्ति की बराबरी रहा है.हिंदी जगत में स्त्रियों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की प्रचुरता और विपुलता के मद्देनज़र क्या आपको लगता है कि आज एक स्त्री के लिए अभिव्यक्ति के समान अवसर हैं और वह निर्द्वंद हो कर मनचाहा रच और अभिव्यक्त कर पा रही है?

२. साहित्य को स्त्री,दलित,पिछड़ा जैसे खांचों में रख कर पढना और समझना मुझे उन्हें मुख्यधारा से परे धकेलने का एक षड्यंत्र ज्यादा लगता है. मगर, कुछ लोग अनुभवों और यथार्थ की प्रमाणिकता की दृष्टि से वर्गीकरण और रेखांकन को युक्तिसंगत भी ठहराते हैं. आप अपने लेखन पर चस्पां 'स्त्री लेखन' के लेबल से कितनी सहज या असहज महसूस करती हैं?

३.आधुनिक स्त्री रचनाधर्मिता में जाहिर तौर पर 'कॉमन थ्रेड' पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और प्रतिरोध है. हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर पितृसत्ता की जकड़न, उसकी प्रविधियों और उसके पाखंडों का उद्घाटन और उदभेदन बहुत कुशलता से किया है. यहाँ तक की स्त्री यौन शुचिता की खोखली अवधारणाओं की भी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं.मगर, कुटिल पितृसत्ता जिस प्रकार आज भी राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींच रही है, उससे हिंदी जगत की लेखिकाएं आँखें फेरे क्यों दिखाई देती हैं?

४.व्यापक स्त्री हित से जुड़े राजनीति और अर्थनीति के ज्वलंत प्रश्न, जैसे विधायिका में महिला आरक्षण, मंत्रिमंडलों, नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व, इत्यादि महिलाओं के रचनात्मक सरोकारों में अपेक्षित स्थान क्यों हासिल नहीं कर पाते हैं?

५. 'मातृत्व' एक ऐसा गुण है, जो स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है. सो, स्वाभाविक रूप से दुनिया भर के स्त्री-साहित्य में इसे 'सेलिब्रेट' किया जाता रहा है. मगर कुछ पश्चिमी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) ने यह महसूस किया है कि मातृत्व के प्रति भावुक सम्मोहन को बढ़ावा देना   किसी स्तर पर मर्दवादी राजनीति का एक आयाम भी हो सकता है. आप इस निष्कर्ष से कितनी सहमत हैं?

६.समाज में स्त्रियों के संगठित दमन चक्र के कमजोर पड़ने और स्त्री स्वातंत्र्य की सशक्त छवियों के समानांतर इर्ष्या और कुंठा की लहरें भी दिखाई पड़ रही हैं. इस का नतीजा है कि यौन हमलों और हिंसा की बाढ़ सी आ गई है और कार्य स्थलों पर और अन्यत्र स्त्री-पुरुष रिश्ते असहज होते चले जा रहे  हैं..समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिंतित करती है?

७.आज पारंपरिक साहित्य की तुलना में सोशल मीडिया  का स्त्री-लेखन ज्यादा चर्चाएँ बटोर रहा है. सोशल मीडिया की अराजकता, उसका औसतपन, उसकी क्षणभंगुरता और उसके आभासी चरित्र की आलोचनाएँ और आक्षेप  अपनी जगह हैं, मगर अब उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. साहित्य में सोशल मीडिया के विवादास्पद हस्तक्षेप को गंभीर लेखन और साहित्य में कहाँ देखती हैं आप?

८.साहित्य के बारे में शुरू से एक मासूमियत भरी स्थापना रही है कि स्तरीय साहित्य अपने बूते जिंदा रहता है. मगर हकीकत यह है कि आज जो रचना साहित्यिक परिचर्चा, गोष्ठी, जलसा, विमोचन, समीक्षा, पुरस्कार के जुगाड़ तंत्र में अपनी जगह नहीं बना पाती, पाठक उस तक पहुँच भी नहीं पाता, चाहे वह जितनी भी उच्च कोटि की हो. एक स्त्री के नजरिये से साहित्य की यह धक्कम-पेल आपको हताशाजनक लगती है या चुनौतीपूर्ण?



९. एक सवाल जो मुझे हमेशा परेशान करता है कि आखिर हिंदी के स्त्री लेखन से 'हास्य' और 'विनोद' लगभग निष्कासित क्यों है? कटाक्ष और व्यंग अगर है तो उसकी प्रकृति हास्य-मूलक नहीं है. ऐसा क्यों?


१०.अपनी आगामी लेखकीय योजनाओं के बारे में बताएं.





1-
उत्तर:



मैं तो ये मानती हूँ कि अभिव्यक्ति की ताकत ने ही जानवर से मनुष्य को मनुष्य बनाया ! अगर उसमें अभिव्यक्ति की ताकत नहीं होती तो वह जानवर की तरह ही रहता! आज भी हमारे देश में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो जानवर की तरह ही रहने को अभिशप्त हैं। ऐसी स्थिति में समाज ने उन्हें रख छोड़ा है या रहने पर मजबूर कर दिया है कि वे जो बोल कर अपनी पीड़ा भी बता नहीं पाते । जहां तक स्त्रियों का सवाल है, कुछ टेक्नॉलॉजी की बढ़त, कुछ मानवता के मुद्दों पर ज्यादा जोर देने, कुछ विश्व की स्थिति या फिर विश्व भर में लोकतान्त्रिक संस्थाओं के आ जाने के कारण, स्त्रियों की अभिव्यक्ति के अवसर बढ़ने की मुहिम चली है। पर यह दृष्टिकोण बदलने के लिए प्रयाप्त नहीं है । यह कितनी कामयाब हुई है, इसके तोलने या विवेचन की दरकार है ! अलग-अलग देशों से अलग-अलग स्थितियां हो सकती हैं। भारत के सन्दर्भ में मध्यमवर्गीय समाज व दलित समाज की स्त्रियां भी अब बोलने लगी हैं। शिक्षा के चलते वे लिखने भी लगी हैं !
अभिव्यक्ति को दो तरह से बांटना होगा! एक तो है बोलना और दूसरा है लिखना ! लिखने वाली स्त्रियों का प्रतिशत बहुत कम है, फलतः उनकी अभिव्यक्ति की ताकत भी उस अनुपात में बहुत कम है। ऐसे भी हर वह औरत, जो लिखती-पढ़ती है जरुरी नहीं कि वह लिखती ही हो। हर पुरुष भी जो पढ़ा-लिखा है, जरुरी नहीं कि लिखना जाने या लेखक हो। जैसे लेखकों की संख्या कम है, उसी तरह लेखिकाओं की संख्या भी कम है! उसके दो कारण हैं - एक तो स्त्रियों में अशिक्षा, दूसरा राजनीती और तीसरा समाज की वर्जनाएं व प्रतिबंन्ध। हमारे संविधान को अभी समाज ने स्वीकार नहीं किया है! उसने स्त्री को पुरुष के बराबर नहीं माना है, भले संविधान में बराबरी का प्रावधान दर्ज है । और फिर जो स्त्रियां लिख भी रही हैं, उन पर लांछन लगते हैं ! मैत्रोयी पुष्पा पर लांछन लगा दिया गया! उनके लिए ‘छिनाल’ शब्द का इस्तेमाल किया गया ! स्त्री जब आत्मकथा लिखती है, तो सच लिखती है ! जब कोई स्त्री कई पुरुषों के बिस्तर में आने की बात लिखती है, तो उसमें पुरुष भी तो शामिल होता है ना ? फिर केवल स्त्री को ही छिनाल क्यों कहा जाता है ? ऐसे भी सच बोलने वाली स्त्री को लोग पसंद नहीं करते फिर हिंदी में तो आत्मकथाएं लिखने की परम्परा ही नहीं रही । यह तो माहात्मा गांधी ने सत्य से हमारा साक्षात्कार कराया । अभी दलितों और स्त्रियों ने आत्मकथाएं लिखनी शुरू की हैं! पहले अगर किसी ने लिखा भी तो उसमें अपने ऐश्वर्य, सामर्थ्य, वर्चस्व का ही चित्राण किया। ऐसी रचना आत्मकथा नहीं होती । आत्मकथा सच्चे मायने में वही होती है, जिसमें आपकी पीड़ा के साथ-साथ,आपने जो भोगा है, आपका जो शोषण हुआ, उसे सच्चाई से चित्रित किया जाय! जिसमें आपकी कमजोरियां भी दर्ज हों और संघर्ष भी, जैसे महात्मा गांधी ने किया । इसलिए जो स्त्रियां सच लिखती हैं, उन पर लांछन लगते ही हैं! जब तक वे पति के आने का इंतज़ार करती स्त्रियों की ऐसी ही कहानियाँ लिखती रहीं, गृहिणी होने के नाते अपने फर्जों को गिनाती या दर्शाती रहीं अथवा माँ के नाते ममता का ढिंढोरा पीटती रहीं .. किसी ने आपत्ति नहीं की । लेकिन जैसे ही वे सच लिखने लगी, आपत्ति होने लगी ! उन पर अघोषित प्रतिबन्ध लगने लगे! संविधान में प्रतिबंध नहीं है लेकिन समाज ने तो लगा रखा है प्रतिबन्ध। स्त्रियां भी स्त्रियों को क्रिटीसाइज करने लगती हैं क्योकि वे स्वयं भी पुरूष अनुकूलित ही नहीं पुरुष वर्चस्व से आतंकित भी हैं । इसलिए मेरी राय में अभिव्यक्ति के समान अवसर होने के बावजूद अभी भी औरत निर्द्वन्द होकर, मनचाहा रच या लिख नहीं पा रही । विरले ही कुछ लेखिकाएं लिख रही हैं और झेल रही हैं चुनौतियां ।








2-

उत्तर:
इसमें मैं कुछ डिफर करती हूँ । ऐसे मैं केवल स्त्री पर ही नहीं विभिन्न विषयों और मुद्दों   पर लिखती हूं । फिर भी स्त्रीवादी कहलाने में मुझे कोई दिक्कत नहीं । मुझे अपने स्त्री होने पर गर्व है, इसलिए मेरे लेखन पर स्त्री का लेबल लगने पर शर्मिंदा होने का सवाल ही नहीं उठता । स्त्री होने के कारण स्त्री –व्यथा और स्त्री -समस्या का विशेष जानकार होना अच्छी बात है वह उपलब्धि है मेरी । ऐसे इसका एक और पहलू भी है । पुरूष लेखकों को यह भ्रम आज तक है कि कोई स्त्री उनके समकक्ष लिख ही नहीं सकती,जैसे कि लेखन केवल उन्हीं का अधिकार है। उन्हें हमारे लेखन पर स्त्री लेखन का लेबुल लगा कर संतोष मिलता है कि स्त्रियां उनकी टक्कर में नहीं हैं । यह कि उनका लेखन अलग कैटेगरी का है । इस भ्रम को तोड़ना जरूरी है । यदि साहित्य मानवता का दर्पण है और मानवता ही दलित, अदलित आदिवासी,स्त्री -पुरूष, काला-गोरा ऊंचा-नीचा में बंटी है, तो साहित्य एक जैसा कैसे होगा ? उनकी समस्यायें तो तथाकथित मुख्यधारा, जिसमें केवल उच्च जाति, वर्ण या वर्ग के लोग ही हैं से भिन्न ही होगीं । उनकी दृष्टि भी अलग होगी । इस तथाकथित मुख्यधारा के लोग जो 10 प्रतिशत हैं, पढ़ते-लिखते आए हैं सदियों से और 90 प्रतिशत जो अवर्ण हैं, उन्हें इन 10 प्रतिशत सवर्णों ने तो पढ़ने ही नहीं दिया। आबादी में आधी आबादी की भी शामिल है। फिर 10 प्रतिशत मुख्यधारा कैसे हुई? वह तो अल्पधारा हैं! मुख्यधारा तो 90 प्रतिशत वे लोग हैं, जिन्हें अनपढ़ रखा गया इस देश में । अब वे लिखने लगे हैं! फिर उनकी पहचान तो अलग होगी ही न । एक बात और कहना चाहूंगी, "समुद्र बहुत बड़ा होता है, जो नदियों से मिलने से बनता है! नदी मिल जाती है समुद्र में, तब वह भी समुद्र बन जाती है, लेकिन नदी की अपनी पहचान तो बनी रहती है है न जहां वह बहती है? नदी तो खत्म नहीं हो जाती ? नदी न हो, तो समुद्र भी नहीं होगा।" जब मानवता में दलित, अदलित, अवर्ण-सवर्ण या लिंग भेद के खाचों वाली सोच मिट जाएगी, तो साहित्य में भी भेद खत्म हो जाएंगें । सारी धाराओं, विभिन्न नस्लों, जातियों, पिछड़ों, दलितों से मिलकर ही तो मानवता बनती है। इनकी अपनी पहचान कायम रखते हुए अगर ये सब मानवता में मिलते हैं, तो ज्यादा भाईचारा कायम हो सकता है ! अगर कोई षड़यंत्र रचा गया है, तो वह तथाकथित सवर्ण निर्मित मुख्यधारा ने रचा है । उन्होंने मानवता के नाम पर षड़यंत्र करके गैर सवर्णों को पहचान तक नहीं दी। स्त्रियों के लेखन को आप स्त्री का लेबल लगा दीजिये या कुछ लगा दीजिये, है तो वह मानवता का साहित्य ही न ! मानवता का वह पक्ष, जिसे आपने स्त्री कहकर निग्लेक्ट किया, लेखिकाएं उसे उभारती हैं! वह साहित्य नहीं तो क्या है ? स्त्रियां अपनी पहचान का साहित्य लिख रहीं हैं और पुरुषों से बढ़कर लिख रही हैं ! कोई भी पुस्तक आती है, तो पुरुष लेखक की तुलना पुरूष लेखक से तो की जाती है पर लेखिकाओं से नहीं। मुझे लेबल लगने में कोई एतराज़ नहीं है । मैं दलित साहित्य पर भी काम करती हूँ और आदिवासी साहित्य पर भी। स्त्री के मुद्दे पर लिखती हूँ और पूरी वंचित जमातों पर भी, जिन्हें मुख्याधारा ने नेग्लेक्ट किया, उपेक्षित किया । मैं उन्हें आगे लाने का प्रयत्न कर रही हूँ ! उस पर आप कोई भी लेबुल लगाएं, क्या फर्क पड़ता है ? बात तो मानवता की ही होती है न ।








3-
उत्तर:
मेरे विचार से यह आरोप सही नहीं है । स्त्रियां पितृसत्ता के विरुद्ध भी लिखती हैं और उससे इतर सामाजिक सरोकारों, सामाजिक अन्याय व अन्य विविध विषयों पर भी लिखतीं हैं! ये कहना गलत होगा कि वे केवल पितृसत्ता के विरुद्ध ही लिख रहीं हैं। स्त्रियों ने अपने लेखन में आदिवासी, दलित और वंचित समाज के मुद्दों पर लिखा है । सच्चाई यह है कि चूंकि वह साहित्य स्त्रियों द्वारा सृजित है, इसलिए उसे स्त्री -साहित्य कह दिया जाता है। इससे इतर वे प्रेम, प्रकृति, परस्पर रिश्ते, ट्रेड यूनियन, विदेश गए भारतीयों के सांस्कृतिक द्वंद्व, राजनीतिक आर्थिक विभेद, धार्मिक संकीर्णताओं, पुरानी परंपराओं व अंधविश्वासों की जकड़न के खिलाफ या नई पीढ़ी की सोच आदि कई विषयों पर भी लिखती हैं । यह सच है कि पुरूषों की तुलना में लेखिकाएं कम है पर जो हैं उनका दायरा व्यापक है, आयाम बड़ा है। स्त्री मुद्दे पर जो लिखा हो उसे ही आप स्त्री - साहित्य कह सकतें हैं। मैंने पहले भी कहा - लोग स्त्री को अपने बरक्स लेखक के रूप में स्वीकारनें को तैयार नहीं हैं। इसी लिए यह प्रश्न उठाए जाते हैं ।राजनीति को देखें तो अभी तक महिला - आरक्षण का बिल पास नहीं हुआ है। स्त्री को पुरुष मानसिकता किसी भी क्षेत्रा में आगे बढ़ने नहीं दे रही । मैत्रोयी पुष्पा, स्त्रियों पर भी लिख रहीं हैं और दूसरे मुद्दों पर भी। उनकी आत्मकथा कबूतरी पूरे आदिवासी समाज की कथा है। चित्रा मुदद्गल अपने आपको स्त्रीवादी नहीं कहती हैं । वे दूसरे मुद्दों पर लिख रहीं हैं और स्त्रियों पर भी। ट्रेड यूनियन संघर्ष के विभिन्न पहलुओं पर उन्होंने लिखा है । कृष्णा सोबती, नासिरा शर्मा, निर्मला पुतुल, मृदुला गर्ग, कुसुम अंचल, अनिता भारती, अर्चना वर्मा, अनामिका, मृदुला गर्ग, सरोजनी श्रीवास्तव, जय वर्मा, सुधा ओंम ढींगरा, सुधा अरोड़ा, जाकिया जुबैरी, ग्रेस कजूर, मीरा आदि लेखिकाएं स्त्री मुद्दों के साथ - साथ तमाम और दूसरे मुद्दों पर भी लिख रहीं हैं! सुषुम बेदी,कविता वाचनकवि दिव्या, विदेश में रहकर लिख रही हैं! लेखिकाएं अनुवाद भी कर रहीं हैं! उनके लेखन का मूल्यांकन न करना भी पुरुषों की एक राजनीती है। ये पितृसत्ता स्त्री का वर्चस्व है! किसी भी क्षेत्र में पुरुष स्त्रियों को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता ! ये बात ठीक है कि का स्त्री मुद्दे पर लिखना उनके ज्यादा नज़दीक पड़ता है, इसलिए वे स्त्री मुद्दों पर ज्यादा लिख रही हैं और पाठकों का भी ध्यान उनकी उन रचनाओं पर ज्यादा जाता है। सच तो यह है कि पुरूष मानसिकता उन्हें स्त्री तक ही सीमित कर देना चाहती है । स्त्री मुद्दा सब में एक कॉमन थ्रेड होने का अर्थ यह नहीं कि दूसरे मुद्दे उनके लिए वर्जित हैं । वे उन पर लिख रही हैं। लिख सकती हैं और लिखेंगी भी ..! .. और लिखा भी है .. लेखिकाओं ने आँखें नहीं फेरी हैं .. आप उनकी चर्चा और मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं। मैं किस किस का नाम लूं? मैंने खुद भी स्त्री के अतिरिक्त हर मुद्दे पर लिखा है। हाशिए के वंचित समाज पर, प्रेम समाज, राजनीति और प्रकृति पर भी लिखा है। अधिकारों से वंचित समाज पर भी लिखा है ।








4-
उत्तर:
कौन नहीं कर पातीं हैं ? कौन ? स्त्रियां नहीं कर पाती हैं या पुरुष उन्हें हासिल करने नहीं देते ? सवाल तो फिर वहीं आ जाता है ! इसके लिए संगठन की दरकार है! भारत में अधिकांश स्त्रियां गृहिणी हैं, वे सही नागरिक भी नहीं बन पाईं हैं । उनके लिए सारा संसार सिर्फ उनका घर ही होता है । घर के बाहर क्या हो रहा है, उन्हें नहीं मालूम ! ज्यादातर स्त्रियां वोट भी डालने जाती हैं, तो पति से पूछ कर कि किसे वोट दें ? अभी तक पढ़ी-लिखी स्त्रियां भी अंधवश्वासों से मुक्त नहीं हो पायी हैं ! पढ़ी-लिखी डॉक्टर बनी महिलाओं की भी यही स्थिति है । अगर उन्हें बेटा नहीं हुआ है, तो वे पूजा -पाठ या जादू-टोना का सहारा लेने लग जाती हैं, जबकि तथ्य यह है कि लड़का होने के लिए पुरुष के 'Y' का होना जरुरी है! यानी उस डॉक्टरनी की पढ़ाई - लिखाई बेकार गयी! पुरुष भी ये जानते हुए कि बेटा उन्हीं के कारण होता है, तब भी दूसरा विवाह करने के बारे में सोचते हैं । सामाजिक, राजनितिक, वैज्ञानिक चेतना का अभाव और अन्धविश्वास के प्रभाव और रूढि़वादी मानसिकता से स्त्रियां तो क्या, पुरुष भी मुक्त नहीं हो पाएं हैं ! कया यह समाज की, विशेषकर जागरूक व पढ़े लिखे पुरूषों की जिम्मवारी नहीं बनती कि वे
स्त्रियों को जागरूक करें, नागरिक बनने में उनके सहायक, सहयोगी बनें ? दरअसल पुरुष अपनी सत्ता को गंवाना नहीं चाहता । फलतः वह स्त्रियों को नौकरी में आरक्षण नहीं देने में कोताही करता है । अभी तक आरक्षण का बिल लटका पड़ा है ! अनुपात में स्त्रियां कम संगठित हैं, उनका संगठित होना बहुत जरुरी है और गृहिणियों को नागरिक बनाना भी बहुत जरुरी! स्त्री यह नहीं चाहती है कि वह पुरुष की जगह ले ले । स्त्री तो चाहती है कि वह पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर, अपना कर्त्तव्य निभाते हुए, अपना हक हासिल करे। पुरुष चाहता है कि वह उसकी दासी बनी रहे और जो वह कहे, वही करती रहे । हर पुरुष के बारे में मैं यह नहीं कहती, लेकिन हज़ार में कोई एक पुरुष ही होगा, जो चाहेगा कि स्त्री आज़ाद रहे, शायद दस घर में एक ही हो ! संगठन के अभाव और चेतना के अभाव में इन मुद्दों पर संगठित रूप से प्रदर्शन, आंदोलन, जो कभी पहले शुरू हुए थे, आज नहीं हो रहे। सरकार भी ध्यान नहीं दे रही । सरकारें बदल रहीं हैं लेकिन बदलाव की राजनीति नहीं कर रहीं । बदलाव की राजनीति होगी और समाज भी बदलाना चाहेगा, तो ही स्त्री की स्थिति में सुधार आएगा ! इसलिए स्त्रियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, स्त्रियों की इस स्थिति के लिए समाज दोषी है ।








5-
उत्तर:
काफी हद तक यह सही है । मातृत्व के इस गुण को कब सराहा है पुरुष ने ? स्त्री का माँ बनना उसका एक स्पेशल गुण है, जो पुरुष में नहीं है ! लेकिन वह माँ के इस गुण का ही सर्वाधिक गुहादोहन करता है ! स्त्री के मातृत्व को पुरुष के साथ नत्थी कर दिया गया है । मातृत्व के गुण को सराहे जाने का मतलब होता है बच्चा पैदा करने को सराहा जाना, न कि किस विशेष रिश्ते में बंधे पुरूष से बच्चा पैदा होने पर ही इस गुण को सराहना ! अन्यथा उसे नकारना और धिक्करना। गुजरात के एक आदिवासी क्षेत्र में, बिना शादी के बच्चा पैदा हो जाता है । उसे नाजायज़ नहीं माना जाता ! मातृसत्ता का एक प्रदेश है मेघालय, वहाँ बच्चा नाजायज़ नहीं होता । हमारे समाज में विवाह से इतर पैदा होने वाले बच्चे को नाजायज़ माना जाता है, जिसमें बच्चे का कोई दोष नहीं होता । तब पुरूष और समाज स्त्री के मातृत्व गुण को क्यों नहीं स्वीकार करता ? दरसल मातृत्व के गुण को पुरुष समाज ने कभी सराहा ही नहीं । जब सराहा तो अपनी ही पैदा की हुई औलाद के संदर्भ में । दूसरा यह कि पुरूष माँ की ममता को ब्लैकमेल करता है! तलाक लेने पर बच्चे का क्या होगा, इसका डर स्त्री को सताता रहता है! जबकि बच्चा, माँ - बाप दोनों की जिम्मेदारी होता है! बच्चे को नौ महीने पेट में रखने के कारण बच्चे के प्रति माँ में ममता ज्यादा होती है। यह स्वाभाविक भी है। स्त्री की इसी ममता को भंजाता है पुरुष । यह मर्दवादी चाल है। वह स्त्री को ममता का हवाला देकर आज़ाद नहीं होने देता । बहुत सी स्त्रियां सिर्फ यह सोचकर पुरूष से अलग नहीं हो पातीं कि बच्चों का क्या होगा ? इस सोच को पश्चिम या पूरब की राजनीति कह कर खारिज नहीं किया जा सकता ! यह विश्व-पुरूष की सोच है । पश्चिम की राजनीति के अनुसार आज सुप्रीम कोर्ट ने बिना ब्याह के साथ रहने और उस रिश्ते से पैदा बच्चों को भी मान्यता दे दी है । बिन ब्याह वाले बच्चों को भी भारत में मुवावजा देने की बात हो रही है । यह अच्छी बात है । बच्चों के मोह में पड़कर औरत उसकी दासी बने रहना कबूल करती रही है! बच्चे के प्रति भावुक सम्मोहन तो दरअसल स्त्री-पुरूष दोनों में होता है, पर पुरूष ने चूंकि स्त्री को घर तक सीमित कर दिया, उसे अपने पर आश्रित बना दिया, इसलिए वह स्त्री को ममता का बार-बार अहसास दिला कर डराता रहता है । यह साजिश आज की नहीं, जब आदिम समाज ने कृषि को अपनाया, तभी से चली आ रही है । ऐसी भी अगर पश्चिम का कोई विचार अच्छा हो, तो उसे सिर्फ इसलिए ही नकारना नहीं चाहिए कि वह पश्चिम से आया है ! हमारे देश का कोई संस्कार बुरा है, तो सिर्फ इसलिए स्वीकारना नहीं चाहिए कि वह हमारे देश का है! जातिवादी प्रथा हमारे देश की है, हम इसे नकार रहे हैं , संविधान ने भी उसे नकारा है । पश्चिम ने हमे डेमोक्रेसी सिखाई, तो क्या वह बुरी है  ? तो अगर पश्चिम का नारीवादी आन्दोलन यह कहता है कि मर्दवादी समाज स्त्री की ममता को भुनाता है, तो वह सही कहता है! मैं सहमत हूँ इससे !








6-
उत्तर:
आज हमारा ट्रासीजनशन का समय है । पुरानी संस्कृति नए युग की मानवतावादी बराबरी भाईचारे और आज़ादी की नव संस्कृति को पचा नहीं पर रही है । समाज का जो वर्ग इस व्यवस्था से सुविधाएं लेते रहा है वह वर्ग कटुता पैदा कर रहा है । उनका जो शिकार था, आज वह जाग रहा है । इसलिए द्वन्द्व तो होगा ही । यह एक चुनौती है। आज कटुता चिंता का नहीं बल्कि बहस का विषय है। इसका कारण पुरूष है समाज है, स्त्री नहीं । स्त्री को लिंग के आधार पर हमने दोयम दर्जा दे रखा है, भारत में यह भेदभाव केवल
स्त्रियों के प्रति ही नहीं है। दलितों के लिए भी हमारा सभ्य समाज ईष्र्या और कुंठा से ग्रस्त है ! हाशिये के समाज या कमज़ोर समाज को ऊपर लाने या बराबरी का दर्जा देने की बात होगी, तो जो समाज इस व्यवस्था में फायदा उठता आ रहा है, ईष्र्या करेगा ही! उस ईष्र्या की परवाह करके क्या हम न्याय के लिए लड़ना छोड़ दें ? लैंगिंग कटुता भी वंचित समाज यानी स्त्री नहीं लाती । पुरूष जिसकी सुविधाएं छिन रही हैं, वह पैदा करता हैं । स्वीडेन की स्त्रियों ने कहा कि हम खाना बनाते हैं, हमारा भी मूल्यांकन करो और वहां मूल्यांकन हुआ। वहां घरेलू स्त्रियां अपने हक की लड़ाई लड़ रही हैं । वे अपने घरेलू काम का मूल्यांकन और मुआवज़ा मांग रही हैं । हमारी स्त्री घर के सारे कपडे धोती है, तो धोबी का काम करती है । खाना बनती है, तो दाई का काम करती है । बच्चे पालती है तो आया का काम करती है और सौदा लाती है तो छोटे मुंडू  का काम करती है । पति के साथ रात को बिस्तर में सोती है, तो वेश्या का काम भी करती है । इतने सारे काम करने के बाद किसी स्त्री से पूछो कि क्या करती हो, तो कहेगी ”कुछ नहीं !“ वह नौकरी करेगी, तभी उस ‘कुछ नहीं’ को काम करना मानेगी । आज यदि वह इस ‘कुछ नहीं’ से ‘कुछ’ बनना चाहती है, तो घर में कटुता बढ़ जाती है । इसमें स्त्री का क्या दोष ? वह क्या करे ? वह तो अपना हक मांग रही है ! इसलिए लैंगिग कटुता मुझे चिंतित नहीं करती है ! बहुत बड़ी चुनौती है यह स्त्रियों के लिए । स्त्रियों को स्वीकार करके, अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ेगी ! और यह उन पुरुषों के लिए भी चुनौती है, जो सामाजिक न्याय के लिए लड़ रहे हैं। पुरुष स्त्रियों को अधिकार दिलाने के लिए उनका साथ दें और समाज में बराबरी दिलायें तो कटुता दूर होगी । पुरुष भी कंधे से कंधा मिलाकर स्त्रियों के साथ चलें ताकि उस मुक्त स्त्री के साथ मिलकर एक नयी संस्कृति की रचना की जा सके और बराबरी की नई दुनिया कायम हो ।
मनुष्य बेसिकली एक जानवर है और उसमें ईष्र्या और छीनने की प्रवृत्तियाँ रहती हैं ! सभ्य मनुष्य में ये प्रवृत्तियाँ नहीं होतीं ! अगर पुरुषों को, सभ्य मनुष्य बनना है तो उन्हें इस कटुता और ईष्र्या को त्यागना होगा !








7-
उत्तर:
सोशल मीडिया से प्रचार बहुत हो जाता है, इसलिए लोग उसकी तरफ ज्यादा झुक रहे हैं ! सोशल मीडिया से ज्यादा गंभीर लेखन नहीं हो सकता, मुझे ऐसा लगता है, उसके लिए पुस्तक पढ़ना बहुत जरुरी है ! आप एकांत में पुस्तक पढ़ते हैं, तो उस पर कुछ सोचते हैं । कंप्यूटर पर बैठकर पढ़ने या लिखने और पुस्तक पढ़ने या लिखने में बहुत अंतर है । लेकिन आज लेखक भी प्रचार चाहता है और प्रचार के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेता है । प्रचार हेतू वह भी इलीट समाज के प्रचार का यह सक्षम माध्यम जरूर बन रहा है । सोशल मीडिया कई बार अराजक भी हुआ है, अराजक इस मायने में कि - कई ऐसी बहसें हुई हैं, जो दुखद हैं! पहले सीनियर लेखकों के प्रति आदर होता था । जूनियर लेखक उनसे सीखने की कोशिश करते थे ! आज बढ़े-बढ़े लेखकों पर सोशल मीडिया के माध्यम से आक्षेप लगाए जा रहे हैं ! अरे.. इन सीनियर लेखकों ने भी तो अपने समय में बदलाव के लिए संघर्ष किया है, दिशा दी है । भले आज का समय उनसे भी आगे निकल आया है पर उनका निरादर तो नहीं करना चाहिए । किसी का आप के विचारों से मतभेद हो सकता है लेकिन अपनी बात तो तर्क पूर्ण तरीके से रखें । मन भेद की हद तक तो मत जाइये। अनामिका पर ही बहस चलाई लोगों ने ! मैं उसका सख्त विरोध करती हूँ! अनामिका ने कैंसर की पीडि़त एक औरत के बारे में कविता के माध्यम से अपनी संवेदनाएं व्यक्त की । उस पर बहस चली, जो अर्थपूर्ण नहीं लगी । गोष्ठियों में आमने-सामने बहस कीजिये, वह अधिक सार्थक और जीवन्त होती है । उन गोष्ठियों में जिन्हें कम्प्यूटर चलाना नहीं आता या जिनके पास कम्प्यूटर नहीं है, वे भी भागीदारी कर पाते
है । कम्प्यूटर पर बहस केवल इलीट की बहस बन कर रह जाती है । सोशल मीडिया की बहस हमें किसी नतीजे पर नहीं ले जा रही । आपस में बैठकर जो बहस होती है, उससे संगठन बनता है । कहीं एसी बहसें चन्द लोगों का शगल न बन कर रह जाएं, इनसे इस खतरे की संभावना भी है ।








8-
उत्तर:
केवल स्त्री के नज़रिये से ही क्यों ? यह तो स्त्री -पुरूष दोनों के लिए एक समान समस्या है । एक स्त्री के नजरिये से नहीं, एक मनुष्य के नज़रिये या एक लेखिक के नज़रिये से इस पर बात होनी चाहिये । ये सही है कि आज सामाज में समय के अभाव के चलते लोगों के पास मिलने जुलने का समय नहीं है ! इसलिए लोग टेक्नॉलॉजी का सहारा लेते हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत सारे काम करते हैं । पहले वाला सोशल मीडिया का प्रश्न और ये प्रश्न दोनों एक दूसरे के कहीं जुड़े भी है और अलग भी ! हकीकत यह है कि पहले बहुत कम लोग लिखते थे। दरबारों या साहित्य प्रेमी धन्ना सेठों के द्वारा आयोजित साहित्य गोष्ठियों में साहित्य पनपता था या फिर लोक में । आज लेखक व पाठक गोष्ठियों में मिलते है । वहां एक-दूसरे को लोग जान पाते है । लेकिन अब लिखने वाले बहुत ज्यादा हो गए हैं! विमोचन होता है तो उसमे लोग जुट जाते हैं। गोष्ठियों में, जलसों में इनकी समीक्षा होती है, तो लोग जान जाते है कि फलां पुस्तक आई है और कैसी है ! कई बार महँगी पुस्तकें लोग खरीद नहीं पाते! पहले भी अप्राप्त होती थीं पुस्तकें ! कइयों की तो पांडुलिपियों पर ही चर्चा होती थी ! गोष्ठियां होना लेखक और पाठक दोनों के लिए अच्छा है । प्रत्यक्षतः यह कोई बुरी बात नहीं लगती । लेकिन इसमें प्रायोजित प्रसार ( Projectid Publicity) का खतरा भी है, जो जेनुयिन रचनाओं को पछाड़ सकता है । स्तरीय लेखन अपने बलबूते लेखक के घर में, जिन्दा तो रह जाता है लेकिन जब उसे कोई पढ़ेगा ही नहीं, तो वह स्तरीय है या नहीं ये कोई कैसे जानेगा ? जानने के लिए पुस्तक का व्यापक रूप से पढ़ा जाना जरुरी है! और पढ़े जाने के लिए पुस्तक का सस्ता तथा उपलब्ध होना भी जरुरी है ! सस्ता होने के लिए सरकार या प्रकाशकों के स्तर पर एक नीति निर्धारण की जरूरत होगी। वे ही पुस्तकों के दाम घटा सकते हैं । ये सारी इन्टरकनैक्टिड चीज़ें हैं ! इसलिए शॉर्टकट करके लेखक व प्रकाशन गोष्ठियों में उसकी समीक्षा या विमोचन करा के लोगों को सूचना दे देते हैं । ये सब सूचना के आदान-प्रदान का एक ढंग है ! और आज के भीड़-भाड़ के जमाने में यह जरुरी हो गया है ! अच्छा है या बुरा मैं इस पर कोई कमैन्ट नहीं करुँगी । आप इसे नसैसरी ईविल (Necessary Evil ) कह सकते हैं ।
जैसे आज मोबाइल जरुरी हो गया है ! रिक्शेवाले के लिए भी मोबाइल जरुरी है ! कुछ लोग कहते हैं मोबाइल के ज्यादा इतेमाल से कान में कैंसर हो जाता है लेकिन फिर भी उसका इस्तेमाल होता है ! बिजली जरुरी है! करंट लग जाने के डर से बिजली का इस्तेमाल तो बंद नहीं कर सकते ! कहने का मतलब है विकल्पहीनता की स्थिति में किसी भी प्रक्रिया को एहतियात के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है। रही पुरस्कार की बात ! इसमें कोई शक नहीं कि पुरस्कार भी एक जुगाड़ू तंत्र बन रहा है । मेरे ख्याल में पुरस्कार या तो उत्साह बढ़ाने के लिए अथवा अच्छी रचना के लिए देने चाहिए ! आजकल लोग गुटबाजी करके भी पुरस्कार दे रहे हैं ! इसके खिलाफ लड़ना पडे़गा ! पुरस्कार अपने में गलत नहीं होते, उन्हें देने वाले गलत हो सकते हैं । इसी तरह से गोष्ठी कराना, परिचर्चा कराना, विमोचन कराना, समीक्षा कराना .. ये अपने में गलत नहीं हैं ! इसका कौन इस्तेमाल करता है, कैसे इस्तेमाल करता है उस पर डिपेंड करता है ! आज कि तारीख़ में ये सब जरुरी हैं ! ये चुनौतियां हैं, हताशा नहीं है ! स्त्री क्यों हताश होगी ? वह भी उस चुनौती का मुकाबला करेगी ! जब स्त्री बराबरी चाहती है,तो उसे हक के लिए लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी बराबर की चुनौतियां भी स्विकारनी होंगी स्त्री होने के नाते प्रिबेलेज (Priveldge) नहीं ।








9-
उत्तर:
लगता है हमारी जिंदगी से ही हास्य और विनोद खत्म हो गया है । दरअसल हिंदी लेखन में हास्य इस हद तक नीचे गिर गया है कि कवियों और शायरों ने बीबी को भी हास्य की पात्र बना दिया । कवि सम्मेलनों और गोष्ठियों में कभी बीवी, तो कभी साला और कभी-कभी शौहर और ब्याह भी प्रायः हंसाने के विषय बनाकर प्रस्तुत किए जाते हैं । आज के हास्य और व्यंग में स्वाभाविकता नहीं रही । जबरन हँसाने की कोशिश की जाती है। कटाक्ष और व्यंग ऐसा हो जो हँसाये भी और दिल पर चोट भी करे ! हँस कर बिखर नहीं जाए ! आज हंस कर या हंसी में बिखरने वाला , हँस कर खत्म होने वाला साहित्य लिखा जा रहा है! शरद जोशी जी, परसाई जी, जन्मजेय जी जैसा लेखन नए लोगों में नज़र नहीं आता । मंचीय लोगों में तो बिलकुल नज़र नहीं आता । वे तो केवल तालियां बजवाकर अपना या रिश्तों का मज़ाक उड़ाते हैं! हंसी कभी कभी खटकती जरूर है ।








10-
उत्तर:
हमारी कई योजनाएं हैं ! हमारा संगठन है रमणिका फॉउन्डेशन ! यह एक ट्रस्ट है । इसी की दूसरी अनुषगी ईकाई है । आखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक मंच All India Tribal Literary Foram ( AITLF) उसके माध्यम से हम आदिवासियों की लोककथाएं , लोकगीत , शौर्यगाथाएं और समकालीन लेखन जमा कर अनुवाद करवा रहे हैं ! कई किताबें छप गईं और कई आने वाली हैं! कई सेमीनार हुएं हैं, उनकी दस्तावेज़ी रिपोर्टें तैयार हो रही हैं कि हमारे संगठन ने कितने आदिवासी दलित और स्त्री सम्मलेन करवाए तब से लेकर आज तक आदिवासी, स्त्री, दलित साहित्य ने कहां तक कितनी यात्रा तय की इसका दास्तावेजीकरण भी हो रहा है। रमणिका फाउंडेशन ने साहित्य अकादमी के सहयोग से दिल्ली में हुए 2 जून 2002 को संपन्न आखिल भारतीय आदिवासी लेखक सम्मिलन में आदिवासी-साहित्य का नामकरण किया था । उसमें नौ राज्यों के आदिवासी लेखक शामिल हूए थे । तब से दलित-साहित्य की तरह आदिवासी-साहित्य भी जाना जाने लगा है । इससे पहले आदिवासियों का साहित्य आदिवासी - साहित्य के नाम से नहीं जाना जाता था । इधर 2003 से हम लोग एक परियोजना के तहत स्त्री -मुक्ति, स्त्री सशक्तिकरण की कथाओं का चालीस भाषाओं से हिंदी में अनुवाद भी करवा रहे हैं ! उसमें आदिवासी महिलाओं के साथ-साथ हर जाति व वर्ग की, हर उम्र की महिलाओं की रचनाओं शामिल हैं। हमारी एक वेबसाइट युद्धरत आम आदमी की www.yuddhrataamaadmi.com के नाम से हैं । दूसरी रमणिका फाउंडेशन नाम से पुनः बनवाई जा रही है। युद्धरत आम आदमी की वैवसाइट पर पत्रिका की सारे अंक अपलोड हैं, ताकि शोधार्थी या पाठक पत्रिका को निशुल्क डाउनलोड करके पढ़ सकें । लेखन में मेरी दूसरी आत्मकथा छपने के लिए चली गई है और तीसरी आत्मकथा हजारीबाग से दिल्ली तक लिखनी शुरू की है । झारखण्ड के 17 आदिवासी कवि जो हिंदी में लिखते हैं की पाण्डुलिपि तैयार कर के हम छपने के लिए भेज चुके हैं । भारत के और दूसरे आदिवासी कवि, जो हिंदी में लिखतें हैं और ऐसे कवि भी, जो अपनी भाषा में भी लिखते हैं, हिंदी में अनुवाद करवा रहे हैं । अब तक हम टोटल 44 भाषाओं में अनुवाद करवा चुके हैं ! ‘हाशिए उलांघती औरत: कहानी’, परियोजना के तहत हम कुल मिलाकर आठ खंड निकाल चुके हैं ! बाकी 22 खंड अभी आने हैं । पांच भाषाओं के खण्ड आ चुके हैं । अभी तमिल बंगाली, मलयालम, नार्थ-ईस्ट की 15 भाषाओं की तथा उडि़या भाषा की कथाओं के हिन्दी अनुवाद के खण्ड मार्च 2015 तक आ जाएंगे । इधर मेरी दो कविता पुस्तकें भी आ रही हैं ‘मैं हवा को पढ़ना चाहती हूँ’ और ‘कोयले की चिंगारी’ के नाम से । मेरी रचनावली भी प्रकाशनार्थ जा चुकी है। मेरी कुछ किताबों के अंग्रेजी में अनुवाद हुए हैं, वे भी सम्पादित हो रही हैं । मेरा लेखन जारी है । हमारी संस्था के माध्यम से कहानियों, कविताओं, लोक-कथाओं, सृजन मिथकों, शौर्यगाथाओं, लिजिन्द्रियों यानी आदिवासी और लोक विरासत के संकलन, चयन, संपादन, अनुवाद व प्रकाशन का काम जारी है । एक आदिवासी लाइब्रेरी की स्थापना का प्रयास भी हो रहा है ।







परिचय
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नाम : रमणिका गुप्ता
जन्म- २२ अप्रैल, १९३०, सुनाम (पंजाब);
शिक्षा- एम.ए., बी.एड.।
कार्यक्षेत्र- बिहार/झारखंड की पूर्व विधायक एवं विधान परिषद् की पूर्व सदस्या। कई गैर-सरकारी एवं स्वयंसेवी संस्थाओं से सम्बद्ध तथा सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में सहभागिता। आदिवासी और दलित महिलाओं-बच्चों के लिए कार्यरत। कई देशों की यात्राएँ। विभिन्न सम्मानों एवं पुरस्कारों से सम्मानित।

प्रकाशित कृतियाँ-
कविता संग्रह- पातियाँ प्रेम की, भीड़ सतर में चलने लगी है, तुम कौन, तिल-तिल नूतन, मैं आजाद हुई हूं, अब मूरख नहीं बनेंगे हम, भला मैं कैसे मरती, आदिम से आदमी तक, विज्ञापन बनता कवि, कैसे करोगे बंटवारा इतिहास का, प्रकृति युद्धरत है, पूर्वांचल : एक कविता-यात्रा, आम आदमी के लिए, खूँटे, अब और तब तथा गीत-अगीत।
उपन्यास- सीता, मौसी।
कहानी-संग्रह- बहू-जुठाई।
आत्मकथा- हादसे।
साक्षात्कार संग्रह- साक्षात्कार।
स्त्री विमर्श- कलम और कुदाल के बहाने, दलित हस्तक्षेप, निज घरे परदेसी, साम्प्रदायिकता के बदलते चेहरे।
दलित चेतना पर- साहित्यिक और सामाजिक सरोकार, दक्षिण-वाम के कटघरे और दलित-साहित्य, असम नरसंहार एक रपट, राष्ट्रीय एकता, विघटन के बीज (गद्य-पुस्तकें)।
अन्य- छह काव्य-संग्रह, चार कहानी-संग्रह एवं बारह विभिन्न भाषाओं के साहित्य की प्रतिनिधि रचनाओं का संकलन सम्पादन। शरणकुमार लिंबाले की पुस्तक दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रा का मराठी से हिन्दी में अनुवाद। इनके उपन्यास मौसी का अनुवाद तेलुगू में पिन्नी नाम से और पंजाबी में मासी नाम से हो चुका है। जहीर गाजीपुरी द्वारा उर्दू में अनूदित इनका कविता-संकलन- 'कैसे करोगे तकसीम तवारीख को' प्रकाशित। इनकी कविताओं का पंजाबी अनुवाद बलवीर चन्द्र लांगोवाल ने किया जो बागी बोल नाम से प्रकाशित हो चुकी है।

सम्प्रति : सन् १९८५ से युद्धरत आम आदमी (त्रौमासिक हिन्दी पत्रिका) का सम्पादन।
संपर्क- ramnika01@hotmail.com

Tuesday, February 17, 2015

हमारी झुटपुट अभिव्यक्ति में ही इन्द्र जनों का आसन डोलने लगता है- किरन सिंह


"स्त्री को अक्सर अपनी अभिव्यक्ति के लिए तिनके की ओट लेनी पड़ती है। मीरा ने जिस कृष्ण को ढोल बजा कर खरीदा वह ईश्वर न होकर मनुष्य होता तो ? महादेवी की पीडा किसी अज्ञात के लिए नहीं बल्कि किसी इंसान के लिए होती तो ? राणा जी के जहर के प्याले और हाथी के पाँव के नीचे से मीरा बच पाती ? ‘बंग महिला’, ‘एक विधवा की आत्मकथा’ इत्यादि इस बात के उदाहरण हैं कि स्त्रियाँ अपनी रचनाओं के अन्त में अपना नाम तक नहीं लिख पाती थीं। "
---- किरन सिंह



'लमही' जनवरी - मार्च अंक  'स्त्री का कहानी पक्ष ' में  पत्रिका  द्वारा आयोजित   परिचर्चा के दस  प्रश्नों  के उत्तर  के माध्यम  से वरिष्ठ  और  युवा  स्त्री -कथाकारों  ने अपने विचार बहुत बेबाकी से रखें हैं ! कुछ लेखिकाओं के विचार आप फरगुदिया पर पढ़ सकतें हैं !
लेखिका किरन सिंह जी ने 'संझा' कहानी के माध्यम से  किन्नर समाज की समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया है !   हंस कथा सम्मान और रमाकांत स्मृति सम्मान से सम्मानित
किन्नर समाज की समस्याओं पर आधारित 'संझा' कहानी से चर्चा में आई लेखिका  किरन सिंह जी के विचार आप सभी के लिए ...



१.
कहा जाता है कि अभिव्यक्ति की बराबरी से बड़ी कोई बराबरी नहीं हो सकती. दुनिया भर के जनतांत्रिक आंदोलनों का अंतिम आदर्श भी यही अभिव्यक्ति की बराबरी रहा है.हिंदी जगत में स्त्रियों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की प्रचुरता और विपुलता के मद्देनज़र क्या आपको लगता है कि आज एक स्त्री के लिए अभिव्यक्ति के समान अवसर हैं और वह निर्द्वंद हो कर मनचाहा रच और अभिव्यक्त कर पा रही है?

२.
साहित्य को स्त्री,दलित,पिछड़ा जैसे खांचों में रख कर पढना और समझना मुझे उन्हें मुख्यधारा से परे धकेलने का एक षड्यंत्र ज्यादा लगता है. मगर, कुछ लोग अनुभवों और यथार्थ की प्रमाणिकता की दृष्टि से वर्गीकरण और रेखांकन को युक्तिसंगत भी ठहराते हैं. आप अपने लेखन पर चस्पां 'स्त्री लेखन' के लेबल से कितनी सहज या असहज महसूस करती हैं?

३.
आधुनिक स्त्री रचनाधर्मिता में जाहिर तौर पर 'कॉमन थ्रेड' पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष और प्रतिरोध है. हिंदी साहित्य में लेखिकाओं ने भावनात्मक, शारीरिक, सामाजिक और आर्थिक स्तरों पर पितृसत्ता की जकड़न, उसकी प्रविधियों और उसके पाखंडों का उद्घाटन और उदभेदन बहुत कुशलता से किया है. यहाँ तक की स्त्री यौन शुचिता की खोखली अवधारणाओं की भी धज्जियाँ उड़ाई गई हैं.मगर, कुटिल पितृसत्ता जिस प्रकार आज भी राजनीति और संस्कृति के क्षेत्र में महिलाओं के लिए लक्ष्मण रेखाएं खींच रही है, उससे हिंदी जगत की लेखिकाएं आँखें फेरे क्यों दिखाई देती हैं?

४.
व्यापक स्त्री हित से जुड़े राजनीति और अर्थनीति के ज्वलंत प्रश्न, जैसे विधायिका में महिला आरक्षण, मंत्रिमंडलों, नौकरियों और शैक्षिक संस्थाओं में सानुपातिक प्रतिनिधित्व, इत्यादि महिलाओं के रचनात्मक सरोकारों में अपेक्षित स्थान क्यों हासिल नहीं कर पाते हैं?

५.
'मातृत्व' एक ऐसा गुण है, जो स्त्री को श्रेष्ठ कृति बनाता है. सो, स्वाभाविक रूप से दुनिया भर के स्त्री-साहित्य में इसे 'सेलिब्रेट' किया जाता रहा है. मगर कुछ पश्चिमी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) ने यह महसूस किया है कि मातृत्व के प्रति भावुक सम्मोहन को बढ़ावा देना   किसी स्तर पर मर्दवादी राजनीति का एक आयाम भी हो सकता है. आप इस निष्कर्ष से कितनी सहमत हैं?

६.
समाज में स्त्रियों के संगठित दमन चक्र के कमजोर पड़ने और स्त्री स्वातंत्र्य की सशक्त छवियों के समानांतर इर्ष्या और कुंठा की लहरें भी दिखाई पड़ रही हैं. इस का नतीजा है कि यौन हमलों और हिंसा की बाढ़ सी आ गई है और कार्य स्थलों पर और अन्यत्र स्त्री-पुरुष रिश्ते असहज होते चले जा रहे  हैं..समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिंतित करती है?

७.आज पारंपरिक साहित्य की तुलना में सोशल मीडिया  का स्त्री-लेखन ज्यादा चर्चाएँ बटोर रहा है. सोशल मीडिया की अराजकता, उसका औसतपन, उसकी क्षणभंगुरता और उसके आभासी चरित्र की आलोचनाएँ और आक्षेप  अपनी जगह हैं, मगर अब उसे नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन है. साहित्य में सोशल मीडिया के विवादास्पद हस्तक्षेप को गंभीर लेखन और साहित्य में कहाँ देखती हैं आप?

८.
साहित्य के बारे में शुरू से एक मासूमियत भरी स्थापना रही है कि स्तरीय साहित्य अपने बूते जिंदा रहता है. मगर हकीकत यह है कि आज जो रचना साहित्यिक परिचर्चा, गोष्ठी, जलसा, विमोचन, समीक्षा, पुरस्कार के जुगाड़ तंत्र में अपनी जगह नहीं बना पाती, पाठक उस तक पहुँच भी नहीं पाता, चाहे वह जितनी भी उच्च कोटि की हो. एक स्त्री के नजरिये से साहित्य की यह धक्कम-पेल आपको हताशाजनक लगती है या चुनौतीपूर्ण?

९. एक सवाल जो मुझे हमेशा परेशान करता है कि आखिर हिंदी के स्त्री लेखन से 'हास्य' और 'विनोद' लगभग निष्कासित क्यों है? कटाक्ष और व्यंग अगर है तो उसकी प्रकृति हास्य-मूलक नहीं है. ऐसा क्यों?

१०
.अपनी आगामी लेखकीय योजनाओं के बारे में बताएं.



                   
1-
     हमारी झुटपुट अभिव्यक्ति में ही इन्द्र जनों का आसन डोलने लगता है। एक मुसलमान अपने अभिव्यक्ति में आजाद हुआ तो उसे ‘संदिग्ध’ कह देंगे। दलितों ने हमारे कुकर्म याद दिलाए तो वे हुए ‘कुंठित’ । और औरत ने जरा पूछ लिया कि साहब, आइना दिखा रही हूँ बताइए वहाँ नर दिखाई दे रहा है या नरभक्षी तो वह साबित हुई- ‘अश्लील।’
      स्त्री को अक्सर अपनी अभिव्यक्ति के लिए तिनके की ओट लेनी पड़ती है। मीरा ने जिस कृष्ण को ढोल बजा कर खरीदा वह ईश्वर न होकर मनुष्य होता तो ? महादेवी की पीडा किसी अज्ञात के लिए नहीं बल्कि किसी इंसान के लिए होती तो ? राणा जी के जहर के प्याले और हाथी के पाँव के नीचे से मीरा बच पाती ? ‘बंग महिला’, ‘एक विधवा की आत्मकथा’ इत्यादि इस बात के उदाहरण हैं कि स्त्रियाँ अपनी रचनाओं के अन्त में अपना नाम तक नहीं लिख पाती थीं।
 मैं मौजूदा समय को स्त्री-अभिव्यक्ति का स्वर्ण काल मानती हूँ। यह सच है कि इस लेखन का एक हिस्सा आरोप-पत्र है। इस लेखन पर प्रति-आरोप है कि,‘वही रोना-धोना वही स्यापा।’’ यह स्यापा नहीं है, शहादत पर मर्सिया गायन है। यह शोक-गीतों का उत्सव है।
  ‘गहने बनवाओ-गहने तुड़वाओ,’ के निर्देश के दरकिनार, परंपराएँ टूट-बन रही हैं। राज्य हिंसा के विरोध में मणिपुर में महिलाएँ नग्न होकर प्रदर्शन के लिए निकल पडी। बलात्कार के विरोध में जगह-जगह महिलाओं ने चादर लपेट कर प्रदर्शन किया। दमन के खिलाफ स्त्रियों ने कविता,कहानी, लेख लिखे। लेकिन राज्य और पितृसत्ताओं की निगाह में, हमारी चरम और परम अभिव्यक्ति भी, पीडित का भड़ास निकलना भर है। वे हमारा विरोध नहीं करते। क्योंकि विरोध करने पर मामला तूल पकड़ेगा। विरोध के प्रति स्वयंभूओं का ठंडा रुख, हमारी अभिव्यक्ति को ठंडा कर देने की योजना के तहत  है। ए.ओ. ह्यूम ने ‘प्रेशर रिलीज थ्योरी’ के तहत कांग्रेस की स्थापना की थी। शुरु में प्रार्थना पत्र ही भेजे जाते रहे। धीरे-धीरे ये प्रार्थना पत्र, गरम दल के दस्तावेज और सरफरोश गीतों में बदल गए।
ताजा चलन में औरत की अभिव्यक्ति को खामोश करने के लिए, महान भारतीय परंपरा और परिवार को बचाने की दुहाई देकर नैतिकता के डंडाधारी लामबन्द हो रहे हैं। ‘लव जेहाद’, औरत के चयन और प्रेम की अभिव्यक्ति पर कंुडली मारने, उसे दिमाग न समझ कर सिर्फ जिस्म समझने की फासीवादी-खाप मानसिकता का ताजा उदाहरण है।
पहरा हुआ करे। जेल में सुरंग बन चुकी है।


 2-
स्त्री, दलित, पिछड़ा... आपसे अल्पसंख्यक छूट गया है।
 तमाम दुश्वारियों के बावजूद, आज स्त्री को अपने स्त्रीत्व पर गर्व है। तुलनात्मक रुप से, स्त्री एक बेहतर इंसान है।
 ‘स्त्री लेखन’ अनुभाग में रखने से औरत को एक आरक्षित और सुरक्षित घेरा मिल जाता है। इससे मूल्यांकन का दायरा छोटा हो जाता है और स्त्री की चुनौतियाँ कम हो जाती हैं। यह ‘स्त्री लेखन’ का लेबिल औरत को ‘कम्फर्ट जोन’ में डाल देगा और स्त्री के विकास को खतरनाक स्तर तक बाधित करेगा।
मेरा दिल औरताना है और संघर्ष मर्दाना। मैं बरसों से बन्द दरवाजे, पाजेबों वाले लात से मार कर चरमरा देना चाहती हूँ। मेरे चेहरे पर अपने आप ऐसा भाव रहता है जैसे मैं ही ‘मित्रो मरजानी’ या ‘सारंग’ हूँ। ऐसे में तो ‘पुरुष लेखन’ को असहज महसूस करना चाहिए।

3-
.महिलाएँ अभी स्वयं के साथ, माँ, दादी, चाची, सहेलियों के साथ जो देखी-सुनी हैं, बहुतायत से उसे लिखने में व्यस्त हैं। कुटिल पितृसत्ता की बंदिशों के बावजूद स्त्रियों ने जब खूब लिखना शुरु कर दिया है तो भविष्य में राजनीति और संस्कृति के क्षेत्रों में जाएँगी।


4-
आपका सवाल वाजिब है और तीसरे प्रश्न का विस्तार है। राजनीति और अर्थनीति, दोनों ही हमारे समाज को गहरे तक प्रभावित करते हैं। लेखक को ‘पैसिव एक्टिविस्ट’ माना जाता है। किन्तु अब लेखक-लेखिकाओं को यह मानना होगा कि लेखन और आन्दोलन एक ही काम की दो विधियाँ हैं।
स्त्री को दूसरों के लिए प्रशिक्षित करके तैयार किया जाता है। फिलहाल वह यह नहीं समझ पा रही है कि अपने बारे में सोचना आत्मकेन्द्रित होना या स्वार्थी होना नहीं है बल्कि अपने माध्यम से स्त्री जाति के बारे में सोचना है। अनुभव की सीमा, संस्कार और आत्मविश्वास की कमी के कारण भी राजनीति आदि विषयों पर कम लिखा जा रहा है।


5-
मातृत्व की विशेषता के कारण स्त्री में जन्मजात रचनात्मकता का गुण आ जाता है। चालीस की उम्र के बाद औरत को अपने स्वतन्त्र तरीके से जीना चाहिए। बच्चों का हाल-चाल लेकर उन्हें अपना निर्णय लेने के लिए छोड़ देना चाहिए। लेखन में हम क्या लाते हैं, यह व्यक्ति के समय और रुचि के हिसाब से बदलता रहता है।
6.
समाज में गहराती लैंगिक कटुता क्या आपको चिन्तित करती है ? क्या मतलब ? स्त्रियों पर बढती हिंसा को लेकर गहरा शोक रहता है, उदासी रहती है, अवसाद रहता है  भयानक क्रोध और घृणा रहती है। मोहनलालगंज में, मैं घटनास्थल पर गई थी। उसके बाद  मुझे कुछ दिन नींद नही आई। मैं यही सोचती रहती थी कि मरने से पहले उस विधवा स्त्री की आँखों के आगे इंतजार करते उसके दो बच्चे घूम रहे होंगे। वह अपनी जिन्दगी के लिए बलात्कारी-हत्यारों से कितना गिड़गिड़ाई होगी। ज्यादातर हत्याओं में प्रेमी और परिचित शामिल रहते हैं। अपने प्रेमियों और परिचितों को अपनी हत्या में शामिल देख कर  औरतों पर मरने से पहले क्या बीतती होगी ?


7-
सोशल मीडिया का सदुपयोग भी हुआ है। जन आन्दोलन, सम्पादन, कार्यक्रमों के प्रचार, सूचना प्राप्त करने में इसकी भूमिका रही है। लेकिन ज्यादातर मामलों में यह सस्ती लोकप्रियता बटोरने, प्रपंच करने, चापलूसी करने और बेशर्म आत्मप्रचार का माध्यम है। मुझे डर है कि रिश्तों के आधार पर बरसाया गया अतिरिक्त पानी और पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर की गई अनावश्यक काँट-छाँट, हमारे रचनाकारों के एक बड़े वर्ग को बोनसाई न बना दे।
     सोशल मीडिया को नजरअंदाज करना नामुमकिन क्यों है भाई ? सोशल मीडिया न हुआ बंबइया  डॉन हो गया।


8-
सभी प्रश्न बहुत अच्छे हैं। किन्तु प्रश्न आठ, प्रेमचन्द, निराला और मुक्तिबोध की परंपरा का नहीं है। प्रश्न का उत्तर न देना प्रश्नकर्ता की शान में गुस्ताखी होगी इसलिए कह दूँ कि बूढ़ा समय जब शाम को झाड़ू-बूहारू करेगा तो ग्लिटर से लिखे पन्नों को कूड़ा डम्प करने वाले गड्ढे में पाट देगा। साहित्य का इतिहास  इस बात की तस्दीक करता है।

9-
 या तो दीवाना हँसे या तू जिसे तौफीक दे’ स्त्रियों में जहर के प्रति इम्यून विकसित हो जाता है। इसलिए वो दीवाना होने से बच जाती हैं। और हमारा ही बनाया, वो कल का ईश्वर, हम पर कभी मेहरबान नहीं रहा। तो हम कैसे हँसे ? फिलहाल तो स्त्रियों का लेखन सामूहिक रुदन है। वे हँसती भी हैं तो गम छिपाने की तर्ज पर। अभी आने वाले कई वर्षो तक स्त्रियों का हास्य-लेखन नहीं आएगा।


10-
मैं पाण्डुलिपि तैयार कर रही हूँ। यह कहानी की मेरी पहली किताब होगी।

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किरन सिंह
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3/2शिक्षा: एम्. ए. ( हिंदी, प्राचीन भारतीय इतिहास ) बी. एड., पी -एच. डी.रचनाएँ: "सूर्यांगी" पर उ.प्र. हिंदी संस्थान से 'महादेवी वर्मा पुरस्कार' ,
मुजफ्फर अली द्वारा निर्देशित 'शाल' एवं 'मंगला' तेली फिल्मों में अभिनय.
आकाशवाणी, दूरदर्शन, लखनऊ में आकस्मिक समाचार वाचिका एवं उदघोषिका.

सम्प्रति: अध्यापन, स्वतंत्र लेखन .26 विश्वास खण्ड
गोमती नगर, लखनऊ



         


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