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Wednesday, August 06, 2014

तुम्हारे समय के लोग अब नहीं बचे हैं













बुद्ध और नदी::

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जंगल बुद्ध को पुकार रहे थे

आओ कि बचा लो हमें

जंगल औरत होकर चिल्ला रहे थे
 
और पहले से भी ज्यादा काली पड़ गई थी उनकी देह



'देखो, चितगोंग में मैं गिरा और टूट गया अपने ही बामियान में

कुशीनारा से जाकर पूछो -

सारनाथ से उठने वाली मेरी आवाज़ का क्या हुआ ?



कहते हुए बुद्ध जंगल की जड़ों में खो गए



पेड़ और परिंदे मौन !

जानवर और हवाएं चुप !

जड़ें आर्द्र थीं बुद्ध की आँखों से

या बुद्ध की ऑंखें जड़ों की नमीं से भीग गई थीं



एक नदी पास से गुज़र रही थी

पहले ठिठकी

फिर रुकी

अपने किनारे पर दोनों का सिर रखा और सहलाती रही देर तक


तपते हुए सिर



उसका सूखा चेहरा अब भी उम्मीद से भरा था

और कंठ से आती थी धीमी धीमी आवाज़

कल -कल कल



नदी बुद्ध की माँ थी

स्वप्न देखते हुए एक युग को जन्म दिया

और मर गई।





बुद्ध::                                                                          

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बुद्ध क्या तुम मेरे घर आओगी

सुना है तुम उद्विग्न नहीं होतीं

सुना है तुम घर घर घूम रही हो धरती पर

पर मेरा पता हिंसा और अहिंसा के बीच अंधी गली के

आखिरी कोने पर है

मकान नंबर बारिश से मिट गया है

छत बची नहीं है

दीवारों में महुआ और अर्जुन, नीम उग आये हैं

तुम्हारे समय के लोग अब नहीं बचे हैं

नए लोग , नए दरवेश चले आये हैं यहाँ और अब हम पहले से भी ज्यादा हिंसा के अभ्यस्त हो गए है

अंगुलिमाल आणविक ताकत को गर्दन में लपेटे घूम रहा है

जंगल के भीतर उसने बच्चों के स्कूल तबाह किये हैं।

उनकी औरतों को नक्सल से सरोगेट किया है



मैं प्रसव पीड़ा से बेहाश हूँ बुद्ध

सरोगेट माँ नहीं हूँ मैं

प्रेम ने मुझे विधर्मी किया

मेरा प्रेमी निडर हो मेरा पेट सहला रहा है

हमारे क़त्ल से पहले तुम पैदा हो जाना बुद्ध

मैं तुम्हें भ्रमण से नहीं रोकूंगी पुत्री -बुद्ध

बुद्ध तुम्हारे गुण- सूत्र में एक्स एक्स है

बत्तीस गुणों के साथ तुम पैदा होने वाली हो

देखो कुश से मैं अपनी नाल काटने वाली हूँ

मैं तुम्हें कहीं फेंक कर नहीं आउंगी

डरना मत तुम।






थेरी गाथा: यशोधरा ::                
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मैंने अपना सिर मुंडा लिया है

आश्वासन देती हूँ

कि कामना की हर बूँद को मैंने

कर दिया है निर्वासित

राहुल को अपनी पीठ पर बांधे मैं चल पड़ी हूँ

तुम्हारी तलाश में



सत्य के उस पेड़ के नीचे

जहाँ मार को तुमने किया था पराजित

हर उस राह तक मैं गई जहाँ दुनिया की भीड़ में

तुम घिरे थे

उज्ज्वल था तुम्हारा रूप और कद कुछ और ऊँचा

सारी भविष्यवाणियां सच हो चुकी थीं।



इतनी बड़ी जीत के बाद भी क्या तुम मुझे माया कहोगे ?



इतना भुरभुरा है मेरा कांच, मेरी देह

तो क्यों तुम मेरे ही कांच में कैद करने का मुझे

यत्न करते रहे बार-बार

क्यों इस कांच से डरते रहे

मेरे ही कांच से मुझे डराते रहे



कांच छोड़कर तुम जिस यात्रा पर निकल पड़े हो

वहाँ मेरे भी घुमंतू पैरों के निशान हैं

और मेरी टापू सी आँखें आकाशदीप की तरह जलती

तुम्हारे सच के जहाज़ की प्रतीक्षा में

तुम जा रहे हो दूर

बांधो न नाव इस ठाँव



अहिंसा की पौध गाते हुए निकल रही है

वन के वन उगे, साथ चल पड़े हैं

बुद्धम शरणम गच्छामि



किन्तु यश को धारण करने वाली मैं

इतिहास का रथ मेरी देह से गुज़र गया

लो गुज़र ही गया हंता।

मेरी पीठ से बंधा रहा राहुल

मैं नहीं जानती उसका क्या हुआ ?



दस शील आचरणों वाली मैं

बुद्ध अब भी मैं तृष्णा हूँ

दुःख का कारण हूँ !



तुम्हारा मोक्ष नलिनाक्ष……

समय गुज़र गया

दो विश्वयुद्ध हुए

आतंक भी आया और लौट गया

बाज़ार की चमक-दमक में

अक्सर लौट आते हैं लोग तुम तक

घुंघराले बालों वाली तुम्हारी मूर्तियां

तुम्हारी रूप सज्जा कुछ बदल गई है अब

पत्थर ,कांसे और ताम्बे में कसी

और पीतल में बंधी तुम्हारी देह



अप्पो दीपो भव

मेरे कांच से मेरी ही लौ बाहर निकल चली है

तुम्हारे कुंडल के वलय में अपने सूरज बनाती

फुसफुसा रही है



बुद्ध मेरे बुद्ध ,हिंसा के इस समय में

चलो मेरे साथ मेरे घुमंतू

सुजाता के दर्द का पता पूछ आयें

इस बार तुम्हारे साथ मेरी भी जरुरत है जंगल -जंगल को




कई बुद्ध ::               

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अब कहाँ हैं बुद्ध

बैलगाड़ियों में लदकर जा रहे हैं बुद्ध

गाँव से शहर को



उनकी कांसे की देह के पास एक गज़ लोहे का फावड़ा पड़ा है

फावड़ा है बस ;दूर-दूर तक कोई कुंआ नहीं है।

प्यासे हैं बुद्ध और शहर की नदी सूख गई है



मिट्टी हो गए हैं बुद्ध

कोई हल चलाओ ,बीज गिराओ

चिड़ियों को चीखकर पुकारो कि वेआयें बार-बार

बुद्ध को हरा करें

बुद्ध की देह पर राख नहीं सरसों के फूल मलें



बुद्ध कपास और बिनौले में लेटे हैं

विदर्भ कैसे चले आये लुम्बिनी से ?





लेटे हैं बुद्ध क्यों चुप-चाप काली मिट्टी में

पेड़ की शाखा उनकी गर्दन पर कसी है

पेड़ झुककर ज़मीन हो गया है

ज़मीन चुप पड़ी है

क्यों इतने चुप हैं बुद्ध ?

कुछ बोलते नहीं क्यों ?



बुद्ध क्या अब और जात्रा नहीं करोगे ?



जात्रा जंतरमंतर से नहीं डरती

किसी घड़ी से भी नहीं ....



जात्रा डरती है खुद से

कि वह छूटे हुए गाँव नगर की

पल्ले में बंधी चाबी है

जिसका ताला कहीं छूट गया है



जात्रा में सब छूट ही जाता है बुद्ध।



अब तुम आ ही गए हो विदर्भ

सब छोड़ के

तो लुम्बिनी की चाबियों से हमारे सीने खोलना

क्या हमने सच में आत्महत्या की थी ?



बुद्ध तुम्हारे ओंठ पृथ्वी हैं

और जीभ…

उम्मीद



आधे बुद्ध ::                   

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बुद्ध तुम लेटे तो लेटे ही रह गए

बेचैन ,डबडबायी आँखों से।



मुझे तुम्हारी आँखों की नींद से पूछना है

तुम्हारे गालों पर लुढ़क आये आंसुओं से अर्थ लेना है

बुद्ध मैंने किसी पुरुष को रोते नहीं देखा

अच्छा लगा कि तुम्हारे गाल गीले हैं और आँखें हिरण्यवती

बुद्ध रुंधे कंठ से ही सही ,पर बताओ मुझे सच

क्या तब भी सब वैसा था जैसा आज है ?



तुम फाल्गु के प्रपातों में जिस सच के दाने डाल आये थे

काली -भूरी छोटी मछलियां उसे खाकर बोधिसत्व हो गई थीं



मैं आम्रपाली और सुजाता की बात नहीं कर रही सखा

मैं तो सारे जंगल की बात कर रही हूँ

परिंदों की

साल के पेड़ों की

अर्धनग्न स्त्रियों की

काले-चिकने पुरुषों की





मैं बात कर रही हूँ इटखोरी की भग्न एक सौ चार तुम्हारी प्रतिमाओं की

जो कोयले के दलदल में बार-बार मर रही हैं



तुम किस पर मुकदमा दायर करोगे बुद्ध ?

तुम अल्पसंख्यक हो बुद्ध

संविधान में तुम हो

नक़्शे में भी हो तुम

कुशीनगर में तो तुम हो ही

चौरासी हज़ार स्तूपों में तुम हो

और तुम्हारा महापरिनिर्वाण हो चुका है।



फिर तुम कहाँ नहीं हो ?

तुम्हारी जनगणना करते हुए मैंने पाया

कि आधी नंगी औरतें आधी रह गईं अब

जिन पत्तों से वे पत्तलें बनाती थीं वे पेड़ उन औरतों से भी आधे रह गए

उन पेड़ों से भी आधे बचे परिंदे -कर्लू, पिग्मी हंस के जोड़े

परिंदों से भी आधा रह गया पानी



बुद्ध तुम हर जगह से धकेल दिए गए

लुम्बिनी के राज प्रासादों में क्या इतनी जगह है

कि अल्पसंख्यक बुद्ध सो सके चैन से ?



बंजारे मेरे,यशोधरा और राहुल के पास लौट जाओ



उस सच में दूसरा मोक्ष प्रतीक्षारत आधे बुद्ध।





बुद्ध और दीपघर ::             

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बुद्ध, स्वप्न में भी दीप नहीं जलता अब

कि तुम दिखो प्रकाश में

कि तुम कहो हम दिख रहे हैं तुम्हें

कि तुम दीखते हो हमें

कि तुम्हारी आवाज़ कहे चलो साथ



पर

कहाँ जायेंगे बुद्ध हम और तुम ?

बनारस के घाट की सीढ़ियों पर सत्य की कोई संधि वेला नज़र नहीं आती

झूठ के उलटे पांवों पर चलते हुए हम कौन -से पुरखों का सामना करेंगे बुद्ध ?



मजबूरियां गिद्धों की तरह आयीं

हमारे कन्धों ,जाँघों ,टखनों का मांस ले उड़ीं

प्राण अटके रह गए बुद्ध

तुम्हारी आँख में



बुद्ध क्या सारी धरती को काले ताबीज़ से बांधेंगे हम

क्या अवधूत की तरह धरती को आधा नग्न गाढ़ देंगे हम

क्या पीर की मज़ार हो जायेगी पृथ्वी

क्या हमारे शव लौट आयेंगे इस लोक में

क्या फिर - फिर पुकारेंगे तुम्हें हम

और तुम नहीं आओगे



न हिमाद्रि से

न उतरोगे शिवालिक से तुम



हिमाचल और तिब्बत से तुम्हारे दोनों हाथ ओझल हो जायेंगे

नेपाल में हम तुम्हारे पैरों को ढूंढेंगे

पर तुम न मिलोगे



अपनी छाया को अपनी देह से मिटाते हम

खुद से ही डरने लगेंगे

हमारी स्मृतियों का लोप होगा

कहाँ कुशीनारा ?

कहाँ लुम्बिनी ?

कहाँ बुद्ध ?



हम एक दूसरे के सीनों में मर जायेंगे

कोई दीपघर न होगा







बुद्ध और बारिश ::                           


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नए मकान बन गए हैं बुद्ध

मेरा गाँव दीखता नहीं अब



सूरज की धूप नयी ईंटों में पक रही है

खेतों की शाम धूल से अट गई है

रात सीमेंट और लोहे के बिस्तर पर लेटी है खामोश



एक उदास बीड़ी की गंध फेफड़े से उठती है

मैं मर रहा हूँ

अपनी बीड़ी की आग से मर रहा हूँ



अपने खेतों में भी मरता था

लेकिन ज्यादा मर रहा हूँ अब



मेरे सीने में बीज की गंध

मेरे ओंठ धान से भीगे

मेरी उँगलियों पर हंसिए के निशान

मेरे पैर मिट्टी में धंसे

मेरी गर्दन पर बैलों के घुंघरुओं का स्पर्श

मेरे कंधे पर हल की कोमल लकीरें

मेरे बालों पर गिर रहा है मचान का फूस



एक मौसम आकाश से टूटकर गिरा है

और मैं महकने लगा हूँ अब



बुद्ध ओ बुद्ध अपने ही दीप में जलते हुए बुद्ध

बड़ी आँखों वाले बुद्ध

मुस्कराते हुए बुद्ध

उठते हुए बुद्ध

लेटे हुए बुद्ध



निहारते हुए

न जाने क्या न जाने क्या

मेरी देह की सीढ़ी पर बैठे हुए बुद्ध



बुद्ध मेरे कान रहट

सुन रहे हैं भारी क़दमों की आवाज़

क़दमों के नीचे मेरी आत्मा रेहन पड़ी है

उसे जूते की कील नहीं चुभती अब



और आँखें

क्या कहूँ उनकी !

वे ही तो खेत थीं

पलकें सीवान



बुद्ध पलकें झपकाते हुए पाता हूँ

कि अब कोई और मेरी देह में रह रहा है

जिसे मैं पहचानता नहीं





मेरी भूख को मेरा पेट तगारी में भर कर

सींव पर छान रहा है

और वैराग्य की दुनिया में

मैं तुमसे पहले आया बुद्ध

तुमसे बहुत पहले



बुद्ध जब तुम राजप्रासाद से बाहर आ रहे थे

उन्हीं दिनों मैं भूख से मरा अपने खेत में



मेरा जन्म हुआ फिर

अतृप्तियां पुनर्जन्म का कारण हैं

मैं बहुत से देशों से मर कर आया हूँ





इस बार फिर मरूँगा बुद्ध

तुम्हारी करुणा की गोद में





दुनिया के चूल्हे को अपने पेट में लेकर मर रहा हूँ बुद्ध

मैं सूखी लकड़ी हूँ

मैं ही दूर तक फैली सूखी घास



खूब जलती हुई

बारिश और अँधेरे में।







अपर्णा मनोज : 
कवयित्री , कहानीकार,अनुवादक 
'मेरे क्षण ' कविता संग्रह प्रकाशित
कत्थक, लोकनृत्य में विशेष योग्यता, ब्लागिंग में सक्रिय
संपादन : 'आपका साथ साथ फूलों का '

Friday, November 15, 2013

शेष अवाक है ! -रश्मि प्रभा

रश्मि प्रभा 











शीर्षक से परे

खुद सी लगती है वह खामोश लड़की, 
जो किसी रचनाकार की रेखाओं में होती है  - 
बाह्य बोलता प्रतीत होता है,
अंतर की ख़ामोशी का अनुमान सम्भव नहीं -

अनुमानित श्रृंखला से बहुत दूर रहा मेरा गंतव्य,
बिल्कुल अज्ञात !!!
मैं खुद भी अपरिचित रही उस दिशा से 
जो मेरे आगे क्रमशः 
अचानक खुलते गए 

सामने रहस्य का घुप्प अँधेरा ही नहीं  
चकाचौंध रौशनी के भी स्रोत थे 
जिसमें हर अन्धकार से जूझने की 
लड़ने की 
चाभी रखी थी 
… 
किस ताले की चाभी कौन है 
यह जानने को 
ख़ामोशी को मुखर होना ही पड़ता 
खोज की पदचाप 
वर्तमान की धुन बनती 
अपने को पाने-खोने के क्रम में 
मैंने उस सूक्ष्मता को जाना 
जो क्षण क्षण के रूप में 
मेरे ही भीतर थे !!!
…. 
मेरा एक क्षणिक अस्तित्व रक्तबीज था 
मेरी एक शक्ति दुर्गा 
मेरा एक क्षण विरक्त सिद्धार्थ 
एक समर्पित यशोधरा 
नागयोनी की इच्छाधारी शक्ति 
छल,झूठ,हठ का त्रिकोण 
बेबस भी,समर्थ भी 
कभी ठहरा हुआ पल 
कभी द्रुत गति से भागता समय 
कभी यम 
कभी देव 
संक्षेप में कहूँ 
तो कृष्ण के मुख से निःसृत गीता 
विस्तार में - अनुमानित विचार 
जो रह जाता है अनुत्तरित मंथन 
जन्म से मृत्यु तक  ………………!


ईश्वर का दिया अद्भुत वरदान
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माँ एक करिश्मा है 
ईश्वर का दिया अद्भुत वरदान 
इस वरदान की काया में 
मैं चैतन्य हो गई 
....
माँ सिर्फ पाठशाला नहीं होती 
विद्यार्थी भी होती है 
बच्चे  की जिज्ञासा से भरी किताब से 
वह हर क़दम पर ज्ञान का उजाला पाती है 
....
घर-बाहर- 
प्रतिदिन ....... 
परिवार और समाज से 
पर्याप्त ऑक्सीजन लेकर 
व्याधियुक्त कीटाणुओं से बच्चे का बचाव .... एक डॉक्टर भी नहीं कर पाता !
मैं यानि तुम्हारी माँ -
गुडिया घर से जब बाहर आई 
तो तुम्हें पाया 
और तुमसे मेरी दहलीज़ 
मेरा आँगन 
मेरा बागीचा ...विस्तृत हुआ 
अर्थवान हुआ ....
मैंने मन से लेकर कमरों तक 
दुआओं के लाल धागे बांधे 
नज़र से बचाने के लिए कुछ काले धागे !
हो सकता है मेरे चेहरे में मेरी उपरी बनावट की कमजोरी दिखे 
पर तुमसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता 
कि मेरा मन - हिमालय भी है,त्रिवेणी भी,अमरनाथ की  गुफा भी 
संजीवनी भी,विषकन्या भी ....
सही मायनों में 
ईश्वर का तेजस्वी त्रिनेत्र .....!
.....
मैं सूनामी में घिरकर डूब सकती हूँ 
घबराकर चीख सकती हूँ 
पर तुम पर सूनामी की हल्की बूंद भी पड़े 
तो मैं ज्वालामुखी बन सकती हूँ 
अपनी तपिश से एक एक बूंद सूखा सकती हूँ 
नौ महीने का साथ 
रक्त,धड़कन,भय,ख़ुशी .... का अद्भुत मिश्रण है 
जो कहीं भी हो 
समझता है अपने पौधे को 
अपने वृक्ष को ....
तभी तो - मैं चिड़िया बनकर अपनी चहचहाहट से 
तुम्हें गीत सुनाती हूँ 
दुआओं की लोरी बनकर हर रात सर सहलाती हूँ 
और चैतन्य होती जाती हूँ ....


इंतज़ार कैसा ?
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समझौतों के तपते रेगिस्तान में 
सबके चेहरे झुलसे हैं 
अपनों के न्याय की तलाश में 
साँसें दम्मे सी उखड़ी हैं ...... 
कहीं जाकर क्या मिलेगा भला ?
झूठी हँसी हंसने से 
क्या ज़िन्दगी पुख्ता लगती है 
या हो जाती है  ?

बाह्य प्रसाधन प्रचार में ही फर्क लाते हैं 
सूखे बेबस होठ 
जिन्हें पानी की तलाश हो 
उनकी भाषा रंगकर नहीं बदली जा सकती 
जिन आँखों के आगे 
खून की नदी बही हो 
उनमें काजल डाल देने से 
उजबुजाता भय छुप नहीं जाता !
क्यूँ बेवजह भाषणों से उनके दिल दिमाग को रेत रहे 
थोड़ी ज़मीर बची हो 
तो ...... पानी लाओ 
और उनके हाथ तोड़ डालो 
जो बेशर्मी से खून की होली खेलते हैं 
कभी अपनों को जलाकर 
कभी अपनों को काटकर .... 

अखबारी समाचार तो खटाई हो जाते हैं 
मधुमक्खी सी भीड़ जहाँ देखो 
समझ लो 
कोई पीटा जा रहा है 
या कोई मर गया है ....
भीड़ न बचाती है 
न किसी को खबर देती है 
बस मज़े लूटती है 
और अफवाह फैलाती है !

इन अफवाहों में किसी की बेटी अपनी लगी है 
तड़पते शरीर में कोई अपना दिखा है 
पंखे से लटके प्रतिभाशाली लड़के में 
मृत व्यवस्था की दुर्गन्ध आई है 
.... जिस दिन ऐसी घटनाओं से हमारी तुम्हारी नींद उड़ेगी 
रोटी में अवाक लड़की नज़र आएगी 
हल्की हवा में किसी युवा की सिसकी सुनाई देगी 
उस दिन 
परिवर्तन के लिए कोई मशाल नहीं जलाई जाएगी 
ना ही कोई भीड़ होगी 
बल्कि परिवर्तन की आहट अपने अपने दिलों से निकलेगी 
प्यास  बुझेगी 
आँखों में ज़िन्दगी उतरेगी ....

एक बार 
बस एक बार 
खुद को रखो वहाँ 
दिल से सोचो 
दिमाग से काम लो .... 
खुद को खुद की ताकत दो 
क्योंकि मसीहा हमारे ही भीतर है 
वह जब भी आएगा 
अपने भीतर से ही आएगा 
तो ....... इंतज़ार कैसा !


शेष अवाक है !------------------------------

शब्दों में जब कील लगे हों 
तो चुभते हैं 
हथौड़े हों 
तो चोट लगती है 
घिनौने से एहसास लिपटे हों 
तो एक अजीब सी सनसनाहट होती है 
इस अनचाहे दौर में 
किस पर विश्वास करें 
किस सभ्यता 
और किस संस्कार की बातें करें 
!!!!!!!!!!!!!!!!!
नग्नता यूँ खुलेआम परोसी गई है 
कि घर ही नंगा हो गया 
अब गंगा भी क्या नहाये 
गंगा तो रही ही नहीं 
कीचड़ में कमल लगने के एहसास में 
सब के सब दलदल में धंसते जा रहे हैं ...
.......
बात बेटी और बेटे में फर्क की नहीं 
आँगन और दालान के अस्तित्व की है !
परिधान का असर पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है 
और परिधान ही लुप्त है !!
बेटी को आम भाषा में बेटी की तरह इसलिए रखते थे 
कि किसी की विकृत नज़र उस पर ना पड़े 
पर ........... 
ज़िन्दगी फ़िल्मी पर्दे के जैसी हो गई 
गीत के अश्लील,अस्वाभाविक बोल 
मासूम होठों पर थिरकने लगे 
आगे बढ़ने की होड़ में 
किसी भी गाने पर नन्हें बच्चे ठुमके लगाने लगे 
फिर क्या बालिग़,क्या नाबालिग 
फुलभंगे से विचार कीड़े की तरह रेंगने लगे 
.........
पैसे के आगे 
क्या इतने निरीह,बेशर्म हो गए हम 
कि भविष्य के दरवाज़े पर कालिख पोत दी !
जिम्मेदारियों से परे हमने जीना शुरू किया है 
फिर कौन किसे दोष दे रहा 
और क्यूँ?
क्या बराबरी के लिए हमें बेपर्द होना ज़रूरी था ?
मॉल हो,सड़क हो,रेस्तरां हो  ....
हर जगह हमने बुजुर्गों की उपस्थिति को नकार दिया 
बड़े और छोटे के बीच का फर्क मिटा दिया  
........ आह! यह आग हम सबने मिलकर लगाई है 
और यह इतना फ़ैल चुका है 
कि अब आसान नहीं बुझाना 
....
सर पर हाथ रखकर रोने के सिवा 
हमारे पास कुछ भी नहीं 
सरकार हमारी - हमने चुनी है 
विकृति को देख मान्यता हमने दी है 
कम से कम कपड़ों में अपने बच्चों को भीड़ में गुम कर दिया 
अब ............. किसे ढूंढें ?
किसकी दुहाई किसे दें ?
कहाँ दें ?
सबकुछ तो हमने सूखे पत्ते की तरह जला डाला ....

खुद को आधुनिक,उच्च श्रेणी का दिखाने में 
अब किसी के घर में न बेटा है न बेटी 
एक होड़ है 
और होड़ की तबाही है 
शेष अवाक है !



रश्मि प्रभा 
जन्म तिथि - 13 फरवरी , 1958
जन्म स्थान - सीतामढ़ी
शिक्षा- स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)
भाषाज्ञान-हिंदी,अंग्रेजी
पारिवारिक परिचय
माँ - श्रीमती सरस्वती प्रसाद (कवि पन्त की मानस पुत्री)
पिता - स्वर्गीय रामचंद्र प्रसाद
प्रकाशित कृतियाँ
काव्य-संग्रह: शब्दों का रिश्ता (2010), अनुत्तरित (2011), महाभिनिष्क्रमण से निर्वाण तक (2012), मेरा आत्मचिंतन (2012), एक पल (2012) संपादन:अनमोल संचयन (2010), अनुगूँज (2011), परिक्रमा (2011), एक साँस मेरी (2012), खामोश, खामोशी और हम (2012), वटवृक्ष (साहित्यिक त्रैमासिक एवं दैनिक वेब पत्रिका)-2011 से निरंतर।
ऑडियो-वीडियो संग्रह:कुछ उनके नाम (अमृता प्रीतम-इमरोज के नाम)
सम्मान: परिकल्पना ब्लॉगोत्सव द्वारा वर्ष 2010 की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री का सम्मान।
पत्रिका ‘द संडे इंडियन’ द्वारा तैयार हिंदी की 111 लेखिकाओं की सूची में नाम शामिल।
परिकल्पना ब्लॉगर दशक सम्मान - 2003-2012
शमशेर जन्मशती काव्य-सम्मान - 2011
भोजपुरी फीचर फिल्म साई मोरे बाबा की कहानीकार, गीतकार
ई-मेल rasprabha@gmail.com
संपर्क - 9371022446

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