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Sunday, February 15, 2015

जीवन के सच और उसकी भयावह विचित्रता की कहानी: "अनोखा" - स्वाती ठाकुर

जीवन के सच और उसकी भयावह विचित्रता की कहानी: "अनोखा" - स्वाती ठाकुर 
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'अनोखा' यह शीर्षक हठात ही ध्यान आकर्षित करता है और पाठकीय मन जाने कौन कौन से  बोध तैयार कर लेता है। मेरे भीतर के पाठक पर भी शीर्षक का कुछ ऐसा ही प्रभाव पड़ा। सबसे पहले हिन्दी भाषा में जो लिंगभेद व्याप्त है, उस दृष्टि से भी इस शीर्षक ने ध्यान खींचा। 

अनोखेपन को हम दो रूपों में ले सकते हैं। ज़िंदगी के स्याह सफ़ेद दोनों ही पक्षों में इसे व्यवहृत किया जा सकता है। हालांकि यह सच है कि अनोखेपन को मानव मन सामान्यत: सकारात्मक रूप में ही ग्रहण करने का अभ्यस्त हो चुका है। और इस लिहाज़ से जब हम इस कहानी से गुजरते हैं तो कहानी कई जगहों पर हमें हौंट करती है, कई जगहों पर हमसे सवाल करती है, कई जगहों पर हमें ठहर कर सोचने को विवश करती है। किसी पाठ का मूल्यांकन उस पाठ के भीतर से ही किया जाना चाहिए। इस आधार पर जब हम ‘अनोखा’ कहानी को देखते हैं तो कहानी का भाव पक्ष, उसका विषय हमसे कई प्रश्न करता है और ये प्रश्न अनदेखा कर दिए जाने वाले कतई नहीं हैं. यह अलग बात है कि प्रश्न को प्रस्तुत करने वाली शैली भी प्रश्न के प्रभाव को तय करती है। पर हम पहले उस शैली पर न जाते हुए यदि भाव की बात करें तो कहानी का नायक एक स्त्री है जिसका नाम अनोखा है पर जिसके जीवन में तनिक भी अनोखापन नहीं है, उसके जीवन को क्रूर कहना गलत न होगा... व्यक्ति के नाम से उसके व्यक्तित्व या जीवन के किसी न किसी पहलू की संगति की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से कर ली जाती है, पर इस तरह की अपेक्षा अनोखा के सन्दर्भ में हमें निराश ही अधिक करती है: “करीब पाँच फुट लम्बी, साँवला रंग, छोटी निर्जीव आँखें, भूरे सूखे बाल, ऊपर के चारो दांत कुछ आगे को निकले हुए, उसके पास से आती पसीने की असहनीय गंध और शरीर में लिपटे हुए पुराने कहीं-कहीं से फटे हुए कपड़े” यह है ‘अनोखा’ कहानी के केन्द्रीय चरित्र ‘अनोखा’ का परिचय, जिसमें कहीं कोई विलक्षणता, कोई अनोखापन नहीं है।

किसी भी व्यक्ति की कहानी उसका जीवन सिर्फ उसी तक सीमित नहीं  रहता। अनोखा के जीवन की कहानी में भी कई अन्य पात्र हैं, जो अलग-अलग किरदार निभाते हैं और उसके जीवन को प्रभावित करते हैं। बेटे को विशेष महत्त्व देने वाली उसकी माँ रामरती है, जो दूसरों के घर चौका-बासन और लिपाई-पुताई कर अपना घर चलाती है, जिसने बेटे की आकांक्षा में पांच बेटियाँ जनी हैं। यह स्थिति भी अपने आप में कोई अनोखी स्थिति नहीं है, हमारे समाज में आज भी बेटे की चाह में जाने कितनी अनचाही लड़कियां जन्म लेती हैं और जाने कितनी मार दी जाती हैं। और बेटे की आकांक्षा को समाज के बड़े तबके ने स्वाभाविक रूप में स्वीकार भी कर लिया है। पर कहानी में व्यक्त समाज का यह सच, जो सही नहीं है, जो अपने आप में बेहद क्रूर और भयानक है, बड़े सवाल खड़े करता है: स्त्री में पुरुष को जनने की ऐसी आकांक्षा क्यों? जबकि कहानी में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि पति के रूप में अनोखा की माँ के जीवन में जो पुरुष है, उसने उसके जीवन को और अधिक यंत्रणामय ही बनाया है। हालांकि कहानी स्वयं इस प्रश्न का जवाब इस रूप में देती है कि रामरती को यह उम्मीद है कि बेटे के रूप में पुरुष उसे उन कष्टों/यंत्रणाओं से उबार लेगा, जो उसे पति रूपी पुरुष से मिले हैं। “एक लड़के की चाह में पाँच बेटियाँ जनी थीं उसने, दबाव किसी का नहीं था उसे खुद ही बेटा चाहिए था अपने बुढ़ापे को सँवारने के लिए  पर क्या वास्तव में यह उम्मीद भर ही उस प्रश्न का पूरा जवाब हो सकता है?

कहानी का विषय उस वक़्त अपने महत्वपूर्ण मोड़ (टर्निंग प्वाइंट) पर पहुंचता है जब अनोखा  चौदह वर्ष की हो चुकी है। उसका शरीर स्वाभाविक रूप से विकसित हो रहा है। कभी कभी ऐसा भी लगता है स्त्री के शरीर में होने वाला यह स्वाभाविक विकास ही क्या उसका अनोखापन नहीं है? जहां पुरुष अपने जीवन में किसी भी तरह के अनोखेपन को स्वयं गढ़ता या निर्मित करता है, वहां स्त्री में एक ख़ास तरह का नैसर्गिक अनोखापन होता है, जिसकी उसे इस सभ्य समाज के अति सभ्य पुरुषों द्वारा सजा भी मिलती है। अनोखा को भी इसकी सजा मिली है, जिसे वह समझ नहीं पाई।  अनोखा के विकसित होते शरीर को देख स्त्री को भोगने के आकांक्षी उसके परिवेश के पुरुषों की जीभ लपलापाई हुई है, ये वही पुरुष हैं, जो ऊपर से भद्रता की सफ़ेद चादर ओढ़े हुए हैं, ये वही पुरुष हैं जिन्हें अनोखा चाचा-भैया कहती है, ये उन्हीं घरों के पुरुष हैं, जिनमें अनोखा की माँ काम करती है। 

अनोखा, जो अपने घर में हर स्नेह-सुविधा से वंचित रही, जिसका कारण उसकी गरीबी और माँ रामरती का पक्षपातपूर्ण व्यवहार था, को अपने शरीर के ये बदलाव अच्छे लग रहे थे क्योंकि उसने गौर किया था कि इन्हीं की वजह से अब:“जब भी वो घर में रहती तो चचेरे भाई भी उसे बड़े ध्यान से निहारते और जब भी बाहर जाती 
गाँव के चाचा-ताऊ सब उसे अपने पास बुलाते, उसके हाल पूछते और बिना किसी काम के ही दो – चार रुपए भी पकड़ा देते कि रख लो कुछ अपनी पसंद का ले लेना”इन्हीं चाचाओं में से एक हैं रज्जन काका, जिनकी उम्र है ४६ वर्ष और जिन्होंने अपनी ११ वर्षीय बेटी का अभी हाल ही में विवाह किया है, और अब उनका मन रम गया है अनोखा के शरीर पर और इस आकांक्षा में वे उसे नित नए तोहफे देते हैं और एक दिन कहानी के शब्दों में उसका कौमार्यभंग कर देते हैं, अनोखा समझ नहीं पाती कि: “अच्छा क्या लगा रज्जन का साथ या अपने पैरों में चाँदी की पायल” और यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक अनोखा गर्भवती नहीं हो जाती, फिर अपमान और यंत्रणा का दौर और फिर गर्भपात। रामरती अपनी इस बेटी, जिसकी शुचिता भंग हो चुकी है 
उससे मुक्ति पाने के लिए उसकी शादी तीन बेटियों के बाप से कर देती है जो ‘ब्याह की ही रात बिना किसी वार्तालाप के वसूल लेता है अपने पति होने का अधिकार’ परिणामस्वरूप अनोखा फिर गर्भवती होती है। बेटे के आकांक्षी उसके पति पक्ष द्वारा लिंग जांच कराई जाती है, जिसमें पेट में पल रहे बच्चे के बेटी पाए जाने पर अनोखा का फिर से गर्भपात कराया जाता है, पर यह सिलसिला थमता नहीं है, डॉक्टर के शारीरिक संबंध से मना करने के बावजूद अनोखा फिर गर्भवती होती है, पर इस बार उसके गर्भ में पुरुष पल रहा है, जिसे उसका परिवार जन्म देना चाहता है, बेशक अनोखा के जीवन की कीमत पर ही, क्योंकि “डॉक्टर से बच्चा बचाने के लिए ही कहा गया था माँ तो नई भी आ जाएगी लेकिन लड़का,  इतनी मुश्किल से तो घर का चिराग मिला है इसलिए बच्चा हर हाल में बचना चाहिए” यह कहानी अनोखा की कहानी भर नहीं यह उस मरे हुए समाज की कहानी है, जहां स्त्री, पुरूषों की भूख मिटाने तथा पुरुष जात को पैदा करने के लिए ही है। और स्त्री की भूख, उसके जीवन का कोई मोल नहीं है इस सभ्य समाज के लिए। एक स्थान पर जब अनोखा का शराबी बाप 
हरिप्रसाद अपनी भूख मिटाने के लिए अपनी बीवी रामरती पर टूट पड़ता है, और थक कर सो जाता है तो रामरती सोचती है अपनी भूख के बारे में और खुद ही कहती है: “ उसकी भूख? उसे भूख है ही नहीं. ज़िंदगी ने इतना भर दिया है उसे कि वो भूख को ही भूल चुकी है. कई बार तो उसे खुद के जीवित होने पर भी शक हो उठता है” यह कहानी एक ऐसे सच को हमारे सामने लाती है, जो नया कतई नहीं है, पर स्वाभाविक भी 
नहीं कि आँखें मूँद ली जाए। हमें इस बात को मानना ही पड़ेगा कि आज हमारे समाज में ऐसी बहुत सी चीजें/व्यवहार प्रचलन में हैं जो एक तरह से सच/समय के सच के रूप में व्यवहृत/स्वीकृत होती हैं, पर वे सही किसी भी लिहाज से नहीं है। हमें सच और सही के इस फांक को मिटाने की ज़रूरत है। कला का कोई भी रूप समस्या का समाधान नहीं देता। कुछ सच की कड़वाहट को थोड़ा कम करने के लिए एक सुखद आदर्श प्रस्तुत कर देते हैं। और कुछ उस कड़वाहट को उसके यथार्थ रूप में ही व्यक्त कर देते हैं। इस विद्रूप समय में किसी भी तरह 
के मुलामियत के आवरण की आवश्यकता भी नहीं है। ज़रूरत है सच को सही बनाने की। किसी का जीवन अनोखा हो या न हो, पर हर किसी को एक सामान्य गरिमापूर्ण जीवन तो मिलना ही चाहिए, बिना किसी वर्ग, जाति और लिंग के भेद के। यह कहानी कोई अनोखी बात नहीं करती, अनोखी समस्या नहीं उठाती, इसकी शैली में भी कोई अनोखापन नहीं है, पर यह कहानी समस्या  की क्रूरता से हमें झकझोड़ती है, हममें एक अकुलाहट भरती है और यही इसकी खासियत है, यही 

इसका अनोखापन है।

साभार लमही

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स्वाती ठाकुर
शोधार्थी, हिंदी विभाग 
दिल्ली विश्वविद्यालय

Wednesday, February 11, 2015

"पितृसत्तात्मक रूपों की शिनाख्.त" विशेष संदर्भ- होमवती देवी की कहानी ‘उत्तराधिकारी’ - अल्पना मिश्र

पितृसत्तात्मक रूपों की शिनाख्.त
विशेष संदर्भ- होमवती देवी की कहानी ‘उत्तराधिकारी’
- अल्पना मिश्र


अपनी जड़ों को पहचानने की कोशिश करती, जब मैं आधुनिक युग में गद्य के क्षेत्र में उतर आईं महिला रचनाकारों को पढ़ रही थी, तब तमाम कहानियाॅ मुझे अपनी सर्जनात्मक क्षमता से रोमांचित करतीं और अपनी बेहद जमीनी अनुभवों से बनी देशज दृष्टि से बाॅधतीं, आह्लाद से भरती, विचार करने की प्रेरक बनती दिख रही थीं, कुछ कहानियाॅ स्त्री को देर से मिली शिक्षा के कारण भी दिखा रही थीं तो कुछ कह रही थीं कि आस्थाओं और नियति के प्रश्न से जूझना स्त्री के लिए कितना दारूण है और इससे निकलने के रास्ते कैसे सत्ता व्यवस्था के शिकंजे से आक्रांत बना दिए गए हैं। ऐसे में एक ऐसी कहानी मेरे हाथ लगी, जिसने मुझे चैंका भी दिया और विचार के लिए रोक भी लिया। यह कहानी तो अंधे के हाथ बटेर लगने की तरह थी। यहाॅ जड़ थी, जिसकी शाखाएं अब लहलहाती हुई दीखने लगी थीं। यह कहानी थी होमवती देवी की ‘उत्तराधिकारी’।

‘उत्तराधिकारी’ अपने प्रस्तुतीकरण में भाषा की सांकेतिकता और कलात्मकता लिए हुए थी, जब कि मैं मन ही मन यह मान कर चल रही थी कि बीसवीं शताब्दी के पुर्वार्द्ध में महिला लेखकों के लेखन में कलात्मक बारीकियों की बहुत उम्मीद करना उनके साथ अन्याय ही होगा, क्योंकि शिक्षा बहुत देर में स्त्रियों तक पॅहुची थी। उसमें भी जन साधारण की कोटि में आने वाली स्त्रियों की पॅहुच में यह और भी देर में आई। चेतना के स्तर पर असर दिखाने का काम इस शिक्षा ने और भी देर में शुरू किया। सन् 1877 में पहली बार लड़कियों को मैट्रिक  की परीक्षा देने की अनुमति मिली थी। भारतेंदु युग में भी स्त्री शिक्षा की मुख्य चिंता में स्त्री धर्म पालन करवाना ही था। स्वयं भारतेंदु के प्रसिद्ध बलिया भाषण में या ‘बाला बोधिनी’ के संपादकीय में यह चिंता व्यक्त होती रहती थी। भारतेंदु मंडल भी इससे भिन्न राय नहीं रखता था। प्रताप नारायण मिश्र, पर्दे के पीछे रहते हुए स्त्रियों को कुछ शिक्षा मिल जाए, इसी के पक्षधर थे। ऐसे में स्त्री चेतना की बात शिक्षा पर अधिक आधारित न होकर अनुभव पर ही आधारित हो सकती थी। शिक्षा प्राप्त महिलाओं ने जो स्त्री प्रश्न उठाए, उसमें भी जीवन अनुभव ही केन्द्र बना। इस जीवन अनुभव ने, सुधार आन्दोलनों से उठ रही बहस में जीवन यथार्थ पर बात करने की उन्हें समझ दी। द्विवेदीयुगीन स्त्री केन्द्रित पत्र पत्रिकाओं में इस बहस का स्वरूप देखा जा सकता है, जो पश्चिमी टाइप शिक्षा से अपने लिए माध्यम तो चुनती है पर स्त्री समस्या को ठेठ भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखने का साहस रखती है। इन्हीं वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ होमवती देवी की कहानी ‘उत्तराधिकारी’ को देखना उचित होगा। इसी पृष्ठभूमि से उभर कर आई अनेक महिला रचनाकारों को पढ़ना सुखद अनुभूति से भरता है। हॅलाकि इन महिला कथाकारों को लेखक का ठीक ठाक दर्जा भी उस समय नहीं दिया गया और बाद में भी इन कहानियों को अनावश्यक समझ कर इन पर बात नहीं की गई। जबकि कुछ कहानियाॅ अपने कथ्य, शिल्प और ट्रीटमेंट की दृष्टि से अलग और तत्कालीन समय के हिसाब से नई स्त्री दृष्टि ले कर आ रही थीं। ऐसी ही अपने समय से आगे बढ़ी हुई नई स्त्री दृष्टि सम्पन्न कहानी है ‘उत्तराधिकारी’।

यह कहानी पिछले किसी भी दायरे को तोड़ती हुई स्त्री समस्या के हल की तरफ ले जाने वाली एक नई बहस उठाती है और पिछली किसी भी भावुकता से मुक्त होती हुई स्त्री के मानसिक अनुकूलन की जड़ता और पितृसत्ता की आचार संहिता, दोनों को एक साथ चुनौती देती है। इसका कथ्य अपने समय से बहुत आगे का है और इसके कथ्य की सांकेतिकता में छिपी हुई लेकिन बेधड़क बोल्डनेस है।

होमवती देवी का जन्म 20 नवम्बर सन् 1902 में हुआ था। सन् 1936 में ‘उद्गार’ नाम से उनका पहला कविता संग्रह भी आया था। उनका पहला कहानी संग्रह ‘निसर्ग’ सन् 1939 में आ गया था। बहुत बाद में उनकी एक कहानी ‘ गोटे की टोपी’ पर किशोर साहू ने ‘सिंदूर’ नाम से एक फिल्म बनाई थी। हॅलाकि ‘गोटे की टोपी’ में भावुकता अधिक थी और फिल्म बनाए जाने की दृष्टि से उसका उपयोग समझ में आ सकता है फिर भी यह स्त्री जीवन के संदर्भ में मानव मन को संवेदनशील बनाने की उत्प्रेरक भूमिका निभाने वाली कहानी है और उनकी नई दृष्टि से जीवन को समझने तथा उसका हल ढूंढने की कोशिशों को यहाॅ भी बखूबी लक्ष्य किया जा सकता है। चूॅकि लेखिका का देहान्त सन् 1951 में हुआ था, इस हिसाब से उनका रचनाकाल प्रेमचंद और उनके कुछ बाद का ठहरता है। यह वह दौर था जब कहानी के क्षेत्र में अनेक दिग्गज मौजूद थे। हिंदी कहानी ने अपना स्वरूप और अपनी उॅचाई पा ली थी। लेकिन यही वह समय था जब स्त्री का कहानीकार के रूप में प्रतिष्ठित हो जाना लगभग असंभव भी था। सुभद्रा कुमारी चैहान की बेहतरीन कहानियों का जिक्र मुख्य कथा धारा में नहीं किया गया। कविताओं में कुछ स्वीकृति जरूर मिल रही थी। ऐसे समय में समाज की एक बड़ी समस्या अनमेल विवाह को ले कर नई दृष्टि के साथ बात करना निश्चित ही बड़ा दुस्साहसिक कदम था। जब कि इसी विषय को लेकर एक बेहद यथार्थवादी और मार्मिक उपन्यास ‘निर्मला’ प्रेमचंद लिख चुके थे।

‘उत्तराधिकारी’ में उठाई गई समस्या आज भी हमारे समाज में पूर्ववत मौजूद है। बस, कहीं कहीं उसकी पकड़ जरा सी ढीली पड़ी है, खास कर उन जगहों पर, जहाॅ स्त्रियों को कुछ अधिकार प्राप्त हुए हैं या उनमें अपनी स्थिति परिस्थिति को लेकर सजगता आई है। पुत्र मोह, वंश को आगे बढ़ाने की चाह, एक स्त्री की मृत्यु होते ही दूसरे विवाह की लालसा, गरीबी के कारण कम उम्र की लड़कियों का अधिक उम्र के पुरूषों से विवाह, वैध संबंधों की आड़ में अवैध संबंधों की स्थितियाॅ आदि इस कहानी के केंद्र में हैं।

लालाजी की तीसरी पत्नी का देहांत हो गया है और तेरहवीं के कर्मकांड के दिन ही लालाजी के लिए रिश्ते की बात लेकर बनिया आ पॅहुचा है। यही है हमारा समाज! यही सभ्यता है! जहाॅ स्त्री की मृत्यु शोक का विषय है तो सिर्फ इसलिए कि ‘‘ न कोई घर देखने वाला, न तीज त्यौहार मनाने वाला।’’ इससे बड़ी भूमिका उसकी नहीं है! लालाजी की कई बेटियाॅ हैं, पुत्र रत्न नहीं है। सामाजिक मान्यता यही है कि ‘‘लड़कियों से कब किसी का वंश चला है? और फिर यह अतुल धनराशि - इसका उत्तराधिकारी तो होना ही चाहिए।’’ इस अतुल धनराशि पर सबकी निगाह है। इसलिए भी लालाजी की पुत्रविहीन स्थिति सबके अर्थात् उनके रिश्तेदारों की चिंता के केन्द्र में है और अब वे लोग उन्हें बच्चा गोद ले लेने की सलाह भी देने लगे हैं। परंतु लालाजी को यह नहीं भा रहा है। दूसरे के पुत्र को अपने औरस पुत्र की जगह दे देने की उदारचेतना हमारे साजाजिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन सकी है। आज भी यह सोच पाना आसान नहीं है। फिर लालाजी तो पिछली पीढ़ी के हैं। उनके लिए यह बात पचा पाना और भी मुश्किल है। और चूॅकि कन्या औरस संतान होते हुए भी सम्पत्ति की हकदार नहीं मानी गयी थी, इसलिए उसका होना न होना कोई महत्व नहीं रखता था। यह उसकी मायके में भूमिका और उपयोगिता दोनों को मद्देनजर रख कर पितृसत्ता द्वारा निर्धारित किया गया होगा। लड़की को धन सम्पत्ति का मालिक बनाने का मतलब था किसी दूसरे पुरूष के हाथ में अपनी सम्पत्ति की बागडोर थमा देना और यह पितृसत्तात्मक परिवार व्यवस्था के कतई अनुकूल नहीं हो सकता था। दूसरे, लड़की पिता का वंश नहीं चला सकती, यह स्पष्ट था, फिर उसे धन सम्पत्ति का हकदार बना कर क्या मिलेगा? इस समूची विडम्बना पर भी व्यंग्यार्थ यहाॅ देखा जा सकता है। इसलिए लालाजी इस तरह की कोई मजबूरी बन सकने के पहले सारे विकल्प आजमा लेना चाहते हैं। इस विकल्प में सबसे आसान विकल्प दूसरा, तीसरा, चैथा या पाँचवाँ... विवाह ही है। इसलिए वे धीमें स्वर में लेकिन स्पष्ट मंतव्य के साथ अपनी माँ  के पास आ कर कहते हैं कि ‘‘ इस समय तो सामने एक नई उलझन खड़ी हो गई माँ ! सब अपनी अपनी कहते हैं। मैं सोचता हूँ कि किसी को गोद ले कर रखने से क्या फायदा? अगर वंश चलना होगा तो तभी ....... जब इस घर की देहली पर होगा। ’’

लालाजी तीसरी पत्नी की तेरहवीं के दिन ही उस बीस वर्षीया गरीब लड़की से शादी के सपने देखने लगते हैं जब कि उनकी लड़कियों की बेटियों की शादी की उम्र हो रही है। उनकी नातिन सरोज का विवाह शीघ्र होने वाला है। पत्नी की मृत्यु का एक महीना बीता कि उधर उनकी नवविवाहिता का गृहप्रवेश हुआ। यहां लेखिका की भाषा का व्यंग्य बहुत पैना हो गया है - ‘‘ हॅसना और रोना - शादी तथा गमी- सब एक ही स्थान पर और एक ही व्यक्ति द्वारा संपादित होने में कोई आश्चर्य नहीं।’’ फिर लेखिका कुछ दार्शनिक हो उठती हैं कि ‘‘ यही संसार का क्रम है और यही शायद व्यक्ति का धर्म। इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं किया जा सकता।’’ लेकिन यह दार्शनिक भाव शीघ्र गायब हो जाता है। बल्कि कुछ और गहराई से देखने पर लगता यह है कि यह दार्शनिक भाव भी मीज दर्शन नहीं है और न ही लेखिका सृष्टि का नियम विधान समझाने बैठी हैं।  यहां  तो लक्ष्य स्त्री के मूल्यहीन जीवन को दिखाना है। किस तरह हमारा समाज उसके जीवन का मूल्य एक परिचारिका के रूप में आंकता है और उसकी मृत्यु के शोक में समय गॅवाने को निरर्थक समझता है। यह स्त्री प्रश्न सन् 1915 में लिखी गई आत्मकथा ‘सरलाः एक विधवा की आत्म जीवनी’ में लेखिका दुःखिनीबाला ने भी उठाया था। वहाॅ भी यह प्रश्नांकित हुआ था कि एक छोटी सी प्यारी लड़की के बधू बन कर घर आने और सबकी संवेदना के साथ उसके जुड़ जाने के बाद उसकी मृत्यु के समाचार को पाकर इकट्ठी हुई शोक सभा में दूसरे विवाह का प्रस्ताव शुरू हो जाता है। उससे भी पहले प. रमाबाई ने स्त्री जीवन को समाज द्वारा निकृष्ट बताये जाने के विरूद्ध तर्कपूर्ण ढंग से प्रतिवाद किया था। यहां भी लेखिका अपने उद्देश्य से पल भर को भी विचलित नहीं होती हैं। उनकी भाषा फिर यथार्थ के तेवर से भर जाती है।

होमवती जी, नवविवाहिता बधू और उसकी परिस्थितियों का चित्रण बिना किसी भावुकता में पड़े करती हैं। यह तटस्थ दृष्टि उन्हें यथार्थ को साफ देखने और उसकी सतहों को उघाड़ने का साहस देती है। यह बधू घर की स्थितियों से अनजान, भोली भाली मूर्खा नहीं है, वह तो इन परिस्थितियों से जूझने निकली है। नतीजा कि सास के पाॅव छूते ही वह अनुमान कर लेती है कि यह शायद अधिक दिन जीवित न रहे। धन दौलत की भी समझ है उसे ओर वह बहुत सावधानी से सारी परिस्थितियाॅ संभाल भी लेती है। बिना किसी नारेबाजी, बिना किसी शोर शराबे के, खालिस देशी पृष्ठभूमि से निकल कर ठोस कदम उठाती हुई एक मजबूत स्त्री की तरह वह पाठक के सामने आती है। लालाजी का भतीजा मोहन, जो उसका हमउम्र है, पढ़ा लिखा भी है, लालाजी का विश्वासपात्र भी है, उससे नवविवाहिता की सहज स्वाभाविक मित्रता, अपना नया रूप रंग ढूंढ लेती है।

यहाॅ लेखिका मनुष्य की सहज इच्छाओं और आकर्षण की बात कर के अपने समय से आगे खड़ी हो जाती हैं। वह गाॅव की एक अनपढ़ लड़की को चित और पट दोनों साधते दिखाने का साहस रखती हैं। इस साहस के साथ जो एक बड़ी बात कहानी के अंत में खुलती है, वह है स्त्री को स्त्री का सहयोग। यहां अंत में पता चलता है कि नवविवाहिता बहू के निर्णयों के पीछे एक सहमति सास की भी बनी हुई है और इस चित और पट को संभालने में वह स्त्री इसलिए भी अधिक सक्षम बन कर खड़ी हो पाई है। कहानी के अंतिम परिदृश्य में नवविवाहिता बहू पुत्रवती होती है। घर खुशियों से भर गया है। पूरे समय बहू के इर्द गिर्द जो व्यक्ति बना हुआ है, वह मोहन है। लेकिन मोहन और बहू के संबंध को ले कर लेखिका कहीं भी लाउड नहीं होती हंै। बेहद धीमा और सांकेतिक स्वर भी पाठक को ठीक ठीक पहचान में आ जाता है। अंतिम वाक्य लेखिका के इस कला कौशल का उदाहरण है। शिशु को उठाते हुए दादी कह पड़ती हैं- ‘‘ यह तो ठीक मोहन जैसा ही होगा, वैसी ही नाक, आॅख और वैसा ही उॅचा माथा......, जैसे दूसरा मोहन ही हो। ’’ पास ही खड़े मोहन ने एक बार शिशु की ओर और दूसरी बार उसकी माँ  की ओर देखा, पर वह जैसे लाज से धरती में गड़ी जा रही थी।’’
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एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली- 7

 

Sunday, June 29, 2014

जूठन की कथावस्तु तथा कल और आज का समाज- विपिन कुमार पाण्डेय

 “जूठन”- एक दलित की आत्म व्यथा-कथा और सामजिक सारोकार
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    बचपन से ही यह सुनता आ रहा हूँ की साहित्य समाज का दर्पण है,यानी किसी समय के साहित्य द्वारा किसी काल विशेष के समाज को जाना, समझा जा सकता है. इसी क्रम में मैंने दिसम्बर महीने में एक पुस्तक पढ़ी जूठन जिसके लेखक ओंम प्रसाद वाल्मीकि जी है. अपने स्नातक काल में ही मैंने इस पुस्तक के बारे में काफी कुछ सुना था,कि यह दलित साहित्य की प्रथम आत्मकथा है जिसमे की दलितों के जीवन का असल चित्रण किया गया है. यह इस पुस्तक की विशेषता ही है की जब मैंने इस पुस्तक को पढना शुरू किया तो पुस्तक खत्म होने तक पढना न रोक सका. पुस्तक पठन के दौरान कभी हँसा, कभी रोया, कभी विचार किया, कभी उस समय के बारे में सोचा और फिर आज के समय से तुलना करनी चाही, और जब तुलना की तो पता चला की भले ही पुस्तक का घटना क्रम पुराना है, पर उसमे लिखी कुछ बाते आज के सन्दर्भ में भी सही है.
जूठन जिस मनोस्थिति में लिखा गया है, अथवा जिस तरह की विषयवस्तु इसकी है इसकी प्रासंगिकता कल कितनी थी और आज कितनी है इन सब बातो पर गौर करने से पहले हमें इसके लेखक वाल्मीकि जी के जीवन चरित पर नजर डालनी होगी.

लेखक का जीवन परिचय- आजादी के महज 3 वर्षो बाद जून की तपती दोपहरी में 30 तारीख को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में इनका जन्म हुआ था. वैसे ये भी जन्मे तो हर साधारण बालक की तरह ही थे, पर समाज के अन्त्यज वर्ग में पैदा होने के कारण शायद इनको वे सुख सुविधाए नहीं मिली जो और किसी बालक को मिलनी चाहिए थी.

आज भी जिस शब्द को  उच्च वर्ण के लोग गाली की तरह उपयोग करते है (भंगी या चूहड़ा) ऐसे वर्ण या जाति में इनका जन्म हुआ था. इस वर्ण में पैदा होना ही उस समय भारत देश में सबसे बड़ी गलती मानी जाती थी.

भले ही अम्बेडकर के सुधारवादी नारे, और गाँधी के हरिजन सुधार के नारे फिजा से पूरी तरह गायब नहीं हुए थे पर फिर भी इन नारों और आंदोलनों का मखौल पुरे देश में उड़ाया जा रहा था. दलित परिवार के लोगो को आदमी नहीं समझा जाता था. वाल्मीकि जी ने हिंदी साहित्य से परास्नातक की उपाधि ली और साहित्य सेवा में लग गए. पुरे जीवन भर दलित साहित्य की रचना के द्वारा दलितों का उद्धार करने का प्रयास किया, अनेको नाटक, उपन्यास,कहानियाँ आदि इनकी जिजीविषा की कहानी कहते नजर आते है. अभी विगत वर्ष में नवम्बर महीने में इनका देहावसान हो गया.

जूठन की कथावस्तु तथा कल और आज का समाज- पहले पहल तो पुस्तक का शीर्षक ही काफी चौकाने और सोचने वाला है. काफी लोगो ने विचार किया की आखिर जूठन कैसा नाम है. पर इस नाम को रखने के पीछे लेखक का जो दर्द छिपा हुआ है उसे उन्होंने बताते हुए अपने बचपन के दिनों को याद किया है.बचपन के दिनों को बताते हुए वे कहते है की कैसे उनकी माता और पिता दोनों हाड़तोड़ मेहनत करते थे पर उसके बाद भी दोनों समय निवाला मिलना दुष्कर कार्य था, उनकी माता कई तथाकथित ऊँचे घरो में झाड़ू पोछे का काम करती थी और बदले में मिलता था उन्हें रुखी सुखी रोटियाँ जो जानवरों के भी खाने लायक नहीं होती थी, उसी को खाकर गुजारा करना पड़ता था. ऐसे समय में जब किसी सवर्ण के घर बारात आती थी या उत्सव का कोई अवसर आता था तो उस क्षेत्र के सारे दलित खुश हो जाते थे, क्यूँकी भोजन के बाद फेके जाने वाले पत्तलों को उठाकर वे घर ले जाते और उनके जूठन को एकत्र करके कई दिनों तक खाने के काम में लाते, इस घृणित कार्य के बाद भी पेट की भूख शांत होने पर उन्हें थोड़े समय के लिए ख़ुशी ही मिलती थी.

उपरोक्त विवरण को जब मै पढ़ रहा था तो मुझे अपने जीवन के कुछ प्रसंग अनायस याद आ गए, जैसे मेरी दादी कहा करती थी की उनके बचपन में गाँव के चमार(शायद गाँधी जी द्वारा निर्मित हरिजन शब्द से उनका पाला न पड़ा था) जब खेती कट जाती थी और बैलो के द्वारा अनाज को भूसे से अलग किया जाता था, ऐसे में बैल जो गोबर करते थे उन्हें अपने घर ले जाते थे उसमे से खड़े अनाज निकालकर और धोकर उसे खाते थे.मुझे ये बाते बड़ी खराब लगती थी और उस समय  कुछ समझ में भी नहीं आता था साथ में यह बाते अमानवीय लगती थी.

  या जब मेरे किसी रिश्तेदारी में कोई उत्सव होता था तो उत्सव के उपरान्त आस-पास के सारे दलित एकत्र होकर बचा खाना लेने आते थे, उनके चेहरे पर जो ख़ुशी या ऐसी ही कोई भावना जब उभरती थी तो मेरी समझ में नहीं आता था की ये क्या है.

  ऐसे ही वाल्मीकि जी जब अपने स्कूल की बात बताते है की कैसे सवर्ण अध्यापक उन्हें बात ही बात में मारते थे, या कहते थे की भंगी या चमारो के लड़के पढ़ नहीं सकते क्यूँकी इनका जन्म पढने के लिए नहीं हुआ है,मुझे पढ़ के बड़ा आश्चर्य हुआ की या बात 1960 के दशक की है पर इसके लक्षण आज भी हर जगह दिख जाते है. जैसे की कुछ बाते जो मैंने देखी है याद आ रहीं हैं, मेरे मामा जी एक जूनियर हाई स्कूल में अध्यापक है, स्कूल ऐसी जगह है जहाँ पर दलितों के बच्चे ज्यादा पढने आते है, ऐसे में मेरे मामा जी बच्चो को पढ़ाते ही नहीं है, आज से करीबन 3 साल पहले जब मैंने उनसे पूछा था की आप पढ़ते क्यूँ नहीं हो तो उन्होंने दलितों को गाली देते हुए कहा था की ये पढ़ लेंगे तो हम लोगो के खेतो का काम कौन करेगा.ऐसा ही एक और वाकया अपने स्नातक के दिनों का याद आ रहा है, हम लोग विश्विद्यालय द्वारा आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में सहभागिता कर रहे थे मेरे साथ मेरे मित्रो में शुमार मेरे एक दलित मित्र जो आजकल शोध कर रहे है भी प्रतियोगिता में थे, उन्होंने मुझसे अच्छा बोला था और मुझे लगता था की प्रथम स्थान उन्ही का होगा और मेरा दूसरा होगा,पर जब परिणाम आया तो मै पहले स्थान पर था और वह दुसरे स्थान पर, इस बात का उन्हें काफी दिनों तक दुःख रहा, या आज जब मै राजस्थान के बाड़मेर जिले के किसी भी स्कूल में जाता हूँ तो अक्सर अध्यापक यह कहते नजर आते हैकि ये भीलो के बच्चे, मेघवालों के बच्चे पढ़ नहीं सकते. अब मेरे दिमाग में यह प्रश्न आ रहा है की क्या हमने सच में विकास कर लिया  है, हमारा संविधान भी कहता है की हम सब बराबर है और जातिगत आधार पर किसी को कमतर नहीं समझा जा सकता है. आज हम कथित रूप से 21वि सदी में आ गए है, पुरे विश्व में महाशक्ति के रूप में हमे मान्यता मिल रही है, मानवाधिकारों का झंडा बुलंद करने में हम सबसे आगे रहते है, गांधी , अम्बेडकर की विचारधाराओं का प्रचार कर रहे है, वही यह सब भी देखने को मिल रहा हैं.आज भी केवल ब्राह्मण खानदान में पैदा होने के कारण मुझसे उम्र में कई गुना बड़े लोग मुझे प्रणाम करते है, आदर देते है ऐसा क्यूँ होता है मुझे समझ में नहीं आता.

ऐसे ही एक जगह लेखक ने अपने प्रेम संबंधो का जिक्र करते हुए लिखा है की कैसे उनके दलित होने के चलते उन्हें अपने प्रेम की तिलांजलि देनी पड़ी क्यूँकी उन्होंने एक सवर्ण लड़की से प्रेम किया था. और कैसे एक सुसंस्कृत परिवार में उनको तब लज्जित होना पड़ा जब उस परिवार वालो को ये पता चला की ये दलित है, यद्दपि की इसके पहले उनके मध्य काफी घनिष्ठ सम्बन्ध थे.

एक और बात जो उन्होंने लिखी है और जो आज के संदर्भ में भी कही न कही गौरतलब है वह यह की कैसे अगर कुछ दलित आगे मुख्यधारा में शामिल भी हो जाते है तो कैसे समाज उनका बहिष्कार करता है.अपने एक मित्र की बात बताते हुए कहते है की कैसे उसके अधिकारी होने पर भी उसे अपने सहयोगियों से अपमान मिलता था. ऐसी कई बाते आज भी देखने को मिल जाती है, जैसे की मेरे मुहल्ले में एक सरकारी विद्यालय है जिसके प्रधानाध्यापक एक दलित हैं और चपरासी एक सवर्ण है, पर प्रधानाध्यापक साहब की मजाल नहीं की वे चपरासी से कहकर कुछ काम करवा सके, या ऐसे ही हमारी सहयोगी गीतिका भंडारी ने बताया की कैसे उनके मुहल्ले में एक दलित के घर कोई नहीं जाता जबकि दोनों पति-पत्नी भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में कार्यरत है. मैंने एक नियम पढ़ा था की जिसकी सत्ता होती है उसका वर्चस्व होता है, पर यहाँ तो इसका  उल्टा दिखायी देता है, सत्ता और शक्ति के होते हुए भी क्या कारण है ही ऐसे लोगो को समाज वह सम्मान नहीं देता जिसके वे हकदार है इस बात पर आज विचार करने की आवश्यकता है.

ऐसे ही उनके जीवन में कई परेशानियाँ और चुनौतियाँ आई जिसमे से कई तो उनके अपनों ने खुद खड़ी की जैसे की नाम बदल लेने की कवायद या फिर सरनेम हटा लेने की बात.उनके कई परिचितों और रिश्तेदारों ने अपने उपनाम हटा लिए थे और वाल्मीकि जी को भी यही सलाह देते थे, खुद उनकी पत्नी भी उनसे कई बार कह चुकी थी, वाल्मीकि जी का यह मानना था की जिस चीज़ से उनकी पहचान जुडी है उसे भला कैसे बदल ले, और इसी कारण वे ताउम्र अपने नाम को अपने साथ लिए चलते रहे भले ही उसके चलते उन्हें लाखो परेशानियाँ आई हो.

अब आज के ज़माने में एक नया चलन चला है की कई लोग अपने नाम के आगे अपना सर नेम नहीं लगाते, मुझे लगता है इस बात के पीछे कहीं न कहीं अपनी पहचान छुपाने की बात होती है, जिससे की उन्हें समाज में मिलने वाले अपमान से निजात मिल सके, हो सकता है इसके पीछे और भी कई कारण हो पर शायद सबसे प्रमुख कारणों में से एक यह भी जरुर है.

ऐसी ही और भी बाते है जो लेखक ने की है और विचार शक्ति को उद्वेलित किया है. आज जूठन पढने के बाद और आज के समाज से तुलना करने बाद यह बात एकदम दिख रही है की हम चाहे लाख नारेबाजी कर ले, झूठा स्वांग कर ले, मानव की समानता की बात कर ले पर हम अभी सदियों पहले की सोच को ही अपने अंतर्मन में जिन्दा रखे हुए है, तभी तो आज राजस्थान के किसी विद्यालय का प्राचार्य सिर्फ इसलिए हम लोगो के साथ बैठ के नहीं खाता की उस खाने को किसी तथाकथित छोटी जाति के बच्चे द्वारा परोसा गया है, या फिर मकान किराये पर देने से पहले उसकी जाती पूछी जाति है, या उत्तर प्रदेश में एक दलित नेत्री के शासन काल में उसी को गाली दी जाती है महज इसलिए की वो दलित है और फिकरा कसा जाता है की नीच और निम्बू की जितना दबाया जाये उतना रस निकलता है.

आज हमें यह विचार करने की महती आवश्यकता है की हम कहाँ जा रहे, और हमें कैसा समाज चाहिए या फिर इसे कैसे बदला जाए अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर कोई लेखक जूठन जैसी पुस्तक   लिखने को मजबूर होगा, फिर किसी को अपमानित होकर अपना नाम बदलना पड़ेगा और हम जैसे लोग बैठे-बैठे ऐसे ही किताब को पढ़कर उनपर विचार करते रहेंगे.



















नाम - विपिन कुमार पाण्डेय 
जन्म स्थान- गोरखपुर , उत्तर प्रदेश 
 वर्तमान में राजस्थान के बाड़मेर जिले में , अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में कार्यरत  (शिक्षक प्रशिक्षण का कार्य)
कविता लेखन , और पुस्तक पठन में रूचि.

मो.-9799498911

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Saturday, November 30, 2013

"तेरे नाम के पीले फूल"- नीलम मेंदीरत्ता के काव्य संग्रह की वंदना गुप्ता द्वारा समीक्षा



रुदाली
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इस आलीशान महल के भीतर
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इस काल कोठरी में जाने की इज़ाज़त,
तो मै कभी खुद को भी नहीं देती,
तो तुम्हें कैसे दे दूँ ??
बस साँझ ढले कोठरी की दहलीज़ पर,
यादों का दिया जला देती हूँ,
रात भर कोठरी की एक एक ईट,
का मौन टूटता है,
और दबे स्वर में मिलकर,
सब रुदाली गाती है,
मै कोठरी के बाहर बैठ,
दिए की लौ को एक टक देखा करती हूँ,
इस से पहले कि दिया बुझे,
थोडा घी और डाल आती हूँ,
बस रात इसी तरह गुज़र जाती है,
दिन का क्या है,
वो तो मुझे अपने पीछे लिए-लिए घूमता है,
तुम दिन में आना,
हाँ बाबा !! मै हँसती हुई ही मिलूंगी .........


प्यास
   
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सुनो
! बहुत प्यासे हो ना तुम !
और तुम्हें प्रेम की तलाश भी है,
मै बताती हूँ तुम्हें ,
दूर बहुत दूर,
रेगिस्तान में एक कुँआ है,
अमृत मिलता है वहाँ,
चल कर जाना होगा,
छोटे छोटे क़दमों से,
ऊँट नहीं जाता वहाँ ,
प्यास जाती है,
लम्बा सफ़र है,
और हो सकता है,
कि तुम वहाँ पहुँच जाओ,
और तुम्हें कुँआ ना मिले,
या फिर कुँआ मिले,
पर सूखा हुआ मिले,
फिर?
फिर क्या? तुम्ही सोचों,
कि चल कर जाओगे,
या मन की उड़ान भरोगे ...


" तेरे नाम के पीले फूल " मोहब्बत से सराबोर इश्क की दास्ताँ है जहाँ सिर्फ और सिर्फ प्रेम ही प्रेम समाहित है। ढूंढने निकलो तो खुद को ही भूल जाओ , प्रेम की तासीर में बह जाओ और अपना पता ही भूल जाओ। और क्या चाहिए भला एक पाठक को , अपने दिल की आवाज़ जब कहीं उसे सुनाई देती है तब कहाँ भान रहता है दीन और दुनिया का। एक प्रेम के नगर में प्रवेश करने के बाद बस प्रेम रस में प्रेमी बन बह जाता है। बस यही तो आकर्षण है जो "तेरे नाम के पीले फूल "काव्य संग्रह में नीलम मेदीरत्ता ने संजोया है ।सभी कवितायेँ अपनी ओर आकर्षित करती हैं इस तरह कि बरबस दिल की खूंटियों पर टंगे अरमान मचलने लगते हैं , कुछ अपनी सी कहानी कहती लगती हैं कवितायेँ तो अनायास एक तारतम्य सा बन जाता है और यही किसी लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है जब उसके पाठक को उसकी रचनाओं में अपना अक्स, अपने पीड़ा , अपनी ज़िन्दगी नज़र आती है .


"प्रेम पिंजरा " प्रेम का पिंजरा होता ही ऐसा है जिसमे एक बार कैद हो जाओ तो उम्र निकल सकता और फिर उसमे जब स्त्री प्रेम करती है तो पूरी शिद्दत से करती है ये पुरुष जनता है तभी तो जब वो खुद को आज़ाद करने को कहती है तो वो कह उठता है ----
मूर्ख !! अगर तुझे आज़ाद ही करना था /तो मैं प्रेम क्यों सिखाता / खोल देता हूँ पींजरा।/ अगर उड़ सकती है तो उड़ जा। .............
इसके बाद कहने को क्या बचा भला ?

"प्रेम का प्याला "जिसने प्रेम का प्याला पिया या जिसने ये गर्ल पिया उसे भला पीने को क्या बाकि रहा और प्रेम दीवाने तो सबको अपना सा बनने की  ही इच्छा रखते हैं फिर चाहे किसी विश्वामित्र  की तपस्या भंग हो या मीरा बन प्रेम का प्याला पिया हो।


नीलम की कवितायेँ प्रेम का ताजमहल बनाती हैं जहाँ उनकी कविता अधूरी है गर मुकम्मल न हो पाये ज़िन्दगी की आरज़ू कुछ ऐसा ही भाव संजोया है "अधूरी कविता "मे तो "खुद से प्यार " कविता में खुद को चाहने के भाव इतनी सहजता से उतरे हैं कि किसी को भी खुद से प्यार हो जाये।


अब जहाँ प्रेम होगा तो वहाँ दर्द भला कैसे पीछे रहेगा वो तो उसका जन्म जन्म का संगी साथी है। कैसे हिल मिल आँख मिचौली खेल करते हैं दोनों क्या किसी से छुपा है तभी तो "रुदाली" में स्त्री के जीवन की पीड़ा रात के चौबारे पर कैसे मातमपुर्सी करती है और सुबह के मुहाने पर कैसे ओस सी खिलती है इसका बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है।

"तेरी तस्वीर " , "तेरा नाम " , " पीले फूल " " द्वार नहीं खटखटाती हूँ " सभी कवितायेँ प्रेम के विभिन्न आयामों से गुजरती एक प्रेमिका के समर्पण और प्रेम का आख्यान है जहाँ वो खुद को हर पल जी रही है प्रेम के घूँट भर भर पी रही है मगर फिर भी ना तृप्त हो रही है।

आगे में पकाते पकाते मुझे /उसके हाथ भी जले /मैं तपी पर सोना न बन सकी / रख बन गयी / एक चिंगारी आज भी सुलगा करती है मुझ में कहीं / और वक्त का खेल देखो / आज कोई मुझे कुम्हार / और खुद को कच्ची मिटटी कह गया / और मैंने झट रख में अपने हाथों कि हड्डियां छुपा ली……………… "कच्ची मिटटी " कविता जैसा चाहे ढाल लो के भाव को पुख्ता करती है तो साथ में कहती है अपना बना लो या मुझे मुझसे जुदा कर दो , हूँ तुम्हारा ही हिस्सा बस तुम एक नेक दुआ तो करो।

"नागराज " कविता प्रेम का डंक जिसे लगा बस वो ही तो जी उठा के भाव को मुखरित करती प्रेम की पराकाष्ठा को दर्शाती है तो " क़त्ल " में तो जैसे रूह के कत्लेआम पर रूह भी कसमसाती है।

संवेदनशील मन प्रहार करता है "सुनो ! लड़कों " कविता के माध्यम से आज दिए जाने वाले संस्कारों पर जो उसी तरह बोने जरूरी हैं जैसे एक लड़की में रोपित किये जाते हैं।
कुछ कड़वी लगी न / हाँ ऐसी ही हूँ मैं / ज्यादा कड़वी /ज्यादा सच्ची /ज्यादा नशीली /
वैधानिक चेतावनी : सिगरेट पीना स्वस्थ्य के लिए हानिकारक है
"सिगरेट सी हूँ मैं " कविता में स्त्री के मनोभावों को प्रस्तुत करती कवयित्री ज़िन्दगी की तल्खियों को भी उतार देती हैं।

बोधि प्रकाशन से प्रकाशित कविता संग्रह प्रेम की दुनिया का भ्रमण तो कराता ही है साथ में मन को भी भ्रमर सा बहा ले जाता है जो हर कविता पर पीहू पीहू सा पुकार लगाता है। मन के तारों पर प्रेम की सरगम जब गुनगुनाती है तब मधुर संगीत उपजता है जिसमे डूबे रहने को जी चाहता है। बस यही तो हैं " तेरे नाम के पीले फूल " जो सहेजे हैं कवयित्री ने जाने किन किन गलियों से गुजरते हुए , किन किन पड़ावों पर ठहरते हुए क्योंकि मोहब्बत के शाहकार यूं ही नहीं बना करते जब तक इश्क के चिनार नहीं खिला करते।

नीलम और बोधि प्रकाशन को बधाई और शुभकामनाएं देते हुए यही कहूँगी कि ७० रूपये बेशक किताब की कीमत हो मगर कवयित्री के भाव अनमोल हैं जिन्हे जब पाठक पढ़ेगा और उनसे गुजरेगा तभी समझेगा और ऐसे भावों को पढ़ने और उसमे डूबने के लिए ये कीमत कोई ज्यादा नहीं।

तो दोस्तों यदि आप इस संग्रह को पढ़ने की इच्छा रखते हों तो बोधि प्रकाशन या नीलम मेंदीरत्ता से संपर्क कर सकते हैं :

ईमेल :neelammadiratta@gmail.com

बोधि प्रकाशन
दूरभाष : ०१४१-२५०३९८९। ९८२९०-१८०८७

ईमेल: bodhiprakashan@gmail.com
 

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