Friday, November 16, 2012

बेटी संज्ञा , बहू सर्वनाम !


         बेटी संज्ञा , बहू सर्वनाम !

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अगर एक मां होने के साथ साथ आप सास के ओहदे पर भी हैं तो अपने संबोधनों और अपने व्यवहार पर ग़ौर करें ! जैसा रवैया आपका अपनी बेटी के प्रति है , वही बहू के प्रति रखें तो बहू भी बेटी सा ही सुलूक करेगी । आपकी बहू का भी एक नाम है , वह भी किसी घर की संज्ञा रही है , उसे सर्वनाम न बनायें ।'' हमारी बिट्रटो तो बहुत बढि़या खाना बनाती है , आप उंगलियां चाटते रह जाओ | बिट्रटो के ऑफिस में सब उसकी बड़ी तारीफ करते हैं , मज़ाल है कि काम आधा छोड़कर उठ जाये ! कभी कभी तो दस बज जाते हैं ..... अभी सो रही है , एक इतवार ही तो मिलता है ज़रा देर तक सो लेती है । बड़े लाड़-प्यार में पली है हमारी बिट्रटो ......''


'' इसे तो चाय तक ढंग की बनानी नहीं आती ! कभी फीकी तो कभी मीठी चाशनी ! ... ऐसी बेस्‍वाद सब्‍जी बनाती है । पता नहीं , इसकी मां ने क्या सिखाया है इसे ! आजकल तो सभी काम करती हैं पर काम करने का ये मतलब थोड़ी है कि रसोई दूसरा संभाले ...इसे घर गृहस्थी   चलानी नहीं आती ... महारानी सो रही है अब तक .....बडे बुजुर्गों की परवाह ही नहीं इसे । ''

यह पहचानना कतई मुश्किल नहीं है कि कौन सा संवाद किसके लिये कहा जा रहा है ! किसी दकि़यानूसी मध्यवर्गीय भारतीय परिवार में कभी आप जायें जहां एक ही उम्र की दो लड़कियां हैं - एक घर की अनब्‍याही बेटी है , जिसका एक नाम है और वह अपने नाम से बुलायी जाती है । दूसरी ब्‍याह कर लाई गई बहू है - नाम उसका भी है पर नाम होते हुए भी वह ' यह-वह', 'इस-उस' के सर्वनाम से जानी जाती है ।

एक औसत सास की त्रासदी ही यह है कि वह स्वयं जि़ंदगी भर औरत बनी रहती है पर सास बनते ही अपना औरत होना भूल जाती है । जिस बात के लिये वह अपनी बेटी की तारीफ करती है , उसी के लिये उसकी बहू उपहास और निंदा का पात्र् बनती है । जिन्हें अपना समय याद रहता है और जो अपने समय में हुई भूलों को दोहराना नहीं चाहतीं , वे अपनी बहू के प्रति न कभी अतार्किक होती हैं , न दुराग्रह पालती हैं क्योंकि अन्तत: एक औरत ही दूसरी औरत की तकलीफ़ को ज़्यादा गहराई से महसूस कर सकती है । उसे करना चाहिये ।

ऐसी ही एक समझदार महिला को मैं कभी भूल नहीं सकती जो अपनी बहू प्रीति को लेकर हमारे सलाहकार केंद्र में आई थी । प्रीति का चेहरा जैसे किसी सदमे से पथराया हुआ था । बोलने की कोशिश करते ही उसके आंसू धाराप्रवाह बहने शुरू हो जाते थे । वह हमारे सामने छुई-मुई सी चुप बैठी रही । उसकी पूरी कहानी उसकी सास ने कह सुनाई । देखने में बेहद खूबसूरत प्रीति गरीब परिवार से थी । उसकी खूबसूरती पर मुग्ध हो बेटा वहां रिश्ता करने को तैयार हो गया था । लड़की के घर वालों ने समृद्घ परिवार और होनहार वर देख लड़की के लाख चाहने पर भी उसे बी ए की पढ़ाई का आखिरी साल पूरा नहीं करने दिया और शादी के बाद वह मुंबई आ गई । शादी को तेरह साल हो गए थे और उनके दो बच्‍चे थे -- ग्यारह साल की बेटी और छ साल का बेटा । अब उस आदमी के रंग ढंग बदलने शुरु हुए । अपने ऑफिस की एक विधवा सहकर्मी से उसके संबंध बन गये । नौबत यहां तक आ गई कि अपने पड़ोस में ही उसने उस औरत को एक कमरा ले दिया । ऑफि़स से लौटते ही वह एक रिंगमास्टर की तरह घर में घुसता , खाने में नमक कम होने या किसी भी छोटे से बहाने से वह बीवी को मारता-पीटता और रात को घर से निकल जाता । यह हर रोज़ का किस्सा हो गया । बच्चे उसके आते ही थर-थर कांपते । बेटी दरवाज़े की ओट में खड़ी हो जाती । मां ने शुरू मे प्यार से समझाया पर वह किसी भी तरह मानने को तैयार ही नहीं हुआ । मां ने बहू का साथ नहीं छोड़ा और उसके दूसरे सम्बन्ध को स्वीकृति नहीं दी तो वह मां पर भी हाथ उठाने लगा । बहू को यह देखकर तकलीफ़ होती कि उसकी वजह से बूढ़ी मां को भी पिटना पड़ता है । बेटे का आतंक पूरे घर को नरक बना रहा था । पड़ोसी उस झमेले में पड़ना नहीं चाहते थे और पुलिस इसे उनका निजी मामला कहकर बीच बचाव करना नहीं चाह रही थी ।



आमतौर  पर होता यह है कि एक स्‍त्री अपने पति के विवाहेतर संबंध से जीवन भर जितनी भी त्रस्‍त रही हो , अपने बेटे के विवाहेतर सम्बन्ध को जस्टीफ़ाई ही करती है या फिर उस सम्बन्ध का दोष भी अपनी बहू के मत्थे मढ़ देती है -- ''पहले तो मेरा बेटा ऐसा नहीं था|'' या बेटे की शादी के बाद उसके सारे अवगुणों का जि़म्मेदार वह 'इसको' यानी अपनी बहू को ठहराती है - '' इसे ही अपने पति को बांध कर रखना नहीं आता , नहीं तो वह इधर उधर क्यों भागता | '' पति को बांधकर रखने के सारे तिरिया चरित्‍तर को वे जायज ठहराती हैं और औरत में ‘शयनेषु रंभा’ का गुण उन्‍हें तमाम मर्जों की दवा लगता है ।

........और यहां हमारे सामने एक सास बैठी थी जो बहू के पक्ष में दलीलें दे रही थी कि अगर ऐसा काम एक औरत ने किया होता तो लांछनों से उस औरत की झोली भर जाती । पुरुष तो नाजायज सम्बन्ध रखने में भी अपनी शान समझता है और इसे अपने पौरूष की पहचान मानता है । कल को दूसरी औरत को भी छोड़ कपड़े झाड़ता उठ आएगा और सारी धूल-मिट्रटी , दाग-धब्बे उस औरत को ही अपने दामन पर झेलने होंगे ।

पूरी बात सुनने के बाद यह समझना मुश्किल नहीं था कि दो औरतों और दो बच्चों को इस तरह आतंकित कर वह पुरुष दुख देने में एक त्रासद आनंद (सैडिस्टिक प्लेज़र) पा रहा है । दोनों औरतें भी सारा जुल्म इसलिए सह रही थीं कि आखिर घर चलाने के लिए रो-धोकर सही पर पैसे भी तो वही देता है ।

---इतना एहसान तो उसका हम पर है कि घर खर्च के लिये कम ही सही पर पैसे देता है वह ...... सास ने कहा ।

---पर इसे आप एहसान क्यों मानती हैं , यह तो आपका हक है । बच्‍चे उसके हैं । बच्‍चों की परवरिश तो उसे ही करनी होगी न ।

--- अगर उसने घर खर्च देना बंद कर दिया ॽ

--- नहीं करेगा । उसके लिये कानून है न ।

दोनों औरतें - सास और बहू , जिस तरह बदहवास , लुटी-पिटी सी बैठी थीं , यह समझ में आ रहा था कि उन दोनों की दुनिया उस एक कमाऊ पुरुष के ईद-गिर्द घूम रही है । वह त्रास दे रहा है और दोनों औरतें ''रिसीविंग एन्ड'' पर हैं ।

उनकी दुनिया उस पुरुष के घर लौटने और तमाशा खड़ा करने के इंतज़ार की दहशत में कैद है । साम-दाम-दण्ड-भेद का पहला कदम उन्हें समझाया गया कि वे उसकी वजह से दहशत में रहना बंद करें । मार पीट करते उसके बढते हाथ को सब मिलकर रोकें । अच्छे कपड़े पहनें , बालों में गजरा लगाएं , सिनेमा देखने भी जाएं , बच्चों से हंसी मज़ाक भी करें ताकि उसे यह समझ में आए कि उनकी दुनिया उस तक आकर ही खत्म नहीं होती , उससे आगे भी जाती है । तय किया गया कि अगर यह तरीका कारगर नहीं हुआ तो उनके पड़ोसी या पुलिस या फिर कानून की मदद ली जाएगी । आखिर हमारी सलाह पर उस बुज़ुर्ग महिला ने घर और दोनों बच्चों को संभाला और प्रीति को छोटे बच्चों की ट्यूशन का काम करने दिया । प्रीति के ट्यूशन के काम से अब कुछ पैसे भी घर में आने लगे और अपने पांव पर खड़े होते ही प्रीति का आत्मविश्वास बढ़ा और उसने हिंसा में पति के उठते हाथ को रोकना सीखा । आज भी प्रीति अपनी सास की बहुत एहसानमंद है जिसने उसकी जि़ंदगी में आये तूफान को झेलने का हौसला दिया |

कई बार सलाह देना बहुत आसान होता है पर एक औरत जिसकी जि़न्दगी में पति ही सर्वेसर्वा है और वह पति ही उसकी आंखों के सामने दूसरी औरत से रंगरेलियां मनाएं , देखकर पत्नी के लिए खुश रहने का नाटक करना नामुमकिन होता है । यहां उस सास की हिम्मत की दाद देनी पड़ती है जिसने मां बनकर अपनी बहू को हौसला दिया , उसके कांपते कंधों को अपने हाथों का सहारा दिया और अपने बेटे की ज्यादतियों को नज़रअन्दाज़ करते हुए उसे हंसना सिखाया । यह भी समझाया कि अपने को दुखी कर वे एक आततायी पुरूष को सुखी और संतुष्‍ट होने का झूठा दर्प क्‍यों दें ।

कुछ महीनों में धीरे धीरे सब ठीक हो गया और उस खूबसूरत लड़की के चेहरे पर रौनक लौट आई । आज भी प्रीति अपनी सास की एहसानमंद है जिसने उसे अपने पैरों पर खडा होना सिखाया , दोनों बच्‍चों को संभाला और उसकी जि़न्दगी में आए तूफान को झेलने की हिम्मत दी ।

अगर एक मां होने के साथ साथ आप सास के ओहदे पर भी हैं तो अपने संबोधनों और अपने व्यवहार पर ग़ौर करें ! जैसा रवैया आपका अपनी बेटी के प्रति है , वही बहू के प्रति रखें तो बहू भी बेटी सा ही सुलूक करेगी । आपकी बहू का भी एक नाम है , वह भी किसी घर की संज्ञा रही है , उसे सर्वनाम न बनायें ।



सुधा अरोड़ा

1702 , सॉलिटेअर , डेल्फी के सामने , हीरानंदानी गार्डेन्स , पवई , मुंबई - 400 076 . फोन - 022 4005 7872 / 09757 4945 05

5 comments:

  1. सुधा अरोड़ा जी सादर नमन ...
    स्वागत "फर्गुदिया" पर आपका

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  2. आपका इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (17-11-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    1. पारिवारिक रिश्तों में मधुरता बनाये रखने के लिए इस विषय पर चर्चा बहुत जरुरी है .. शुक्रिया वंदना जी !!

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  3. बेहद प्रभावशाली लेख, ज़रूरी पहलुओं की तरफ खींचता हुआ !!!

    सादर

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