Showing posts with label समीक्षा - शोभा मिश्रा. Show all posts
Showing posts with label समीक्षा - शोभा मिश्रा. Show all posts

Tuesday, October 04, 2016

कम से कम एक दरवाज़ा - शोभा मिश्रा



कम से कम एक दरवाज़ा


( सुधा (अरोड़ा )  दीदी के कविता संग्रह  "कम से कम एक दरवाज़ा "  पर लिखने  की कोशिश  की है !  दीदी को जन्मदिन की अशेष  शुभकामनाओं  के साथ  आप सभी से साझा कर रहीं हूँ )


संग्रह के शीर्षक का चयन ही ऐसा है मानो रुढ़िवादी परम्पराओं, पितृसत्तात्मक सोच रुपी दीवारों से बनी काल कोठरी में कैद औरतें गुहार लगा रहीं हो। “किस अपराध में उन्हें ये कैद मिली...?” .. आक्रोशित स्वर में मानो वे प्रश्न कर रही हों कि - मुक्त करो हमें इस अन्धकार से ... इस घुटन से। पीट रहीं हो खिड़की, दरवाजों रहित दीवारों को .. “कम से कम एक दरवाजा” .. तो हो हमारे लिए ..!! 

इस संग्रह को आदरणीय समाजसेविका, लेखिका सुधा अरोड़ा जी ने प्रीती राठी, दामिनी और उन जैसी हज़ारों अनाम बेटियों के नाम समर्पित किया है जो इंसानी दरिंदगी का शिकार होकर महज एक आंकड़ा बनकर रह गयीं ..! किसने बनायी ये संकीर्ण, रुढ़िवादी परम्पराएँ जिनका अनुसरण करते हुए समाज स्त्रियों को आजीवन दूसरों के अधीन रहने के लिए विवश करता है खासतौर पर पिता, पति, पुत्र के रूप में पुरुष स्त्रियों को कभी पुत्री, कभी पत्नी, कभी माँ के रूप में उन्हें अपनी निजी संपत्ति समझता है और अधिकार पूर्वक उसके जीवन के अहम् फैसले स्वयं लेता है ... उनकी स्वतंत्रता, उनके विचारों पर अंकुश लगाता है ... विरोध या बगावत करने पर इतना हिंसक हो उठता है कि उनके प्राण तक लेने में भी नहीं हिचकता ! कितने प्रश्न उठतें हैं मन में कि आखिर स्त्री का अपराध क्या है .. अहंकारी पुरुष प्रधान विचारधारा की दृष्टि से समझने की कोशिश करें तो शायद स्त्री का स्त्री होना ही सबसे बड़ा अपराध है ! स्त्री की शारीरिक संरचना के आधार पर उसे सिर्फ देह में परिवर्तित किसने किया ..? और उस देह पर अधिकार समझने और उसकी रखवाली- निगरानी रखने वाली सोच का निर्माण कब हुआ ..? क्यों हुआ ..? असंख्य प्रश्नों के साथ एक मौन चीख उठती है अंतरात्मा से! एक पाठिका का आक्रोशित मन न जाने कितने प्रश्न कर उठता है ! इस संग्रह की हर कविता में एक आम स्त्री किसी न किसी रूप में अपने आपको पाएगी .. चाहे वो घर के भीतर की स्त्री की पीड़ा हो या घर के बाहर पुरुषवादी सोच से जूझती स्त्री की पीड़ा हो ! संग्रह की कविताओं को छः भागों में विभाजित करके शीर्षकबद्ध किया गया है ..

- नई परिभाषा गढ़ती औरत
- साँकल, सपने और सवाल
- छत, खिड़कियाँ और दरवाज़े
- निर्भया और नयना साहनी
- ताकि बची रहे प्रजाति
- और अंत में..

संग्रह की भूमिका में बहुत ही सहजता और ईमानदारी से लेखिका कविता लेखन के बारे में अपने विचार प्रकट करतीं हैं – “इन कविताओं के बारे में क्या लिखूं ! बस, जैसे नारीवादी होना मेरा चुनाव नहीं था , वैसे ही घोर कविताप्रेमी होने के बावजूद कविता विधा में घुसपैठ करने की मेरी मंशा कभी नहीं रही।"



लेखिका कविताओं में कभी अपनी माँ की स्मृतियों को और बचपन की मीठी स्मृतियों को संजोतीं हैं तो कभी चारदीवारी के भीतर अकेली औरत के भिन्न- भिन्न रूपों, अवस्थाओं का वर्णन कुछ यूँ करती हैं मानों कविता में उपस्थित पीड़ित स्त्री को दिलासा और संबल रुपी कंधा देकर उनका अकेलापन दूर कर रहीं हों । दिल्ली के बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक दामिनी बलात्कार काण्ड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था । भय, शोक, आक्रोश, स्तब्धता की स्थिति में तो सभी स्त्रियाँ थीं लेकिन लेखन के माध्यम से कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपने घावों पर मरहम रखने तथा समाज को एक सकारात्मक सन्देश देने वाली समाज सेवी लेखिका भी इस अपार दुःख की घड़ी में अपने आपको असमर्थ पा रहीं थीं इस त्रासदी पर लिखने में ! .. लेकिन कलम सहमती जरुर है मौन नहीं होती कभी ! मुखरता से प्रकट होती है अंततः ! निर्भया और नयना साहनी शीर्षकबद्ध कविता श्रृंखला उदाहरण हैं उस मुखरता का ..







“क्या इसलिए होती हैं मांएं धरती से बड़ी “ माँ की स्मृति में लिखी गयी संग्रह की पहली कविता में लेखिका कितने अबोध प्रश्न करतीं हैं माँ से ! स्त्री को जन्म देती स्त्री किस परंपरा का निर्वहन करती चली आ रही है ! स्त्रियों द्वारा एक दूसरे को रुढ़िवादी परम्परा स्थानांतरित की जाने की प्रक्रिया का उल्लेख करती हुई लेखिका दुनिया की पहली स्त्री का जिक्र करतीं हैं। इस कविता को पढ़ते हुए सोचने लगती हूँ – आखिर दुनिया की पहली स्त्री भी “परम्पराओं में गढ़ी स्त्री” रही होगी ..? क्या उसकी भी दुनिया सीमित होगी चारदीवारी तक ! उसके हिस्से के आसमान का निर्धारण क्या किसी दूसरे व्यक्ति ने किया होगा ! कविता की कुछ शुरूआती पंक्तियाँ -

“आखिर मैं कब आई होऊँगी तुम्हारे भीतर
गर्भ में धरने से पहले
क्या तुमने धरा होगा अपनी आत्मा में मुझे
जैसे धरा होगा तुम्हारी माँ ने तुम्हें
और उनकी माँ ने उन्हें
और एक अटूट परंपरा स्त्रियों की
वहाँ तक जहां बनी होगी दुनिया की पहली स्त्री

तुमने मुझे क्यों जना माँ
क्या एक चली आ रही परंपरा का निर्वाह करना था तुम्हें
या फैलना था एक नए संसार तक
और फिर देखना था अपने आप को मुझमें

“नई परिभाषा गढ़ती अकेली औरत” शीर्षक कविता श्रृंखला की कविताएँ स्त्री के उन भावों को दर्शातीं हैं जिनमें वो रोने, हंसने जैसी ख़ुशी और दुःख के क्षणों को भी अपने भीतर जब्त कर लेती है ! औरत की उन्मुक्त हँसी को लोग सहन नहीं करते हैं ! उन्मुक्त हँसी हँसती औरत के लिए ऐसी परिभाषाएं गढ़तें हैं कि जल्दी ही अपराधबोध में घिरकर वह बेबस और लाचार महसूस करने लगती है ! अहंकारी पुरुष असहाय, बेबस, लाचार, भावशून्य चेहरे वाली स्त्रियों से संतुष्ट रहतें हैं ! स्त्रियों को मानसिक रूप से अपाहिज बनाकर जीवनपर्यन्त उनकी वैसाखी बने रहना चाहतें हैं ..

“उसके भीतर कई रातें बजतीं हैं !” कविता में पत्नी के रूप में स्त्री पति द्वारा अन्तरंग क्षणों में देह से बांटे जाने वाला प्रेम पाकर खुश है । समर्पित है उस प्रेम के प्रति जिसमें हर रात ठिठुरती है, सुबह अकड़ी हुई देह और एक तरफ झुके हुए कंधे की परवाह किये बिना ! लेकिन इसी कविता के मध्य तक आते- आते दांपत्य जीवन में पांच साल का अंतराल आता है जिसमें स्त्री परित्यक्ता है ! स्त्री को पति रुपी वैसाखी की आवश्यकता क्यों है ! क्यों समाज एक पति द्वारा त्यागी गई स्त्री को दूसरे विवाह का सुझाव देता है ! क्यों उपहास उडाता है समाज अकेली रह रही स्त्री का ! कविता में एक जगह यही भाव हैं – परित्यक्ता स्त्री को दूसरा विवाह करने की सलाह दी जाती है लेकिन औरत अपने भीतर बजतीं उन ठिठुरती रातों को याद करती है जब पति के नागपाश में जकड़ी उसकी उघारी देह बर्फ – सी जम जाती थी ! औरत दृढ निश्चय करती है -

उसे नहीं चाहिए एक और नागपाश
बर्फीली हवा में देह की ठिठुरन
अकड़ा हुआ एक कंधा
टांगों और बाहों में मजबूती से कैद
अपनी निर्वस्त्र देह ।

“सन्नाटे का संगीत” कविता में औरत अपने सपनों का आकाश पाने को व्याकुल एकांत में एक धुन हमेशा सुनती रहती है जिसमें उन्मुक्त पंछियों की तरह विचर सके ।


“भरवां भिंडी और करेले” – उन हर घरेलू औरतों के बोन्साई सपनों की कहानी है जिन्होंने उसे कभी विस्तार ही नहीं दिया ! दूर रखा प्रकृति की उन किरणों, वायु और नमी से जिनसे उनकी ऊँची शाखाएं आकाश की ऊँचाइयों को छू सकतीं थीं ! अपने हिस्से की ज़मीन पर अपनी जड़ों को विस्तार दे सकतीं थीं ! .. लेकिन इसके विपरीत वे एक उम्र गुजार देतीं हैं चारदीवारी में अपनों को खुश रखने, उनके भविष्य को सँवारने में ! एक दिन उन्हीं “अपनों” द्वारा ठुकराए जाने पर पहचानतीं है अपने आपको और चारदीवारी में गमलों में सजाये हुए बोन्साई सपनों को खुले आसमान के नीचे उपजाऊ भूमि में रोप देतीं हैं ! खुली हवा में सांस लेतें हैं उनके सपने ! उन रंगों से रंगतीं हैं अपने सपनों को जिनकी अनदेखी करतीं थीं जिम्मेदारियों के बोझ तले ! आत्मविश्वास से भरी कविता की कुछ पंक्तियाँ - 

“घेर ली उसने आधी दुनिया
और पूरा आसमान
उसकी उँगलियों की करामात
पहुंची पेरिस, पहुंची जापान।
सराहना से अंटे अखबार
लद फंद गयी मैडल और ट्राफियों से
कमरे के रैक में भर गए
पुरस्कार और सम्मान ।

“छत, खिड़कियाँ और दरवाज़े” श्रृंखला की कविताओं में स्त्री- अधिकारों की नई परिभाषा गढ़ती कविताएँ हैं । संग्रह के शीर्षक वाली कविता “कम से कम एक दरवाजा” इसी श्रृंखला में हैं । हमारे समाज में घरवालों की रजामंदी के बगैर प्रेमी से विवाह करने वाली लड़कियों को “घर से भागी हुई लड़कियां“ कहा जाता है और ऐसी लड़कियों के लिए घर के सभी दरवाज़े बंद कर दिए जातें हैं ! चाहे लड़की के साथ दुर्व्यवहार हो, हिंसा हो ! बेटियों के प्रति ऐसी कठोर भावना रखने वाले अभिवावकों के लिए सीख है ये कविता -

“जानतें हैं, तुमने गलत फैसला लिया
फिर भी हमारी यही दुआ है
खुश रहो उसके साथ
जिसे तुमने वरा है !
यह मत भूलना
कभी यह फैसला भारी पड़े
और पांव लौटने को मुड़ें
तो यह दरवाज़ा खुला है तुम्हारे लिए !”

इसी श्रृंखला की “राखी बांधकर लौटती हुई बहन“ कविता उस सामाजिक परंपरा पर गहरा कटाक्ष है जिसमें पिता की संपत्ति से बेटियों को वंचित रखा जाता है ! बेटियों को पिता की संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने पर भाई के नाराज़ होने का डर और वो मायका जहां उसका बचपन बीता – उस बचपन की निशानी को खोने का डर सताता है ! पिता की संपत्ति को त्यागकर राखी जैसे कुछ त्योहारों पर भाई से मिलकर, मायके से साड़ी- गहनों का उपहार पाकर खुश रहतीं हैं बेटियाँ ! कभी-कभी मायके के घर के आँगन में अपने बचपन को याद करके खुश रहतीं हैं बेटियाँ । कविता की भावुक करने वाली बेहद संवेदनशील पंक्तियाँ --

“कितना अच्छा है राखी का त्यौहार !
बिछड़े भाई बहनों को मिला देता है
कोठी के एक हिस्से पर हक जताकर
क्या वह सुख मिलता
जो मिला है भाई की कलाई पर राखी बांधकर !

“निर्भया और नयना साहनी” शीर्षकबद्ध श्रृंखला की कविताएँ मन- मष्तिष्क को झकझोर देतीं हैं ! इस श्रृंखला की कविता “अब हम आँसुओं से नहीं, अपनी आँख ले लहू से बोलेंगें ....” के बहाने दामिनी-निर्भया को याद किया गया है ! श्रद्धांजलि देती कविता में मर्म है उन सभी लोगों का जो वीभत्स, अमानवीय कृत्य के बाद बारह दिनों तक अस्पताल में मृत्यु से संघर्ष करती दामिनी के जीवन के लिए प्रार्थना करते रहे ! अंततः मृत्यु जरुर जीती लेकिन दामिनी का बलिदान मिसाल बना ! कविता में दामिनी के बहाने उन तमाम लड़कियों- महिलाओं को याद किया गया है जो कभी दरिंदगी का शिकार हुईं थीं ! उनमें से कुछ को तो न्याय तक नहीं मिला ! “निर्भया और नयना साहनी” श्रृंखला की कविताएँ कविता न होकर मार्मिक कहानियाँ हैं जिसमें दामिनी, नयना साहनी और उन जैसी तमाम महिलाओं की आह है ... दर्दनाक चीखें हैं जिन्हें पढ़कर पाठक का अंतर्मन भी चीत्कार उठता है ..!
संग्रह की कविताओं को सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा बुरटे जी ने बहुत ही सुन्दर रेखांकनों से संवारा है |

इस संग्रह में व्यथा है हमारे समाज की स्त्री की ... वो व्यथा जो हर दिन दोहराई जाती है अखबारों में .. हमारे आस-पड़ोस में... स्त्रियों के प्रति हो रहे अपराधों में ...लचर क़ानून व्यवस्था में ..! ये संग्रह माध्यम है हमारे समाज की स्त्री के ज्वलंत प्रश्नों का .. जिसका उत्तर अक्सर उसे नहीं मिलता है .. समाधान न सूझने पर वह कई बार हताश भी होती है ... अपने आपको अंधकारों में घिरा पाती है लेकिन अपनी कलम से हर बार लिख देती हैं उगता हुआ सूरज ... इस कलम रुपी सूरज की किरणें निश्चित रूप से भर देंगी उनका जीवन उजालों से ....... ये पंक्तियाँ उसी उजाले का संकेत हैं ---

“जब मेरी जान पर बन आई तब मैं चेती !
जब मुझे कुचलने की बेतरह कोशिश की गई
मेरे सामने दो ही रास्ते थे -
मैं आत्महत्या कर लेती या बगावत करती
मैंने दूसरा रास्ता चुना और देखा
लाल गोले सा उगता सूरज !”


- शोभा मिश्रा

8750067070








फेसबुक पर LIKE करें-