Thursday, March 09, 2017

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?





"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम क्यों है ?"
 इस प्रश्न पर कुछ सम्मानित वरिष्ठ, युवा लेखिकाओं, महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के विचार आज फरगुदिया पर पढ़िए !
आदरणीय  सरला महेश्वरी जी, सुधा दीदी, वंदना शर्मा दीदी, कविता वाचक्नवी दीदी, मीना दीदी, किरन दीदी, विजय पुष्पम दीदी, उषा राय जी ...
प्रिय आभा बोधि जी, नाइस हसन जी, प्रत्यक्षा जी, आराधना सिंह, डॉ विभावरी, चंद्रकांता  सहयोग के लिए आप सभी का बहुत आभार!!


  

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी
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"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का प्रश्न सीधे तौर पर नीति-निर्णायक निकायों में महिलाओं की भूमिका से जुड़ा हुआ है। इसमें महिलाओं की चिंताजनक स्थिति नीतियों को तय करने में उनकी भागीदारी की अनुपस्थिति का संकेत देती है । यह सत्ता में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ा पहलू है ।
अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर महिला प्रश्न पर चली आ रही बहस और आंदोलनों का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है।
महिलाओं में राजनीतिक शक्ति न्यस्त हो, यह कोई सिर्फ भारतीय मामला

नहीं है।इसका विरोध करने वाले इसे सवर्णों के द्वारा सब कुछ हथिया लेने की एक साजिश कहते हैं । लेकिन वास्तविकता में यह लंबे काल से दुनिया के जनतांत्रिक प्रशासनिक निकायों की एक साझा चिंता का विषय रहा है।इस पूरे इतिहास से हम सभी परिचित हैं।
हमारे देश में भी महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का प्रश्न अचानक ही नहीं उत्पन्न हुआ है।1974 में महिलाओं की स्थिति के संबंध में तैयार की गयी रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ही महिलाओं की राजनीतिक स्थिति के बारे में था। और इसमें विशेष तौर पर इस बात का उल्लेख किया गया था कि महिलाओं की ख़राब स्थिति के लिये उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति के साथ ही उनकी राजनीतिक स्थिति भी ज़िम्मेदार है और इससे उबरने के लिये विधायक निकायों में आरक्षण के बारे में कहा गया था कि असमानता के वर्तमान ढ़ाचे को तोड़ने के लिये इस प्रकार का संक्रमणकालीन क़दम लिंग की समानता तथा जनतांत्रिक प्रतिनिधित्व के सवाल की दृष्टि से कोई पश्चगामी क़दम नहीं होगा, बल्कि यह वर्तमान व्यवस्था की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर ढ़ंग से समानता और जनतंत्र के दूरगामी लक्ष्यों की सेवा कर सकेगा।
1974 की स्टेटेस रिपोर्ट, 1988 की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना की संस्तुतियाँ और फिर 1995 में राष्ट्रीय महिला कन्वेंशन के प्रस्ताव में विधानसभा और संसद में महिलाओं के लिये 33 प्रतिशत आरक्षण की माँग को इसी रूप में देखा जाना चाहिये।
लेकिन चिंता की बात है कि आज तक महिला आरक्षण बिल अधर में लटका हुआ है।कभी ओबीसी के नाम पर तो कभी महिलाओं की योग्यता का सवाल उठाकर, कभी इसे प्रोक्सी पोलिटिक्स, यानी वाइव्ज ब्रिगेड के ख़तरे के रूप में, तो कभी घर-परिवार के टूटने के नाम पर लटकाया जा रहा है।
हमारे पितृसतात्मक समाज में राजनीतिक पार्टियाँ भी पुरुष-प्रधान समाज के स्थापित मूल्यों को प्रतिबिम्बित करती हैं जिसे सामाजिक-आर्थिक ढ़ाचे में बिना कोई ढांचागत परिवर्तन किये बदलना मुश्किल है।
पूरे विश्व में विधायिकाओं में सिर्फ 10.5 प्रतिशत महिलाएँ हैं और मंत्री पद पर सिर्फ 6.1 प्रतिशत महिलाएँ हैं। हमारे देश की स्थिति तो हमारे पड़ौसी देशों से भी बदतर है।
इस बात को समझते हुए भी कि सिर्फ आरक्षण ही सारी समस्याओं का हल नहीं है, मैं इस बात को कहना चाहूँगी कि सामान्य तौर पर वंचित और उत्पीड़ित महिला समाज में जितनी भी राजनीतिक जागृति पैदा होगी, उससे पूरे समाज के जनतांत्रिक रूपान्तरण की प्रक्रिया को ही बल मिलेगा।"

--सरला माहेश्वरी
पूर्व सांसद,राज्य सभा
लेखिका, अनुवादक




"​भारत बहुलतावादी देश है। भारतीय समाज बहुरंगी है। यहाँ बहुत तरह की विचारधाराएं हैं , मत वैभिन्य हैं - वामपंथ है, दक्षिण पंथ है, मार्क्सवाद है, समाजवाद है लेकिन एक सत्ता ऐसी है जिसे लेकर बहुत छोटे से तबके को छोड़ कर सब एकजुट हो जाते हैं ! वह है - पितृसत्ता। पुरुष वर्चस्व और सामंती अवधारणा। समाज के हर क्षेत्र में पितृसत्ता की रुग्ण जड़ें इतनी गहरी धंसी हुई हैं कि उसपर कोई नए फूल, कोमल पत्ते अंकुर निकलने की गुंजाइश नहीं रह गई है ! फिर भी उन जड़ों को सींचने में देश का एक बड़ा तबका जुटा है ! ऐसी स्थिति में स्त्रियों की भागीदारी कहाँ तक हो पाएगी।
समाज के किसी भी क्षेत्र में किसी भी तबके की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक व्यवस्था में वह प्रावधान होना चाहिए जो उस तबके को सहभागी बनाने में मदद करे।
हमारे देश में स्त्रियों को लेकर एक दुविधा बनी रहती है कि इनको कितनी आजादी दी जाए, जो पितृसत्ता के खिलाफ न जाती हो। थोड़े बहुत बदलाव को छोड़कर निर्णय लेने का अधिकार आज भी पितृसत्ता के हाथों में महफूज है, जो बड़े करीने से अपना खेल कर रहा है और जिबह होने वाली महिलाएं जान भी नहीं पाती कि उनके पर कतरे जा चुके हैं। जो जान-समझ पाती हैं, उन पर करारा प्रहार होता है। जो असहमति में मुंह खोलती हैं, उन पर चरित्रहीनता का फतवा जारी कर दिया जाता है !
धार्मिक संहिताएं सदियों से स्त्री को नियंत्रण और पाबंदियों में रहने का आदेश देती हैं और आज भी उसी लीक पर देश का नियन्ता वर्ग चल रहा है ।


राजनीति में सहभागिता का पाठ समभाव के बिना पूरा नही हो सकता । हमारे देश में घर से लेकर, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, खेत-खलिहान और दफ्तरों तक में महिलाओं को कमतरी का अहसास कराया जाता है। स्त्रियों की सीमा रेखा आज भी घर परिवार की देहरी बना दी जाती है।
राजनीति में महिलाओं का प्रतिशत कम होना सिर्फ भारत की समस्या नहीं है ! पूरे विश्व में इसे देखा जा रहा है। पिछले दिनों अमेरिका में लेडी क्लिंटन अगर चुनाव जीत जातीं तो अमेरिका की पहली महिला प्रेसिडेंट होने का  इतिहास रचतीं।
राजनीति के लंबे इतिहास में महिला नेत्री उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। इंदिरा गांधी से लेकर सुचेता कृपलानी, भंडारनायक से लेकर मार्गरेट अल्वा तक अधिकांश ने सत्ता में जाकर भी महिलाओं की बेहतरी के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। महिलाओं के हक़ में किसी भी बड़े फैसले को पारित होने में दशकों लग गए। कारण यह भी है कि उनकी आवाज़ सुनी ही नहीं गई, चाहे वह सुभाषिनी अली हों या वृंदा करात। परिवार के तहत आईं नेत्रियों ने सत्ता में ओहदा तो लिया पर पर्याप्त हस्तक्षेप नहीं किया। महिलाएं जब तक वर्ग, जाति और धर्म की फांस से बाहर नहीं निकलती तब तक राजनीति तो क्या घर में भी उनकी सहभागिता सार्थक और सम्मानजनक नही हो सकती है। धर्म का ध्वज वाहक बने रहने से पितृसत्ता ही मजबूत होती है। पितृसत्ता और स्त्री चेतना या स्त्री अस्मिता एक दूसरे के विलोम होते हैं।
पर यह भी बहुत बड़ा सच है कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा की मारी महिलाऐं, देश के सामने कोई बड़ा आदर्श प्रस्तुत कर पाने में अक्षम रही हैं। सच तो यह है कि आजादी के इतने सालों बाद भी शुद्ध रूप से महिला अधिकारों के लिए पूरे देश की महिलाएं कभी एक मंच पर नही आ पाईं । ​​आरक्षण बिल लंबे अरसे से इस या उस कारण से पारित नहीं किया जा रहा है। ​
पर हाँ, ​इरोम शर्मीला का राजनीति में उतरना और ​युवा वर्ग का बेख़ौफ़ होकर अपनी बात कहना हममें एक उम्मीद जगाता है ! वह सुबह कभी तो आएगी ......"

--सुधा अरोड़ा
लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता





"इस मामले में एशियन देशों का हाल काफी बुरा है ! भारत में 'महिलाओं की राजनीति' में भागीदारी का प्रतिशत विश्व में 98 नम्बर पर है ! क्या ये आश्चर्य की बात नही कि युगांडा जैसा देश नम्बर एक पर है ? यह बात अलग है कि इंदिरा,सोनिया, जयललिता मायावती, ममता बनर्जी और महबूबा मुफ्ती आज के दौर की वे महिलाएं थीं या हैं जो अपनी अपनी पार्टी की प्रधान तक बनी ! बहुत सी महिलाएं है ऎसी जो राजनीति में अपनी छाप छोड़ गई पर आधी आबादी की हिसेदारी पर बात की जाए तो लगता है अब समय आ गया है कि जिस तरह से संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों में हमारी हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई उसी प्रकार हरेक दल को अब इस दिशा में विचार करना चाहिए कि देवगौड़ा सरकार द्वारा लाया गया महिला आरक्षण बिल लोक सभा में भी पारित किया जाए ! क्यों कि पुरुषों ने पॉलटिक्स को अपना ऐसा अखाड़ा बना डाला है जहां या तो स्त्रियाँ ऊँचे पदों तक आ नही पातीं या उनके खानदान की स्त्रियों के सिवाय ऊँचे पद पर किसी सामान्य स्त्री को टिकने ही नही दिया जाता अथवा उनके द्वारा 'नियुक्त' स्त्री मात्र स्टार प्रचारक मार्का शोपीस या कठपुतली बना कर रख दी जाती है ! अजब विरासत छाप राजनीति का दौर है यह !


जिस दिन भारतीय समाज की आखिरी स्त्री भी राष्ट्रीय राजनीति में अपना प्रतिनिधित्व,नितांत अपने दम पर कर पाएगी, उसी दिन इस मसले पर यह देश 98 के दयनीय पायदान से ऊपर कहीं आ पायेगा !
अब हाथ कंगन को आरसी क्या , हमारे उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनावों में महिलाओं की भागीदारी का आँकड़ा ही जरा देख लीजिए 17 वीं विधान् सभा की 403 में से 98 सीटें आधी आबादी को दी गई हैं मतलब 25 प्रतिशत से भी कम 😊 और इनमे भी इन दलों का हाल ये है कि अपनी अपनी बहुओं बेटियोंं में कितनी ही सीटें बाँट दी गई ! Bjp ने 370 में से सर्वाधिक 46 सीटें महिलाओं को दीं हैं , तो कॉंग्रेस की 105 सीटों में से मात्र 5 महिलाओं को मिलीं और सपा ने 299 में से सिर्फ 29 महिलाओं को टिकिट दिए हैं और बसपा जिसकी मुखिया एक महिला ही है वहाँ टिकिट बंटवारे में महिलाओं की सबसे बड़ी उपेक्षा की गई यहाँ हाल ये कि 400 सीटों पर सिर्फ 21 महिला प्रत्याशी हैं तो भाई ये तो सच्चाई है इस् सदी में भारतीय राजनैतिक परिपेक्ष्य में महिला हिस्सेदारी का !
इसलिए स्वाभाविक है हमारा ये लगना कि 20 साल की अपनी यात्रा में जो महिला आरक्षण बिल राज्यसभा से आगे नही जा पाया है उसे अब आगे बढ़ाया जाए क्यों कि अधिकार माँगने से मिल नही रहा है दोस्तों 😊 ये सोच पाना असम्भव न् हो तो कठिनतर अवश्य हो चला है कि कोई स्त्री नितांत अपने दम पर उठे टिके और बढ़ती चले और राष्ट्रीय राजनीति में भी ऊंचाइयों तक पहुँचे , बिना किसी बड़ी आर्थिक बैकग्राउंड के, बड़े घरानों या पारिवारिक पृष्ठभूमि के या अन्य प्रकार की बैसाखियों के और तमाम राजनैतिक दुश्चक्रों,कलंक कथाओं,उठा पटक, बाधाओं को पार करती हुई अपनी सामर्थ्य ,चाह और देश के प्रति अपनी अभिलाषाओं स्वप्नों को साकार कर सके ! क्यों कि राजनीति का सबसे बड़ा उद्देश्य देश समाज की सेवा ही तो है ! पर अफ़सोस प्रायः उनके ये उद्देश्य क्षरित होते हैं प्रधानी से लेकर मंत्री पद तक जाते जाते उनकी ये यात्रा कठपुतली से सत्ता तक की रह जाती हैं और "सत्ता कभी स्त्रीलिंग नहीं होती " 😊 प्रायः स्त्री होने का जरूरी दायित्व कहीं पीछे छूट ही जाता है इसलिए मैं उन महिलाओं के प्रति बेहद आदर सम्मान बल्कि श्रद्धा से भरी हूँ जिन्होंने दूर दराज के उपेक्षित इलाकों , स्त्रियों , दलितों और आदिवासियों के प्रति अपने सेवा संकल्प को किसी राजनैतिक दलदल में न् धंसने दिया , न् झुकने दिया , वे न् कठपुतली बनी और न् अपनी ही महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ीं ! इसके विपरीत उन्हें अपने वे पवित्र ध्येय हमेशा स्मरण रहे जिनके कारण वे इस क्षेत्र में उतरीं थीं !

---वंदना शर्मा
कवयित्री




"राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सामाजिक संरचना पर काफ़ी कुछ निर्भर करती है । मार्था नसबौम जैसा कहती हैं कि-स्त्रियों के राजनीतिक भागीदारी की क्षमता में एक महत्वपूर्ण अवरोध हिंसा का ख़तरा है ।
पित्रसत्तात्मक समाज अनेक तरीक़ों से स्त्रियों को दबाता कुचलता है । घरेलू हिंसा , यौन शोषण , साक्षरता दर का कम होना , इन सब कारणों ने भी स्त्रियों के आर्थिक और राजनीतिक अवसरों पर अपना प्रभाव डाला है ।

स्त्रियों की सामाजिक और राजनीतिक स्तरों में सक्रिय भागीदारी की क्षमताओं को कम किया है ।

स्त्री सशक्तिकरण  के पहल के बावजूद अब भी संसद में स्त्रियों की भागीदारी सिर्फ़ बारह प्रतिशत है । पंचायतों में भी स्त्रियाँ proxy नेता , मुखिया ही हैं । फिर भी नियमों का विसरण और व्यापन ही सामाजिक जड़ता को तोड़ने का काम करेगा । स्त्रियाँ जितनी आत्म निर्भर होंगी , जितना स्वाभिमान और साहस से भरीपूरी होंगी उतना ही सार्वजनिक स्पेस को क्लेम् करेंगी , राजनीतिक और सामाजिक दायरों पर अपना दावा पुख़्ता करेंगी |"

--प्रत्यक्षा सिन्हा
लेखिका 





"शिक्षा ,खेलकूद ,चिकित्सा ,इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी,फ़िल्में ,बैंकिंग ,व्यापार ,अंतरिक्ष , सेना और यहाँ तक की अंडर वर्ल्ड में भी महिलाएं पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही हैं ,यहाँ तक कि युद्ध रिपोर्टिंग जैसे साहस भरे कामो को अंजाम दे रही हैं और अपना आप मनवा रही हैं ।राजनीति जैसे क्षेत्र में उनकी आम दरफ्त कम क्यों है यह एक शोध का विषय हो सकता है ।सफाई कर्मी से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक स्त्री ने पूरी निष्ठा और ज़िम्मेदारी से भागीदारी की है लेकिन फिर भी राजनीति में पूर्ण कालिक सक्रिय महिलाएं उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं । देश की आधी आबादी के सक्षम होने के बावजूद राजनीति में उनकी भागीदारी दाल में नमक के बराबर ही है ।
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी मात्र कागज़ों और बहसों तक सीमित रह जाती है ।महिला आरक्षण विधेयक आज तक लागू नही हो पाया ,नही तो जैसे अन्य क्षेत्रों में स्त्रियां अपनी सक्षम भागीदारी सुनिश्चित कर रही हैं वैसे ही राजनीति में भी कर पातीं।यदि कोई सीट महिला के लिए आरक्षित नही घोषित की गयी हो तो सामान्य सीट अमूमन किसी पुरुष उम्मीदवार को ही दी जाती है ।गांव पंचायत जैसे छोटे चुनावों में भी यदि महिला सीट है तो प्रधान महिला भी जनरल मीटिंग्स में नही जाती है या नही जाने दिया जाता है ।उसका पति ही या ससुर ही प्रधान कहा जाता है ।जबकि महिला प्रधान जहाँ कहीं थोडा दबंग होती हैं उस क्षेत्र का विकास अनुपात में कहीं

अधिक हुआ होता है ।
हकीकत यही है कि आधी आबादी अभी तक अपनी मूलभूत आवश्यकताएं ही नही पूरी कर पा रही है तो पूर्णकालिक राजनीति कैसे कर पायेगी ! ये अलग बात है कि इंदिरा गांधी जैसी महिला देश की प्रधानमंत्री रही लेकिन उसके पीछे उनकी सलाहियत कम और नेहरू परिवार से होने का आभामण्डल अधिक प्रभावी था ।ऐसे ही नज़्म हेपतुल्ला ,तारकेश्वरी सिन्हा ,मोहसिना किदवई ,या शीला दीक्षित भी अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से आगे आ पायीं ।अन्य महिलाएं जो किसी प्रदेश में मंत्री या मुख्यमंत्री या किसी अच्छे पोर्टफोलियो में रहीं ,उनके पीछे भी परिवार या किसी न किसी समर्थ व्यक्तित्व का हाथ रहा ।

हालाँकि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर अच्छी खासी तादाद महिला प्रतिनिधिओ की है फिर भी ज़िम्मेदार पदों पर कुछ ही महिलाएं हैं ।साथ ही राजनीति में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी न होने में ,इस क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण भी है ।यदि कोई दबंग लड़की या महिला यहाँ आना भी चाहती है तो परिवार वाले असुरक्षा और पीठ पीछे होती आलोचना और भद्दी बातों को देखते हुए जाने की अनुमति नही देते ।यदि विरोध करके किसी तरह आ भी जाये तो राजनीति के खुर्राट भेड़िये साबुत निगल लेने को तैयार बैठे मिलते हैं ।स्त्रियोचित संकोच ,आर्थिक पराधीनता ,चुनाव में होने वाले अंधाधुंध खर्चे भी यहाँ आने से पहले बार -बार सोचने को विवश करते हैं ।
समय की मांग यही है कि अधिकाधिक महिलाएं राजनीति में आएं और महिला विषयक कानूनों को पारित करने में अपना योगदान दें ,तभी आधी आबादी का दर्द कुछ कम होगा ।"

विजय पुष्पम्
सी 35 ,एच .ए.एल.टाउनशिप
फैज़ाबाद रोड 226016
(09415516679)




ऐसी मुश्किल में लगन और अलख की काम आएगा
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"प्रकृति प्रदत संरचना को विस्तार देने वाली स्त्री को ही पीछे ढकेलने की राजनीति दुखद है। सोचनीय और निंदनीय यह भी है कि संसार कितनी तेज गति से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस संसार में, इस समाज में स्त्री अभी भी पुरूष के साथ या बराबरी की जगह पाने के लिए भागती हुई , खीसटती हुई तड़प रही है। तरस रही है। इस तरह राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण “बंदिश” हैं। बंदिशों की साजिशें हैं। पित्रसत्ततात्मक समाज महिलाओं को अपनी मिल्कियत समझता आया है। और लाख हजार कोशिशों के बावजूद वह महिला को अपनी जरुरत की सामग्री समझता रहेगा। अफसोस की उसमें भी साथ देंगी रहेगी औंरतें!

पुरुष ने ऐसा जाल बुना, जहाँ औरत ही औरत का विरोध करने के षड्यंत्र में भागीदारी लेती रहेगी। समाज के बुरी नजरों की दुहाई देते हुए, उसे डरा –धमका कर पीछे ढकेलता रहेगा समाज। इसे समझने के लिए कहीं दूरी जाने और सोचने की जरुरत नहीं। अपने घर-परिवार, अड़ोस-पड़ोस से वाकिफ होना ही काफी है। जिस समाज में बेटियों को देर रात बाहर रहने के अंजाम से डराया जाता है, उस समाज में राजीनीति में भागीदारी बहुत दूर की कौड़ी है । और तो और पिता, भाई, पति अक्सर उन महिलाओं को लांक्षित करते पाए जाते हैं, जिन महिलाओं ने अपनी मेहनत और लगन से समाज में अपनी जगह बनाई हों। तो कुल मिला कर स्त्री कुछ करे तो लांक्षन,और न करे तो कुढ़ मगज।

स्त्री को हमेशा मर्यादा की दुहाई देकर बरगलाया गया। ताकि समय बीतता रहे और दुनिया से अंजान स्त्री चूल्हें-चौके तक समीति रह, पुरूष की सेवा में तल्लीन रहे। पुरुष, दरअसल स्त्री प्रतिद्वंदी से भय खा कर ऐसा करता है। उसे इस बात को इतना घोट कर पिला दिया जाता है कि वह यदि स्त्री से हार गया तो वह पुरूष कैसा ? मर्दानगी की दुहाई में पुरूष जितना आगे बढ़ने और बढ़ाने की कोशिश में मन नहीं लगाता, उतना वह फेल ने हो, या प्रतिद्वंदी स्त्री से पीछे न रह जाए..इस बात को ज्यादा तवज्जो देता है? ऐसे समीकरण वाले समाज में स्त्री को मर्यादा की दहाई देना पुरुष के लिए सबसे सरल रास्ता है। और मर्यादा के नाम पर बौराई स्त्री –एक अच्छी बेटी, एक अच्छी बहन, एक अच्छी पत्नी और अंत में एक अच्छी माँ बन कर अपने जीवन की संपूर्णता पर इतरा उठती है। वह स्त्री एक वास्विक संपूर्णता का अनुभव करती है। इसमें भी कोई दो राय नहीं। अपने जीवन और अपने कर्तव्य से फारीग ।

यानि की वस्तु(स्त्री) को तंत्र के संचालन योग्य कैसे समझा जा सकता है! यह पुरूष प्रधान समाज, अपनी षड्यंत्री तरकीबों को तब तक अमल में लाता रहेगा, जब तक स्वय स्त्रियाँ जागेंगी नहीं! मान मरजाद को धता बता कर, खुद के लिए बेकल हो कर घर से बाहर भागेंगी नहीं। भागने का अर्थ स्पष्ट करना जरुरी नहीं। वह सवाल में निहित व संकलित है खुद। ऐसी स्थिति में स्त्री के लगन और अलख ही काम आएँगे...."

--आभा बोधिसत्व
9820198233
apnaaghar@gmail.com

  




"आज आजादी के इतने वर्षों बाद भी भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है, इसका क्या कारण है ? ये सोचने का विषय है | आज देश में चारों ओर विकास  की बयार बह रही है | विकास  की इस बहती बयार ने भी महिलाओं को विशेष प्रभावित नहीं किया है | आज भी  आधी आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी मूलभूत सुविधाओं से दूर है | आवश्यकता है उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ने की, उनके लिए स्वस्थ माहौल मुहैया करवाने की ताकि वे  घरों से बाहर निकल कर समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें| पर दुर्भाग्य इस बात का है कि इसके लिए जमीनी स्तर पर कोई प्रयास नहीं हो रहें हैं | घर हो या बाहर, दफ्तर हो या राजनीतिक क्षेत्र हर स्थान पर उनका शोषण होता है और वह अपनी बात खुल कर किसी से कह नहीं पातीं |  उनके लिए हमारे पितृ सत्तात्मक समाज ने अनेकों लक्ष्मण रेखाएँ खींच रखी हैं, ढ़ेरों बंदिशे और बाधाएं खड़ी कर रखी हैं ताकि वो उन्हीं में उलझी रहें और उनके बाहरी क्षेत्र में दखल ना दे सकें जिससे पुरुषों का वर्चस्व बना रहे, और अगर कोई महिला इन तमाम बंदिशों और दायरों को पार कर बाहर निकल अपना आस्तित्व साबित करने का प्रयास करती भी है तो हमारे पुरुष वर्चास्व समाज में उन्हें  चरित्रहीन साबित करने की होड़ लग जाती है, ताकि उन लांछनों से

शर्मशार होकर वे  अपने बढ़ते हुए कदम वापस खींच लें | हालाकि कई महिलाओं ने पुरुषों द्वारा खींची गयी लक्ष्मण रेखा को पार कर समाज में अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई है पर इनकी गिनती बहुत कम है |  आज भी देश में महिलाओं के लिए समुचित शिक्षा व्यवस्था नहीं है | महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी है फिर भी वह पुरुषों की साक्षरता दर से कम है |
भारतीय परिवारों की तरह भारतीय राजनीति में भी पुरुषों का दबदबा रहा है और वही राज करते आये हैं बावजूद इसके इंदिरा गाँधी ने पन्द्रह वर्षों तक प्रधानमंत्री के पद पर आसीन रहीं |
आज जरूरत है देश की आधी आबादी को मुख्य धारा से जोड़ने की | जरूरत है उनके प्रति अपना नजरिया बदलने की | अगर इन्हें अवसर मिले तो वह बहुत कुछ कर सकती हैं | महिलाएं एक समय  में एक से अधिक विषयों पर सोच सकती हैं, एक साथ एक से अधिक कार्य कर सकती हैं जब कि पुरुष एक समय  में एक ही कार्य करता है वो भी तब, जब उसकी पत्नी उसको उसके कार्य क्षेत्र के लिए पूरी तरह तैयार कर के भेजती है |
कुल मिला कर महिलाओं के साथ बहुत भेदभाव किया जाता है | उसकी स्थिति में आज भी कोई बहुत विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है । हर स्थान पर पुरुषों का दबदबा है घर, दफ्तर हो या राजीनीति ! कहीं भी महिलाओं के लिए स्थितियां सामान्य नहीं हैं ।
 महिला आरक्षण बिल के अनुसार संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था है परन्तु वास्तविकता इससे अलग है ।
और अंत में राजनितिक पार्टियाँ महिलाओं को एक बड़ा वोटबैंक तो मानती हैं पर प्रत्याशी के रूप में उन्हें टिकट देने से हिचकिचाती हैं । यही सब कारण हैं कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी कम है ।"

--मीना पाठक





"प्रथम तो राजनीति एक सार्वजनिक क्षेत्र है, और मध्ययुगीन परम्परा से सार्वजनिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। यद्यपि 20 के दशक के उत्तरार्द्ध में यह बढ़नी प्रारम्भ हुई किन्तु वह केवल कला और सौन्दर्य के क्षेत्र में, या स्पष्ट कह लें तो फिल्मों में और तत्पश्चात् सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में अर्थात् नर्सिंग एवम् अध्यापन में।
दूसरा कारण यह कि राजनीति मुख्यतः अनीति की शरणस्थली रहती आई है, जहाँ अपराध और कपट को या तो संरक्षण और प्रश्रय मिलता आया है अथवा उस से संघर्ष और जय-पराजय। स्त्रियों की प्रकृति से यह सार्वजनिक समेकित द्वन्द्व मेल नहीं खाता।


तीसरे, समाज में कार्यों का विभाजन इस प्रकार का रहता आया है कि स्त्री परिवार और गृहस्थी की धुरी होती है, वह परिवार और सन्तान से सम्बन्धित दायित्वों से इतना अवकाश और छूट नहीं पाती कि वह निरपेक्ष भाव से ऐसे किसी अवसर /अध्यवसाय को समय दे सके।
चौथा, कई अर्थों में यह 'महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं' भी माना/कहा जा सकता है। जिन परिवारों की पद-प्रतिष्ठा और सुरक्षाकवच-सा स्त्रियों को मिला उन परिवारों की स्त्रियाँ मुख्यतः राजनीति में आईं भी।

पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में स्त्री का स्थान बनाना भी स्वयम् में चुनौती है। तभी तो संसद में आरक्षण का प्रस्ताव तक पुरुष वर्चस्ववादी दलों ने लाने नहीं दिया। राजनीति में अपराधीकरण कम हो तो धीरे-धीरे यह अनुपात बढ़ेगा, या स्त्रियाँ अपराध की अभ्यस्त हो जाएँ तब भी बढ़ेगा। स्त्री-वर्चस्व बढ़ने ओर्र राजनीति के मानवीय पक्ष की अपेक्षा तब की जा सकेगी।"

- कविता वाचक्नवी

लेखिका  





"मेरे ख़याल से सामान्यतः हमारा समाज स्त्रियों में राजनीतिक समझदारी के विकास के अवसर ही उपलब्ध नहीं होने देता. इसके बावजूद यदि किसी महिला का रुझान सक्रिय राजनीति में हो गया तो घोषित रूप से अतिरिक्त समय और श्रम की माँग करने वाले इस क्षेत्र में आने पर महिला के समाज द्वारा उसके लिए निर्धारित भूमिकाओं से समझौता एक अनिवार्य शर्त बन कर उभरता है, लिहाज़ा महिलाओं के राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होने की

राह पुरुषों की तुलना में आसान नहीं रह जाती.

कह सकते हैं कि महिला के राजनीति में सक्रिय होने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति के साथ-साथ धारा के विपरीत चल पाने का जज़्बा बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाता है जिसके अभाव में अपनी सामाजिक, जैविक और पारंपरिक भूमिकाओं से बंधी महिलायें सामान्यतः इस क्षेत्र को प्रोफेशन के तौर पर नहीं अपना पातीं! एक ऐसे समाज में जहाँ टीचर, नर्स, डॉक्टर जैसे चंद प्रोफेशंस को महिलाओं के लिए मुफ़ीद माना जाता हो अगर कोई महिला राजनीति को अपना कार्यक्षेत्र बना भी ले तो ज़्यादातर मामलों में समाज उसे आत्मनिर्भर तरीके से काम कर पाने की सलाहियत नहीं दे पाता. देश की ग्राम पंचायतों में महिला आरक्षित सीटों पर निर्वाचित महिलाओं की जिम्मेदारियां और काम-काज का निर्वहन उस महिला के पिता, पति, भाई या बेटे द्वारा किया जाना बहुत आम है. इन हालात के बावजूद आज हमारे देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों में कार्यरत जुझारू महिला नेताओं का होना इस बात का संकेत है कि यदि अवसर मिलें तो महिलायें बेहतर राजनीतिज्ञ साबित हो सकती हैं. महिलाओं की शख्सियत में इस आत्मविश्वास के विकास में निःसंदेह उनकी उच्च शिक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता की अहम भूमिका है. "

--डॉ विभावरी




"मुख्यधारा कि तरह राजनीति में भी महिलाओं कि उपस्थिति मिसिंग है .पॉलिसी मेकिंग और डिसीजन मेकिंग राजनीति के दो प्रमुख बिंदु हैं लेकिन महिलाओं का सामाजिकरण या वैचारिक कंडिशनिंग इस तरह से होने ही नहीं दी जाती वे राजनीति में भागीदारी का सोचें.राजनीति में स्वप्रेरित महिलायें कम हैं जहाँ हैं वहां भी या तो परिवारवाद का प्रभाव है या उन पर राजनीतिक उम्मीदवारी थोप दी गयी है. यह एक बड़ा कारण है कि स्थानीय निकायों में एक तिहाई आरक्षण के बावजूद महिलाओं कि राजनितिक उपस्थिति प्रभावी नहीं हो पायी है.

यह बात किसी से छिपी नहीं है की महिलाओं में नेतृत्व के गुण कूट कूट कर भरे हैं फिर भी उस नेतृत्व का दायरा उसकी होममेकर की भूमिका तक सीमित कर दिया जाता है.बाकी राजनीति का अपराधीकरण जैसे जुमले केवल महिलाओं को डराने के लिए हैं . जब महिलायें एक अपराधी समाज का सामना कर सकती हैं तो राजनीति का क्यूँ नहीं ?
जागरूक महिलायें खुद को राजनितिक भागीदारी के लिए तैयार करें तो कोई ठोस परिवर्तन हो .और उनकी यह भागीदारी निश्चित ही विकृत हो चुकी वर्तमान राजनीति से इतर एक स्वस्थ राजनितिक परिवेश का निर्माण करेगी."

--चंद्रकांता
लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता




"हमारे घरों में लड़कियों को सहेली के घर जाने तक के लिए झूठ बोलना पड़ता है,फोन पर बात करने,घर पर आने-जाने के हर पल का हिसाब देना होता है।  खुल के बोली गई बातों पर घर के ही तिलमिलाए लोगों के फ्रस्ट्रेशन से जूझना होता है।  हमारी शक्तियां हमारी संवेदनशीलता की वज़ह से इन छोटी-छोटी व्यर्थ की लड़ाइयों में इतनी ख़र्च हो जाती है कि हमारी उड़ानों की ऊँचाई,उनकी परिधि नि:संदेह घटती जाती है।लंबी,ऊँची

उड़ान भरने की हमारी महत्वकांक्षा को हमारे चरित्र से यूं गूँथ दिया जाता है कि अपनी महत्वकांक्षाओं को हम ख़ुद किसी संगीन गुनाह की तरह देखने लगते हैं। राजनीति ही क्यूं खेती,सेना,ड्राइवरी,व्यापार बहुत सी जगहों पर आधी आबादी आधी तो दूर एक चौथाई उपस्थिति भी दर्ज़ नहीं कर पाती।  
सुषमा स्वराज,मायावती,स्मृति इरानी जैसी और कुछ महिलाओं को अपवाद स्वरूप छोड़ दिया जाए तो बाकी महिलाएं चाहे वह गाँव की प्रधान हों,विधायक,सांसद हों उनके सरपरस्त उनके पति या परिवार का कोई सदस्य होता है और राजनीति में होकर भी उनका कोई निर्णय नहीं होता। उनका राजनीतिक अस्तित्व केवल नाम का होकर रह जाता है।"

--आराधना सिंह
कवयित्री 





"हमें राजनीति में वैसे ही उतरना चाहिए जैसे इरोम शर्मिला उतरी हैं। सोलह वर्षो तक अनशन पर बैठी रही इरोम ने जब राजनीति में उतरने का फैसला लिया तब उनके परिवार के सदस्य भी इस निर्णय से खुश नहीं हुए। देवी की छवि में रुढ़ होती जा रही लौह महिला का सामान्य जन में घुल-मिल कर काम करने के प्रति मणिपुर की जनता का एक हिस्सा सहज नहीं हो पा रहा था। जब लौह महिला के राजनीति में आने आने का स्वागत और विरोध हो रहा है तो हम तो सामान्य स्त्रियाँ हैं। हमारी राजनीति की राह और कठिन होगी। लोकतंत्र के इस सबसे बड़े उत्सव में क्या हम निर्णय को प्रभावित कर सकने की भूमिका में हैं? उम्मीदवार के रूप टिकट देना तो दूर की बात है, चुनावी घोषणा पत्रों में स्त्रियों को आकर्षित करने वाली घोषणाएँ गायब रहती हैं।


पिछले चुनावों में एक महिला उम्मीदवार (अपनी समझ से योग्य उम्मीदवार) के पक्ष में घर-घर वोट माँगने के दौरान आमतौर पर यह बात सुनने को मिली-‘‘ये (पति) जहाँ कहते हैं, हम वहीं वोट दे देते हैं।’’स्त्रियों में राजीतिक चेतना का अभाव दिखाई दे रहा है। राजनीति हमारे जीवन को प्रभावित करती है। यह एक मुख्य वजह है कि हम समाज में निर्णायक भूमिका में नहीं उतर पा रही हैं। बहन जी’ हों या ‘दीदी’ ये भी जब सत्ता में आती हैं तो हमें भूल जाती हैं क्योंकि आधी आबादी ‘चुनाव जिताऊ फैक्टर’ नहीं है। जनसत्ता समाचार पत्र की 6 मार्च की रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर में दो चरणों में होने वाले चुनावों में कुल दस महिला उम्मीदवार हैं। उत्तर प्रदेश में 344, पंजाब में 81, उत्तराखंड में 56, और गोवा में 18 महिलाएँ मैदान में हैं। इसमें भी कई महिला उम्मीदवार ऐसी भी हैं, जैसे मड़ियाहूँ सीट से माफिया डान मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह मैदान में हैं। उस पर भाई लोगों की टिप्पणी है-‘‘सब जानत हैं कि भइया जी लड़ रहे हैं। भाभी का नामे भर है।’’ पंचायत चुनावों में स्थिति बेहतर है। वहाँ महिलाएँ विजयी होकर बहुत काम कर रही हैं। भले एक नया शब्द ‘प्रधान-पति’ भी चलन में आया हो। राजनीति में महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए। महिलाओं को अपने विरुद्ध हो रही राजनीति को समझना होगा, जिसकी शुरुआत परिवार से होती है और जो राष्ट्रीय स्तर तक पसरी है।


...किरण सिंह

लेखिका
3/226, विश्वास खण्ड, गोमती नगर

फोनः 09415800397





"भारत में महिला राष्ट्रपति प्रधान मंत्री यहाँ तक कि राजनीतिक दल की अध्यक्ष बनती है लेकिन यह परेशान करने वाली बात है कि राजनीति में महिलाओं की कुल भागीदारी महज़ 10.86 प्रतिशत ही क्यों है ? पंद्रहवीं लोक सभा इसलिये महत्व रखती है कि इसमें महिलाओं का प्रतिशत पहली लोकसभा से लेकर चौदहवीं लोक सभा तक सबसे ज्यादा है । एक अनुमान

के मुताबिक यदि महिला आरक्षण बिल पास हो जाता तो 543 सदस्यों वाली लोक सभा में महिला सांसदों की संख्या 61से बढ़कर 181के करीब हो जाती । मेरा मानना है कि न सिर्फ़ भारत में बल्कि वैश्विक पटल पर भी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है ।आजादी के बाद हमने कई समस्याओं पर मिशन की तरह काम किया और लक्ष्य को प्राप्त किया ।अत : हमें इस दिशा में भी सोचना और काम करना चहिये ।"

---उषा राय
लेखिका




" सियासत में औरतों की मौजूदगी कम होना काबिले फ़िक्र है। 2014 में हम 188 मुल्कों मे 117 वां नंबर रखते थे पर 1 फरवरी 2016 तक के आंकलन के हिसाब से अब 191 देशों में हमारा नंबर 144 वां हो गया है।

हिंदुस्तानी समाज में औरतों की कोई आज़ाद आवाज़ अभी भी नहीँ बन पाई है। राजनीति में महिलाओं का आना किसी निश्चित प्रक्रिया के तहत नहीँ हो पा रहा है । कुछ नेताओं की पत्नियाँ बेटियाँ मजबूरी में आ गई कुछ को किसी नेता की मौत के बाद जगह मिली। कुछ गलैमर के कारण आई।
कुल मिलाकर वंशवाद और वोट पॉलिटिक्स को ही बढ़ावा मिला है। उनका हिस्सा लोकसभा और राज्य सभा में सुनिशचित होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा समाज को अधिक मानवीय और बराबरी पर आधारित होने के लिए निहायत ज़रूरी है।"




 ------नाइस हसन
लेखिका, महिला अधिकार कार्यकर्ता






प्रस्तुति: किरन सिंह
            शोभा मिश्रा







Wednesday, March 08, 2017

चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई...!! - स्वाती



चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई...!!







पढ़ा गया हमको
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज
बच्चों की फटी कॉपियों का
चनाजोरगरमके लिफ़ाफ़े के बनने से पहले!
देखा गया हमको
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे
देखी जाती है कलाई घड़ी
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद !

सुना गया हमको
यों ही उड़ते मन से
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने


सस्ते कैसेटों पर
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में !

भोगा गया हमको
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह
एक दिन हमने कहा
हम भी इंसान हैं
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद
नौकरी का पहला विज्ञापन।
-      अनामिका


  आज महिला दिवस है, इसके इतिहास में न जाते हुए भी हम जानते हैं कि एक औरत होने के नाते इस समाज में हमें रोज़ किन किन चीज़ों से जूझना पड़ता है। यदि हम हमारे लिए बनाए गए तौर-तरीकों से बाहर निकलना चाहते हैं, तो वह कितना संभव हो पाता है और कैसे... आज के दिन को आधी आबादी का दिवस कहूँ या कि आधी दुनिया के लिए प्रतीकात्मक उत्सव तय नहीं कर पाती। उत्सव कहने को इसलिए भी संगत पाती हूँ क्योंकि इसमें पुरुषों की भी सहभागिता रही है। मकसद पुरुषों से नहीं वरन गैरबराबरी की मानसिकता से लड़ना और जीतना है। आज के दिन कौन सी बात की जानी चाहिए, नहीं जानती, क्योंकि ये बातें तो रोज़ की जानी चाहिए और तब तक की जानी चाहिए जब तक व्यवहार के धरातल पर सभी इस बराबरी को जीने न लगें.. इन बातों को क्या कहा जाना चाहिए, यह भी नहीं जानती। अनुभवों को शब्दों के ज़रिए लिखित रूप से दर्ज करना क्यों ज़रूरी है शायद इसलिए कि ये ज्यादा लोगों तक पहुँच सके.. हो सकता है इन शब्दों से बहुतों को ऐतराज़ हो, हो सकता है कुछ लोग कहें कि ऐसा तो होता ही नहीं, पर हमें अपने अनुभवों को साझा करते रहना है क्योंकि ऐसा करके ही हम समस्याओं को उजागर कर पाएंगे और हमें समस्याओं को अनदेखा नहीं करना है और न ही किसी भी तरह के ग्लोरिफिकेशन में जीना है। हमें उन ग्लोरिफिकेशंस की निर्मिति को भी समझना है, बार-बार उसका हवाला देने वालों की मानसिकता को भी समझना है.. मुझे नहीं पता कि मैं जो कुछ भी कह रही हूँ या कि कहने जा रही हूँ, वह किसी पाठ की शक्ल ले भी पाएगा कि नहीं। यह भी नहीं जानती इसे पढ़ने वाले इसे किस तरह से लेंगे, क्योंकि ये कुछ अनुभव हैं, कुछ जिए हुए अनुभव, कुछ देखे हुए अनुभव बस्स...ये अनुभव अपने प्रस्तुत किए जाने की गढ़ावट में बेहद कच्चे हैं पर इन्हें कहना ज़रूरी है...
तुम लड़की हो न, तुम्हारा तो हो ही जाएगा.., तुम लड़की हो न, तुम्हारे लिखे को तो ले ही लिया जाएगा..., तुम लड़की हो न, तुम्हारी तो तारीफ़ की ही जाएगी...
ये जो 'तुम लड़की हो' से जोड़कर कुछ बातें ऊपर कही गई हैं, ये और इस क्रम में और भी कई बातें लड़कियों की छोटी बड़ी उपलब्धियों को डीमीन करने के लिए बार-बार कही जाती हैं। मुझे नहीं पता कि ऐसा कहने वाले ऐसा कहकर हमारे बढ़ते कदम रोकना चाहते हैं या कुछ और... इसे कहने वालों के लिए इसमे कुछ भी गलत नहीं है। वे कभी भी तनिक ठहर कर नहीं सोचते कि जो उन्होंने बड़ी सहजता से कह दिया है उसका असर उतना हल्का नहीं होता... यह उनकी मानसिकता को दर्शाता है, पर यह मानसिकता बनती कैसे है..
इन दिनों देश में एक अलग हवा चल रही है.. एक खास किस्म का डिस्कोर्स हर डिस्कोर्स को दबाने की कोशिश कर रहा है... मैं जब औरतों की बात करना चाहती हूँ तो मैं एक नागरिक की बात करना चाहती हूँ और जब नागरिक की बात करेंगे तो देश की बात भी करेंगे, समाज की भी बात करेंगे, उसके निर्माण की प्रक्रिया पर भी बात करेंगे... हम हर उस प्रक्रिया की बात करेंगे, उस पर  सवाल उठाएंगे जिसके ज़रिए एक पूरे इंसान को उसके लिंग/ जाति/ धर्म जैसी उसकी परिवेशगत पहचान में रिड्यूस कर दिया जाता है...हम उस सामाजिक कंडिशनिंग की बात भी हर बार करेंगे जिसके सहारे बड़ी कुशलता से सामान्य मानवीय व्यवहार/ संवेदनाओं को भी स्त्रियोचित/ पुरुषोचित के खेमे में बाँट दिया जाता है। समाज के भीतर सीमित कर दी गई सुंदरता की परिभाषा भी इस गैर-बराबरी को गाढ़ा करने में, स्त्रियों की भूमिका को एक फ्रेम में समेट देने में योग देती है।
बहुत सारी समस्याएँ हैं जो गडमड हो रही हैं पर मुझे कहना है। कुछ अजीब सा दोहरापन है इस समाज में। इस समाज ने कुछ 'मोरैलिटी' तय कर रखी है औरतों के लिए और उसकी चिंता पुरुष खूब करते हैं अपने घर की औरतों के लिए पर इस घेरे से बाहर की लड़कियों को वे एक 'देह' में एक 'ऑब्जेक्ट' में रिड्यूस कर देते हैं। यहाँ ऐसा कहते हुए मैं इस बात को स्पष्ट कर देना चाहती हूँ, जब ये पुरुष उस मोरैलिटी के दबाव में अपने घर की स्त्रियों के 'सम्मान' की चिंता करते दीखते हैं तो ऐसा नहीं है कि वे उन्हें पूरे इंसान का दर्ज़ा देने को तैयार होते हैं। मैं यों तो इस पूरी मानसिकता को, इस पूरी दिमागी व्यवस्था को खारिज करती हूँ पर सोचती हूँ कि उन्हें यह अधिकार दिया किसने, उनकी इस मानसिकता को बनाया किसने, क्या पेरेंटिंग और समाजीकरण की इसमे भूमिका नहीं है..? लड़कियों को जहां इस समाज और इसके भीतर के परिवार ने सहज और सच्चे व्यवहार व भावनाओं को भी गलत बता नियंत्रित करने की कोशिश की, वहीं लड़कों को क्यों नहीं सिखाया गया कि उनका हर वह व्यवहार गलत है, जिसके ज़रिए वो किसी को कंट्रोल करना चाहते हैं, वो 'किसी' कुछ भी हो सकता है, व्यक्ति, व्यक्ति की भावनाएं, स्थितियां कुछ भी... आज खबरों में लड़कियाँ सुर्ख़ियों में हैं क्योंकि वे विरोध कर रही हैं, पर ये बोलती लड़कियां इस समाज को हमेशा चुभती रही हैं, क्योंकि यह उनकी सीमित भूमिका, जिसे इस समाज ने तय किया था, से अलग व्यवहार है। यह उस 'स्त्रैणता (femininity)' अलग व्यवहार है, जिसका निर्धारण उसी मानसिकता ने किया है जो स्त्रियों को बड़ी चालाकी से सेकंड क्लास सिटिजन बना देती है।
आज़ादी इन दिनों देश का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है, मैं इस नारे की पृष्ठभूमि में न जाते हुए अपने परिचय और परिचय से बाहर के उन लोगों से जो लिबरल होने का दावा करते हैं, जिनमे से कइयों ने मेरी आइडेंटिटी पर, मेरी नैशनलिटी पर कई दफे सवाल उठाए हैं, बस यह कहना चाहती हूँ कि लिबरल कह भर देने से कोइ लिबरल नहीं हो जाता। हमें हर रोज़ उन सब विषमताओं से लड़ना पड़ता है जिसे कंडिशनिंग के ज़रिए एक लम्बे समय से हमारे भीतर कुछ यों भरा गया है कि वे हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गए हैं।
इन दिनों देशप्रेम का भी उबाल चल रहा है। प्रेम यकीननन एक खूबसूरत भावना है। देश से प्रेम अच्छी चीज़ है पर राष्ट्र्वाद पर चल रही बहसों के इस दौर  ताज्जुब के साथ दुःख इस बात का है कि इस तरह की हवा देने वाले और इससे होने वाली नकारात्मकताओं का समर्थन करने वाली मानसिकता वाले एक स्त्री को उसी पैटर्न में देखते हैं, जिसे किताब के पन्नों में तो महिमामंडित किया जाता है पर जीवन में उसे एक अदद इंसान भी नहीं माना जाता... जब आप किसी की भावनाओं के साथ खेलते हैं, खेलना शायद अच्छा शब्द नहीं है यहाँ, बड़ी आसानी से उसे अपनी सहूलियत के हिसाब से ट्रीट करते हैं, जब आप समाज के एक तबके को अपने बराबर की जगह पाने से वंचित करते हैं, तो आप किस प्रेम की बात करते हैं, जब आपके लिए शब्द महज़ एक औज़ार होते हैं, जब आप किसी के भरोसे को उसकी बेवकूफी बताते हैं, जब आप जीने के लिए ज़रूरी सामान्य मानवीय संवेदनाओं की कद्र नहीं कर पाते तो आप किस प्रेम और बराबरी की बात करते हैं..
जिस समय को हम आज जी रहे हैं, वह कल इतिहास में कैद होगा। इस तरह हम एक इतिहास को बनते देख रहे हैं। जब एक लड़की को रेप की धमकी दी जाती है या कि जब एक स्त्री के साथ गलत व्यवहार किया जाता है और उसके विरोध के प्रतिउत्तर में एक दूसरी स्थिति ला दी जाती है, क्या अच्छा न हो कि गलत को गलत कहा जाए..इतना मुश्किल क्यों हो जाता है साथ मिलकर गलत को गलत कह पाना, वहाँ 'किंतु', 'परंतु' की जगह कैसे बना ली जाती है। आने वाली पीढ़ी यह सीखे कि हर इंसान अपनी परिवेशगत पहचान से ऊपर और पहले एक पूरा इंसान है.. क्योंकि हमारी पीढी ने तो यह नहीं सीखा है, वह सिर्फ स्त्री को देवी बनाने का श्लोकोच्चार करती है, व्यवहार के स्तर पर इसे सीखा जाना बाकी है .. आज हो रही हर तरह की हिंसा वाचिक/ शारीरिक/ मानसिक इस बात को पुष्ट करती है...
हमारे माननीय नेतागणों के बयान हमारे विज्ञापन/ सिनेमा इस बात को लगातार पुष्ट करते हैं कि उनकी नज़र में लड़कियों की ज़िन्दगी का अंतिम लक्ष्य क्या हो, उसका पालन नहीं करती लड़कियां रौंद दी जाएँगी, और घटनाएं भुला दी जाएँगी। सुरक्षा का हवाला दे कर यह मानसिकता बार बार स्त्रियों को अपने पंख फैलाने से रोकती है, इस मानसिकता द्वारा रची गई भूमिका से बाहर अपने लिए नई जगह गढ़ने से रोकती है। 'अच्छी लड़की' का झुनझुना थमा, 'देवी-पूजन' की परंपरा का हवाला देकर उसे एक अदद इंसान बनने से रोकने का काम यह मानसिकता लंबे समय से करती आ रही है। ज़रूरी है कि हम उन मानसिकता को समझें, उस मानसिकता को खाद-पानी देने वाली कंडिशनिंग को समझें जिसकी आड़ में लगातार गैर-बराबरी को पोसा जाता है।
इसलिए आवाज़ उठाते रहिए, सवाल करते रहिए बराबरी की माँग करते रहिए अपने अपने स्तरों पर क्योंकि बिना माँगे कुछ नहीं मिलता। बराबरी की हमारी यह लड़ाई काफी पुरानी है और हम इसमें बहुत आगे आए हैं। हालाँकि अभी हमें लम्बा सफर तय करना है, आर्थिक निर्भरता कम हो रही है, भावनात्मक निर्भरता जिसके सहारे हमें कमज़ोर किया जाता है, उससे भी हमें स्वतंत्र होना होगा। हमें गैर-बराबरी को सेलिब्रेट करने वाली मान्यताओं पर भी सवाल करना होगा। हमारे साथ-साथ बराबरी की इच्छा रखने वाले सभी लोगों को, अपने देश को सुन्दर बनाने की कामना रखने वाले सभी लोगों को एकजुट होना होगा ताकि सभी के लिए समानता व सम्मान के साथ जीने के स्वप्न को सच बनाया जा सके।
आखिर में, आलोकधन्वा की एक कविता पितृसत्तात्मक मानसिकता वाले लोगों के लिए:


तुम्हारे उस टैंक जैसे बन्द और मजबूत
घर से बाहर
लड़कियाँ काफी बदल चुकी हैं
मैं तुम्हें यह इज़ाज़त नहीं दूँगा
कि तुम उसकी संभावना की भी तस्करी करो...!!



--- स्वाती
शोधार्थी , कवयित्री
दिल्ली विश्विद्यालय - हिंदी विभाग 

Tuesday, February 14, 2017

दाम्पत्यः प्रेम और पहेली - मन्नू जी से एक मुलाकात



दाम्पत्यः प्रेम या पहेली -मन्नू जी से एक मुलाकात



आदरणीय मन्नू जी मेरी बहुत प्रिय लेखिका हैं! उन जैसी सम्मानित शख्सियत से भला कौन नहीं प्रभावित होगा! अब तक जितनी बार उनसे मिली हूँ, ढेर सारी सुखद स्मृतियां लेकर लौटी हूँ! बहुत दिनों से मन था उनसे मिलने का! उनके अस्वस्थ रहने के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी! उनसे मिलने की कभी कोई ऐसी वजह नहीं रही जिसमें कुछ स्वार्थ छिपा हो! बस यूँ ही कुछ देर उनके साथ बिताना, साहित्यिक बातें करना न जाने कितने सुखों से भर देता है! लेकिन न जाने क्यों इस बार वैलेंटाइन डे के लिए उनसे राजेंद्र जी और उनके प्रेम भरे कुछ पहलुओं को सहेजकर ब्लॉग पर सभी से साझा करने का मन हुआ! हलाकि उनसे इस विषय पर बात करना मेरे लिए बहुत कठिन था! फिर भी मैंने उन्हें फोन किया और मिलने की इक्षा जाहिर की!  बोलीं – “आज आना चाहती हो, आ जाओ! कल ही मैं टिंकू(रचना जी) के यहां से लौटी हूं!”

मैं फ़ौरन घर से निकल पड़ी! ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन से बाहर आकर ऑटो करने लगी तो पास के फ्लावर शॉप की तरफ कदम अटक गए! मैंने गुलाबों का एक छोटा सा बुके बनवाया!.. जबकि उपहार में फूल भेंट करने की अब आदत नहीं रही! यह तो बाद में पता चला कि उस दिन रोज़ डे था! आश्चर्य हुआ.. अपनी प्रिय लेखिका को गुलाब भेंट किया था मैंने.. इस दिन के महत्व से अनजान! इससे बेहतर क्या हो सकता था मेरे लिए! उनके घर से वापस आकर फ़ेसबुक पर छोटी सी पोस्ट भी लिखी! खैर .. जिस मकसद से उनसे मिलने गयी थी उसका पूरा ब्यौरा सुनें..!

घर पहुँची तो मन्नू जी नेबोलाइज़र पर थीं! कुछ देर बाद उन्होंने आवाज लगाई - यहीं आ जाओ! पास पहुँचकर मैंने उन्हें बुके और मिठाई थमाते हुए अभिवादन किया!

“अरे वाह! ये मेरे लिए हैं ..!” कहकर कुछ देर तक स्निग्ध हंसी के साथ फूलों को निहारती रहीं! मुझे उनकी कहानी “यही सच है” पर बनी फिल्म रजनीगंधा की नायिका याद आ गयी! आँखें बंद करके रजनीगंधा के फूलों को गालों से लगाकर कैसे प्रेम से लबालब भरी लगती थी!

उन्होंने गीता  (घरेलू सहायिका) को बुलाकर कहा  -“इन्हें डाइनिंग टेबल पर सजा दो!” उसके बाद मिठाई वाले पैकेट की ओर इशारा करके बोलीं -“ये क्या है..?”

“मिठाई है आपके लिये!”

“अरे ये सब मत किया करो!”

“कुछ नहीं .. बस मन किया!  मुझे अच्छा लगता है!” न जाने क्या-क्या चल रहा था मन में लेकिन मैं इतना ही कह पाई! उन्होंने मिठाई का डिब्बा भी गीता के हाथ में थमा दिया!

“अच्छा .. तुम अपनी सुनाओ.. क्या हाल हैं ..? तुम्हारा काम कैसा चल रहा है ? .... देखो मैं भूल रहीं हूँ .. तुम कुछ अच्छा सा काम कर रहीं थीं .. जरा बताओ क्या काम था वो ..?” उनसे ये मेरी चैथी या पांचवी मुलाकात थी! इस बार लगभग एक साल के बाद मिल रही थी! वे बातों-बातों में बार बार दोहरातीं हैं कि उन्हें कुछ याद नहीं रहता! अपनी कम होती याददाश्त से सबसे ज़्यादा परेशानी उन्हें खुद होती है! पर मैं हैरान थी कि पूरी तरह नहीं पर कुछ याद था जो मुझसे जुड़ा था! मैंने उन्हें फरगुदिया ब्लॉग और झुग्गी-बस्ती की बच्चियों की डायरी के बारे में याद दिलाया !

- “अरे हाँ.. हाँ! याद आया .. देखो दिमाग को क्या हो जाता है .. भूल ही गई थी.... बहुत अच्छा काम है .. करती रहना इसे !” वे कुछ याद करती सी बोलीं ! मैं उनसे कहना चाहती थी कि ब्लॉग और डायरी लेखन के लिए अभी पूरा समय नहीं निकाल पा रहीं हूं लेकिन कहा नहीं! क्योंकि उसके बाद अपनी व्यस्तता और उसके कारण बताने पड़ते और वे बहुत मुश्किल से मेरी बात सुन पा रही थीं!

न जाने कितना कुछ भरा हुआ था उनके मन में! एक बात शुरू करतीं.. उसे अधूरा छोड़कर दूसरी बात याद आने पर बताने लगतीं!

“तुम्हारा काम बहुत अच्छा है... इसे करती रहना..!” अचानक मौसम की बात करने लगीं -“अच्छा यहाँ तीन चार दिन पहले सर्दी काफी कम हो गई थी ... टिंकू के यहाँ तो सर्दी कम थी .. वहाँ खूब अच्छे से नहा लेते थे लेकिन यहाँ तो ठंडक है.. आज सबेरे भी ठंड लग रही थी!”

“कल काफी कोहरा हो गया था अचानक और आज भी तेज हवाएं चल रहीं हैं..! मैंने उनकी बात आगे बढ़ाते हुए कहा!”

आज अच्छी लग रहीं थीं मन्नू जी! उनके चेहरे की लगातार मुस्कराहट देखकर मुझे खुशी हो रही थी लेकिन वे मुझे कुछ कमजोर लगीं! मैंने पूछ भी लिया - “मैं इस बार काफी समय बाद देख रहीं हूँ! आप कुछ दुबली दिख रहीं हैं !”

वे हँसती हुई बोलीं - “अरे .. काहे का दुबलापन! खाती हूँ ... सोती हूँ .. मोटी होती जा रहीं हूँ!”

हम दोनों एक साथ हँस पड़े!

“अच्छा .. तुमको सर्दी-वर्दी नहीं लग रही है ..?” मेरे स्वेटर न पहनने की तरफ उनका ध्यान गया था!
मैं हँस पड़ी –“नहीं .. ज्यादा नहीं लग रही है .. मेट्रो की भीड़ में तो गर्मी लग रही थी!’

कुछ देर यूँ ही बातों का सिलसिला चलता रहा! मैं बस हाँ...हूँ...जी...करती हुई उनकी बातें सुनती जा रही थी! मैं उनसे वेलेंटाइन डे के बारे में बात शुरू करना चाह रही थी लेकिन शुरुआत कैसे करूँ, ये नहीं समझ पा रही थी ! डर भी रही थी क्योकि मन्नू जी के पास राजेंद्र जी से जुडी बहुत कड़वी यादें ही हैं! जब भी कभी राजेंद्र जी का जिक्र आया है, वे उनके जीवन में लगातार बनी रही दूसरी महिलाओं से उनके संबंधों का ज़िक्र करके क्षोभ और बेचैनी से भर जातीं हैं! लेकिन न जाने क्यों मैं उत्सुक हो रही थी ये जानने के लिए कि कुछ तो ऐसे मधुर क्षण होंगें जिन्हें याद करके मन्नू जी राजेंद्र जी के प्रति प्रेम से भर जातीं होंगीं ! डरते-डरते मैंने वेलेंटाइन-डे की बात की और कहा- “अच्छा बताइए मन्नू जी! वैलेंटाइन-डे पर आपके बारे में कुछ लिख सकती हूं ?”

मेरी बात सुनते ही तपाक से बोलीं - “तुम मनाती हो वैलेंटाइन-डे ..?”


मैं सहम गयी! एक क्षण को यूँ लगा कहीं नाराज़ तो नहीं हो गयीं मन्नूजी! मैंने डरते-डरते कहा -“मैं मनाती नहीं .. लेकिन अपने ब्लॉग - फरगुदिया पर आजकल के प्रेम से हटकर कुछ अलग नया पोस्ट करना चाहती हूँ!”

मन्नूजी कुछ बुझी हुई सी कहने लगीं- ‘‘ मैं क्या बताऊं बेटा, मेरे शरीर में अब कुछ बचा नहीं है.. सुनाई नहीं देता है.. दिखाई नहीं देता है.. ये जो मेरा भेजा है वो बिलकुल निचुड़कर खत्म हो गया है ... लिख तो मैं कुछ सकती नहीं...! (कुछ देर की चुप्पी के बाद) .. एक दिन मैं रात में अच्छी भली सोई.. खाया-पिया, बातें की, पढ़ा- लिखा.. साढ़े ग्यारह बजे सोई.. सुबह उठी तो देखा मुझे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा.. अब मैं बहुत परेशान..!! मैं आँखें फाड़कर इधर-उधर देख रहीं हूँ और कह रहीं हूँ .. अरे!! मुझे कुछ दिख नहीं रहा, दिख नही रहा.. मैंने घबराकर टिंकू को फोन किया – “टिंकू मैं उठी तो मुझे कुछ नहीं दिख रहा.. वो भी परेशान !! उसने कहा तुरंत ड्राइवर के साथ आप अपने आँख के डॉ के पास जाओ... इस दिन ड्राइवर के आने का दिन भी नहीं था लेकिन उसे बुलवाकर गयी... उन्होंने अच्छी तरह से चेक किया और कहा-आपको कोई प्रॉब्लम नहीं है ..आँख बहुत अच्छी हालत में है लेकिन सर्कुलेशन ऑफ ब्लड रुक जाए तो दिखाई देना बंद हो जाता है! अब मैंने कहा..मैं क्या करूँ ..?? उन्होंने कहा - इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है! अपने आप ही धीरे धीरे रोशनी लौट आएगी! (याद करते हुए कहती हैं ) लगभग सात आठ महीने हो गए शायद...अब थोड़ा थोड़ा दिखना शुरू हो गया है.. (मुझे छूकर) अब ये मुझे दिख रहा है कि तुमने पिंक कलर का कुछ पहन रखा है .. पर मैं तुम्हारा फेस नहीं पहचान सकती.. चेहरा मुझे नहीं दिखाई दे रहा.. एक शरीर है मेरे आगे.. ये दिख रहा है.. रंग भी दिख रहा है.. थोड़े दिनों बाद शायद और दिखाई देने लगे..! मेरे सारे शरीर के अंग बेकार हो गए .. अब मैं क्या करूँ ..!!..कुछ समझ नहीं आता है.. मेरे पास कोई आएगा तो मैं उसे क्या दे सकती हूँ..!”

एक लेखक के जीवन से लिखना पढना छूट जाए तो क्या स्थिति होगी ये आसानी से समझ सकती हूँ मन्नूजी को अचानक इस तरह दिखाई न देने से उनपर क्या प्रभाव पड़ा होगा.. उनकी मायूसी समझ सकती हूँ! लेकिन उनके साथ कुछ समय बिता लेने भर से कितनी प्रेरणा मिलती है .. उसे व्यक्त नहीं कर सकती! उनसे बस इतना ही कह पाती हूँ –“आपके साथ समय बिताने भर से बहुत प्रेरणा मिलती है!”

’’हाँ! आओ, बैठो.. बल्कि टिंकू तो यही कहती है-आपकी बीमारी का इलाज ही यही है-आपके साथ कोई रहे... आपसे बातें करें... आपका मन बहलाये..! .. तो आओ.. रोज आओ.. जो भी मेरे घर आता है अपना घर समझकर आता है और मैं भी उनका स्वागत घर के सदस्य की तरह ही करती हूँ!”

डरते-डरते मैं उनसे अपनी इक्षा जाहिर कर ही देती हूँ -“.मैं बताऊँ ... मैं आपके और राजेंद्र जी के लगभग पैंतीस सालों के साथ और अलग होने के बाद के जीवन के कुछ अच्छे प्रेम भरे पहलुओं को अपने ब्लॉग पर देना चाहती हूँ !.. अगर आप चाहें तो कुछ साझा करें ..!”

उन्होंने मेरी बात ध्यान से सुनी! फिर कुछ रूककर सोचते हुए बोलीं - “देखो .. मैं राजेंद्र जी के साथ पैतीस या तैतीस साल रही लेकिन मैं ये कह सकूँ... कि उसमें उनके साथ कुछ अच्छे दिन रहे ...... ऐसा कुछ था नहीं (कुछ देर की चुप्पी) ..दिन तो लगभग सभी तकलीफदेह थे .. बस एक अच्छाई ये थी उनमें कि वे मुझे लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहित करते थे .. कहते थे, तुम लिखो .. बस तुम लिखो ..देखो तुम्हारा लिखा हुआ कितना सराहा जाता है ... बस मेरा लिखा पढ़कर आगे और लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहित करते थे ....यह उनकी खास आदत थी.....!”
 राजेंद्र जी की बात बीच में ही छोड़कर अपने बारे में बताने लगतीं हैं -.”..और सच कहूँ शोभा .. मैं अगर जिन्दा रही .. अभी की बीमारी छोड़ दो, वह तो एज रिलेटेड है .... पर उसके पहले जो मैंने अपने आपको संभाले रखा .. वो सिर्फ लेखन की वजह से ... अपने लेखन की वजह से ही मैं जिन्दा रही ... किस्मत अच्छी थी कि मेरा लिखा सभी को क्लिक करता था .. मेरे लिखे दोनों नाटक बहुत सराहे गए ..!”

कहते हुए उनकी आँखों में कुछ चमक दिखी! सच ही तो है! घोर पीड़ा भरे उन दिनों में वे लिखकर ही तो अपना दर्द बाँट पाती होंगी! मैं उनकी आँखों में राजेंद्र जी के प्रति प्रेम ढूंढ रही थी लेकिन उनका जिक्र करते हुए वे दुःख और क्षोभ से भर गयीं!

मैं फिर कोशिश करती हूँ! कहीं किसी बात का जिक्र करते हुए शायद मन्नू जी के प्रति राजेंद्र जी के प्रेम की झलक दिख जाए! मैं पूछती हूँ - “तो आपका लिखा पढ़कर खूब प्रोत्साहित करते थे राजेंद्र जी ..?”

“बहुत ....बहुत करते थे! .. कुछ कुछ रचनाओं के लिए तो बहुत करते थे .. कोई लड़की अपनी कहानी लेकर हंस के ऑफिस में गयी थी तो उसने मुझे बताया कि उन्होंने कहा - देखो कहानी कैसे लिखी जाती है मन्नू से जाकर सीखो ... उस लड़की ने मुझे बताया .. ये नहीं बताते थे .. तो मुझे अच्छा लगता था कि चलो कम से कम मेरे लेखन की तो ये इतनी तारीफ करतें हैं .. ये मेरी रचनाओं के प्रशंसक थे! ..लेकिन एक स्टेज के बाद तो संबंधों के मायने भी बदल जातें हैं ... प्रेम व्रेम कोई मायने नहीं रखता ...!” अपनी बात खत्म करते करते प्रेम की बात करते हुए खिन्न होतीं हैं!


मैं जल्दी ही उनकी बात पूरी होने से पहले कहती हूँ - “प्रेम ..मैं आजकल के आधुनिक प्रेम की बात नहीं कर रहीं हूँ जिसमें ज्यादातर स्वार्थ भरा होता है! मैं एक सम्मानजनक प्रेम के भाव की बात कर रहीं हूँ! आपसे अलग होने के बाद तो उन्हें आपकी ज़रूरत या अहमियत महसूस हुई होगी कभी ... फोन पर या...”

मुझे बीच में टोकते हुए कहतीं हैं -‘‘वो अलग होना ही नहीं चाहतें थे .. अलग होना बिलकुल नहीं चाहते थे ... मैंने ही उन्हें आग्रह कर अलग किया! ...क्योंकि उन्होंने आपसी संबंधों का जो दायरा बना लिया था कि घर की और आर्थिक जिम्मेदारियां मैं संभालूं ... वे किसी भी तरह की कोई जिम्मेदारियां नहीं लेगें .. बस घर में बने रहेंगें ... घर नहीं छोड़ेगें ... घर की सुविधाएं और कहाँ मिलतीं! ...लेकिन कौन व्यक्ति होगा जो इतना सहेगा ....?”

(कुछ और भी कहना चाहतीं हैं लेकिन मैं बीच में ही टोककर कहती हूँ ) ..”हम सभी जानते हैं ये सब बातें .. जो कमियाँ थीं वो तो थी ही ..अपनी आत्मकथा में आपने लिखा भी है लेकिन मैं ये चाहतीं हूँ कि आज आप उनकी कुछ अच्छी-अच्छी बातें साझा करें.!”

वे फिर अपनी पहले कही बात दोहराती हैं - “बस, उनका सारा लगाव मुझे लेखन के लिए प्रोत्साहित करने तक था .. बल्कि मुझसे कहते थे कि तुम्हें आसानी से नाम मिल गया है लेखन में इसलिए तुम बहुत लापरवाह हो गई हो .. तुम और मेहनत करके और अच्छा लिखने की कोशिश करो .. पर एक पत्नी की अपनी इच्छाएं, ज़रूरतें होती हैं... आप बीमार पड़े हैं और कोई हाल भी न पूछे.. अपने दोस्तों के साथ फ़ोन पर ठहाके लगाता रहे तो आपको कैसा लगेगा.....!”

"जी, मैं समझ सकती हूँ! बीमार पत्नियां अपने पति की उपेक्षा से कैसे घुटकर रह जाती हैं! बहुत सारे बंधन उन्हे जकड़े रहते हैं! वे अपना मुंह भी नहीं खोल पातीं!"

अपनी बात को पीछे धकेलते हुए मुस्कुराकर मैं पूछ बैठती हूं – “किसी खास दिन से जुड़ी ऐसी घटना जिसमें आपके प्रति उनका प्रेम झलका हो..... जैसे- शादी की सालगिरह के अवसर पर... आपके जन्मदिन के अवसर पर ..?”

मेरी बात पूरी होने से पहले ही कहतीं हैं -‘‘जन्मदिन तो मेरा वो याद ही नहीं रखते थे.. मुझे एक बार बहुत तकलीफ भी हुई .. मेरी एक फ्रेंड थी ..मेरे जन्मदिन के बहाने उनसे मिलने आई और वो तो घर में ही नहीं थे... मुझे बहुत तकलीफ़ हुई! अरे.. कुछ न करते पर कम से कम अपनी उपस्थिति तो दर्ज़ करते..!’’

“अलग होने के बाद भी जन्मदिन याद नहीं रखते थे..?” मैं फिर पूछती हूँ!

“बस, यही बहुत बड़ा फ़र्क आया..!! साथ रहते जिस पति ने कभी जन्मदिन याद नहीं रखा, अलग होने के बाद बराबर फोन करते ... फूलों का बुके भेजते.. साल दर साल.. बल्कि उसके बाद उन्होंने मुझसे अपने सम्बन्ध बहुत अच्छे बना लिए थे..कोशिश करते थे कि मैं उन्हें वापस बुला लूँ.... लेकिन वह संभव नहीं था.. बहुत झेल लिया था मैंने लगातार पैंतीस साल..!”

उनकी बात पूरी होने से पहले ही प्रश्न करती हूँ - ‘‘ उन्होंने कभी आपसे कहा नहीं कि मुझे बुला लो.. मैं आना चाहता हूँ..?’’

“नहीं..ये कहा तो नहीं लेकिन कोशिश बहुत की..! जन्मदिन जो कभी याद नहीं रखते थे, अब हर साल जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर फूल भेजने लगे.. मैं सब महसूस करती थी..अच्छा भी लगता था और टीस भी उठती थी..! (कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर कहतीं हैं ).. सौभाग्य से ये घर मेरा.. एक एक तिनका.. एक एक पाई मेरी.. खरीदने से लेकर बनाने तक सब कुछ मेरा था ...सबकुछ लगाकर मैंने ये घर बनाया था.. तो मैं कह सकती थी न कि आप मुझे अब मुक्त करिये... मैं ऐसा कह सकती थी तो कहा .. अगर ये घर उनका होता तो मैं कैसे कहती...? ..बहुत सी पत्नियां इसीलिए कुछ भी नहीं कह पातीं...मरते दम तक सहती चली जाती हैं!”

पिछली किसी मुलाकात में उन्ही की कही बात याद करती हूँ –‘हिन्दुस्तान के परिवार औरत के कन्धों पर टिकें हैं!’ सच ही तो है..अधिकतर स्त्रियों का अनुभव भी तो यही है! चारदीवारी में अपनों द्वारा ही मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना सहती हुई वे भीतर ही भीतर टूटती रहतीं हैं! फिर भी परिवार को बचाने के लिए अपने आपको मजबूत रखने का भरसक प्रयत्न करतीं हैं!
आगे वही सब बातें दोहराती हैं जो उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- वासु चटर्जी जी, गिरीश अस्थाना का अचानक उनके घर आना और राजेंद्र जी को घर आने देने का अनुरोध करना.. और दृढ़ता से मन्नू जी का उन्हें मना करना.... आदि..आदि....!

बातों बातों में फिर मीता का जिक्र करके खिन्न होने लगतीं हैं! मैं उन्हें आग्रहपूर्वक समझाने की कोशिश करती हूँ! कुछ नकारात्मक याद न करके राजेंद्र जी और स्वयं से जुडी कुछ सकारात्मक, प्रेम भरी यादें साझा करने को कहतीं हूँ!

मैं फिर पूछतीं हूँ –“अलग होने के बाद तो आपकी कमीं महसूस हुई होगी..?”

“अलग होने के बाद तो ये आ गई थी न.. मैत्रेयी! वो इनके बहुत निकट हो गई थी... इनके पास कोई सपोर्ट था नहीं..मैत्रेयी इनके लिए घर का सामान खरीदकर देने लगी.. इनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करने लगी ....!”

घुमा फिराकर प्रश्न पूछकर मैं  दोनों के बीच प्रेम ढूंढना चाहती थी! लेकिन राजेंद्र जी के संबंधों को लेकर वे हर बार कड़वाहट से भर उठती हैं... मैं उन्हें समझाते हुए कहती हूँ- “घर परिवार से अलग हुए पुरुष के जीवन में बहुत सारी स्त्रियां आ सकतीं हैं  लेकिन पत्नी का तो अलग स्थान रहता ही है न ..? दूसरी स्त्रियों के साथ रहे उनके संबंधों को हम भटकाव कह सकतें हैं ..जीवन की ऐसी कुछ चीज़ें उथली होती हैं.. लेकिन कुछ ऐसा भी तो होगा आप दोनों के बीच जो अदृश्य और स्थिर रहा होगा... कहीं न कहीं उनके मन में आपके प्रति कुछ तो अपनत्व भरा .. प्रेम भरा रहा होगा जिसमें आपने अपने प्रति प्रेम महसूस किया होगा..?”

कहतीं हैं – “मन में जरूर था उनके... इसमें कोई संदेह नहीं! कभी-कभी कहते भी थे कि मैं जानता हूँ तुमने बहुत बर्दाश्त किया है मेरे साथ .... लेकिन मेरी अपनी कुछ मजबूरियां हैं..!”

मैं खुश हो गयी उनकी ये बात सुनकर! कुछ तो ऐसा महसूस किया मैंने जिसमें प्रेम की झलक थी! हलकी ही सही! मैंने उत्सुकता से कहा – “चलिए स्वीकार तो करते थे न..!”

“स्वीकार तो करते थे.. बहुत करते थे .. ऐसी बात नहीं कि स्वीकार नहीं किया.. कभी कभी नहीं भी करते थे .. कभी कभी कहते थे – ए! तुम तो जिद लेकर बैठ जाती हो .. अरे क्या है इसमें अगर कुछ अलग है मेरे जीवन में!! ...लेकिन भीतर ही भीतर महसूस भी करते थे कि कोई भी औरत अपने पति के जीवन में दूसरी औरत बर्दाश्त नहीं करेगी..!”

“कभी गिफ्ट दिया उन्होंने आपको ?” मैं प्रश्न करती हूँ!

“हाँ, दिया था ... इनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक तो थी नहीं जो मुझे महंगा गिफ्ट देते... लेकिन एक बार दोस्तों के सामने इन्होंने मंगलसूत्र दिया था... मैं बहुत खुश हुई थी... गिफ्ट के लिए नहीं ..उनके दिल में आये मेरे प्रति प्रेम भरे भाव के लिए..ऐसा नहीं है कि चाहते नहीं थे ... मन में बहुत कुछ रखते थे लेकिन व्यक्त नहीं करते थे..!”

“अच्छा, कैसे महसूस किया आपने कि वो आपको चाहते थे .. कोई घटना बताइये ?” मैंने ये सोचकर प्रश्न किया  कि शायद वे किसी प्यारी-सी याद का जिक्र करें!

“पता चल जाता था.. बातों से..व्यवहार से ..!” मैंने ऐसा महसूस किया मानो कुछ और भी कहना चाहती हैं लेकिन नहीं कहतीं!

कुछ रुककर सोचकर इस बार वे स्वयं ही मेरे पहले प्रश्न के उत्तर में कहने लगतीं हैं –“शोभा, जो सम्बन्ध खत्म हो गया...जब था तब काफी दुखद था....अब नहीं हैं ...तो कैसे कहूँ कि प्रेम था ...कोई प्रेम नहीं था उनके दिल में मेरे लिए ... मत बात करो इस प्रसंग पर ..!” खिन्न होकर वे कहतीं हैं !

मैं भी प्रेम की बातें न करने की हामी भरती हूँ! रचना जी के बारे में बताने लगतीं हैं! वे हंस को किस तरह संभालती हैं! मैं भी “आपका बंटी” उपन्यास का जिक्र करके भावुक हो जातीं हूँ! कैसे पहली बार पढ़ते समय खूब रोई थी-उसका जिक्र करती हूँ! इसी तरह लंच करते हुए कुछ साहित्यिक और कुछ दूसरी बातें होती रहीं!

विदा लेने से पहले एक बार फिर मैं सुधा दीदी की कही बात का जिक्र करते हुए पूछती हूँ – “आपने कभी सुधा दीदी से कहा होगा कि अलग होने के बाद राजेंद्र जी आपका इतना ध्यान रखने लगे थे कि उनके उस आपके प्रति बदले व्यवहार को देखकर आपने उनसे कहा था - "मुझे ये पता होता कि अलग होने के बाद ये मेरा इतना ध्यान रखने लगेंगें .. मेरे बारे में इतना सोचने लगेंगें तो मैं पहले ही इनको अलग कर देती !”

हंसकर मेरी इस बात से सहमत होतीं हैं! उत्साहित होकर कहतीं हैं – “ये सही बात है!! .. मैंने कहा था कि ऐसा मालूम होता कि अलग होने के बाद ऐसे स्नेह जताएंगें तो मैं पहले ही अलग हो जाती ..!”

कुछ देर तक फिर राजेंद्र जी की ही बातें हम करतें हैं! कुछ नकारात्मक.. कुछ सकारात्मक! मैं उनसे पूछती हूँ कि आजकी बातचीत में आप दोनों के जीवन के कुछ सुखद पहलू छनकर आयें हैं उन्हें मैं ब्लॉग पर साझा करुँगी! हँसते हुए फिर वही सब दोहरातीं हैं! लापरवाही से कहतीं हैं – “अरे क्या प्रेम-व्रेम ....बहुत कुछ तो मुझे याद भी नहीं है...खैर तुम्हें इसमें कुछ प्यार नजर आता है तो लिख दो ..तुम्हें प्रेम-दिवस के लिए कुछ मैटर चाहिए लेकिन मैं बताऊँ तुम्हें शोभा ..जो कुछ मैंने झेला ..सहा.. उसके मुकाबले ये दो-एक छुट-पुट प्रेम भरी बातें कुछ मायने नहीं रखतीं.. !”

सचमुच दाम्पत्य में प्रेम और उपेक्षा बहुत उलझी हुई पहेली है! एक पत्नी ताउम्र उसके मकड़जाल में उलझकर रह जाती है जो न सहते बनता है, न कहते!

मैत्रेयी जी का जिक्र मन्नू जी ने ही छेड़ दिया था! न जाने क्यों मैं भी मैत्रेयी जी की नयी किताब का जिक्र शुरू कर देती हूँ! वे ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहतीं हैं- “सुना है मैंने लेकिन अब मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहती .. जब से ये ब्लड सर्कुलेशन वाली समस्या हुई तब से मैं तो सारी दुनिया से कट गयी ... बस ..! धीरे धीरे अब थोड़ा बहुत दिखने लगा है...!”

मैं आश्वासन देती हूँ उन्हें भी उनके साथ अपने आपको भी कि वे जल्दी ही पूरी तरह से स्वस्थ हो जाएं! वे ठीक से देखने लगें लेकिन निराश होकर कहती हैं-“नहीं! अब ये ठीक नहीं होगा... डॉ कहते हैं ... बी हैप्पी.. खूब खुश रहिए.. एक्टिव रहिये... लोगों से मिलिए जुलिये ...! ...हालात तो कुछ ऐसे हैं कि मैं कुछ कर ही नही सकती.. फिर भी मैं कोशिश करके थोड़ा बहुत टहल लेतीं हूँ..!”

अंततः मैं मन ही मन उनके लिए पूरी तरह स्वस्थ होने की प्रार्थना करती हूँ! उनका हाथ थामकर कुछ क्षणों के लिए उनके पास ठहरकर उनसे विदा लेतीं हूँ! बेडरूम से बाहर निकलने लगतीं हूँ तो पीछे से उनकी आवाज सुनाई देती है – “गीता ने वो फूल सजा दिए हैं न ..?”

“जी! ये रहे मेरे सामने ..!” मैं डाइनिंग टेबल पर सजे गुलदस्ते की तरफ इशारा करती हूँ और उनका सौम्य, शालीन मुस्कुराता चेहरा मेरे भीतर ठहर जाता है.......

उनके दांपत्य जीवन में प्रेम था या पहेली ...उन्ही अनसुलझी कड़ियों में उलझकर रह गयी मैं! पति का प्रेम स्त्री का संबल होता है..अभिमान होता है.. पति का दूसरी स्त्रियों से बटा प्रेम भला कैसे कोई स्त्री स्वीकार कर सकती है!
हाँ.. पत्नी के कर्तव्यों को निभाते हुए मन्नूजी का प्रेम निस्वार्थ,एकनिष्ट और समर्पित प्रेम की परिभाषा है मेरे लिए! आजकल के स्वार्थी और सिर्फ भौतिक सुखों की चाह रखने वाले प्रेम से बिलकुल अलग  .......

प्रस्तुति;शोभा मिश्रा

Monday, February 13, 2017

पावन संकल्पों से संकल्पित होकर- सोनरूपा विशाल


 

पावन संकल्पों से संकल्पित होकर- सोनरूपा विशाल 



लेखिका सोनरूपा विशाल से जब भी किसी ख़ास अवसर पर लिखने के लिए कहतीं हूँ वे हमेशा मेरी उम्मीदों पर खरी उतरतीं हैं! विवाह उपरांत भी कैसे उनके सहचर के प्रेम में कोई बदलाव नहीं आया .. उनकी रुचियों को कैसे अपने प्रेम से सींचा .. उसे बहुत खूबसूरती से इस संस्मरण के माध्यम से साझा किया है..



!!संस्मरण!!

मैं जब हँसती हूँ
तुम कहते हो
आह.. चाँदनी सी बिखर गई है!
मेरी अँगड़ाई
तुम्हारे लिए
नदिया की बलखाती लहर है!
मेरा श्रृंगार जैसे बसंत!
मेरी ख़ुशबू हरसिंगार का बगीचा!
लटें बादल!
आँखें डल झील के सजीले शिकारे!
उँगलियाँ मुरलियाँ!
बाँहें गगन!
साँसे पवन!
चाल हिरनी सी!
मेरी नींद जैसे साँझ!
मेरा आँचल जैसे सागर!
प्रेम में तुम मुझमें सृष्टि रच रहे होते हो!
और
ये तुम्हारे प्रेम की शिद्दत है
जिस कारन मुझे ख़ुद में वो सब नज़र आता है
जो तुम्हें मुझमें नज़र आता है !
मैं मुस्कुराती हूँ कभी
कभी बन्द कर लेती हूँ आँखें
कभी एक टक तुम्हें देखती हूँ!
फिर अचानक
तुम्हें अपनी बाहों में गह कर
कहती हूँ कि
जो रची है तुमने
वो सृष्टि अब तुम्हारी हुई!

!!मेरे इन हाथों में तुम गर अपना हाथ नहीं देते,मुझमें कितना प्यार है मैं इससे अनजानी रह जाती!!
ये फरवरी के गुलाबी मौसम की दोपहर थी,तारीख़ 13, जो अब हमें हमारी एंगेजमेंट की तारीख़ के रूप में ज़्यादा याद रहती है ! इस रस्म में हम दोनों के सिर्फ परिवारीजन ही शामिल हुए थे !
उसी शाम जब पापा  रोज़ की तरह क्लब जाने के लिए घर से बाहर निकले, उन्हें सामने एक व्यक्ति और उसके हाथ में बड़ा सा पैकेट जिसे बरेली से कुरियर किया गया था..दिखाई दिया !  ' ये क्या है' पापा ने पैकेट उलट पलटकर  फिर  कुरियर रिसीव किया और उसे अंदर आकर खोलने लगे !  मैं समझ गयी थी कि ये ज़रूर विशाल ने भेजा है !  अगले दिन वैलेंटाइन डे भी था !  मुझे घबराहट हो रही थी कि न जाने पापा क्या कहेंगे!   मैं बहुत झिझक और डर रही थी!   इससे पहले भी विशाल मेरे जन्मदिन पर अचानक रात में आकर मम्मी के हाथ में केक दे कर चलते बने थे और मम्मी अवाक रह गयी थीं !
लेकिन कुरियर देख कर पापा ने कुछ नहीं कहा बस उसको थोड़ा सा ही खोल कर छोड़ दिया!  जिसे हम सब ने बाद में खोला उस पैकेट में बड़ा सा टेडी बेयर, चॉकलेट्स,ग्रीटिंग और रोमेंटिक मेसेज के साथ एक ख़ूबसूरत सी फोटो थी!
उस वक़्त मोबाइल के यूज़र्स कम ही लोग थे !  विशाल के पास मोबाइल था लेकिन मेरे पास नहीं और लेंड लाइन फोन भी घर के बीचों बीच लगा था नहीं तो  विशाल से बोलती कि 'क्या ज़रूरत थी ये सब भेजने की !  वो तो अच्छा हुआ कि आज एंगेजमेंट हो गयी तब आया ये कुरियर, नहीं तो न जाने मम्मी पापा कितना नाराज़ होते!'
ख़ैर एंगेजमेंट और शादी में कुछ ही दिनों का फ़र्क था!  दोनों परिवार शादी की तैयारियों में व्यस्त थे! एक दिन सुबह-सुबह नहा धो कर मैं अपने लंबे बाल सुखाने धूप में बैठी ही थी कि कॉल बेल बजी,देखा तो दो लोग दरवाज़े पर थे !
उस वक़्त जिन्होंने भी उन्हें रिसीव किया उन्होंने आकर बोला कि दो कैमरामेन हैं विशाल जी ने उन्हें भेजा है!  मम्मी ने उन्हें अंदर लेकर आने को कहा! मम्मी के पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें मेरे कुछ फोटोज़ लेने हैं, मम्मी ने इजाज़त दे दी ! शादी की तैयारियों के दौरान शायद एक दो बार से ज़्यादा विशाल से मेरी बात नहीं हुई थी ,जो मुझे विशाल क्या कर रहे हैं इस तरह का कुछ  पता चलता!  उस दिन मैंने कई तरह की ड्रेसेज़ में फोटोज़ खिंचवाए!
दिन जल्दी-जल्दी बीत रहे थे ! अब शादी कर के मैं ससुराल आ गयी थी!
रस्मों रिवाज़ पूरे करके जैसे ही मैं अपने कमरे में आयी तो सबसे पहले मेरी निगाह दीवार पर लगी मेरी बड़ी सी तस्वीर पर पड़ी ! देखते ही मैंने मन ही मन सोचा 'वाओ मैं और इतनी सुंदर'!  यक़ीन नहीं हुआ उस वक़्त !  काले रंग के शरारे में, काली बिंदी लगाये हुए और खुले बालों में मेरा ये फोटो मुझसे पहले मेरे यहाँ होने का एहसास करवा रहा था!
पूरे कमरे में मेरी पसंद का असर दिखाई दे रहा था !  नये घर में ऐसा ख़ुशनुमा अनुभव मुझे नई जिंदगी के प्रति आशान्वित कर रहा था!
अब एक और नई मुस्कुराहट मेरा इंतज़ार कर रही थी !

कमरे में दो अलमारियों में से एक अब मेरे लिए दे दी गयी थी जिसे खोलते ही मुझे उसमें एक पेपर रखा हुआ मिला जिस पर नीरज जी का लिखा हुआ मेरा बहुत पसंदीदा गीत था !

'फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज़ पाती,
कैसे बताऊँ किस किस तरह से हर पल मुझे तू सताती
तेरे ही सपने लेकर के सोया
तेरी ही यादों में जागा.....!
मैंने उसे वैसे का वैसा ही रख दिया! इस वक़्त कमरे में मैं अकेली थी तो जम के कमरे का मुआयना कर रही थी! अब मैंने बेड से लगी हुई दराज़ खोली ....अरे यहाँ भी वही गीत लिखा हुआ पर्चा!  म्यूज़िक प्लेयर ऑन किया तो उसमें भी यही गीत बज उठा ! मैं अचरज में थी कि ये क्या माजरा है !  इतने में मेरी ननद आ गईं मैंने उनसे इस बारे में पूछा तो वो ख़ूब हँसने लगीं बोलीं 'जब भैया का हमसफ़र इतना सुरीला है तो उसे इम्प्रेस करने के लिए कुछ तो गाना वाना गाएंगे न!  भाभी ये गाना भैया आपको सुनाने के लिए याद कर रहे थे,शादी की व्यस्तताओं में याद नहीं कर पा रहे थे तो जगह-जगह लिख कर रख लिया और याद करते रहे!
मुझे हँसी आ गयी! वो दिन है और आज का दिन है विशाल से जब भी कोई गाना सुनाने को कहती हूँ तो यही गाना सुनाते हैं और मैं दोबारा उन्हीं पलों को जी लेती हूँ !
ऐसे अनगिन पल हमारे पास हैं जिसने हमारे प्रेम को आकाश सा विस्तार और चाँद तारों सी रौशनी दी है !
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न जाने कितनी ग़ज़लों,गीतों में पिरोया है मैंने अपने प्रेम को !अपनी कैफ़ियत तो बयां करने की फ़न ईश्वर ने मुझे दिया है लेकिन अक्सर जब विशाल को अपने अहसासात कहने के लिए शब्द नहीं मिलते तो मेरे इसी फ़न से वो थोड़ी-थोड़ी जलन महसूस करते हैं ! मैं मुस्कुरा देती हूँ और कहती हूँ
'भले ही न हों तुम्हारे पास शायराना लफ़्ज़, न हों तुम पर प्रेम में पगे हुए शब्दों का ख़ज़ाना लेकिन तुमने एक संवेदनशील,भावुक पत्नी को कभी बिखरने नहीं दिया है तुम मुझे इतना समझते हो कि जब मैं कुछ लिखने की प्रक्रिया में होती हूँ ,तुम बहुत ज़रूरी होने पर भी मेरे ख़्यालात की दुनिया में दस्तक नहीं देते!मेरी हर उपलब्धि जैसे तुम्हारी उपलब्धि है ,ऐसी बहुत सी बारीक बातों से मैंने जाना है ये तुम्हारा समर्पण है मेरे प्रति!
जीवन में आयी हर परिस्तिथि, हर ज़िम्मेदारी निबाहने में तुम मुझे सक्षम पाते हो, ये तुम्हारा विश्वास है मेरे प्रति!
मेरी कई रुचियों की पौध तुम्हारे साथ और समर्थन से लहलहा उठी हैं ! मेरे आकाश,निजता,विस्तार को तुमने सदा सम्मान दिया है! ऐसी कई भागीदारियाँ जतलाती हैं कि ये तुम्हारा आदर है मेरे व्यक्तित्व के प्रति!
मैंने तुम्हें 'तुम' रहने दिया है और तुमने मुझे 'मैं'!हमारी ये समझदारी हमारे 'हम' होने में बहुत अहम है !
समर्पण,विश्वास,आदर,सम्मान जैसे रंगों से मिलकर प्रेम की तस्वीर बनती है!'




मैं एक गीत अपने प्रेम को समर्पित करते हुए संस्मरणों की असीम श्रृंखला के इस अंश को पूर्ण कर रही हूँ!


!! गीत !!

रेशम रेशम ख़्वाब सजाना आया है
प्यार तुम्हारा जब अन्तर में छाया है

दुनियादारी में अब कोई सार नहीं
मन ये बातें सुनने को तैयार नहीं

प्रेम का हर पल सचमुच कितना अद्भुत है
मेरा ही मुझ पर कोई अधिकार नहीं

प्यार है ये कोई या कोई माया है
प्यार तुम्हारा...............................!

पावन संकल्पों से संकल्पित होकर
ख़ुश रहती हूँ तुमसे अनुबंधित होकर

तुमको अपने मन में अंकित करके मैं
और तुम्हारे मन में मैं अंकित होकर

गुमनामों में अपना नाम लिखाया है
प्यार तुम्हारा................................!

मरुथल से इक झील हुए हम तुम मिलकर
उजियारी कंदील हुए हम तुम मिलकर

एक लहर पानी में ज्यों घुल जाती है
ऐसे ही तब्दील हुए हम तुम मिलकर

हर शय ने हम पर अमृत बरसाया है!
प्यार तुम्हारा...............................!

-- सोनरूपा विशाल 

मुझमें रही न हूं - रोहिणी अग्रवाल






हिंदी की प्रेम कहानियाँ - जिनमें प्रेम के रूप में सिर्फ समर्पण, त्याग और गूढ़ आस्था का चित्रण है, उस स्थापित प्रेम के स्वरुप की आलोचनात्मक शिनाख्त करता रोहिणी अग्रवाल जी का सारगर्भित लेख ..


तूं तूं करता तूं भया, मुझमें रही न हूं

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प्रेम से भी ज्यादा मनोहारी है प्रेम की कल्पना। किसी अतींद्रीय लोक में ले चलती जहां न सामाजिक दबाव और वर्जनाएं हैं, न लोभ-मद-मत्सर। है तो प्रेम करने और पाने की अकुंठ स्वतंत्रता! इतनी कि प्रियजन एकाकार होकर अपने अलग.अलग अस्मिता ही भूल जाएं। मानो प्रेम और कुछ नहीं, आत्मविस्मृति के जरिए आत्म विस्तार की सर्जनात्मकता का आह्लाद है।

अमूमन हर साहित्यानुरागी अपने पाठक-जीवन के प्रारंभिक चरण में प्रेम कहानियों के रस से सराबोर जरूर हुआ है। खुली आंखों और पन्नों पर कसे हाथ में किसी अदृश्य तूलिका के साथ वह हृदय की भीतरी गहराइयों में उतर कर कब अपने सपनों और कल्पनाओं को प्रेम की तरल रंगत में डुबोने लगता है, पता ही नहीं चलता। प्रेम उसे मुक्त करता है और उसकी अदना सी हैसियत को सृष्टि का विस्तार और गहराई का आधार देने लगता है। लैला-मजनू, शीरी-फरहाद, राधा-कृष्ण, रोमियो-जूलियट, युसूफ-जुलेखा की कितनी ही कहानियां मुझे अपने सम्मोहन में बांधने लगी हैं। समर्पण, त्याग, विरह की मीठी यादें और मिलन की उदग्र आशा - लगता है इन मनोवृत्तियों और मनोकांक्षाओं के बीच चहलकदमी करती कोई भाव हिलोर है प्रेम। 'लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल' वाली स्थिति जिसे आध्यात्मिक संदर्भों का बाना पहनाकर कोई रहस्यवाद का नाम देना चाहिए तो भले ही दे ले, लेकिन है तो वह नारसिस जैसी आत्ममुग्धता की पराकाष्ठा।

मैं रुक जाती हूं। एक ही सांस में दो परस्पर विरोधी बातें! बरजती हूं खुद को कि प्रेम का अर्थ रोमानी हो जाना नहीं है, सामाजिक संदर्भों में प्रेम के स्वरूप और तत्वों की आलोचनात्मक शिनाख्त करना भी है। विश्व की तमाम प्रेम कहानियों के साथ हिंदी की प्रेम कहानियां दबे पांव मेरी स्मृति में चली आई हैं। 'अरे, यह क्या''ए मैं चौंक जाती हूंए ''प्रेम कहानियों में प्रेम ही नहीं!'' देखती हूं, 'उसने कहा था' में प्रेम की स्मृतियों को जगा कर इमोशनल ब्लैकमेलिंग करती सूबेदारनी के भीतर की प्रेमिका को धकियाकर पतिव्रता पत्नी और ममतामयी मां आ बैठभ् है जो अपनी गृहस्थी को बचाने के लिए अतीत के प्रेमी से जान की कुर्बानी लेने में भी नहीं चूकती। 'जान्ह्वी' कहानी में 'दो नैना मत खाइयो जिन पिया मिलन की आस' कहकर अपने प्रेम को महिमामंडित करती जान्ह्वी की पीड़ा जरूर है, लेकिन ऊपरी सतह खुरचते ही वहां पितृसत्तात्मक व्यवस्था की अहम्मन्यता के साथ.साथ स्त्री-पुरुष स्टीरियोटाइप्स यथावत बनाए रखने की सजग लेखकीय चेष्टाएं भी हैं। 'यही सच है' में दीपा का द्वंद्व नहीं, दो प्रेमियों में से किसी एक का चयन कर अपने भविष्य को सुरक्षित कर लेने की सजग भौतिक चिंताएं हैं तो 'तीसरी कसम' में प्रेम की नक्काशीदार कल्पना के सुख में स्त्री के सौंदर्य और यौवन का भोग करने की लोलुप प्रवंचनाएं हैं। मनोजकुमार पांडेय की कहानी 'और हंसो लड़की' में ऑनर किलिंग को वैध ठहराती सामाजिक दरिंदगियां हैं जो प्रेम कर सकने वाली स्त्री की स्वतंत्र निर्णय क्षमता से खौफ खा कर हत्या और आतंक को अपने वर्चस्व का पर्याय बनाती हैं। फिर वंदना राग की कहानी 'यूटोपिया'! यहां प्रेम वासना का रुप ही नहीं लेता, अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति अपने मन में पलती घृणा को घिनौने प्रतिशोध में बदल देता है। तो क्या प्रेम विडंबना का दूसरा नाम है?

लेकिन 'कोसी का घटवार' के गुसाईं-लछमा और 'आषाढ़ का एक दिन' के विलोम की प्रिय के प्रति निष्कंप आस्था और अकुंठ समर्पण की भावना देख मैं अपने ही कथन को सुधारने लगती हूं कि प्रेम हर विडंबना का सहज स्वीकार है। प्रेम है, तभी तो विडंबनाओं के दुर्दांत हस्तक्षेप से अपने को बचाना आसान हो जाता है।

प्रेम का दुर्भाग्य यह है कि इसके अखंड-समग्र रूप को जाना-पहचाना नहीं जा सका है। वह औदात्य की पराकाष्ठा या वर्जनाओं का घटाटोप अंधेरा बनाकर रूढ़ियों में बांध दिया जाता है। साहित्य की दुनिया से परे यथार्थ जगत के कस्बाई और ग्रामीण जीवन में यह 'उच्छृंखलता' या 'शर्म' के रूप में आता है तो महानगरीय संस्कृति में 'आधुनिकता' और 'स्टेटस सिंबल' बन कर। दावा किया जाता है कि प्रेम समय और मनुष्य का संस्कार करता है, लेकिन देखा यह गया है कि अपनी ही भौतिक लिप्साओं और संकीर्णताओं में खोया हुआ समाज प्रेम को लोभ, भोग और वासना में तब्दील करते.करते निजी जायदाद की जद में ले आता है। तब प्रेम में एक ही धरातल पर खड़ी दो संवेदनशील-विवेकशील मनुष्य अस्मिताएं अपना वजूद खोकर जेंडश्र में तब्दील होने लगती हैं, यही नहीं, नेपथ्य से निकलकर आती पितृसत्तात्मक व्यवस्था 'कांता सम्मत उपदेश' देते हुए स्त्रीसे एकनिष्ठ भाव से प्रेम, त्याग, समर्पण, नैतिकता, और मनुष्यता के उंचे-गहरे मूल्यों को संभाले रखने की अपेक्षा करने लगती है, और प्रेम (भोग) का चश्मा पहन कर पुरुष को इधर-उधर हर हरे भरे खेत में मुंह मारने का लाइसेंस दे देती है। प्रेम चूंकि हर तरह के द्वैत, विभाजन और विषमता को अस्वीकार करता है, इसलिए यह 'वसुधैव कुटुंबकम्' का कानफोड़ू नारा बन कर नहीं आता, किसी के अंधेरे कमरे में दीया जला कर अदृश्य हो जाने की साधना में ढल जाता है। अंदर की मनुष्यता का उत्खनन है प्रेम, और एक ऐसी शै जिसका उत्स, अस्तित्व और लक्ष्य सब एक है - प्रेम।

प्रेम बुलबुले की तरह उग कर फूट पड़ने वाली क्षणिक स्थिति नहीं है। इसलिए असफल प्रेम की अभिव्यक्ति के नाम पर वह एसिड अटैक, बलात्कार या हत्याकी कायर साजिशों में उभर कर अपने को गिराता नहीं, आकर्षण को हार्दिकता और उत्तेजना को सृजन के आनंद में तब्दील कर 'चितकोबरा' उपन्यास के मनु-रिचर्ड और 'मढ़ी का दीवा' के जगसीर-भानी की तरह प्रेम की परिधि मे हर दबी-कुचली अस्मिता को ले आता है। आज यदि साहित्य में प्रेम 'वन नाइट स्टैंड' या दैहिक तृप्ति का एक माध्यम मात्र बन कर रह गया है तो समाज के विघटनशील चरित्र के साथ-साथ साहित्यकार की सृजनशीलता के क्रमश- क्षरित होते चले जाने का भी सूचक है।निजता की क्षुद्रताओं से खींच बाहर कर चिंतन की ऊर्ध्वगामी दिशाओं को मनुष्य, समाज और सृष्टि के साथ जोड़ देने पर उसमें दर्शन की जो गहराइयां आती हैं, दरअसल वहीं प्रेम का घर है। दो मनुष्यों के बीच आकर्षण की लुकाछिपी से शुरु हुआ प्रेम अपने भीतर के कल्मष को धोने की प्रक्रिया में इतना नि:संग और समर्पित, दृढ़ और लचीला, एकांतप्रेमी और सार्वजनीन बन जाता है कि वह अंततः अपना मूल रूप खोकर आत्मानुशासन में बंधी स्वाधीन प्रेरणा का प्रचारक बन जाता है।

आज की उपभोक्ता संस्कृति के लिए प्रेम भीषण गर्मी में कुल्फी का लुत्फ उठाने की ऐयाशी भले हो, दरअसल यह कोमलता और संवेदना के सहारे सिरजी वैचारिक उदारता के साथ मनुष्यता के संरक्षण का पहला और आखरी कदम है। चूंकि साहित्य यथार्थ जगत की अपूर्णताओं की जीरॉक्स प्रति नहीं है और न उन से पलायन की युक्ति, इसलिए उसे ही हिंसा और उन्माद से संत्रस्त समाज को बताना होगा कि प्रेम विश्वास और सद्भाव की खोई हुई निधियों को पाकर भीतर तक समृद्ध हो जाने के ऐश्वर्य का दूसरा नाम है।

-डॉ रोहिणी अग्रवाल
डीन, मानविकी संकाय महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक
9416053847

(साभार जनसत्ता )

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