Wednesday, February 20, 2013

सायबर लव - आलेख, मनीषा कुलश्रेष्ठ


 सायबर लव        
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"सोशल नेटवर्किंग साईट्स से घर बैठे हमें बहुत महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिल जातीं हैं , इस आभासी दुनिया के मित्रों से मिलकर बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है लेकिन सायबर प्यार के मामले में ज़रा संभलकर रहने की जरुरत है, इंटरनेट के माध्यम से डिस्काउंट में मिले प्रेम से ज़िन्दगी संवरने के चांसेज कम होतें हैं , डिप्रेशन में जाने के ज्यादा होतें हैं ... 'अहा ज़िन्दगी '  फरवरी माह के प्रेम महाविशेषांक में प्रकाशित कथाकार,उपन्यासकार मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखा  आलेख 'फरगुदिया' पर आप सभी के लिए ..."  


सायबर लव और सायबर संबंध भले ही भारत में, इस दशक के उत्तरार्द्ध में मध्यमवर्गीय शहरों और मध्यमवर्गीय समाज में लोकिप्रिय हुए हों, मगर पन्द्रह साल पहले भी चैट रूम्स में सायबर रोमांस, सायबर फ्लर्टसायबर सेक्स अस्तित्व में थे. तब सोशलनेटवर्किग साइट नहीं हुआ करती थीं. उन्हीं दिनों से सायबर रोमान्स के चलते विकसित देशों में बहुत से दिल जुड़े  भी तो दिल टूटे भी, घर बसे भी, उजड़े  भी. टूटे दिलों और उजड़े  घरों के लोग मनोवैज्ञानिक सहायता के लिए मनोचिकित्सक के क्लिनिक के लिए जाने लगे. फिर वह समय आया जब अमेरिका और जापान में तभी सायबर रोमान्स पर सायकियाट्रिक वर्कशॉप होने लगी थीं. इन दस सालों में बहुत सारी अजीबोगरीब सायबर सफल प्रेम, सायबर मैरिजेज, सायबर असफल प्रेम, सायबर प्रेम अपराध, सायबर डेट रेप की कहानियां सामने आईं. इस किस्म के प्रेम पर चर्चित देशी (मित्र)और विदेशी फिल्में(यू हैव गॉट मेल) बनीं.  जुकरबर्ग़ के स्वयं के प्रेम ने फेसबुक को इतना बड़ा माध्यम बना दिया.

अब जिस तरह से आम भारतीय सोच में बदलाव आया है और इंटरनेट का बूम आया है, युवा, सोशल नेटवर्किंग साइट्स का दीवाना होने लगा है. जिस तरह से सायबर प्रेम परवान चढ रहा है, मुझे लगता है जल्दी ही हमें भी ऐसी ही मनोचिकित्सकीय कार्यशालाओं की जरूरत पड़ने लगेगी. बीसवीं सदी के बीतते हुए पनपी इस तकनीकी को सलाम कि सायबर स्पेस ने हमारी सामाजिक सीमाओं को विस्तार दिया है और हमारी काम करने की पद्धत्ति को बदला है. मगर इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के ही साथ इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग और ऑनलाइन डेटिंग की वेबसाइटों के चलते जाने कितनी सायबर प्रेमकहानियों ने स्क्रीन पर जन्म लियाकुछ भ्रूणावस्था में ही मर गईं¸ कुछ स्क्रीन पर ही बनीं और बिखर गईं¸ कुछ सफल सायबर प्रेम कहानियां बनी और विवाह में परिणत हुईंदेश की सीमाओं के भीतर और तमाम वैश्विक हदों के बाहर जाकर मिसाल बनीं . कुछ प्रेम अपराधकथाओं में बदल गईं. सायबर प्रेम की गाथाएं लिखने बैठें तो सच्चे अनुभवों पर कई कई महाकाव्य बन जाऐंगे.

सायबर प्रेम यानि ई - क्रश, या 'क्रॉसिंग द लाईन ऑनलाईन'. कुछ भी कह लेंप्रेम तो प्रेम है. प्रेम में पडना अपने आप में एक सम्मोहन है. प्रेम शब्द से प्रेमएक मानसिक अवस्था है, अति होने पर मनोविकार भी.

          इतिहास गवाह है कि स्त्री और पुरुष अपने लिए सही जीवनसाथी पाने के लिए या प्रेम भर करने के लिए, सदियों से तरह  तरह के साधनों का उपयोग करते रहे हैं¸ चाहे वे कबूतर हों¸ दूतियां हों¸ चूडी बेचने वालियां हों. सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मिनी और चित्तौडग़ढ क़े महाराणा रतनसिंह और अलाउद्दीन खिलजी की प्रेम¸ अंधे आकर्षण¸ शौर्य और बलिदान की यह ऐतिहासिक त्रिकोणात्मक गाथा पुष्टि करती है इन साधनों की. सत्तर¸ अस्सी और शुरूआती नब्बे के दशक में प्रेम हरेक को सहज सुलभ नहीं था, कॉलेज और रेस्तरां लडक़े - लडक़ियों से भरे तब भी थे¸ मगर अभिव्यक्ति के माध्यम अतिसंक्षिप्त थे. दिल की बात कई बार जबां पर ही अटक जाती थी, अस्वीकृति का भय लगातार बना रहता था. अब सायबर स्पेस है न यही वजह है कि ज्यादा से ज्यादा कुंवारे सायबर - खाक छान रहे हैं.
आजकलबेहतर साथी की तलाश में. पहले की तरह यह नहीं कि मोहल्ले की सबसे ठीक कन्या पर आकर सब्र कर लिया जाए या क्लास में महज एक ढंग का अनार हो और सारे के सारे, सौ बीमार हों.

हालांकि ऑनलाइन संबन्ध, सहज सम्बन्धों से एकदम अलग तरह से विकसित होते हैं. लव एट फर्स्ट साइट की जगह लव एट फर्स्ट बाइट. इस सायबर प्रेम में दैहिकता की सीमा पाटने के लिए इसकी अपनी भाषा विकसित हो चुकी है¸ संक्षिप्त और मारक मसलन ठहाके के लिए LOL¸ आलिंगन के लिए < >¸ कस के आलिंगन करना हो तो <<< >>>¸ चुम्बन के लिए हैं इमोटीकोन्स. फिर स्माइलीज हैं न जो आपकी मनोदशा बताते हैं चैटिंग के दौरान. सक्सेसफुल ऑन लाईन डेटिंग के गुर बताती हैं कई वेबसाइट्स¸ जबकि ऑनलाईन डेटिंग को भुना रही हैं कई वेबसाइट्स. ऑनलाईन डेटिंग में आम प्यार की तरह ही आनंद और पीड़ा दोनों आपको प्रसाद में मिलते हैं. यहां कुछ कह नहीं सकते, कि आपको क्या मिलने वाला है प्रेम के नाम पर,  चांसेज फ़िफ्टी - फिफ्टी! आपको आपका सच्चा प्रेम भी मिल सकता या एक अच्छा - खासा धोखा भी. मान लीजिए कि पटना की प्रमिला 'क्यूट पॅमेला' बन कर रामपुर के रामभरोसे बनाम 'रैम्बो' को सायबर डेट कर रही है, पिछले सात महीने सेदोनों की सायबर उम्र कुछ भी हो सकती है और असल उम्र कुछ और. यही बात पेशे और शैक्षणिक स्तर पर भी आ जाती है. सायबर विस्तार अपने आप में बहुत विस्तृत होते हुए भी अलग तरह की सीमाएं रखता है. छल और धोखे की शत - प्रतिशत संभावनाएं यहां हैं¸ अज्ञात और गोपनीयता के पर्दे में लिथड़ा प्रेम कई बार बहुत दुखदायी हो जाता है. ऐसे में आप चैटरूम में किसी अनजान कूल डूड या क्यूट बेब या फिर लकी लिप्स या माचो मैक के प्रेम की आड़ में बस फालिंग इन लव की चक्करदार जाईंट व्हील की राइड का मजा भर ले रहे होते हैं. जो हो सकता है सच में मिलने पर निराश- हताश करे. या फिर आप चारों खाने चित्त धाराशाई मिलें.

        आईए जानें कि मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं एक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इंटरनेट पर अकसर लोग अपनी आभासी छवि पेश करते हैं. जानकर भी और अनजाने भी ऑनस्क्रीन इमेज में अकसर लोग अपनी वह छवि बनाते हैं जैसा कि वे खुद को देखना चाहते हैं¸ या इस खामख्याली में रहते हैं कि वे ऐसे हैंअपने व्यक्तित्व का सच में खुद उनको नहीं पता होता है विरोधाभास उनकी सायबर छवि में खूब दिखता हैवहां वो गढ़े हुए यानि ऑल्टर्ड सेल्फ होते हैं¸ अपनी आदर्श छवि में बंधे हुए स्वयं को पेश करते हुए. अपनी व्यक्तिगत और असल छवि को लेकर उनमें आत्मविश्वास नहीं होता. वे खुद भी महसूस करते हैं कि वे जब ऑनलाइन होते हैं तो ज्यादा खुश और आत्मविश्वासी होते हैं. ये चीजें सायबर संबंध को भुरभुरा बनाती हैं. रोमांच, सायबर रोमांस का पहला गुण है. एक दूरस्थ अजनबी में प्यार को खोज पाने का रोमांच. फरफेक्ट सोलमेट ढूंढने के चक्कर में एक से दूसरा, तीसरा, फिर न जाने कितने सायबर प्रेम. सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर इनबॉक्स प्रेम बड़ा लोकप्रिय है, रंग लगे न फिटकरी....परफेक्शन प्रेम का किश्तों में, इसमें यह तो उसमें वह ! यह तय है कि इसायबर संबन्धों में एकनिष्ठता भी फिर वर्चुअल ही होती है, हर बार प्रेम में पड़ने का रोमांच ज्यादा से ज़्यादा होता है. भले ही आज का आपका परफेक्ट सोलमेट एकदम कल ही एक भ्रम साबित हो! वह एक ऊबी हुई गृहणी या कॉल सेन्टर में बैठा कोई टेलीकॉलर हो सकता है¸ या फिर कोई सायको अधेड. वजह यही है कि इंटरनेट को प्रेम के नाम पर एक पलायन की तरह इस्तेमाल करने का आंकड़ा बढ ग़या है. ऊबे हुए लोग¸ हीनभाव से ग्रस्त लोग इस अवास्तविक संसार से बहुत आकर्षित होते हैं. वे सोचते हैं कि हम बस वही हैं, जो हम टाईप करते हैंलिखते हैंकहते हैं. अपने रूपरंग¸ व्यवहार¸ वजन और स्टायल और छवि को लेकर यहाँ आसानी से झूठ बोला जा सकता हैहाल ही में एक भारतीय लडक़ी ने दूर विदेश में बैठे एक लडक़े को ऐश्वर्या राय का फोटो भेज कर लिख दिया यह मैं हूँ. अब अंतर्राष्ट्रीय खबर बन चुकी ऐश को किसी चैनल पर देख कर विदेशी लडक़े ने इस बात पर हंगामा काटा और यह खबर भारतीय मीडिया में भी आ गई. बल्कि अब तो यह आस-पड़ोस और परिवारों में होने लगा है कि सोशल नेटवर्किंग साईट पर प्रेम हुआ और स्कायप’ पर सगाई. जब शादी हुई तो कभी नियामत साबित हुई तो कभी ‘कयामत’ !

ऑनलाइन रोमांस में दूसरी चीज स्पीड होती है. आकर्षण और निकटता के बीच ऐसी कई धीमी अवस्थाएं होती हैं¸ जिनमें बार - बार मिल कर एक - दूसरे को समझना और हल्का आशंकित होना भी है. लेकिन इस स्पीड के चलते प्रेम की ऐसी कई जरूरी अवस्थाएं अनजान छूट जाती हैं, जो कसौटी का काम कर सकती हैं. ऑनलाईन रोमांस में आकर्षण और निकटता के बीच कुछ नहीं होता. आकर्षण¸ इंस्टेन्ट अभिव्यक्ति और फिर सायबर लव जो कि न जाने कब 'सायबर लस्ट में बदल जाता हैफिर एक समय बाद यह भी उबाऊ होने लगता है. इस प्रेम का त्रिआयामी चित्र पूरा कभी सामने नहीं आता. एक व्यक्ति को व्यक्तित्व बनाने में बहुत से आयाम काम करते हैं. ऑनलाइन टायपिंग से आप व्यक्ति का स्वभाव¸ काम¸ गुण पूरा पूरा नहीं जान सकते. आप नहीं जान सकते कि उसे कब किस बात पर गुस्सा आता है¸ उसके कपड़े  पहनने का ढंग कैसा है¸ वह हकलाता है या बोलता है तो मुंह से थूक गिरता है, या उसकी चाल में लचक है.
यह सच है कि कुछ हद तक, किसी न किसी तरह का 'सायबर सम्बन्ध' संभव है. सायबर आकर्षण की अपनी जगह है, इस संसार में. मगर सायबर प्रेम? क्या यह संभव है?
मैं पूरी तरह से सहमत हो ही नहीं पाती कि यहाँ लोग अपने सही रूप में खुद को कंप्यूटर स्क्रीन पर पेश करते होंगे. सायबर दुनिया में लोग वह सब चीजें कह - सुन लेते हैं जो वो रू-ब-रू कभी कहने का साहस न जुटा पाऐंगे. यहां वे संकोचहीन होते हैं, बल्कि यह संकोचहीनता की अवस्था 'अति' पार करके मनोवैज्ञानिक ग्रंथि बन जाती है. संकोचहीनता की यह अति एक परदे के पार, एक परदे के पीछे 'अज्ञात' बन जल्दी ही किसी अजनबी को अपना सब कुछ बता देने, किसी पर भी सहज ही विश्वास कर लेने, बहुत निकट महसूस करने की हदों के पार ले जाती है. सायबर स्पेस में अंतरंगता बहुत तेजी से विकसित होती है.

सायबर-स्पेस के सोशल-नेटवर्क में आमतौर पर लोग खुद को वैसा प्रस्तुत करते हैं जो उनकी कल्पनाओं के अनुसार आदर्श होता है मगर सच्चे तौर पर नहीं. वे अपने 'आल्टर्ड सेल्फ' और 'आल्टर्ड ईगो' के साथ आपके सामने होते हैं.  मैं इसे 'प्रोजेक्टिव आइडियलिज्म' कहूंगी. जब आप सामने वाले को देख,सुन,महसूस नहीं कर रहे होते हो, बस एक खाली स्क्रीन और कीबोर्ड आपके सामने होता है, तब हम अपनी उन खूबियों को पेश करते हैं जो हमें बेहद पसंद होती हैं. चाहे वे हममें हो न हों. हम अपने ही सपनों के 'खुद' बन जाते हैं.उसमें हम वो सारे रंग भरते हैं जो खूबियां हमें दूसरों में पसंद होती हैं. फिर जब सामने भी कोई है तो वह भी इस मानसिकता के तहत यही सब करता है, वह प्रतिक्रिया में आपके 'आइडियल प्रोजेक्शन' की होड़ में अपना भी आदर्श स्वरूप प्रस्तुत करेगा ही न ! वह क्यों पीछे रहेगा? आप की सोच में वह अपनी सोच जोड़ेगा, कई बार आपको लगेगा कि  'वाह ! यह कितना कुछ मेरे जैसा है न!' या 'कितना समझता है यह मुझे' यही पहला कदम है सायबर आकर्षण का. इंटरनेट पर आपके 'आदर्श स्व' को हवा देने वाले और सायबर रोमान्स को उकसाने वाले 'इंटरनेटी केसेनोवा' भरे पड़े  हैं. जिन्हें अमरीकी मनोवैज्ञानिक सायबरहोलिक्स या इलेक्ट्रॉनिक कोल्ड टर्कीज का नाम देते हैं.

ऑनलाईन फ्लर्टिंग की शुरूआती हल्के - फुल्के संवाद के बाद शुरू होती है. ऑनलाइन डेटिंग या सोशल नेटवर्किग साइट के पन्नों पर या फिर चैटरूम में. शुरूआत अकसर व्यक्तिगत बातों के शेयर करने से होती है. फिर दो अजनबी एक दूसरे के दोस्त बनने लगते हैं. धीरे - धीरे दिल खुलते हैं. - मेल्स या मैसेजेज का एवेलान्च आता है. वर्चुअल उपहारों, फूलों के चित्र, चुम्बनों वाले स्माइली, एनीमेटेड लव सिग्नल्स अदले - बदले जाते हैं. कोई भी प्यार भरा दिल इस सब के संक्रमण से ग्रसित हुए बिना फिर रह सकता है भला? हर बार धडक़ते दिल और पसीजी हथेलियों से आप माऊस थामते हैं. अपने इनबॉक्स में नई ई - मेल या सोशलनेटविर्किग साइट के आपके प्रोफाइल पेज पर नया मैसेज या नोट देख कर पेट में गड्ढे बनते - बिगडने लगते हैं. फिर तस्वीरों की अदल बदल की बारी आती है. सच्ची तस्वीर हो तो फिर उम्मीदों और सपनों पर आघात लगने का भय बना रहता है या उम्मीदों के पंख लगने शुरु होते हैं. कई  बार  सपनो का राजकुमार या स्वप्न सुंदरी मिल जाती है मगर कई बार महज धोखा. सायबर प्रेम का सबसे मुश्किल दौर होता है मिलन, जो सारे वर्चुअल रोमांस के पत्ते झड़ा सकता है. एक ब्लॉग पर मैं ने किसी का अनुभव पढा था कि मुंबई के एक रोमियो महाशय जहाज पकड क़र सुदूर उत्तरपूर्व के एक सुन्दर शहर में पहुंचे. तयशुदा जगह परएक क्यूट चिक की प्रतीक्षा में खड़े  हुए उसे एक छोटी बच्ची मिली आर्किड्स लिए 'ये मेरे भाई ने भेजे हैं. खेद है वह नहीं आ सका.' छ: महीने लम्बी चैट्स , प्यार भरी - मेल्स वह जिसे करता रहा वह 'चिक' नहीं, 'डूड' था!  यह एक छोटी सी बात ही तो थी जो उसका 'स्वीटहार्ट' बताना ही भूल गया.

        मुझे इस प्रेम पर कई बार हैरानी होती है, प्रेम के शुरूआती प्राकृतिक संकेत, बायलॉजिकली तो दैहिक भाषा के ककहरे मसलन मुस्कान, मुद्राओं, आवाज और आंखों के मूक संवाद में छिपे होते हैं. प्राकृतिक प्रेम में शारीरिक बनावट, दैहिक भाषा, आवाज व्यवहार सब कुछ एक बडी भूमिका निभाते हैं. यहाँ तो बस स्क्रीन और छपे शब्द, कुछ छायाचित्र. वेबकैम का इस्तेमाल तो लोग बहुत अंतरंग होने के बाद ही करते हैं. वैबकैम और वॉयस मैसेज के बावजूद परस्पर संवाद के त्रिआयामी प्रभाव अनुपस्थित ही रहते हैं. कोई शक नहीं कि सायबर स्पेस ने हमारी सामाजिक सीमाओं को विस्तार दिया है और हमारी काम करने की पद्धत्ति को बदला है. यहाँ तक कि इसने मित्र बनाने और बेहतर साथी ढूंढने में एक विस्तृत साधन की भूमिका निभाई हैबावजूद सफल सायबर प्रेमगाथाओं और विवाहों के इंटरनेट सच्चे प्रेम का संवेदनात्मक विकल्प बन सकेगा इस पर मुझे हमेशा संदेह रहा है और रहेगा, क्योंकि एक नैसर्गिक निकटता के लिए अब या बाद में सायबर प्रेमियों को मिलन की दरकार तो रहती ही है. अकसर मिलने पर स्क्रीन से अलग व्यक्तित्व से मिलने पर सायबर इमेज में जोड और घटाव का अनुभव सायबर प्रेमियों को होता ही है जो कि उत्साहजनक या निराशाजनक कुछ भी हो सकता है.
 
वैवाहिक रिश्तों में खटास की एक वजह बनता जा रहा है, यह वर्चुअल रोमानियत का आकाश कि जब भी कोई ऊबा हुआ या अकेलापन महसूस करे तो एक क्लिक के साथ यह आपके लिये खुल जाता है बस पंख पसारने की देर है. तनाव, ऊब, पारिवारिक दबावों के चलते विवाहित लोगों के सायबर लवर्स में बदलने का प्रतिशत बढता जा रहा है. हैरानी की बात है इनमें घरेलू गृहणियों की संख्या विश्वभर में बहुत ज्यादा है. सायबर संसार सबसे ज्यादा महिलाओं को रास आता है क्योंकि यहां उन्हें उनकी दैहिक सुंदरता को लेकर नहीं आंका जाता. उनके बढते वजन और बिगड़ते आकार को लेकर 'आंटीजी' नहीं समझता. पुराने फोटो को देखकर ये सायबर रोमियो वही टायप करते हैं जो वे सुनने को तरसती रही हैं असल लाइफ में. महिलाओं की यह प्रवृत्ति उन्हें शोषित होने की तरफ धकेलती रही है सदियों से तो वर्चुअल संसार में भी यह प्रवृत्ति भुनाई जाती है. ऑनलाइन रोमियोज की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करते हैं. बात मिलने जुलने पर आती है तो डेट रेप जैसे कई किस्से सामने आते हैं.

आज के कारपोरेट समय में ऑफिस रोमान्स की जगह अब सायबर रोमान्स शादियां तोडने की खास वजह बनता जा रहा है. क्योंकि जब दिवा स्वप्नों और सायबर प्रेम के बीच झूलते हुए कोई वास्तविकता को ही भूलने लगे तो असल जिन्दगी के समीकरण तो बिगडेंग़े ही. यह और कुछ नहीं सूखे किनारों पर बैठ अपने पैरों की उंगलियां पानी में डालने जैसा कुछ है. यह देखने जैसा भर है कि उस पार की घास कहीं ज्यादा हरी तो नहीं
बेहतरी इसीमें है, ना - ना करते भी सायबर प्यार हो बैठे तो उसे जल्दी असलियत की जमीन पर ले आएं. शादीशुदा हैं तो बाज एं, अकेले हैं तो जल्दी ही मिलने की तारीख तय कर लें क्योंकि चाहे प्रेम कितना ही वर्चुअल हो, दिल टूटने पर पीड़ा तो वर्चुअल नहीं होती वह तो असल होती है. अगर इंटरनेट पर प्रेम डिस्काउंट में मिलता है तो पीड़ा एक के साथ एक मुफ्त मिलती है. ऐसे में जरूरी तो यह है कि हम उस 'कॉमन सेन्स' का इस्तेमाल करें जो आजकल 'अनकॉमन' है.

मनीषा कुलश्रेष्ठ     





7 comments:

  1. प्रेम के बहाने सायबर संबंधों की मनोवैज्ञानिक जटिलता को पूरा का पूरा रख दिया है आदरणीया मनीषा जी ने ...एक बहुत सुंदर और समसामयिक आलेख पढवाने के लिये फर्गुदिया का आभार !

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  2. इस आभासी दुनिया के मित्रों से मिलकर बहुत कुछ सीखने को भी मिलता है लेकिन सायबर प्यार के मामले में ज़रा संभलकर रहने की जरुरत है, इंटरनेट के माध्यम से डिस्काउंट में मिले प्रेम से ज़िन्दगी संवरने के चांसेज कम होतें हैं , डिप्रेशन में जाने के ज्यादा होतें हैं...............बहुत ही सार्थक एवं वास्तविक कथन मनीषा जी का..जिसे हम सभी को मनन एवं चिंतन करने की आवश्यकता है!आभासी संबंधो को सभी दृष्टिकोणों से जांचा परखा एक सार्थक आलेख साझा के लिए फर्गुदिया का आभार!

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  3. बहुत सुंदर विश्लेषण है। नेट प्रयोक्ताओं के लिए जरूरी है जो ई-प्रेम की बाढ़ में आ जाते हैं और गच्चा खा जाते हैं। शुक्रिया मनीषा जी को, इस समझाऊ आलेख के लिए!

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  4. कल 07/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. सुन्दर प्रस्तुति,,, वस्तुत : पहली बार आपके चिट्ठे पर आना हुआ है।।

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