Saturday, February 08, 2014

आत्मकथ्य - किरन सिंह


आत्मकथ्य - किरन सिंह

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"संझा" कहानी से कथाजगत में किरन सिंह ने अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज़ की है ... इनका लेखन समाज की उन समस्याओं की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है जिन्हें  हम अनदेखा करते   हुए उनके हाल पर छोड़ देतें हैं !    'संझा' कहानी के लिए किरन जी को "हंस कथा सम्मान" और "रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार"से सम्मानित किया गया  है ! साहित्यजगत में बहुत कम समय में  अपना विशेष स्थान बना चुकी  त्रैमासिक पत्रिका "दूसरी परंपरा" के अंक दिसंबर-२०१३ फ़रवरी- २०१४ में किरन सिंह जी का आत्मकथ्य प्रकाशित हुआ है .. आप सभी इसे फ़रगुदिया पर पढ़ सकतें हैं !"
 
     ‘पिछले तीन साल में मैंने चार कहानियाँ लिखी हैं।‘ (यह कथन संदर्भ है।) मेरी सहेलियाँ मुझे चिढ़ाते हुए कहती थीं-‘‘नौ महीना आठ दिन पर डिलीवरी दोगी तो माँ तो मान ली जाओगी कहानीकार नहीं। जरा जल्दी-जल्दी कन्सीव करो यार!’’
    एक नाई था। उसकी एक गाय थी। वह गाय का आधा दूध बेचकर चावल खरीदता और आधे दूध में खीर पकाता और खाता था। बादशाह उससे पूछते-‘‘कहो हमारी रियाया का क्या हाल है ?’’ नाई का जवाब होता-‘‘रियाया खीर खा रही है आलमपनाह।’’ एक दिन जलन के कारण किसी ने उसकी गाय को जहर दे दिया। नाई भूखों मरने लगा। बादशाह ने फिर पूछा-‘‘हमारी रियाया का क्या हाल है ?  नाई ने कहा-‘‘कभी भूख से कभी जहर से, रियाया मर रही है हुजूर!’’ मैं कहना यह चाहती हूँ  कि मेेरे पास भी आपको बताने के लिए अपने जीवन की घटनाएँ , सुबह के एकांत में की गई उनकी सूक्ष्म व्याख्या और उसके आधार पर निकाले गए निष्कर्ष ही है।  हाँ! तो, यह पुरस्कार मिलने से कुछ दिन पहले की एक घटना-एक साहित्यिक कार्यक्रम में, मुझे अपने षहर के कुछ सम्मानित साहित्यकारों को गंतव्य तक अपने साथ ले जाना था। किसी लोकप्रिय पत्रिका ने  बीस-पच्चीस युवा कहानीकारों की सूची भेजी उन के पास भेजी थी। उस सूची में से,   कहानी मँगाने के लिए नाम चुनना था। कौन-कौन से युवा कहानीकार छूट गए हैं इस पर भी चर्चा होती रही। मेरा कान-ध्यान उधर ही लगा था। उस लंबे रास्ते की बातचीत में कभी भी मेरा नाम नहीं था। धन्यवाद! रमाकांत स्मृति पुरस्कार समिति, यह पुरस्कार मिलने के बाद, मुझे कहानीकार के रुप में गंभीरता से स्वीकार कर लिया गया है। 

      मैंने कहानियाँ लिखना क्यों शुरू किया ? इसलिए क्योंकि मैं आत्मकथ्य नहीं लिखना चाहती। आत्मकथ्य की शर्त है सत्य और मेरे जीवन के सत्य ऐसी दुधारी तलवारें हैं कि... खैर आप जानना चाहते हैं कि ‘संझा’ कहानी का प्लाट मुझे कहाँ से मिला तो सुनिए-

     मेरे सबसे बड़े ममेरे भाई हैं जुगुल किशोर। उनसे छोटी धर्मशिला दीदी और उससे छोटे नवल किशोर। धर्मशिला दीदी की शादी  हुई। कोई बात नहीं। बड़े भाइयों के कुँवारे रहते छोटी बहनों की शादी हो जाया करती है। लेकिन जब नवल किशोर  भइया की भी शादी तय हो गई तब मैंने माँ से पूछा-‘माँ जुगुल भइया की शादी क्यों नही हो रही है ? माँ ने कहा-‘‘ ऐसे ही।’’ ऐसे ही कैसे ? लेकिन बचपने के उन दिनों में माँ के जवाब पर सवाल पूछने की रवायत नहीं थी। छोटे नवल किशोर भैया की शादी  में बड़े मामा ने माँ से बहुत रूपए उधार लिए। यह बात मुझे इसलिए मालूम है क्योंकि माँ के रुमाल में बँधे, गुमडि़या गए रुपए, रात भर जाग कर मैंने ही गिने थे। जब मेरा छोटा भाई आई ़ आई ़ टी ़ दिल्ली में पढ़ने के लिए जा रहा था तब माँ ने वे रुपए बड़े मामा से माँगे। कई बार माँगने पर भी मामा ने वे रुपए नही दिए। माँ यह बात पिताजी को बता भी नहीं सकती थी क्योंकि माँ ने वे रुपए पिताजी की चोरी गेहूँ बेच कर और पिताजी को बताए बिना मामा को दिए थे। एक रात माँ की रुलाई सुन कर मेरी नींद खुली। माँ कह रही थी रमेसचन्दर... यानी मेरे मामा... रमेसचन्दर पापी है, उसको कोढ़ फूटेगा। उस रात मुझे पता चला कि मेरा भाई जुगुल किशोर किन्नर है। मेरे ननिहाल का सत्तर अस्सी घरों का गाँव जुगल भइया से इतना प्रेम करता है कि  कोई बाहरी उन्हें लेने आए तो लाठियाँ बजने लगेगीं। लेकिन मामा... जुगुल भइया दो-तीन मजदूरों के बराबर खेत में काम करते हैं लेकिन मामा अपने घर के दरवाजे पर खड़े हो कर जुगुल भइया को गाली देकर ही बुलाते हैं। उनके लिए जुगुलकिकिशोर, उनके पौरुष पर ऐसा कलंक है जो दिन-रात उनकी आँख के आगे नाचता रहता है। जुगुल भइया अपना उभरा सीना छिपाने के लिए कि मामा से अपना चेहरा, झुकते चले गए। सारे गाँव और मामी का प्यार भी पिता के प्रेम की भरपाई न कर सका। मेरे इसी अभाव की काल्पनिक भरपाई है संझा और उसके लिए उसके पिता का पे्रम।
    मैंने कहानियाँ लिखना इसलिए शुरू किया क्योंकि मेरी ससुराल में सभी को थोड़ी बहुत कविता लिखनी आती थी। शिवमंगल सिंह सुमन और अदम गोंडवी मेरे ससुर के अच्छे परिचित थे। मैं जो कविताएँ लिखती उसे बारी-बारी से सभी सुधारते थे। छन्द-लय के अलावा यह भी देखा जाता कि तथाकथित आपत्तिजनक शब्द  भाव तो नहीं है जिससे उनकी बहू को समाज में गलत समझ लिया जाए। जैसे मंैने यह दोहा लिखा-
        बरसे  रस  की चाँदनी  भीगे  उन्मन  अंग।
        श्याम  पिया मैं श्वेत  हूँ, रैन दिवस एक संग।।
      दोहा पढ़ने के बाद सासू-माँ दो दिन तक अनमनी रहीं। तीसरे दिन रहा न गया। पूछती हैं-
    ‘‘ लेकिन मेरा बचवा...’’ उनका बचवा यानी मेरा आदमी...‘‘मेरा बचवा तो झक गोरा है...फिर ये पिया...साँवले ?’’
     मेरा पहले से तैयार जवाब था-’’अरे अम्माजी आप भी न! कृऽऽष्ण भगवान कृष्ण!’’
    ‘‘अच्छा आँ...हाँ !’’ वो अक्सर इत्मीनान की साँस लेती। अम्मा-पिताजी यानी मेरे सास-ससुर मुझे कवि सम्मेलनों ले जाते। सबसे परिचय करवाते हुए कहते कि वे अपनी बहू को आगे बढ़ाना चाहते हैं। मैं अम्मा-बाबूजी से क्षमा माँगते हुए कहना चाहती हूँ कि- एक बार कुछ बच्चों ने देखा कि एक चिडि़या अपने अंडे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रही है। बच्चों ने अंडे को तोड़ा। चिडि़या को निकाला। उसके चिपचिपे पंखों को पोंछा और उसके नीचे एक मुलायम कपड़ा बिछा कर पानी-दाना रख दिया। अगले दिन बच्चे दौड़ते हुए चिडि़या के पास गए तो वह चिडि़या मर चुकी थी। अंडे से बाहर निकलते हुए चिडि़या को जो संघर्ष करना पड़ता, उसमें उसके पंख मजबूत होते औैर वह बाहरी दुनिया के थपेड़ों का सामना कर पाती। रक्षा में हत्या हो गई। मेरी वे पुराने किस्म के भावबोध की कविताएँ कहीं नहीं छपती थीं। कविताएँ घर में पढ़ी जाएँगी यह सोचकर मैं अपने को सेंसर करते हुए, डर-डर कर लिखती थी। मैं कोई संतुलित राह निकालने में असफल रही और मेरे भीतर की कवयित्री की अकाल मृत्यु हो गई।
     मैंने कुछ भी लिखना इसलिए शुरू किया क्योंकि मेरी एक खिड़की थी। जो मुझसे  छीन गई।
    घोर सामंती राजपूत परिवार में मेरा जन्म हुआ। मेरा नाम पड़ा इतवारी और मुझसे पाँच दिन पहले पैदा हुई बुआ का नाम पड़ा सोमवारी। जब  पाठशाला में नाम लिखाने की बारी आई तो मास्साब के कहने पर शहराती नाम रखा गया। मेरा नाम हुआ किरन क्योंकि मै इतवार की सुबह की किरन के साथ जन्मी थी और बुआ का तीजा क्योंकि वो लड़के की आस में पैदा हुई तीसरी संतान थीं। मेरा  रिश्ता साहित्यिक समाज से जुड़ा तो मेरा नाम छपने लगा किरण सिंह। उधर बुआ की शादी  ऐसे परिवार में तय हुई जिनके यहाँ लोग पेशे  से ठेकेदार और शौकिया  डकैत थे। बुआ की ससुराल की तरफ से हमारे यहाँ जो षादी का कार्ड आया उस पर बुआ का नाम छपा था, तिजा सिंह की जगह, तेजा सिंह।
      मेरे पिता पढ़ने के लिए और नौकरी के लिए गाँव से बाहर निकले जरुर लेकिन परिवार से इस वादे के साथ कि वे शहर  जाकर बिगड़ेंगे नहीं। इसलिए उन्होंने सांमती संस्कारों को और दृढ़ता से निभाया। मेरे कस्बे के उस मकान में मुकदमा लड़ने वालों, जच्चा-बच्चा, पढ़ने और परीक्षा देने वालों की भीड़ लगी रहती। माँ मेरे कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर के अपना काम करती रहती थी। मेरे कमरे में एक खिड़की थी जिसके बाहर पोखर था। मैं खिड़की के पास बैठी अपनी कोर्स की किताबें पढ़ती और बाहर देखती रहती। उस खिड़की पर वह जाली लगी थी जिससे भीतर से बाहर तो देख सकते थे लेकिन बाहर से भीतर नहीं दिखाई देता था। संझा कहानी में यह खिड़की है। मेरे कस्बे का एकमात्र काॅलेज, कई दिनों तक छात्रों फिर कर्मचारियो के हड़ताल में, हड़ताल के दौरान तोड़े गए फर्नीचर की मरम्मत में, कई दिनों तक छात्रसंघ के चुनाव में बन्द ही रहता था। काॅलेज खुलता तो कई बार चाचा लोग आकर कह देत,े फलां गुरुजी नहीं आए हैं, जाने का कोई काम नही है। वह खिड़की मेरा सहारा थी। एक दिन उस खिडकी की जाली में छेद करके एक पे्रम-पत्र खोंस  दिया गया था। उस चिट्ठी में लिखा था ‘हँसी तो फँसी।’ दरअसल एक लड़का हरे रंग की पैंट, लाल बुशर्ट  पहनता था और अपनी दबंगई के किस्से, ऊँची आवाज में लड़कियों के कॅामन रुम के आगे सुनाया करता था।  एक दिन मैंने उसकी ओर देख कर सहेलियों से कहा- ‘‘तोता!’’ और हँस पड़ी।

मेरी माँ, जो मेरी सबसे अच्छी सहेली थी, अपनी उस गलती के लिए, बहुत दिनों तक पछताती रही। दो चार और चिट्ठियाँ हुईं तो माँ ने उस लड़के के डर से वे चिट्ठियाँ पिताजी को दे दीं। मेरी कोठरी बदल दी गई। अब मुझे बीच वाली कोठरी में रहना था जिसमें अँधेरा और सीलन थी, जिसकी खिड़की रसोई में खुलती थी। रसोई का धुआँ कमरे में भर जाता था। उस कमरे में चार साल रहना हुआ। एकांत, अँधेरे और धुएँ के उन चार सालों में मेेरा व्यक्तित्व सामान्य नहीं रह गया। माँ मुझे काम नहीं करने देती और कहती कि तुम बस पढ़ो और निकलो यहाँ से। मेरे पास बहुत सारा खाली समय होता जिसमें मैं, एकांत में  देखे-सुने को सोचती रहती और एक काल्पनिक दुनिया की रचना करती। इस तरह मुझमें विचार की शक्ति  आई और मेरी कल्पना षक्ति बहुत बढ़ गई। नुकसान यह हुआ कि उजाला मुझे चुभता है, समायोजन में कठिनाई होती है,जाती हूँ और लोगों को ऐसे देखती हूँ जैसे वे मेरी खिड़की से बाहर खड़े हों।
           मेरे लिए लेखन, वह आग है जो उस तरफ लगी हुई जंगल की आग को बुझाने के लिए, इस तरफ से लगा दी जाती है। मैं अपने को और दूसरों को नष्ट करने वाला मानव बम नहीं बनना चाहती। मैंने अपने क्रोध को रचनात्मकता में तब्दील किया है। मेरी कहानियाँ, सामंती सोच वाले समाज से, मेरा रचनात्मक प्रतिषोध हैं। मेरा व्यक्तिगत मत है कि स्त्री की अधिकांष क्रिया, किया नहीं, प्रतिक्रिया होती है। स्त्री या तो रक्षात्मक रहती है या आक्रामक, वह सहज मनुष्य नहीं रहती। मेरे लिए, कहानी,विकटतम स्थितयों में भी जिन्दगी जीने का लालच है। मैं अपनी कहानियों की षुरुआत नहीं जानती लेकिन अन्त जानती हूँ। विकटतम स्थितियों में भी मेरी नायिकाएँ न हारेंगी न मरेंगी। वे डरेंगी पर वे लड़ेंगी। न दैन्यं न पलायनम्। मनुष्य से इतर किसी भी षक्ति में मेरा विष्वास नहीं। नहि मानुषात हि श्रेष्ठतरं किंिचंत्। नियति भी यदि बदनियति पर उतरी तो उसे मनुष्य के इस्पाती इरादों से टकराना होगा।
     हर माघ में जब पाला पड़ता था और हर आषाढ़ में सूखा या बाढ़, तब  परदादी इस तरह कहानियाँ सुनाती थी कि हमें पता ही नहीं चलता था कि हम भात के बिना, खेत और तालाब में अपने आप उगा, बथुआ और कुरमी का साग थोड़ा बहुत खाकर कब सो गए। मुझे मालूम न था कि यह रिष्ता आगे रास्ता बनेगा।
      मैं यहाँ पर बैठे पुरुषों से कहना चाहती हूँ कि मेरे लिए, मेरे उन चाचाओं जैसे मत बनिएगा जो मेरी चैकीदारी करते हुए मेरे अगल बगल चलते थे और कहते थे कि तुम्हें रास्ता दिखाने के लिए तुम्हारे साथ चल रहे हैं। बल्कि मेरे उस फुफेरे भाई जैसे बनिएगा जिसने मुझे सिखाया कि जब सारा गाँव सो जाता है, उस समय परती खेतों के पार जो नीबू की झाडि़याँ हैं, उसकी बीच की डाल का नीबू तोड़ा जाए तो जिन्न वष में हो जाता है। मुझे उस रात का डर आज भी ठीक उसी तरह याद है। भीतर से काँपते हुए भी मैं यह दिखा रही थी कि मैं डर नहीं रही हूँ। मैंने नीबू तोड़ा और आराम से  कदम बढ़ाती हुई भइया के पास गई। मैंने बाद में समझा कि उस रात जिस जिन्न पर मुझे काबू पाना था वह मेरे भीतर के डर का जिन्न था।
   यहाँ बैठी हुई स्त्रियों से मैं कहना चाहती हूँ मेरे लिए मेरी उस दीदी जैसी न बनिएगा जो रोज हम लोगों को अपना चाल चलन ठीक रखने के लिए समझाती हुई वह बात फुसफसाते हुए जरुर बताती थीं कि कैसे परिवार की एक सुन्दर लड़की को एक गोड़ से सम्बन्ध रखने के लिए जात पर लिटा कर फरसे से काट डाला गया। आप मेरे लिए, मेरी उस दलित सहेली की तरह बनिएगा जिसके बाराती दुआर पर सोए थे। जो अपने प्रेमी से आखिरी बार मिलने गई थी कि ठाकुरबाड़ी और मिसरौली के लड़कों ने घेर लिया। कहने लगे हमको भी हिस्सा दो सुभावती नही तो अभी हल्ला कर देंगे। जिन्दगी भर कुँवारी बैठोगी। सुभावती ने वह छोटा चक्कू निकाल लिया था जो दुल्हनों को नजर-टोना से बचाने के लिए कमर मंे खोंस दिया जाता है। सुभावती आज पुलिस में सिपाही है।
    आप ये नहीं कह सकते कि मुझसे आपका कोई रिष्ता नहीं। मै स्त्री हूँ और हिन्दी में लिखती हूँ। मैं एक लुप्त होती प्रजाति हूँ। मुझे सँभाल कर रखिए।

                                                   किरन सिंह
                                        3/226, विष्वास खण्ड, गोमती नगर
                                                              लखनऊ-226010
                                         फोन-08765584823

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