Tuesday, February 14, 2017

दाम्पत्यः प्रेम और पहेली - मन्नू जी से एक मुलाकात



दाम्पत्यः प्रेम या पहेली -मन्नू जी से एक मुलाकात



आदरणीय मन्नू जी मेरी बहुत प्रिय लेखिका हैं! उन जैसी सम्मानित शख्सियत से भला कौन नहीं प्रभावित होगा! अब तक जितनी बार उनसे मिली हूँ, ढेर सारी सुखद स्मृतियां लेकर लौटी हूँ! बहुत दिनों से मन था उनसे मिलने का! उनके अस्वस्थ रहने के कारण हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी! उनसे मिलने की कभी कोई ऐसी वजह नहीं रही जिसमें कुछ स्वार्थ छिपा हो! बस यूँ ही कुछ देर उनके साथ बिताना, साहित्यिक बातें करना न जाने कितने सुखों से भर देता है! लेकिन न जाने क्यों इस बार वैलेंटाइन डे के लिए उनसे राजेंद्र जी और उनके प्रेम भरे कुछ पहलुओं को सहेजकर ब्लॉग पर सभी से साझा करने का मन हुआ! हलाकि उनसे इस विषय पर बात करना मेरे लिए बहुत कठिन था! फिर भी मैंने उन्हें फोन किया और मिलने की इक्षा जाहिर की!  बोलीं – “आज आना चाहती हो, आ जाओ! कल ही मैं टिंकू(रचना जी) के यहां से लौटी हूं!”

मैं फ़ौरन घर से निकल पड़ी! ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन से बाहर आकर ऑटो करने लगी तो पास के फ्लावर शॉप की तरफ कदम अटक गए! मैंने गुलाबों का एक छोटा सा बुके बनवाया!.. जबकि उपहार में फूल भेंट करने की अब आदत नहीं रही! यह तो बाद में पता चला कि उस दिन रोज़ डे था! आश्चर्य हुआ.. अपनी प्रिय लेखिका को गुलाब भेंट किया था मैंने.. इस दिन के महत्व से अनजान! इससे बेहतर क्या हो सकता था मेरे लिए! उनके घर से वापस आकर फ़ेसबुक पर छोटी सी पोस्ट भी लिखी! खैर .. जिस मकसद से उनसे मिलने गयी थी उसका पूरा ब्यौरा सुनें..!

घर पहुँची तो मन्नू जी नेबोलाइज़र पर थीं! कुछ देर बाद उन्होंने आवाज लगाई - यहीं आ जाओ! पास पहुँचकर मैंने उन्हें बुके और मिठाई थमाते हुए अभिवादन किया!

“अरे वाह! ये मेरे लिए हैं ..!” कहकर कुछ देर तक स्निग्ध हंसी के साथ फूलों को निहारती रहीं! मुझे उनकी कहानी “यही सच है” पर बनी फिल्म रजनीगंधा की नायिका याद आ गयी! आँखें बंद करके रजनीगंधा के फूलों को गालों से लगाकर कैसे प्रेम से लबालब भरी लगती थी!

उन्होंने गीता  (घरेलू सहायिका) को बुलाकर कहा  -“इन्हें डाइनिंग टेबल पर सजा दो!” उसके बाद मिठाई वाले पैकेट की ओर इशारा करके बोलीं -“ये क्या है..?”

“मिठाई है आपके लिये!”

“अरे ये सब मत किया करो!”

“कुछ नहीं .. बस मन किया!  मुझे अच्छा लगता है!” न जाने क्या-क्या चल रहा था मन में लेकिन मैं इतना ही कह पाई! उन्होंने मिठाई का डिब्बा भी गीता के हाथ में थमा दिया!

“अच्छा .. तुम अपनी सुनाओ.. क्या हाल हैं ..? तुम्हारा काम कैसा चल रहा है ? .... देखो मैं भूल रहीं हूँ .. तुम कुछ अच्छा सा काम कर रहीं थीं .. जरा बताओ क्या काम था वो ..?” उनसे ये मेरी चैथी या पांचवी मुलाकात थी! इस बार लगभग एक साल के बाद मिल रही थी! वे बातों-बातों में बार बार दोहरातीं हैं कि उन्हें कुछ याद नहीं रहता! अपनी कम होती याददाश्त से सबसे ज़्यादा परेशानी उन्हें खुद होती है! पर मैं हैरान थी कि पूरी तरह नहीं पर कुछ याद था जो मुझसे जुड़ा था! मैंने उन्हें फरगुदिया ब्लॉग और झुग्गी-बस्ती की बच्चियों की डायरी के बारे में याद दिलाया !

- “अरे हाँ.. हाँ! याद आया .. देखो दिमाग को क्या हो जाता है .. भूल ही गई थी.... बहुत अच्छा काम है .. करती रहना इसे !” वे कुछ याद करती सी बोलीं ! मैं उनसे कहना चाहती थी कि ब्लॉग और डायरी लेखन के लिए अभी पूरा समय नहीं निकाल पा रहीं हूं लेकिन कहा नहीं! क्योंकि उसके बाद अपनी व्यस्तता और उसके कारण बताने पड़ते और वे बहुत मुश्किल से मेरी बात सुन पा रही थीं!

न जाने कितना कुछ भरा हुआ था उनके मन में! एक बात शुरू करतीं.. उसे अधूरा छोड़कर दूसरी बात याद आने पर बताने लगतीं!

“तुम्हारा काम बहुत अच्छा है... इसे करती रहना..!” अचानक मौसम की बात करने लगीं -“अच्छा यहाँ तीन चार दिन पहले सर्दी काफी कम हो गई थी ... टिंकू के यहाँ तो सर्दी कम थी .. वहाँ खूब अच्छे से नहा लेते थे लेकिन यहाँ तो ठंडक है.. आज सबेरे भी ठंड लग रही थी!”

“कल काफी कोहरा हो गया था अचानक और आज भी तेज हवाएं चल रहीं हैं..! मैंने उनकी बात आगे बढ़ाते हुए कहा!”

आज अच्छी लग रहीं थीं मन्नू जी! उनके चेहरे की लगातार मुस्कराहट देखकर मुझे खुशी हो रही थी लेकिन वे मुझे कुछ कमजोर लगीं! मैंने पूछ भी लिया - “मैं इस बार काफी समय बाद देख रहीं हूँ! आप कुछ दुबली दिख रहीं हैं !”

वे हँसती हुई बोलीं - “अरे .. काहे का दुबलापन! खाती हूँ ... सोती हूँ .. मोटी होती जा रहीं हूँ!”

हम दोनों एक साथ हँस पड़े!

“अच्छा .. तुमको सर्दी-वर्दी नहीं लग रही है ..?” मेरे स्वेटर न पहनने की तरफ उनका ध्यान गया था!
मैं हँस पड़ी –“नहीं .. ज्यादा नहीं लग रही है .. मेट्रो की भीड़ में तो गर्मी लग रही थी!’

कुछ देर यूँ ही बातों का सिलसिला चलता रहा! मैं बस हाँ...हूँ...जी...करती हुई उनकी बातें सुनती जा रही थी! मैं उनसे वेलेंटाइन डे के बारे में बात शुरू करना चाह रही थी लेकिन शुरुआत कैसे करूँ, ये नहीं समझ पा रही थी ! डर भी रही थी क्योकि मन्नू जी के पास राजेंद्र जी से जुडी बहुत कड़वी यादें ही हैं! जब भी कभी राजेंद्र जी का जिक्र आया है, वे उनके जीवन में लगातार बनी रही दूसरी महिलाओं से उनके संबंधों का ज़िक्र करके क्षोभ और बेचैनी से भर जातीं हैं! लेकिन न जाने क्यों मैं उत्सुक हो रही थी ये जानने के लिए कि कुछ तो ऐसे मधुर क्षण होंगें जिन्हें याद करके मन्नू जी राजेंद्र जी के प्रति प्रेम से भर जातीं होंगीं ! डरते-डरते मैंने वेलेंटाइन-डे की बात की और कहा- “अच्छा बताइए मन्नू जी! वैलेंटाइन-डे पर आपके बारे में कुछ लिख सकती हूं ?”

मेरी बात सुनते ही तपाक से बोलीं - “तुम मनाती हो वैलेंटाइन-डे ..?”


मैं सहम गयी! एक क्षण को यूँ लगा कहीं नाराज़ तो नहीं हो गयीं मन्नूजी! मैंने डरते-डरते कहा -“मैं मनाती नहीं .. लेकिन अपने ब्लॉग - फरगुदिया पर आजकल के प्रेम से हटकर कुछ अलग नया पोस्ट करना चाहती हूँ!”

मन्नूजी कुछ बुझी हुई सी कहने लगीं- ‘‘ मैं क्या बताऊं बेटा, मेरे शरीर में अब कुछ बचा नहीं है.. सुनाई नहीं देता है.. दिखाई नहीं देता है.. ये जो मेरा भेजा है वो बिलकुल निचुड़कर खत्म हो गया है ... लिख तो मैं कुछ सकती नहीं...! (कुछ देर की चुप्पी के बाद) .. एक दिन मैं रात में अच्छी भली सोई.. खाया-पिया, बातें की, पढ़ा- लिखा.. साढ़े ग्यारह बजे सोई.. सुबह उठी तो देखा मुझे कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा.. अब मैं बहुत परेशान..!! मैं आँखें फाड़कर इधर-उधर देख रहीं हूँ और कह रहीं हूँ .. अरे!! मुझे कुछ दिख नहीं रहा, दिख नही रहा.. मैंने घबराकर टिंकू को फोन किया – “टिंकू मैं उठी तो मुझे कुछ नहीं दिख रहा.. वो भी परेशान !! उसने कहा तुरंत ड्राइवर के साथ आप अपने आँख के डॉ के पास जाओ... इस दिन ड्राइवर के आने का दिन भी नहीं था लेकिन उसे बुलवाकर गयी... उन्होंने अच्छी तरह से चेक किया और कहा-आपको कोई प्रॉब्लम नहीं है ..आँख बहुत अच्छी हालत में है लेकिन सर्कुलेशन ऑफ ब्लड रुक जाए तो दिखाई देना बंद हो जाता है! अब मैंने कहा..मैं क्या करूँ ..?? उन्होंने कहा - इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है! अपने आप ही धीरे धीरे रोशनी लौट आएगी! (याद करते हुए कहती हैं ) लगभग सात आठ महीने हो गए शायद...अब थोड़ा थोड़ा दिखना शुरू हो गया है.. (मुझे छूकर) अब ये मुझे दिख रहा है कि तुमने पिंक कलर का कुछ पहन रखा है .. पर मैं तुम्हारा फेस नहीं पहचान सकती.. चेहरा मुझे नहीं दिखाई दे रहा.. एक शरीर है मेरे आगे.. ये दिख रहा है.. रंग भी दिख रहा है.. थोड़े दिनों बाद शायद और दिखाई देने लगे..! मेरे सारे शरीर के अंग बेकार हो गए .. अब मैं क्या करूँ ..!!..कुछ समझ नहीं आता है.. मेरे पास कोई आएगा तो मैं उसे क्या दे सकती हूँ..!”

एक लेखक के जीवन से लिखना पढना छूट जाए तो क्या स्थिति होगी ये आसानी से समझ सकती हूँ मन्नूजी को अचानक इस तरह दिखाई न देने से उनपर क्या प्रभाव पड़ा होगा.. उनकी मायूसी समझ सकती हूँ! लेकिन उनके साथ कुछ समय बिता लेने भर से कितनी प्रेरणा मिलती है .. उसे व्यक्त नहीं कर सकती! उनसे बस इतना ही कह पाती हूँ –“आपके साथ समय बिताने भर से बहुत प्रेरणा मिलती है!”

’’हाँ! आओ, बैठो.. बल्कि टिंकू तो यही कहती है-आपकी बीमारी का इलाज ही यही है-आपके साथ कोई रहे... आपसे बातें करें... आपका मन बहलाये..! .. तो आओ.. रोज आओ.. जो भी मेरे घर आता है अपना घर समझकर आता है और मैं भी उनका स्वागत घर के सदस्य की तरह ही करती हूँ!”

डरते-डरते मैं उनसे अपनी इक्षा जाहिर कर ही देती हूँ -“.मैं बताऊँ ... मैं आपके और राजेंद्र जी के लगभग पैंतीस सालों के साथ और अलग होने के बाद के जीवन के कुछ अच्छे प्रेम भरे पहलुओं को अपने ब्लॉग पर देना चाहती हूँ !.. अगर आप चाहें तो कुछ साझा करें ..!”

उन्होंने मेरी बात ध्यान से सुनी! फिर कुछ रूककर सोचते हुए बोलीं - “देखो .. मैं राजेंद्र जी के साथ पैतीस या तैतीस साल रही लेकिन मैं ये कह सकूँ... कि उसमें उनके साथ कुछ अच्छे दिन रहे ...... ऐसा कुछ था नहीं (कुछ देर की चुप्पी) ..दिन तो लगभग सभी तकलीफदेह थे .. बस एक अच्छाई ये थी उनमें कि वे मुझे लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहित करते थे .. कहते थे, तुम लिखो .. बस तुम लिखो ..देखो तुम्हारा लिखा हुआ कितना सराहा जाता है ... बस मेरा लिखा पढ़कर आगे और लिखने के लिए बहुत प्रोत्साहित करते थे ....यह उनकी खास आदत थी.....!”
 राजेंद्र जी की बात बीच में ही छोड़कर अपने बारे में बताने लगतीं हैं -.”..और सच कहूँ शोभा .. मैं अगर जिन्दा रही .. अभी की बीमारी छोड़ दो, वह तो एज रिलेटेड है .... पर उसके पहले जो मैंने अपने आपको संभाले रखा .. वो सिर्फ लेखन की वजह से ... अपने लेखन की वजह से ही मैं जिन्दा रही ... किस्मत अच्छी थी कि मेरा लिखा सभी को क्लिक करता था .. मेरे लिखे दोनों नाटक बहुत सराहे गए ..!”

कहते हुए उनकी आँखों में कुछ चमक दिखी! सच ही तो है! घोर पीड़ा भरे उन दिनों में वे लिखकर ही तो अपना दर्द बाँट पाती होंगी! मैं उनकी आँखों में राजेंद्र जी के प्रति प्रेम ढूंढ रही थी लेकिन उनका जिक्र करते हुए वे दुःख और क्षोभ से भर गयीं!

मैं फिर कोशिश करती हूँ! कहीं किसी बात का जिक्र करते हुए शायद मन्नू जी के प्रति राजेंद्र जी के प्रेम की झलक दिख जाए! मैं पूछती हूँ - “तो आपका लिखा पढ़कर खूब प्रोत्साहित करते थे राजेंद्र जी ..?”

“बहुत ....बहुत करते थे! .. कुछ कुछ रचनाओं के लिए तो बहुत करते थे .. कोई लड़की अपनी कहानी लेकर हंस के ऑफिस में गयी थी तो उसने मुझे बताया कि उन्होंने कहा - देखो कहानी कैसे लिखी जाती है मन्नू से जाकर सीखो ... उस लड़की ने मुझे बताया .. ये नहीं बताते थे .. तो मुझे अच्छा लगता था कि चलो कम से कम मेरे लेखन की तो ये इतनी तारीफ करतें हैं .. ये मेरी रचनाओं के प्रशंसक थे! ..लेकिन एक स्टेज के बाद तो संबंधों के मायने भी बदल जातें हैं ... प्रेम व्रेम कोई मायने नहीं रखता ...!” अपनी बात खत्म करते करते प्रेम की बात करते हुए खिन्न होतीं हैं!


मैं जल्दी ही उनकी बात पूरी होने से पहले कहती हूँ - “प्रेम ..मैं आजकल के आधुनिक प्रेम की बात नहीं कर रहीं हूँ जिसमें ज्यादातर स्वार्थ भरा होता है! मैं एक सम्मानजनक प्रेम के भाव की बात कर रहीं हूँ! आपसे अलग होने के बाद तो उन्हें आपकी ज़रूरत या अहमियत महसूस हुई होगी कभी ... फोन पर या...”

मुझे बीच में टोकते हुए कहतीं हैं -‘‘वो अलग होना ही नहीं चाहतें थे .. अलग होना बिलकुल नहीं चाहते थे ... मैंने ही उन्हें आग्रह कर अलग किया! ...क्योंकि उन्होंने आपसी संबंधों का जो दायरा बना लिया था कि घर की और आर्थिक जिम्मेदारियां मैं संभालूं ... वे किसी भी तरह की कोई जिम्मेदारियां नहीं लेगें .. बस घर में बने रहेंगें ... घर नहीं छोड़ेगें ... घर की सुविधाएं और कहाँ मिलतीं! ...लेकिन कौन व्यक्ति होगा जो इतना सहेगा ....?”

(कुछ और भी कहना चाहतीं हैं लेकिन मैं बीच में ही टोककर कहती हूँ ) ..”हम सभी जानते हैं ये सब बातें .. जो कमियाँ थीं वो तो थी ही ..अपनी आत्मकथा में आपने लिखा भी है लेकिन मैं ये चाहतीं हूँ कि आज आप उनकी कुछ अच्छी-अच्छी बातें साझा करें.!”

वे फिर अपनी पहले कही बात दोहराती हैं - “बस, उनका सारा लगाव मुझे लेखन के लिए प्रोत्साहित करने तक था .. बल्कि मुझसे कहते थे कि तुम्हें आसानी से नाम मिल गया है लेखन में इसलिए तुम बहुत लापरवाह हो गई हो .. तुम और मेहनत करके और अच्छा लिखने की कोशिश करो .. पर एक पत्नी की अपनी इच्छाएं, ज़रूरतें होती हैं... आप बीमार पड़े हैं और कोई हाल भी न पूछे.. अपने दोस्तों के साथ फ़ोन पर ठहाके लगाता रहे तो आपको कैसा लगेगा.....!”

"जी, मैं समझ सकती हूँ! बीमार पत्नियां अपने पति की उपेक्षा से कैसे घुटकर रह जाती हैं! बहुत सारे बंधन उन्हे जकड़े रहते हैं! वे अपना मुंह भी नहीं खोल पातीं!"

अपनी बात को पीछे धकेलते हुए मुस्कुराकर मैं पूछ बैठती हूं – “किसी खास दिन से जुड़ी ऐसी घटना जिसमें आपके प्रति उनका प्रेम झलका हो..... जैसे- शादी की सालगिरह के अवसर पर... आपके जन्मदिन के अवसर पर ..?”

मेरी बात पूरी होने से पहले ही कहतीं हैं -‘‘जन्मदिन तो मेरा वो याद ही नहीं रखते थे.. मुझे एक बार बहुत तकलीफ भी हुई .. मेरी एक फ्रेंड थी ..मेरे जन्मदिन के बहाने उनसे मिलने आई और वो तो घर में ही नहीं थे... मुझे बहुत तकलीफ़ हुई! अरे.. कुछ न करते पर कम से कम अपनी उपस्थिति तो दर्ज़ करते..!’’

“अलग होने के बाद भी जन्मदिन याद नहीं रखते थे..?” मैं फिर पूछती हूँ!

“बस, यही बहुत बड़ा फ़र्क आया..!! साथ रहते जिस पति ने कभी जन्मदिन याद नहीं रखा, अलग होने के बाद बराबर फोन करते ... फूलों का बुके भेजते.. साल दर साल.. बल्कि उसके बाद उन्होंने मुझसे अपने सम्बन्ध बहुत अच्छे बना लिए थे..कोशिश करते थे कि मैं उन्हें वापस बुला लूँ.... लेकिन वह संभव नहीं था.. बहुत झेल लिया था मैंने लगातार पैंतीस साल..!”

उनकी बात पूरी होने से पहले ही प्रश्न करती हूँ - ‘‘ उन्होंने कभी आपसे कहा नहीं कि मुझे बुला लो.. मैं आना चाहता हूँ..?’’

“नहीं..ये कहा तो नहीं लेकिन कोशिश बहुत की..! जन्मदिन जो कभी याद नहीं रखते थे, अब हर साल जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर फूल भेजने लगे.. मैं सब महसूस करती थी..अच्छा भी लगता था और टीस भी उठती थी..! (कुछ देर की चुप्पी के बाद फिर कहतीं हैं ).. सौभाग्य से ये घर मेरा.. एक एक तिनका.. एक एक पाई मेरी.. खरीदने से लेकर बनाने तक सब कुछ मेरा था ...सबकुछ लगाकर मैंने ये घर बनाया था.. तो मैं कह सकती थी न कि आप मुझे अब मुक्त करिये... मैं ऐसा कह सकती थी तो कहा .. अगर ये घर उनका होता तो मैं कैसे कहती...? ..बहुत सी पत्नियां इसीलिए कुछ भी नहीं कह पातीं...मरते दम तक सहती चली जाती हैं!”

पिछली किसी मुलाकात में उन्ही की कही बात याद करती हूँ –‘हिन्दुस्तान के परिवार औरत के कन्धों पर टिकें हैं!’ सच ही तो है..अधिकतर स्त्रियों का अनुभव भी तो यही है! चारदीवारी में अपनों द्वारा ही मानसिक-शारीरिक प्रताड़ना सहती हुई वे भीतर ही भीतर टूटती रहतीं हैं! फिर भी परिवार को बचाने के लिए अपने आपको मजबूत रखने का भरसक प्रयत्न करतीं हैं!
आगे वही सब बातें दोहराती हैं जो उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है- वासु चटर्जी जी, गिरीश अस्थाना का अचानक उनके घर आना और राजेंद्र जी को घर आने देने का अनुरोध करना.. और दृढ़ता से मन्नू जी का उन्हें मना करना.... आदि..आदि....!

बातों बातों में फिर मीता का जिक्र करके खिन्न होने लगतीं हैं! मैं उन्हें आग्रहपूर्वक समझाने की कोशिश करती हूँ! कुछ नकारात्मक याद न करके राजेंद्र जी और स्वयं से जुडी कुछ सकारात्मक, प्रेम भरी यादें साझा करने को कहतीं हूँ!

मैं फिर पूछतीं हूँ –“अलग होने के बाद तो आपकी कमीं महसूस हुई होगी..?”

“अलग होने के बाद तो ये आ गई थी न.. मैत्रेयी! वो इनके बहुत निकट हो गई थी... इनके पास कोई सपोर्ट था नहीं..मैत्रेयी इनके लिए घर का सामान खरीदकर देने लगी.. इनकी भौतिक जरूरतों को पूरा करने लगी ....!”

घुमा फिराकर प्रश्न पूछकर मैं  दोनों के बीच प्रेम ढूंढना चाहती थी! लेकिन राजेंद्र जी के संबंधों को लेकर वे हर बार कड़वाहट से भर उठती हैं... मैं उन्हें समझाते हुए कहती हूँ- “घर परिवार से अलग हुए पुरुष के जीवन में बहुत सारी स्त्रियां आ सकतीं हैं  लेकिन पत्नी का तो अलग स्थान रहता ही है न ..? दूसरी स्त्रियों के साथ रहे उनके संबंधों को हम भटकाव कह सकतें हैं ..जीवन की ऐसी कुछ चीज़ें उथली होती हैं.. लेकिन कुछ ऐसा भी तो होगा आप दोनों के बीच जो अदृश्य और स्थिर रहा होगा... कहीं न कहीं उनके मन में आपके प्रति कुछ तो अपनत्व भरा .. प्रेम भरा रहा होगा जिसमें आपने अपने प्रति प्रेम महसूस किया होगा..?”

कहतीं हैं – “मन में जरूर था उनके... इसमें कोई संदेह नहीं! कभी-कभी कहते भी थे कि मैं जानता हूँ तुमने बहुत बर्दाश्त किया है मेरे साथ .... लेकिन मेरी अपनी कुछ मजबूरियां हैं..!”

मैं खुश हो गयी उनकी ये बात सुनकर! कुछ तो ऐसा महसूस किया मैंने जिसमें प्रेम की झलक थी! हलकी ही सही! मैंने उत्सुकता से कहा – “चलिए स्वीकार तो करते थे न..!”

“स्वीकार तो करते थे.. बहुत करते थे .. ऐसी बात नहीं कि स्वीकार नहीं किया.. कभी कभी नहीं भी करते थे .. कभी कभी कहते थे – ए! तुम तो जिद लेकर बैठ जाती हो .. अरे क्या है इसमें अगर कुछ अलग है मेरे जीवन में!! ...लेकिन भीतर ही भीतर महसूस भी करते थे कि कोई भी औरत अपने पति के जीवन में दूसरी औरत बर्दाश्त नहीं करेगी..!”

“कभी गिफ्ट दिया उन्होंने आपको ?” मैं प्रश्न करती हूँ!

“हाँ, दिया था ... इनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक तो थी नहीं जो मुझे महंगा गिफ्ट देते... लेकिन एक बार दोस्तों के सामने इन्होंने मंगलसूत्र दिया था... मैं बहुत खुश हुई थी... गिफ्ट के लिए नहीं ..उनके दिल में आये मेरे प्रति प्रेम भरे भाव के लिए..ऐसा नहीं है कि चाहते नहीं थे ... मन में बहुत कुछ रखते थे लेकिन व्यक्त नहीं करते थे..!”

“अच्छा, कैसे महसूस किया आपने कि वो आपको चाहते थे .. कोई घटना बताइये ?” मैंने ये सोचकर प्रश्न किया  कि शायद वे किसी प्यारी-सी याद का जिक्र करें!

“पता चल जाता था.. बातों से..व्यवहार से ..!” मैंने ऐसा महसूस किया मानो कुछ और भी कहना चाहती हैं लेकिन नहीं कहतीं!

कुछ रुककर सोचकर इस बार वे स्वयं ही मेरे पहले प्रश्न के उत्तर में कहने लगतीं हैं –“शोभा, जो सम्बन्ध खत्म हो गया...जब था तब काफी दुखद था....अब नहीं हैं ...तो कैसे कहूँ कि प्रेम था ...कोई प्रेम नहीं था उनके दिल में मेरे लिए ... मत बात करो इस प्रसंग पर ..!” खिन्न होकर वे कहतीं हैं !

मैं भी प्रेम की बातें न करने की हामी भरती हूँ! रचना जी के बारे में बताने लगतीं हैं! वे हंस को किस तरह संभालती हैं! मैं भी “आपका बंटी” उपन्यास का जिक्र करके भावुक हो जातीं हूँ! कैसे पहली बार पढ़ते समय खूब रोई थी-उसका जिक्र करती हूँ! इसी तरह लंच करते हुए कुछ साहित्यिक और कुछ दूसरी बातें होती रहीं!

विदा लेने से पहले एक बार फिर मैं सुधा दीदी की कही बात का जिक्र करते हुए पूछती हूँ – “आपने कभी सुधा दीदी से कहा होगा कि अलग होने के बाद राजेंद्र जी आपका इतना ध्यान रखने लगे थे कि उनके उस आपके प्रति बदले व्यवहार को देखकर आपने उनसे कहा था - "मुझे ये पता होता कि अलग होने के बाद ये मेरा इतना ध्यान रखने लगेंगें .. मेरे बारे में इतना सोचने लगेंगें तो मैं पहले ही इनको अलग कर देती !”

हंसकर मेरी इस बात से सहमत होतीं हैं! उत्साहित होकर कहतीं हैं – “ये सही बात है!! .. मैंने कहा था कि ऐसा मालूम होता कि अलग होने के बाद ऐसे स्नेह जताएंगें तो मैं पहले ही अलग हो जाती ..!”

कुछ देर तक फिर राजेंद्र जी की ही बातें हम करतें हैं! कुछ नकारात्मक.. कुछ सकारात्मक! मैं उनसे पूछती हूँ कि आजकी बातचीत में आप दोनों के जीवन के कुछ सुखद पहलू छनकर आयें हैं उन्हें मैं ब्लॉग पर साझा करुँगी! हँसते हुए फिर वही सब दोहरातीं हैं! लापरवाही से कहतीं हैं – “अरे क्या प्रेम-व्रेम ....बहुत कुछ तो मुझे याद भी नहीं है...खैर तुम्हें इसमें कुछ प्यार नजर आता है तो लिख दो ..तुम्हें प्रेम-दिवस के लिए कुछ मैटर चाहिए लेकिन मैं बताऊँ तुम्हें शोभा ..जो कुछ मैंने झेला ..सहा.. उसके मुकाबले ये दो-एक छुट-पुट प्रेम भरी बातें कुछ मायने नहीं रखतीं.. !”

सचमुच दाम्पत्य में प्रेम और उपेक्षा बहुत उलझी हुई पहेली है! एक पत्नी ताउम्र उसके मकड़जाल में उलझकर रह जाती है जो न सहते बनता है, न कहते!

मैत्रेयी जी का जिक्र मन्नू जी ने ही छेड़ दिया था! न जाने क्यों मैं भी मैत्रेयी जी की नयी किताब का जिक्र शुरू कर देती हूँ! वे ज्यादा तवज्जो न देते हुए कहतीं हैं- “सुना है मैंने लेकिन अब मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देना चाहती .. जब से ये ब्लड सर्कुलेशन वाली समस्या हुई तब से मैं तो सारी दुनिया से कट गयी ... बस ..! धीरे धीरे अब थोड़ा बहुत दिखने लगा है...!”

मैं आश्वासन देती हूँ उन्हें भी उनके साथ अपने आपको भी कि वे जल्दी ही पूरी तरह से स्वस्थ हो जाएं! वे ठीक से देखने लगें लेकिन निराश होकर कहती हैं-“नहीं! अब ये ठीक नहीं होगा... डॉ कहते हैं ... बी हैप्पी.. खूब खुश रहिए.. एक्टिव रहिये... लोगों से मिलिए जुलिये ...! ...हालात तो कुछ ऐसे हैं कि मैं कुछ कर ही नही सकती.. फिर भी मैं कोशिश करके थोड़ा बहुत टहल लेतीं हूँ..!”

अंततः मैं मन ही मन उनके लिए पूरी तरह स्वस्थ होने की प्रार्थना करती हूँ! उनका हाथ थामकर कुछ क्षणों के लिए उनके पास ठहरकर उनसे विदा लेतीं हूँ! बेडरूम से बाहर निकलने लगतीं हूँ तो पीछे से उनकी आवाज सुनाई देती है – “गीता ने वो फूल सजा दिए हैं न ..?”

“जी! ये रहे मेरे सामने ..!” मैं डाइनिंग टेबल पर सजे गुलदस्ते की तरफ इशारा करती हूँ और उनका सौम्य, शालीन मुस्कुराता चेहरा मेरे भीतर ठहर जाता है.......

उनके दांपत्य जीवन में प्रेम था या पहेली ...उन्ही अनसुलझी कड़ियों में उलझकर रह गयी मैं! पति का प्रेम स्त्री का संबल होता है..अभिमान होता है.. पति का दूसरी स्त्रियों से बटा प्रेम भला कैसे कोई स्त्री स्वीकार कर सकती है!
हाँ.. पत्नी के कर्तव्यों को निभाते हुए मन्नूजी का प्रेम निस्वार्थ,एकनिष्ट और समर्पित प्रेम की परिभाषा है मेरे लिए! आजकल के स्वार्थी और सिर्फ भौतिक सुखों की चाह रखने वाले प्रेम से बिलकुल अलग  .......

प्रस्तुति;शोभा मिश्रा

8 comments:

  1. Prem karna apke vash me ho skta hai per prem Pana.. wo apke vash me nhi.

    Mujhe Mannuji se Milne ki badi iksha hai. Kya aap ek mulakat karwa skti hai?

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  2. प्रेम की गहराई अनंत है उसे शब्दों में तो कभी पूरा नहीं उतारा जा सकता ....आदरणीय मन्नू जी की बातें उनकी भोगी हुई ज़िन्दगी का दुखद हिस्सा हैं । अच्छा लगा आपके इस सराहनीय प्रयास को पढ़कर,जानकर।

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  3. Prem divas ka adbhut tohfa

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  4. जीवन के पैतीस साल देने के बाद अलग होना वाकई बहुत बड़ा निर्णय है .... आँख भर आई प्रेम का यह स्वरूप देख कर

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  5. भारतीय परिवार की विशेषता कहूँ या विडम्बना कि एक घर को बनाने में स्त्री अपना सर्वस्त्र सौंप देती है वहीँ पुरुष घर का स्थायित्व भी चाहता है और बाहर के ठिये भी !आर्थिक ज़िम्मेदारी निभा लेना ही परिवार की दृढ़ता के मानक नहीं और यहाँ तो मन्नू जी ने ये ज़िम्मेदारी भी निभाई.....पढ़ती ही चली गयी लेख फिर भी कहते नहीं बन रहा कि आपने बहुत अच्छा लिखा!क्यों कि एक दर्द की दास्ताँ को कैसे अच्छा कहूँ,लेकिन आपने बहुत सलीक़े से इस संस्मरण को सहेजा है! जानती हूँ काफ़ी कुछ मन्नू जी और राजेंद्र जी के दाम्पत्य जीवन के बारे में लेकिन आज भी उम्र के इस पड़ाव में इतनी तल्खियां समेटे मन्नू जी ने अपना पूरा जीवन कैसी मानसिक स्थिति में बिताया होगा ये सोच रही हूँ !

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  6. बहुत सुंदर संस्मरण है शोभा। बहुत दुख होता है यह सोचकर कि जीवन की बेहतरीन 35 बसंत किसी के साथ बिताने के बावजूद आपके पास कोई ऐसी याद नहीं जिसमें प्रीत की खुशबू महके। उनकी यादों में सिर्फ दुःख वितृष्णा और कड़वाहट ही दिखी। जीवन की अजीब विडम्बना जहाँ एक औरत सिर्फ प्रेम चाहती है और वही उसे evade करता रहता है। मिलता भी है तो धज्जियों की शक्ल में। बहुत देर तक haunt करता रहा यह लेख।

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