Wednesday, January 22, 2014

याद रहेगा बनारस- सुमन केशरी

"बनारस" के  स्मरण मात्र से ही मन में एक पवित्र भाव संचरित होने लगता है, सुमन जी की बनारस यात्रा का सजीव वर्णन हमें  इस  पावन स्थली की ऐतिहासिक धरोहरों - घाटों-मंदिरों  की अध्यात्मिक यात्रा  करवाती है ! यात्रा संस्मरण की पवित्र स्मृतियाँ बी. एच . यू परिसर में बने भारत संग्रह भवन संग्रहालय और भगवान बुद्ध की कर्म - स्थली सारनाथ में स्थित ऐतिहासिक धरोहरों के सजीव चित्रण  की दार्शनिक यात्रा करवाते हुए ... बुद्ध के उपदेशों और यशोधरा के त्याग  की स्मृतियों   से मन भिगोते हुए  गंगा दर्शन के पवित्र वर्णन के साथ समाप्त  होती है !


संस्मरण में यशोधरा के त्याग का वर्णन पढ़ते हुए ये पंक्तियाँ बरबस ही ध्यान आकर्षित करती हैं - "पुरूषोत्तम इस बात को बल देकर कहते हैं कि कभी स्त्रियों ने तो पुरूषों को भला बुरा नहीं कहा। मीरा ने तो कभी पुरूषों को गाली नहीं दी कि उनकी वजह से मीरा का ध्यान खंडित हुआ। शायद यह स्वयं तथागत के मन का डर रहा होगा कि उन्होंने यशोधरा को बिना बताए निकल जाना जरूरी समझा होगा "!
शोभा मिश्रा
http://issuu.com/doosariparampara/docs/dusari_parampra_dec_feb

साभार "दूसरी परंपरा"
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याद रहेगा बनारस
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सुमन केशरी


बनारस ...इस शब्द को पहली बार बूझते हुए सुनने से भी पहले इस शब्द को मैं कई बार सुन चुकी थी...यह शायद मेरे लिए कभी नया शब्द था ही नहीं पर हमेशा नया ही रहा...आज भी इस शब्द को उच्चारते ही मन में कहीँ कंपन होती है, प्रिय से पहली बार मिलने की-सी कंपन...
ऐसा क्यों होता है इस शब्द के साथ..क्या इसलिए कि यह शब्द जन्म से पहले भी साथ था और मृत्यु के बाद भी साथ रहेगा. क्या इसलिए कि जिस जलतत्त्व से हम उत्पन्न हुए उसकी एक धारा यहाँ भी प्रवहमान है...इसलिए कि गंगा यहाँ है, उर्वर धरती यहाँ है और मोक्ष भी यहीं है..या इसलिए कि जिस शब्द की साधिका मैं हूँ और बनना चाहती हूँ उसकी एक सुदीर्घ, अक्षुण्ण परंपरा यहाँ विद्यमान है। मुझे अपनी बात कहते कहते भी रामानुजन की याद आ रही है कि भारत में कोई भी पहली बार रामायण-महाभारत की कथा नहीं सुनता। यह कथा तो माँ के दूध के साथ बच्चे के रक्त में बहती है...
क्या बनारस के साथ भी ऐसा ही नहीं है....
पंडित बलदेव उपाध्याय की पुस्तक काशी की पांडित्य परंपरामें बतलाया गया है कि ऋग्वेद में दिवोदास का उल्लेख मिलता है, जिसने वाराणसी नामक नगर की स्थापना की, जो वाणिज्य का बड़ा केन्द्र था। उसी दौरान काशी, आयुर्वेद का केन्द्र माना जाता था, जिसके फलस्वरूप दिवोदास को धनवन्तरी की उपाधि दी गई थी। अथर्ववेद के एक मंत्र में काशी का उल्लेख मिलता है। वृहदारण्यक उपनिषद में मिथिला के समान ही काशी को अध्यात्म्य विद्या का केन्द्र माना गया है। महाभारत में काशी का उल्लेख तीर्थ के रूप में तो हुआ ही है साथ ही पांडवों की ओर से काशिराज से युद्ध का भी उल्लेख मिलता है। ध्यान रहे कि अंबा, अंबिका और अंबालिका काशिराज की ही पुत्रियाँ बतलाई गईं हैं। फ़ाहियान ने भी चौथी सदी में इस नगरी का उल्लेख एक बड़े वाणिज्य केन्द्र और विद्या एवं अध्यात्म की नगरी के तौर पर किया है। तो बनारस कालातीत है क्या?
संभवतः इसी कारण यह शब्द मेरे मन में एक  स्फुरन पैदा करता है...मैं बार बार उच्चारती हूँ इसे मन ही मन- बनारस...बनारस...बना रहे रस....
बनारस, लगता है यहाँ मेरी जन्म-जन्मांतर की नाल दबी है...
तो मेरे मन में बनारस एक बीज की तरह दबा रहा। पहली बार यहाँ विधिवत् जाने का योग बना 2009 में और निमंत्रण भी कहाँ से? सीधे बी. एच यू से! प्रो. कुमार पंकज ने मुझे अकेडमिक स्टाफ कॉलेज में प्राध्यापकों के लिए यू जी सी के
ओरिएंटेशन प्रोग्राम में अभिप्रेरणा एवं टीम वर्क   (मोटिवेशन ऐंड टीम वर्क) पर बात करने के लिए निमंत्रित किया था. वह लेक्चर मुझे कभी न भूलेगा. यूँ तो मैं इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन,(आई आई पी ए) दिल्ली, एडमिनिस्ट्रेटिव स्टाफ़ कॉलेज ऑफ़ इंडिया (आस्की) हैदराबाद,  बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट ऑफ़ पैलियोबॉटनी (बी एस आई पी) लखनऊ आदि में प्रबंधन और प्रशासन से जुड़े कई विषयों पर लेक्चर दे चुकी थी पर बी एच यू की बात ही जुदा थी।
इस पहली यात्रा में मेरे साथ ऋत्विक और ऋतंभरा भी थे। क्लास के बाद हम लोग बी एच यू के परिसर में ही बने भारत कला भवन संग्रहालय गए। बताया गया था कि इसे देखने में घंटे भर से ज्यादा समय न लगेगा, पर जब देखना शुरू किया तो लगा कि अरे यह तो खजाना है! राय कृष्णदास द्वारा बनाया यह संग्रहालय, स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हमारी राष्ट्र-चेतना का प्रतिबिंबन है। प्रवेश करते ही सामने तीन मूर्तियाँ प्रदर्शित हैं- बनारस से ही मिली चौथी सदी की गोवर्धनधारी की मूर्ति, प्रतिहार कालीन दसवीं सदी की कल्याण सुंदरम्  तथा छठी शताब्दी की अभय मुद्रा में छत्रधारी भगवान बुद्ध । यहाँ प्रदर्शित  एक मूर्ति मेरी आँखों से कभी ओझल नहीं होती। यह है बारहवीं शताब्दी की देवी की मूर्ति – दर्पण गौरी- इस मूर्ति को महाकवि जयशंकर प्रसाद ने इस संग्रहायल को भेंट में दिया था। ऐसे कई व्यक्तिगत भेंट इस संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। पाल शैली की विष्णु-वामन अवतार, पूर्वी भारत से मिली दसवीं सदी की महिषासुरमर्दिनी, कोटा से प्राप्त ग्यारहवीं सदी की ब्रम्हाणी की मूर्तियाँ  लगभग अखंड रूप में यहाँ मौजूद हैं। दूसरी सदी की कुषाणकालीन प्रसाधिका की मूर्ति तो देखते ही बनती है। यहाँ नृत्यरत गणेश तथा पाँचवी सदी, गुप्तकालीन रामायण का उत्कीर्ण भी प्रदर्शित हैं। 
(गोवर्धनधारी, कल्याण सुंदरम् तथा अभयमुद्रा में भगवान बुद्ध)
  गैलेरी दो में गिलगिट (पाकिस्तान) से प्राप्त चौथी-छठी सदी के लघुचित्र प्रदर्शित हैं। इसी गैलेरी में बुद्ध-जीवन, बोधिसत्व तथा अन्य देवी-देवताओँ के चित्र भी हैं।  सबसे आकर्षक है लौर-चंदा, मृगावती, चौर-पंचाशिका, रसिक प्रिया और बिहारी-सतसई आदि के आधार पर निर्मित चित्र। देह में एक फुरफुरी सी होती है इन्हें देखकर...। अनेक रागरागनियों को दर्शाते चित्र भी देखने के मिलते हैं। एक पूरी गैलेरी महामना को समर्पित है। मुगलपूर्व , मुगलकालीन और अंग्रेजों के जमाने के अनेक प्रकार के फ़रमान, नक्शे, हथियार, चित्र, मूर्तियाँ और सिक्के यहाँ देखने को मिले। विश्वविद्यालय परिसर में ही संग्रहालय देख कर यहाँ के इतिहास और पुरातत्त्व विभागों के अत्यंत विकसित और समृद्ध होने का अंदाज होता है, जो कितना सही है, यह तो कभी वहाँ जाकर ही पता चलेगा। हालांकि मुझे दुःख हुआ यह जानकर कि साहित्य-अध्यापन से जुड़े जिस व्यक्ति ने हमें इस संग्रहालय के बारे में बताया था उसे सच में इसकी समृद्धि का अंदाज न था , अन्यथा वह यह न कहता कि मुश्किल से घंटा भर लगेगा इसे देखने में। उसने इसे कभी देखा भी नहीं था। हमने उसकी बातों में आकर अपराह्न में सारनाथ जाने का फैसला कर गाड़ी बुक करवा ली थी। पर अब पछताने से कोई फ़ायदा न था। दो घंटे में किसी तरह संग्रहालय देखदाख कर हम सारनाथ के लिए रवाना हो गए।
सारनाथ- भगवान बुद्ध की कर्म-स्थली! भारतीय इतिहास के महापुरूष, जिन्हें उनके जीवनकाल में ही भगवान-तथागत मान लिया गया, मुझे सदा से ही प्रभावित-प्रेरित करते रहे हैं! अर्धोन्मीलित नयन और मुख पर अपार शांति! सारनाथ में ही भगवान बुद्ध ने अपने प्रारंभिक उपदेश दिए थे। महापरिन्निब्ब सुत्त में कहा गया है कि स्वयं बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि वे चार स्थानों पर अवश्य जाएँ- लुम्बिनी- जहाँ  सिद्धार्थ का जन्म हुआ था, बोध गया- जहाँ उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था, सारनाथ- जहाँ उन्होंने पहला उपदेश दिया था और कुशीनगर- जहाँ उन्होंने परिनिर्वाण प्राप्त किया था। प्राचीन समय में सारनाथ के इस स्थान को मृगदाव कहते थे। सारनाथ ही वह जगह है जहाँ संघ और धम्म की स्थापना हुई। पुरातात्विक उत्खनन से ज्ञात होता है कि तीसरी सदी ई.पू. से ईसा की बारहवीं सदी तक यहाँ बसावट रही। ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने यहाँ अनेक निर्माण किए। अशोक ने यहाँ भगवान बुद्ध के अवशेष पर धर्मराजिका स्तूप(धम्मेक) का निर्माण करवाया था। अशोक कालीन कुछ महत्वपूर्ण शिलालेख यहीं मिले थे।

दरअसल सारनाथ के स्तूप के आस-पास के स्थलों का उत्खनन 1835-36 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने शुरू करवाया। इसके बाद इस काम को आगे बढ़ाया मेजर कीटो ने 1851-52 में, मि. सी.हॉर्न ने 1865 में. उसके बाद इस काम को कुछ समय तक रोक दिया गया और फिर से यह काम शुरू किया गया एफ़. ओ. ऑर्टल(1904-05)ने। उनके बाद इसे आगे बढ़ाने का श्रेय  सर जॉन मार्शल (1907), मि. एच. हारग्रीव्ज़ (1914-15) को जाता है। जिस पहले भारतीय ने इसे देखा वे थे श्री दयाराम साहनी जिन्होंने यहाँ 1927 से लेकर 1932 तक काम किया।  यह भी महत्त्वपूर्ण है कि  भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण को यहाँ मिले धरोहर इतने महत्त्वपूर्ण लगे कि उन्होंने अपना पहला संग्रहालय यहीं बनवाया। यह संग्रहालय 1904 में बनना शुरू हुआ और 1910 में तैयार हुआ। इस संग्रहालय में पाँच गैलेरी और दो गलियारें हैं। इस संग्रहालय को  जेम्स रेलसम ने विहार की तर्ज पर बनवाया है। यहाँ तीसरी सदी ई.पू. के मौर्यकालीन मूर्तियों, स्तंभों एवं शिलालेखों के अलावा पहली सदी की कुषाण कालीन मूर्तियाँ, चौथी-पाँचवी सदी की गुप्तकालीन मूर्तियाँ आदि तथा ग्यारहवीं-बारहवीं सदी की मूर्तियाँ एवं अन्य वस्तुएँ भी प्रदर्शित की गईं हैं। यहाँ बुद्ध की तो विश्वप्रसिद्ध मूर्तियाँ हैं ही, साथ ही तारा, अवलोकितेश्वर पद्मपाणि, वज्रपाणि, बोधिसत्व मैत्रेय,अपराजिता  आदि के साथ साथ शिव,वाराह, उमा-महेश्वर तथा नवग्रहों की भी प्रतिमाएं हैं। यहाँ बारहवीं सदी की एक विशाल मूर्ति शिव द्वारा अंधकासुरवध की है। यहाँ नैपथ्य में महामृत्युंजय का जाप चलता रहता है।  इन देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ अधिकांशतः ग्यारहवी- बारहवीं सदी की हैं। यह भी कहा जाता है कि यह स्थान बौद्धों के अलावा जैन तीर्थंकरों का भी स्थान रहा है। यहीं जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ ने जन्म लिया था। पार्श्वनाथ की जन्मभूमि के स्थान पर निर्मित मंदिर आज भी काशी के भेलूपुरा मुहल्ले में महाराजा विजयानगर के महल के पास स्थित है।
जैसे जैसे हम सारनाथ के निकट पहुँचते गए, तैसे तैसे मुझे राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त की रचना  यशोधरायाद आती गई। मेरे मन में भी इस बात का गहरा क्षोभ है कि तथागत ने यशोधरा के साथ अन्याय किया था। अगर बुद्ध उन्हें बता देते तो क्या सच में यशोधरा ने पति को रोक दिया होता? क्या स्त्री सच में कभी रोक पाती है, पुरूष को अपने मन की करने से! पुरूष के निर्णय अधिकांशतः उसके अपने निर्णय होते हैं, भले ही इसका दोष वह दूसरों पर मढ़ता रहे। कबीर आदि संत कवि भी जब स्त्रियों को नर्क का द्वार या माया महाठगिनी कहते हैं, तो यह उनके मन की कमजोरी होती है। पुरूषोत्तम की कबीर पर लिखी किताब अकथ कहानी प्रेम की: कबीर  कविता और उनका समय में पुरूष की इस मानसिकता का   अच्छा विश्लेषण मिलता  है। पुरूषोत्तम इस बात को बल देकर कहते हैं कि कभी स्त्रियों ने तो पुरूषों को भला बुरा नहीं कहा। मीरा ने तो कभी पुरूषों को गाली नहीं दी कि उनकी वजह से मीरा का ध्यान खंडित हुआ। शायद यह स्वयं तथागत के मन का डर रहा होगा कि उन्होंने यशोधरा को बिना बताए निकल जाना जरूरी समझा होगा!
अब हम सारनाथ के धम्मेक (धर्मराजिका) स्तूप के पास खड़े थे।

अपनी भव्यता में धम्मेक नामक यह स्तूप गजब है। इसके चारों ओर बगीचा है। हरियाली के बीच लाल स्तूप! आस पास विस्तार में फैले पुरातात्विक अवशेष और कुछ शिलालेख। समय की मार स्तूप पर दिखाई पड़ती है, जगह जगह से टूट-चटक रहा है अब यह। हमारे गाईड ने हमें बताया कि आस-पास बसे लोग यहाँ से ईंटे चुरा रहे हैं।यह सुनते ही मन खिन्न हो गया। कितने अदूरदर्शी और लालची लोग हैं हम। अपने धरोहरों के प्रति हमारे मन में कोई मोह नहीं, कोई सम्मान नहीं।  याद आया ऑस्ट्रेलिया का अपना प्रवास और पर्थ का फ़्रीमेंटल जेल! कुल जमा सौ-सवा साल पहले बनी होगी यह जेल और अब वह वहाँ के लिए प्राचीन विरासत है, जिसके रख-रखाव पर इतना ध्यान दिया जाता है कि क्या बताऊँ। इसी तरह सिडनी में किसी व्यक्तिगत संग्रहालय जाना हुआ था, जो मुश्किल से सौ साल पुरानी होगी, पर वहाँ भी खूब रखरखाव था और सभी टूरिस्यों को उसे देखने के लिए भेजा जा रहा था। पर सारनाथ  जो कम से कम चार-पाँच हजार साल पुरानी होगी, उसके प्रति हमारा यह रवैया! अरे यहीं के तो अशोक स्तंभ से स्वाधीन भारत ने अपना प्रतीक-चिन्ह  लिया है। उस स्तंभशीर्ष को हमने वहाँ के संग्रहालय के मुख्य हॉल शाक्यसिंह में देखा- विजयी भाव से खड़े! सामने से दिखाई पड़ने वाले तीनों सिर लगभग अखंड है, पीछे वाला चौथा खंडित है। नीचे उलटा कमल और उसपर बने ये सिंह । एकबार फिर मन स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति, संविधान बनाने वालों के प्रति और लोकतंत्र का सपना दिखाने वालों के प्रति श्रद्धा से भर गया। यदि यह देश लोकतांत्रिक राष्ट्र न होता तो क्या कोई इतने मजे में ईंटे चुरा लेता और जब चाहे जैसे चाहे गांधी से लेकर आज के नेता तक को गरिया लेता? मंदिर-मस्जिद कर लेता? पर क्या लोकतंत्र ऐसे ही कामों के लिए है? क्या लोकतंत्र का अर्थ है - सारे अधिकार और कोई कर्तव्य नहीं! उस जगह पर खड़ी मैं जाने क्या क्या सोच रही थी।
तभी हल्की-सी गुनगुनाहट कानों में पड़ी और कदम स्वतः अंदर की ओर बढ़ गए।  तथागत की एक भव्य प्रतिमा- पद्मासन मुद्रा में. सारनाथ में बुद्ध के प्रथम उपदेश को समर्पित- बुद्ध धर्मचक्र प्रवर्तन मुद्रा में। आकाशचारी देवियों, शिष्यों और मृगों के साथ दो और मनुष्याकृतियाँ हैं, जो संभवतः इस मूर्ति को उत्कीर्ण कराने वाली स्त्री और उसके पुत्र की हैं। गज़ब सुंदर मूर्ति है। इसे सारनाथ का सार ही कहना चाहिए।  वहीं  देशी-विदेशी भिक्षु कुछ मंत्र-सा पढ़ रहे थे। मंत्र का प्रभाव देखिए कि हम निःशब्द वहीं बैठ गए।  मेरी तो आँखें भी मुंद गईं। जाने किस भावावस्था में चली गई । काफी देर बाद ऋत्विक ने मुझे छुआ...कहाँ थी मैं..क्यों लौटा लाए मुझे फिर इस जगत में....
बाहर निकले तो हमारा गाइड हमें एक ऐसी जगह ले गया, जिसे सीता मैया की रसोई कहते हैं। सुनते हैं कि वनवास के दौरान राम ने सीता और लक्ष्मण जी के साथ यहाँ निवास किया था। देश में कई ऐसे स्थल हैं, जिनका संबंध दशरथ पुत्र राम के संग जोड़ा जाता है। नासिक में पंचवटी और नागपुर के समीप रामटेक जाने का अवसर भी मिला है। नासिक के नजदीक की एक पहाड़ी तो हनुमानजी की माता अंजनि के नाम पर ही है।
हम अभी पुरातात्विक स्थल देख ही रहे थे कि हमें बुनकरों ने घेर लिया। सारनाथ में बुनकरों का एक गिल्ड है जो कथित रूप से लगभग फैक्टरी दाम पर कपड़े बेचता है। लगा बजाय इसके कि बिचौलियों को लाभ मिले, क्यों न हम सीधे बुनकरों से बनारसी साड़ियाँ खरीद लें। कुछ साड़ियाँ आदि खरीद लीं पर सच कहूँ तो लगा कि बात बनी नहीं..पर फिर एक पुरानी कहावत भी साथ ही याद आती है जिसका आशय है कि जिस दुकान से आप खरीदारी कर रहे हों, उसकी अपेक्षा सामने वाली दुकान की चीज सदा कुछ बेहतर लगती है और आपको लगता है कि आप तो लूट लिए गए...क्यों मैं ठीक नहीं कह रही क्या?  
बनारस में यदि आपने घाट और मंदिर न देखे तो बनारस क्या देखा!  यह सवाल एक सभ्यतापरक सांस्कृतिक सवाल है। तो अगले रोज हमने काशी-विश्वनाथ और हनुमान जी के दर्शन के बाद सायंकाल में गंगाघाट की प्रसिद्ध आरती देखना तय किया। पहली बार काशी विश्वनाथ जाना अपने आप में एक अनुभव है। इस अनुभव में इतिहास की अपनी भूमिका है और है एक निरंतर भय कि कहीं इस पर भी राजनीति न शुरू हो जाए. यही भाव मेरे मन में तब भी आया था,  जब मैं मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के दर्शन के लिए गई थी। एक अजीब-सी बेचैनी और बाबरी मस्जिद विध्वंस के जुनून के पैदा होने के वक्त कुछ ठोस न कर पाने का गहरा दुख। हम सब जानते ही हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर भीतर गलियों में है और वहाँ पुलिस का सतत पहरा रहता है। जुलाई यानी श्रावण मास और कांवड़ियों की भीड़। हम वी आई पी गेस्ट थे इसीलिए लाइन फंदाते दो पुलिस वाले हमें साथ लेकर तेज चाल में मंदिर पहुँचे। द्वार पर ही हमारे लिए दोने में प्रसाद और कुल्हड़ में दूध लिए एक अन्य सिपाही खड़ा था। हम भीतर ले जाए गए। पुजारी ने हमसे प्रसाद और मालाएं लीं और दूध चढ़ाने के लिए कहा। जितनी तेजी से हम पहुँचे थे, लगभग उसी गति से पुलिसवालों ने हमें आगे ढकेल-सा दिया। वहाँ हम मुश्किल से एक-दो मिनट के लिए होंगे। मेरी बड़ी इच्छा थी कि शिवलिंग को छू सकूँ, पर मेरे कद ने मुझे धोखा दे दिया। अब तक मैं तीन बार वहाँ जा चुकी हूँ पर शिवलिंग को स्पर्श कर पाने में  असफलता ही मिली है! बाबा विश्वनाथ के दर्शनों के पश्चात हम संकट मोचन मंदिर गए जहाँ बंदरों ने हमारा स्वागत किया। पर जो बात मुझे सबसे ज्यादा अच्छी लगी वह थी वहाँ की सफाई और व्यवस्था। अच्छी तरह लाइन में लगे श्रद्धालु और कोई शोर शराबा नहीं । संभवतः इसलिए भी कि वह न तो मंगल का दिन था न शनि का। वह एक सामान्य दिन था जिस दिन ज्यादातर टूरिस्टी किस्म के दर्शनार्थी वहाँ पहुँचते होंगे। वहाँ का प्रसाद बहुत स्वादिष्ट होता है, इसलिए हमने लौट कर बाँटने के लिए ढेर सारा प्रसाद खरीद लिया!

अब गंगा दर्शन की बारी थी और मन में गूंज रहा था- संवत सौलह सौ असी असी गंग के तीर श्रावन सुक्ला सप्तमी जो तुलसी तज्यौ सरीर। उस महाकवि को याद करके मन और आँखें दोनों ही भर आए। मैंने अपने मेजबान से कहा कि या तो मुझे वे मुझे सबसे पहले अस्सी लेकर जाएँ जहाँ तुलसी ने निवास किया था और मानस के कुछ हिस्से रचे थे या फिर पंचगंगा घाट जहाँ कबीर अपने गुरू से मिले थे और कबीर बने थे। गंगा को मैं सबसे पहले कबीर अथवा तुलसीदास को प्रणाम करते हुए ही देखना चाहती थी और उन्हें नमन करते हुए  अनंत काल से बह रहे जल को छूना चाहती थी। यह इस कवि का अपने पूर्वजों को स्पर्श करने जैसा था ! मेजबान ने बतलाया कि गाड़ी से असी जाना संभव नहीं, पैदल ही पंचगंगा जाना पड़ेगा। यह बनारस की प्रसिद्ध गलियों में चलने का पहला मौका था। संकरी-संकरी गलियाँ और एक से निकलती दूसरी गली। बीच बीच में या तो भक्तों के दर्शन होते या गौमाता के! हर घर गोया एक मंदिर..उससे आगे बढ़े तो घर के दरवाजे से सटी पान की छोटी-सी दूकान। पल दो पल बाद ही एकदम देह से छूते मोटरसाइकिल या स्कूटर निकल जाते। बड़ा डर लगा कि कहीं औंधे मुँह गिर न पड़ें हम। ऋतंभरा ऐसी स्थिति में तुरंत माता बन जाती हैं, उन्होंने हमें अपने बाँए कर लिया। ऋत्विक आगे चल रहे थे कि कहीं कुछ आया तो सबसे पहले वे ही उससे निबट लेंगे! गलियों में रहने का हमें बिल्कुल अभ्यास नहीं है। हम तीनों की लगभग सारी जिंदगी दक्षिणी दिल्ली में ही गुजरी है। तेजी से चलते हुए हमने कई कई गलियाँ पार कर लीं। हमारे मेजबान हम लोगों की तेज चाल से बहुत खुश थे। स्वभावतः वे सबसे आगे चल रहे थे। ये लो कई सीढ़ियाँ चढ़ आ गए हम पंचगंगा! मन में स्फुरन हुआ , कितने सौ साल पहले एक जुलाहा यहाँ अंधेरे में आ लेटा था और राम-नाम सुन ऐसी भक्ति में डूबा कि पाछे लागे हरि फिरे कहत कबीर कबीर.. खैर मैंने वहाँ पहुंच कर भर निगाह गंगा देखी- ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको ?उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा...मैंने नीचे घाट पर उतर जल को स्पर्श किया तो याद आए जननी और जनक- ईश्वर तुम्हारी आत्मा को शांति दें....अंजुरी भर जल...बस यही तर्पण है


तुम्हारा...

-सुमन केशरी

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